Monday, May 5, 2014

रेल भवन के बाहर तैनात नन्हा लोको

 जब दिल्ली के रेल भवन के पास से गुजरते हैं तो यहां पर बाहर के नन्हें से रेलवे इंजन को तैनात देखते हैं। ये लोकोमोटिव है पूर्वोत्तर सीमा रेलवे का,  जो 1993 तक रेलवे को अपनी सेवाएं दे रहा था। अब यह आते जाते लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। इसे रेलवे की विरासत के तौर पर रेल भवन के बाहर लाकर स्थापित किया गया है।

लंबे समय तक दार्जिलिंग हिमालयन रेल पर अपनी सेवाएं देने के बाद ये रिटायर हुआ और अब रेल भवन के बाहर शोभा बढ़ा रहा है। ये नन्हा से इंजन इस बात की प्रतीत है रेलवे ने नन्हें लोको से आगे बढ़ते हुए आज 4500 हार्स पावर के और 160 किलोमीटर प्रति घंटे तक गति तक वाले लोको तक का सफर तय किया है। हर बड़े सफर की शुरुआत तो आखिर छोटे से सफर से ही होती है ना।
रेल भवन के बाहर आराम फरमा रहे 799 बी एक स्टीम लोकोमोटिव (इंजन) है। इसका निर्माण ब्रिटेन के ग्लासगो की कंपनी नार्थ ब्रिटिश लोको कंपनी ने 1925 में किया था। इसका मेक नंबर 23292 है। लंबे समय तक धुआं उड़ाते हुए बड़े शान से सेवाएं देने के बाद इसे 1993 में संरक्षित किया गया। रेलवे के विकास के इतिहास की कहानी मूक रूप से याद दिलाने के लिए रेल भवन के बाहर लाकर तैनात किया गया। 
 
बड़ौदा हाउस के बाहर भी एक नन्हा लोकोमोटिव 

बड़ौदा हाउस जो उत्तर रेलवे का मुख्यालय है नई दिल्ली के इंडिया गेट के पास स्थित है। यहां पर भी एक नन्हा लोको आराम फरमा रहा है। ये तत्कालीन पाकिस्तान में अपनी सेवाएं दे रहा था। 1910  में बना ये लोको कराची पोर्ट ट्रस्ट में पहली बार तैनात किया गया। इसका निर्माण स्कॉटलैंड की डिक केर एंड कंपनी ने किया था। एमटीआर ( 0-4-2) मॉडल का ये ये दो फीट 6 इंच का नैरो गेज मार्ग पर चलने वाला लोको था। इससे लंबे समय तक लकड़ी ढुलाई का का काम लिया गया। कराची बंदरगाह पर मालगाड़ी के डिब्बों के ये लोको लंबे समय तक ढोता रहा। 1922 में इसे पंजाब के ढिलवां प्लांट को स्थानांतरित कर दिया गया।
बडौदा हाउस के बाहर नन्हा लोको- ( फोटो - विद्युत प्रकाश) 
-  vidyutp@gmail.com  

( NARROW GAUGE, RAIL, DHR , RAIL BHAWAN, DELHI ) 

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