Sunday, August 31, 2014

गुजरे हैं जिन राहों पर साथ साथ... ((46))

कानपुर का प्रसिद्ध जेके मंदिर। 
( पहियों पर जिंदगी 46)
07 नवंबर 1993  सुबह की साइकिल रैली में मैं नहीं जा सका। कावेरी कोच में चल रहे सदभावना रेल यात्रा के मोबाइल दफ्तर का चार्च मैं आज भवानी भाई और रामकृष्ण भाई को सौंप रहा हूं। कानपुर रेल यात्रियों का ज्वाएनिंग और रिलीविंग स्टेशन भी है। पर आज यहां हमारे शहर हाजीपुर से कोई नया यात्री नहीं आया। सुबह 10 बजे मैं कृष्णकांत के साथ बिरहाना रोड गया। वहां एनवाईपी की शिविरार्थी और पुरानी सर्वोदय कार्यकर्ता सावित्री श्रीवास्तव रहती हैं, जो हमें बेंगलुरू शिविर में मिली थीं उनसे घर पहुंचा। उनके घर नास्ता किया। सावित्रि जी के साथ शिप्रा श्रीवास्तव भी बेंगलुरू में गई थीं, पर शिप्रा वहां नहीं मिली। वह किसी रिश्तेदार के यहां रहकर पढ़ाई कर रही है। कानपुर में रेलयात्रा का अनुशासन थोड़ा ढीला हुआ नजर आया। रणसिंह परमार भाई साहब ग्वालियर चले गए हैं। वे अभी लौट कर नहीं आए हैं।

आज सुबह का नास्ता कानपुर के जिलाधिकारी के निवास पर था। तो दोपहर का कार्यक्रम कानपुर के प्रसिद्ध उद्योगपति सिंघानिया परिवार के स्कूल में था। रेमंड और पार्क एवेन्यू उनके विश्व प्रसिद्ध ब्रांड है। सिंघानिया परिवार की ओर से बनवाया गया, कानपुर का जेके मंदिर काफी प्रसिद्ध है। रेल यात्रियों को इस मंदिर के दर्शन का मौका मिला। शाम का कार्यक्रम खलासी लाइन में था। रात को रेलवे स्टेशन के द्वतीय श्रेणी प्रतीक्षालय में ही सर्वधर्म प्रार्थना सभा और सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। रात को सोने में सबको देर हो गई।

हमारी हाजीपुर जाने वाली ट्रेन देर रात गए कानपुर से ही देर रात गए मिलने वाली थी। इसलिए मैंने सोने से पूर्व भाईजी से और दफ्तर के अन्य प्रमुख लोगों से विदाई ले ली। सुब्बराव जी कितने भी प्रिय लोग आएं या फिर जाएं दुखी नहीं होते। उनके अंदर गीता में कहे गए स्थित प्रज्ञ मनुष्य जैसे लक्षण है। वे किसी के जाने पर उदास नहीं होते। चेहरे पर एक जैसा भाव रहता है।



इससे अच्छी पढ़ाई क्या हो सकती है...
मुझसे सुब्बराव जी कहते रहे हैं कि रेलगाड़ी पर एक साल गुजारो। भला इससे अच्छी पढ़ाई और क्या हो सकती है। पूरा देश घूमने का मौका मिल रहा है। पर मैं सुब्बराव जी से विदाई लेते हुए उदास हो गया। अंदर ही अंदर आंसू आ रहे हैं। इतनी प्यारी ट्रेन। ट्रेन में देश भर से आए लोगों का परिवार छूटता जा रहा है। जब मैं वापसी का टिकट बनवा रहा था तो भी विश्वास नहीं हो रहा था कि मैं सदभावना यात्रा से अलग हो रहा हूं। भाई जी ने चलते हुए कहा- तुम दोनों ही चले जाओगे तो आफिस कौन संभालेगा।

