Friday, May 2, 2014

देश का सबसे लंबा नैरोगेज- ग्वालियर श्योपुर लाइट रेलवे

मध्य प्रदेश के चंबल क्षेत्र में चलती है देश की सबसे कम चौड़ाई वाली पटरी की स्पेशल गेज ट्रेन। इसकी दूसरी खास बात ये है कि ये देश की सबसे लंबी दूरी की लाइट रेलवे है जो अभी संचालन में हैं। ये ट्रेन चंबल की उन्हीं वादियों के बीच से गुजरती है जहां कभी डाकूओं का आतंक हुआ करता था। ऐतिहासिक शहर ग्वालियर से श्योपुर के बीच चलती है छोटी लाइन की ट्रेन। इसे स्पेशल गेज का नाम दिया गया है क्योंकि ये नैरो गेज से भी छोटी है। ये ट्रेन ग्वालियर शहर को मध्य प्रदेश के दूसरे जिले श्योपुर से जोड़ती है। कई इलाकों में सड़के बन जाने के बावजूद ये ट्रेन आज भी चंबल के लोगों की जीवन रेखा है। ये चंबलवासियों की महबूब ट्रेन है।

ग्वालियर श्योपुर तक चलने वाली इस ट्रेन का सफर 1912 शुरू हुआ था। लंबाई के लिहाज से बात करें तो यह देश का सबसे लंबा नैरो गेज मार्ग है। कुल 198 किलोमीटर का चंबल के बीहड़ों से होकर सफर। बीच में हैं कुल 28 रेलवे स्टेशन आते हैं
इस रेल मार्ग का आखिरी रेलवे स्टेशन श्योपुर कभी मुरैना जिले की तहसील हुआ करता था, पर अब यह जिला बन चुका है।ये ट्रेन मीटर गेज नहीं, नैरो गेज नहीं बल्कि स्पेशल गेज की है। पटरियों के बीच चौड़ाई महज दो फीट (61 सेंटीमीटर) है। यानी कालका शिमला से भी छोटे हैं,  इसके डिब्बे। ग्वालियर से श्योपुर कलां तक का रेल मार्ग 198 किलोमीटर लंबा है। अपने स्पेशल गेज में ये दुनिया की सबसे लंबी और सबसे पुरानी रेल सेवा है जो चालू है।

कभी महाराजा ने मंगवाई थी खिलौना ट्रेन
ग्वालियर राजघराने के महाराजा माधवराव सिंधिया ( 1886 -1925 ) तकनीकी दिमाग वाले व्यक्ति थे। उनकी पढ़ाई ब्रिटिश पब्लिक स्कूल में हुई थी। एक बार उनके मास्टर जी जे डब्लू जॉनस्टोन जब छुट्टियों पर ब्रिटेन जाने लगे तो युवराज ने फरमाइश कर डाली कि वहां से मेरे लिए एक खिलौना ट्रेन लेकर आइएगा जिसमें बैठकर सैर कर सकूं। जब मास्टर जी ग्वालियर लौटे तो वाकई भारी भरकम खिलौना ट्रेन लेकर लौटे। वे एक स्टीम लोकोमोटिव, छह डिब्बे और आधे मील बिछाने के लिए दो फीट चौड़ाई वाला रेलवे ट्रेक लेकर आए।

आधे किलोमीटर की इस लाइन को ग्वालियर के किले में बिछाया गया। पर समस्या ये आई कि जब इस ट्रेन का संचालन शुरू किया गया तो आधे किलोमीटर का ट्रैक काफी छोटा पड़ रहा था। जब तक ट्रेन स्पीड पकड़ती थी तभी उसका रेल मार्ग खत्म हो जाता था। तब इस ट्रेन के सफर का पूरा मजा लेने के लिए महाराजा ने दो मील और रेल ट्रैक का आर्डर किया। तब ग्वालियर किले का परिसर इसके लिए छोटा पड़ने लगा। तब इस खिलौना ट्रेन का विस्तार मुरार तक किया गया। अब ये खिलौना ट्रेन ग्वालियर प्रिंसले स्टेट और ब्रिटिश सरकार के बीच विवाद का मुद्दा बन गई। जब तक ट्रेन राज महल के अंदर चल रही थी ये खिलौना ट्रेन थी। पर शहर के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक पटरी बिछा दिए जाने के बाद ये रेलवे सिस्टम बन गया। एक साल बाद ब्रिटिश सरकार ने इसे निजी रेलवे सिस्टम के तौर पर मान्यता दे दी। इसके बाद ग्वालियर से सुसेरा तक 13 किलोमीटर तक का रेल मार्ग बिछाया गया। यहां तक महाराजा शिकार करने जाया करते थे। तकरीबन 20 साल में ये मार्ग बनकर तैयार हुआ।


1904 में इस रेल सेवा को ग्वालियर लाइट रेलवे के नाम से शुरू कराया था।
ग्वालियर से जौरा तक का 51 किलोमीटर का लंबा मार्ग 1904 में चालू हो गया था। साल1904 के दिसंबर में जौरा से सबलगढ़ का मार्ग भी चालू हो गया। साल 1908 के नवंबर माह में बीरपुर तक परिचालन शुरू कर दिया गया। इसका श्योपुर कलां तक पूरा सफर 1909 में आरंभ हो सका। इस तरह 2009 में इस रेल सेवा ने अपना शताब्दी वर्ष मनाया। 
यानी अब  सौ  साल  से  ज्यादा पुरानी हो चुकी है ये सरपट दौड़ती रेल। अब इस ट्रेन का संचालन उत्तर मध्य रेलवे के जिम्मे है। ग्वालियर के महाराजा ने दो लाइट रेलवे का निर्माण अपने राज्य क्षेत्र  में कराया था। एक मार्ग तो ग्वालियर श्योपुर के बीच का था। जबकि दूसरा मार्ग ग्वालियर से भिंड तक का था। ग्वालियर से भिंड का 84 किलोमीटर का मार्ग साल 2001 में ब्राडगेज में परिवर्तित हो चुका है। ये दोनो मार्ग ग्वालियर से आरंभ होते थे। घोसीपुरा रेलवे स्टेशन पर भिंड का मार्ग अलग हो जाता था। आजकल ग्वालियर से सुबह छह बजकर 30 मिनट पर  खुलने वाली पहली ट्रेन शाम चार बजे के बाद आखिरी स्टेशन श्योपुर पहुंचाती है।


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( GWALOIR , SHEOPUR , LIGHT, RAILWAY, NARROW, GAUGE  )  


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