Wednesday, April 30, 2014

दुनिया की सबसे छोटी नैरो गेज लाइन

ये दुनिया की सबसे छोटी नैरो गेज लाइन है जो अभी चालू है। कुल दो किलोमीटर का सफर पूरी मस्ती से तय करती है, लेकिन यात्री नहीं ढोती। माल ढुलाई के काम आती है। असम के तिनसुकिया के पास तिपोंग में चलती है ये ट्रेन। 


तिपोंग कोलरी इस रेलवे ट्रैक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस रेलवे ट्रैक पर दुनिया की सबसे छोटे लोको का इस्तेमाल किया जा रहा है। ए क्लास 0-4-0 सेडल टैंक लोको छोटे-छोटे मालगाड़ी के डिब्बों को खींचता है। ये लोको काफी साल पहले दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे में इस्तेमाल किया जा रहा था। इस ए क्लास लोको का नाम तिपोंग वैली डेविड दिया गया है। इस ए क्लास लोको से शंटिंग आदि काम लिया जाता है। वहीं तिपोंग नार्थ इस्टर्न कोलफील्ड्स ( एनईसी) के कोलयरी के कोयला ढुलाई के काम के लिए बी क्लास के इंजन इस्तेमाल किए जाते हैं जिन्हें दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे से सेकेंड हैंड के तौर पर खरीदा गया है।

ये रेलवे लाइन भारतीय रेल के मीटर गेज रेलवे स्टेशन के पास से आरंभ होता है। इसके दो किलोमीटर के मार्ग में एक सुरंग और कई छोटे छोटे पुल आते हैं। साथ साथ सड़क भी है। छोटे से मार्ग में हरियाली और खूबसूरत नजारे हैं। बांस और फूस के बने लोगों के घर रास्ते में पड़ते हैं। हालांकि 1998 में कोलयरी में एक बार इस रेलवे लाइन को हटाकर सड़क बनाने का प्रस्ताव आया लेकिन ऐसा नहीं किया जा सका। इस रेलवे लाइन 2014 में भी माल ढुलाई का काम जारी है। हालांकि इस छोटे से मार्ग के रखरखाव में काफी समस्याएं आती हैं। कई तरह के कल पुर्जे नहीं मिलते।
तिपोंग लाइन को ठीक करने की कोशिश। 
नैरोगेज की बात करें तो इसका मतलब 2 फीट 6 ईंच ( 762 एमएम) पटरियों के बीच की चौड़ाई वाली रेलवे लाइन। हालांकि कुछ नैरोगेज लाइनों की चौड़ाई दो फीट भी है। भारत में पहली 762 एमएम की नैरोगेज लाइन 1863 में बडौदा स्टेट रेलवे ने बिछाई। यह रेलवे बड़ौदा के गायकवाड रियासत के अंतर्गत आती है। 1897 में बारसी लाइट रेलवे की शुरूआत हुई जो लंबी रेलवे लाइन थी।

नैरोगेज रेलवे के फायदे
नैरोगेज लाइन बिछाने में खर्च कम आता है। इसे कम जमीन में बिछाया जा सकता है। कई बार ये सड़कों किनारे फुटपाथ पर भी बिछा दी जाती है। रेलवे पुल और सुरंग आदि बनाने में भी खर्च कम आता है। नैरोगेज रेल ब्राडगेज की तुलना में ज्यादा तीखे मोड़पर आसानी से घूम जाती है। इसलिए ऐसी रेल पहाड़ों के लिए मुफीद है। ऐसी रेल पहाड़ों के पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाती है। घ्वनि प्रदूषण और वायु प्रदूषण भी ऐसी लाइन से कम मात्रा में होता है। शहरों में इसे घनी आबादी वाले इलाकों में भी आसानी से चलाया जा सकता है।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com

1 comment:

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