वह अन्नपूर्णा में आखिरी चाय - रात को कुछ साथियों ने अन्नपूर्णा कोच में हमारे लिए चाय बनाई। तकरीबन दस लोगों ने साथ साथ चाय पी और उदास हो गए। इस चाय पार्टी में रेखा मुड़के, मधु भाई, देवेंद्र पासवान, मनोज शर्मा, वीना बंसल, गुरप्रीत जैसे लोग मौजूद थे। मानो एक परिवार बिछड रहा है। कई लोग तो रो पड़े।
 रेलयात्रा का मुंबई में स्वागत। सुब्बराव के साथ हैं उषा मेहता। यादें रह जातीहैं...
रात के डेढ़ बजे हैं। सभी डिब्बों के यात्री सो रहे हैं। मधुभाई ने कावेरी कोच का दरवाजा खोला। मैं और भाई अपनी सदभावना ट्रेन छोड़कर प्लेटफार्म नंबर 5 पर आ गए। दिल्ली से आने वाली वैशाली एक्सप्रेस का इंतजार करने लगे। मेरी आंखों में दिल्ली से चलने के बाद हर रेलवे स्टेशन के नजारे घूम रहे हैं। हम दोनों भाई और उदास होते जा रहे हैं। एक दिन पहले रेलयात्रियों की हुई सभा में अंतिम भाषण में मैंने शायर की ये पंक्तियां दुहराई थीं -
शिकवों को उठा रखना, आंखों को बिछा रखना
आ जाए शायद कोई, ......दरवाजा खुला रखना 
परंतु कुछ न कुछ शिकवे शिकायत तो जिंदगी में हमेशा बने ही रहते हैं। पर क्या सारी जिंदगी सदभावना की रेल हो सकती है। नहीं हो सकती ना...पुराने लोग बिछुड़ते हैं नए लोग मिलते हैं। लेकिन पहले जैसी बात कहां होती है...

गुजरे हैं जिन राहों पर कभी, हम तुम साथ साथ
वो राहें रोक कर पूछेंगी, बता तेरे हमसफर कहां गए....



Saturday, August 30, 2014

यूपी के मैनेजेस्टर कानपुर में ((45))

( पहियों पर जिंदगी 45 )

06 नवंबर 1993  अगर लुधियाना पंजाब का मैनेजेस्टर है तो कानपुर उत्तर प्रदेश का। हमारी ट्रेन सुबह सुबह यूपी के सबसे बड़े औद्योगिक शहर कानपुर में खड़ी  है। शाहजहांपुर से ट्रेन रात में चली और बालामउ और उन्नाव होते हुए कानपुर पहुंची। वैसे शाहजहांपुर का मुख्य रेल मार्ग कानपुर नहीं लखनऊ जाता है।
हमारी ट्रेन समय से थोड़ी देरी से सुबह 7.30 बजे कानपुर जंक्शन पर पहुंची। कानपुर में हमारे नेटवर्क के लोग काफी पहले से ही रेलवे स्टेशन पर रेल यात्रा का इंतजार कर रहे थे। ऐसे हालात में रेल यात्रा अपने अपने डिब्बों में ही नित्यक्रिया से निवृत होकर तैयार रहते हैं। वैसे ये एक आदर्श समय है ट्रेन के पहुंचने का किसी रेलवे स्टेशन पर। यहां पर सुब्बराव जी का स्वागत गांधीवादी तरीके से हुआ। सर्वोदय के कार्यकर्ता सूत की बनी हुई माला लेकर आए उनका स्वागत करने।
कानपुर में हमारी मुलाकात यूथ होस्टल और एनवाईपी नेटवर्क के कुछ पुराने साथियों से हुई। उत्तर काशी शिविर में हमारे साथ रहे कीर्ति और समीर भी यहां मिले। वे देखते ही दौड़कर गले लगे। सदभावना यात्रा के दौरान अगर पुराने शिविरार्थी मिल जाते हैं तो उनका उत्साह देखने लायक होता है। हमने साथ मिलकर पुराने दिनों को खूब याद किया। 

 नास्ते के बाद रेलवे स्टेशन से हमारी रैली शहर के हरबंश मोहाल, कैंटोनमेट एरिया, कुछ मुस्लिम बस्तियों से होती हुई कृष्णा नगर पहुंची। यहां जानकी देवी बालिका उच्च विद्यालय में स्वागत और दोपहर का कार्यक्रम हुआ। हमारी साइकिल रैली का पथ 15 किलोमीटर का हो गया है। दोपहर के कार्यक्रम के बाद मैं और दिलीप दफ्तर के काम के वजह से रेलगाड़ी पर वापस आ गए।

देखो देखो हमारे दो सौ साइकिल समर्थक आ रहे हैं...
उधर, उत्तर प्रदेश में चुनाव का रंग चढ़ चुका है। अगले 18 और 21 नवंबर को विधानसभा चुनाव के लिए वोट डाले जाने हैं। इसलिए चुनाव प्रचार चरम पर है। हमारी सदभावना रैली कानपुर की सड़कों पर जा रही थी। पास में कहीं समाजवादी पार्टी की चुनावी सभा हो रही थी। मंच पर भाषण दे रहे एक नेता ने सदभावना साइकिल यात्रियों को देखते ही कहा कि देखो हमारे दो सौ साइकिल समर्थक आ रहे हैं। वास्तव में समाजवादी पार्टी का चुनाव चिन्ह साइकिल है। इसका उन्होंने थोड़ा सा लाभ ले लिया। 
कानपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन का मुख्य द्वार ( कैंट साइड ) 
हालांकि सुब्बराव जी अगले दिन इससे नाराज हुए पर वे कर क्या सकते हैं। हमारे सदभावना यात्रा की सारी साइकिलें एवन कंपनी की हैं। इन्हें दिल्ली के पास उनके साहिबाबाद प्लांट से खरीदा गया था। आर्डर देकर सभी साइकिलें नीले रंग की बनवाई गई थीं। कई जगह लोग इसे एवन की साइकिल रैली कह देते हैं। तब हमने एक दिन साइकिलों में जहां जहां एवन लिखा है वहां सदभावना के स्टिकर लगा दिए। पर हर साइकिल पर कंपनी का लोगो तो रहता ही है।

उदासी का सबब क्या है... कई लोगों ने मुझसे कहा कि विद्युत भैया आज आप बहुत उदास लग रहे हो। शायद ये सच भी हो, क्योंकि आज ही मैंने वैशाली एक्सप्रेस में अपना हाजीपुर वापसी का आरक्षण कराया है। हमारी छुट्टियां खत्म हो रही हैं। इसके साथ ही हमें 27 नवंबर को हाजीपुर में यानी अपने शहर इसी रेल यात्रा के स्वागत की तैयारी भी करनी है। शाम की रैली और सांस्कृतिक कार्यक्रम में मैं नहीं जा सका। पिछले कुछ दिनों से मुझे हल्का बुखार आ जा रहा है। मनोरमा दीदी मजाक में कह रही हैं- बीमारों के ज्यादा संपर्क में रहोगे तो बीमार पड़ोगे ही न...पिछले चार दिनों से ट्रेन में कई सद्भावना यात्रियों की सेहत हल्की फुल्की खराब हो रही है।
- vidyutp@gmail.com




Friday, August 29, 2014

अमर शहीदों की धरती - शाहजहांपुर ((44))

( पहियों पर जिंदगी 44)
उत्तर प्रदेश के रोहिलखंड इलाके में आने वाले शाहजहांपुर वह शहर है जहां से कई महान शहीदों की यादें जुड़ी हैं। 1857 की क्रांति से जुड़े रणबांकुरे शहीद अहमद उल्ला शाह और काकोरी कांड के शहीद अशफाक उल्ला खां का संबंध शाहजहांपुर से है। वहीं अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल लंबे समय तक शाहजहांपुर के आर्य समाज मंदिर में रहे। बिस्मिल क्रांति के शायर थे। हम उनकी फड़कती हुई शायरी आज भी सुनते हैं।
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है....
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है....
आजादी के आंदोलन के तीसरे बड़े शहीद ठाकुर रोशन सिंह भी शाहजहांपुर के निवासी थे।  


04 नवंबर 1993 - बिनोबा सेवा आश्रम शाहजहांपुर में ही हमारी सर्व धर्म प्रार्थना सभा हुई। बहुत लंबी साइकिल यात्रा के कारण सभी रेल यात्री लोग थक गए हैं। पर यात्रा के दौरान पहली बार हुआ है कि हमारे प्यारे भाई जी की सेहत भी खराब हो गई। सुब्बराव जी अचानक प्रार्थना कराते कराते बेसुध होकर लेट गए। उन्हें सख्त आराम की जरूरत थी। इसके बाद कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं हुआ। हम सब लोग बसों से रेलवे स्टेशन लौट आए। रात्रि भोजन का इंतजाम रेलवे स्टेशन पर ही था। हालांकि शाम 6 बजे भोजन करने के थोड़ी देर बाद ही रात का खाना रास नहीं आया।


05 नवंबर 2014  एक दिन पहले की थकान और लंबी साइकिल यात्रा के बाद शाहजहांपुर में आज के सारे कार्यक्रम स्थगित कर दिए गए हैं। रेल यात्रा की सदभावना रैली का कार्यक्रम एक दिन का इतना ही रखा जाता है जिससे कि यात्री अगले दिन भी साइकिल चलाने लायक रहें। इसके लिए आदर्श तौर पर 12 से 15 किलोमीटर साइकिल यात्रा का कार्यक्रम रखा जाता है। दो तरफ की यात्रा लेकर ये दूरी 25 किलोमीटर तक हो जाती है। फिर हर राज्य के लोगों को साइकिल चलाने का स्टेमिना अलग अलग होता है। वैसे तो रेल यात्री के तौर पर उन्हीं लोगों को बुलाया जा रहा है जो युवा हों और साइकिले चला पाने में समर्थ हों। अगर कोई रास्ते में साइकिल चलाते हुए थक जाता है, तो परेशानी बढ़ जाती है। दूसरे सहयात्री उसकी मदद करते हैं। कई बार साइकिलें पंक्चर हो जाती हैं। कई बार उनकी चेन उतर जाती है। हालांकि हर रोज सुबह साइकिल यात्रा पर निकलने से पहले  अपनी अपनी साइकिलों की सभी यात्री जांच पड़ताल जरूर करते हैं। हमारे स्वंयसेवकों में से ही कुछ लोगो साइकिलों की मरम्मत का भी काम कर लेते हैं। वहीं हवा भरने के लिए पंप भी हमारे साथ होता है। ये 200 साइकिलें ट्रेन के आगे और पीछे स्थित अलग अलग दो ब्रेक वैन में लाद दी जाती हैं। हर स्टेशन पर उन्हें बाहर निकाला जाता है।

हम बात  शाहजहांपुर की कर रहे थे, यहां पर एक दिन पहले साइकिलों चलाने में दूरी की सारी सीमाएं टूट गईं। लिहाजा सभी यात्रियों को एक दिन का आराम दिया जाना जरूरी था। संयोग से शाहजहांपुर दो दिनों का पड़ाव था इसलिए आज का दिन आराम के लिए मुकर्रर किया जा सका। सुबह 10 बजे रेल यात्रियों की बैठक प्लेटफार्म पर ही हुई। इस दौरान  हर राज्य से आए यात्रियों ने सदभावना पर अपने विचार साझा किए।


vidyutp@gmail.com


Thursday, August 28, 2014

शाहजहांपुर- आएगा नया जमाना जरूर ((43))

शाहजहांपुर रेलवे स्टेशन पर ही योगाभ्यास। 
( पहियों पर जिंदगी 43)
4 नवंबर 1993  सुबह हमारी ट्रेन शाहजहांपुर में रुकी है। बरेली और शाहजहांपुर के बीच रामपुर नामक महत्वपूर्ण पड़ाव आता है। पर रामपुर में ट्रेन का ठहराव नहीं है। हालांकि रामपुर में हमारी संस्था राष्ट्रीय युवा योजना का बड़ा नेटवर्क है। वे लोग चाहते थे कि ट्रेन रामपुर में भी रुके। पर सदभावना स्पेशल के ठहराव और शेड्यूल पहले से तय हैं। कोई भी बदलाव के लिए कई दिन पहले रेलवे बोर्ड को लिखना पड़ता है फिर वहां से स्वीकृति आती है। इसलिए ट्रेन रामपुर में बिना रूके आगे बढ़ गई। यहां रेल यात्रियों के स्वागत में कई संस्थाओं के लोग आए।
शाहजहांपुर में संजय कुमार जैन हमारे व्यवस्थापक हैं। वे कुछ दिन पहले रेल पर आए थे तो हमने उन्हें रेल यात्रा के दिन भर के कार्यक्रम की जानकारी दे दी थी। पर शहाजहांपुर में इंतजाम में जैसी गड़बड़ी हुई पहले कभी नहीं हुई थी। सुबह ठीक रही। नास्ता रेलवे स्टेशन पर मिला। इसके बाद साइकिल रैली रवाना हो गई। नगर के टाउन हाल के पास अमर शहीद राम प्रसाद बिस्मिल, असफाक उल्ला खां, ठाकुर रोशन सिंह की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण कर हमने शहीदों से प्रेरणा लेने की कोशिश की। साथ ही ये भी याद करने की भी, कि हमें आजाद हवां सांस लेने ये मौका कितनी मुश्किलों और कुर्बानियों से मिल पाया है। यहां से रैली आगे बढ़ी। 




शाहजहांपुर का केंद्रीय विद्यालय नंबर एक 
शाहजहांपुर में सेना के अस्त्र बनाने की बहुत बड़ी फैक्ट्री है। हमलोग आयुध निर्माणी के केंद्रीय विद्यालय परिसर में पहुंचे। वहां छोटे छोटे बच्चों के बीच सुब्बराव जी ने हम बच्चे हिंदुस्तान के गीत गया....हजारों बच्चे साथ साथ दुहरा रहे थे। यहां से संदेश देने के बाद रैली आगे एक और केंद्रीय विद्यालय में रूकी। यहां सिर्फ लड़कियां पढ़ती हैं। समायाभाव के कारण स्वागत गीत रोककर सुब्बराव जी ने सिर्फ संदेश दिया। इस क्रम में उन्होंने कहा- हमारा नारा विश्व बंधुत्व का है। दुनिया के सारे ही लोग एक दूसरे के बहन भाई हैं। ऐसा सुनकर हमारे पीछे खड़ी कुछ स्कूल की किशोरियां बोल पड़ी- अगर सभी भाई भाई हैं तो हमारी किस्मत तो फूटी समझो।
इस विद्यालय के बाद रैली आगे बढ़ चली। दोपहर हो गई थी। लोग भूख से बेहाल हो रहे थे। पर खाने का कुछ पता नहीं था। स्थानीय आयोजक महोदय ने तो आगे का भी कार्यक्रम बना रखा था। हमारा अगला पड़ाव गवर्नमेंट गर्ल्स इंटर कालेज है। यहां यहां युवक बिरादरी नामक संस्था और जीजीआईसी के छात्राओं की जमघट है। हमें श्रोताओं की तरह बिठा दिया गया। सबसे पहले मंच पर सरस्वती वंदना वर दे वीणावादिनी भाव नृत्य हुआ। इसके बाद शानदार बैले नृत्य  आएगा आएगा नया जमाना जरूर...गाएगी गाएगी दुनिया नया तराना जरूर। प्रस्तुति शानदार थी। पर जब पेट में चूहे कूद रहे हों तो कुछ भी अच्छा लगता है क्या। इस पड़ाव पर भी भोजन का इंतजाम नहीं था।दोपहर के दो से ज्यादा बज चुके हैं। 

शाम को पांच बजे मिला खाना - तीन बजे तक तो हमलोग एक बार फिर रेलवे स्टेशन पर वापस लौट आए। एक घंटे इंतजार के बाद कुछ बसें आईं। इन बसों में बैठकर हमलोग शहर से 11 किलोमीटर बाहर बिनोबा सेवा आश्रम ले जाया गया। यहां हमलोग शाम के 5 बजे पहुंचे। तब जाकर इस आश्रम में कहीं भोजन का इंतजाम दिखा। सभी खाने पर टूट पड़े। पर ये असमय का भोजन था। कई लोगों के लिए उपयुक्त नहीं था। पर सदभावना के सिपाहियों को हर हालात के लिए तैयार रहना चाहिए।


Wednesday, August 27, 2014

सदभावना का शहर - बरेली ((42))


( पहियों पर जिंदगी 42)
3 नवंबर 1993  हमारी ट्रेन सुबह बरेली रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर है। बरेली उत्तर प्रदेश के रोहिलखंड क्षेत्र में आता है। यह कभी रोहिला नवाबों की राजधानी हुआ करती थी। महाभारत काल में यह अहिक्षत्र ( पांचाल ) क्षेत्र कहलाता था।

आपने फिल्म मेरा साया का लोकप्रिय गीत तो सुना ही होगा- झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में । लोग कहते हैं कि बरेली झुमके के लिए भी प्रसिद्द है। पुरानी फिल्मों एक और गीत में बरेली के झुमके की चर्चा आती है। कजरा मुहब्बत वाला की ये पंक्तियां झुमका बरेली वाला..अंखियों में ऐसा डाला...झुमके ने ले ली मेरी जान.... हालांकि मुझे यहां झुमके के बारे में कुछ पता नहीं चला। पर ये शहर सांप्रदायिक सद्भवाना के लिए प्रसिद्ध है। अपनी तहजीब के लिए जाना जाता है। यहां प्रसिद्ध मुस्लिम तीर्थ खानकाहे नियाजिया है। मुगल शासकों के समय बरेली फौजी नगर था। यहां तभी से फौजी छावनी है। विश्व प्रसिद्ध कथावाचक और नाटककार राधेश्याम कथावाचक भी बरेली से हुए हैं।


सदभावना का केंद्र - चुन्ना मियां का मंदिर
बरेली की पहचान एक ऐसे मंदिर से है जो सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक है। शहर में एक ऐसा मंदिर है जिसे एक मुस्लिम परिवार ने बनवाया है। ऐसा उदाहरण देश में बहुत कम मिलेगा।
बरेली के सेठ फजल उर्र रहमान ऊर्फ चुन्ना मियां ने यहां पर भगवान विष्णु का लक्ष्मी- नारायण मंदिर का निर्माण कराकर हिंदू- मुस्लिम एकता की एक मिसाल कायम की। ये मंदिर खोखरा पीर इलाके में कटरा मामराई में है। इसके ठीक बगल में बुधवारी मस्जिद भी है। इस इलाके में पाकिस्तान से आए हिंदू शरणार्थियों को बसाया गया था। 

इस मंदिर का इंतजाम आज भी उनके परिवार के मोहम्मद अतिकुर रहमान साहब देखते हैं। सुबह की पूजा समय अक्सर वे मौजूद रहते हैं। सारे सदभावना रेल यात्री दोपहर में इस मंदिर को देखने गए। हमारे दोपहर के भोजन का इंतजाम इसी मंदिर की ओर से था। बरेली गंगा जमुनी तहजीब का नायब उदाहरण वाला शहर है। 


बरेली में हिंदू राजा मकरंद राय ने विशाल मस्जिद का निर्माण कराया तो चुन्ना मियां से मंदिर बनवाया। पूरा शहर इसे चुन्ना मियां के मंदिर के नाम से ही जानता है। चुन्ना मियां ने इस मंदिर के निर्माण में सबसे ज्यादा एक लाख 10 हजार रुपये का योगदान किया। वे जयपुर से मूर्तियां खरीद कर लाए। साथ ही मंदिर के निर्माण के लिए अपना काफी वक्त दिया। इस मंदिर का उद्घाटन करने 16 मई 1960 में राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद आए थे। मंदिर में चुन्ने मियां का नाम सबसे ज्यादा दान देने वालों की सूची में लिखा हुआ है।

कहा जाता है चुन्ने मियां ने पहले मंदिर पास पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के खिलाफ जमीन अतिक्रमण का एक मुकदमा दायर किया हुआ था। पर हरिद्वार के एक संत से मुलाकात ने उनकी जिंदगी बदल दी। उन्होंने न सिर्फ मुकदमा वापस लिया बल्कि मंदिर निर्माण में मदद करने लगे।


शाम को हमारी मुलाकात राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक बनवारी लाल यादव जी से हुई। वे गांधी टोपी लगाते हैं। हमारी सदभावना ट्रेन देखकर वे कौतूहलवश हमसे मिलने आ गए। उन्होंने अपने सदभावना को लेकर विचार हमसे साझा किए और रेलयात्रा जैसे प्रयास की खूब तारीफ की। बरेली में हमारा पड़ाव सिर्फ एक दिन का था। सभी रेल यात्रियों को ये शहर इतना अच्छा लगा कि वे चाहते थे कि यहां एक दिन का और ठहराव होता तो अच्छा होता। 


Tuesday, August 26, 2014

मुरादाबाद - अब विचारधारा के नाम पर होती हैं लड़ाइयां ((41))


( पहियों पर जिंदगी 41) 
2 नवंबर 1993  मुरादाबाद में रेल यात्रा का दो दिनों का ठहराव है। करीब 11 बजे सभी रेल यात्री अमरपुर काशी गांव से रेलवे स्टेशन लौटे। साथियों ने मिलते ही गांव के अपने अपने अनुभव साझा करने शुरू कर दिए। कई लोगों से इतना स्नेह हो गया है कि वे मुझसे एक दिन भी अलग रहने पर शिकायतें करते हैं। हमारे दोपहर के भोजन का इंतजाम गुलजारी धर्मशाला में है। हम सारे लोग वहां पहुंच गए हैं। दोपहर में थोड़े आराम के बाद शाम का कार्यक्रम रेलवे स्टेडियम में तय है। 
 यहां के कार्यक्रम के आयोजक यूनाइटेड नेशंस यूथ आर्गनाइजेशन के नवीन आनंद हैं। वे युवा और अच्छे वक्ता हैं। यहां शाम के कार्यक्रम में हर राज्य से आए प्रतिनिधियों को मंच पर बुलाकर सम्मानित किया गया। ये बड़ा सुंदर प्रयास रहा। जिसे मैंने आगे अपने शहर हाजीपुर में भी लागू किया। इससे देश के अलग राज्यों से यात्रा में चल रहे लोगों को बड़ा फख्र महसूस होता है। यहां पूरी तैयारी से सदभावना यात्रियों ने सुंदर सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किया।

सुब्बराव जी ने अपने व्याख्यान में कहा- राज महाराजाओं के जमाने में युद्ध धन या फिर लड़की के लिए लड़े जाते थे। पर अब युद्ध के कारण बदल गए हैं। अब लड़ाइयां विचार धारा के लिए लड़ी जाती हैं। वे संयुक्त राष्ट्र के ध्येय वाक्य की याद दिलाते हैं युद्ध और शांति दोनों की बातें सबसे पहले दिमाग में आती हैं। इसलिए हमें अपने दिमाग को खुराफाती होने से बचाना चाहिए। मतलब हम युद्ध की बात न सोचकर शांति का बाद सोचें। हमारे युवा गीत में इन पंक्तियो को हम रोज दुहराते हैं- धर्म की दुहाइयां, भाषा की लड़ाइयां, पाट दो ये खाइयां...तो खाई पाटने की बात भी दिमाग से ही शुरु होगी।


सुब्बराव जी ने कहा,  1962 में जब भारत और चीन के बीच युद्ध छिड़ गया तब वे ओडिशा के किसी शहर में थे। तब वे अपना काम छोड़ कर चीन के नजदीक लगते पूर्वोत्तर के राज्य में पहुंच गए। असम की राजधानी दिसपुर के पास के गावों में जाकर कुछ कार्यक्रम किए। लोगों को संगीत और गीतों के द्वारा राष्ट्रीय भावना से जोड़ने की कोशिश में लग गए। रेल यात्रियों को उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के कार्यशैली को सरल भाषा में समझाने की कोशिश की। हम तीसरे विश्वयुद्ध की आग में न झुलसे इसके लिए संयुक्त राष्ट्र कैसे कोशिशें कर रहा है। वास्तव में सदभावना की जरूरत सिर्फ देश की ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को है। 
कार्यक्रम के बाद हमलोग रेलवे स्टेडियम से रेलवे स्टेशन पहुंच गए। हमारे रात्रि भोजन का इंतजाम रेलवे स्टेशन पर ही है। रात को हमारी ट्रेन यूपी के एक नए शहर के लिए चल पड़ी। ये नया शहर था बरेली। लेकिन उससे पहले आता है एक स्टेशन रामपुर। हालांकि रामपुर में हमारे एनवाईपी की काफी सक्रिय इकाई है। पर रामपुर में ठहराव नहीं है सदभावना रेल का। इससे हमारे रामपुर के साथी नाराज हैं। 

 vidyutp@gmail.com
 ( MORADABAD, BRASS, RAMPUR, LIFE ON WHEELS)

Monday, August 25, 2014

पीतल नगरी मुरादाबाद में ((40))

( पहियों पर जिंदगी 40) 
1 नवंबर 1993  एक नई सुबह के साथ महीना बदल चुका है। अंगरेजी माह से देखें तो हम तीसरे महीने लगातार रेलगाड़ी में हैं। सुबह-सुबह हमारी ट्रेन उत्तर प्रदेश के मशहूर शहर मुरादाबाद में पहुंच चुकी है। मुरादाबाद देश भर में पीतल के कारोबार के लिए जाना जाता है। इसे पीतल नगरी भी कहते हैं। पीतल के बर्तन, धूप बत्ती और अगरबत्ती स्टैंड, कैंडिल स्टैंड और तमाम तरह के सजावटी पीतल के सामान यहां बनते हैं। साथ ही बड़ी मात्रा में दुनिया के अन्य देशों में निर्यात किए जाते हैं।

नहीं जा सका अमरपुरकाशी - नेहरु युवा केंद्र के समन्वयक रामरक्षा सिंह के कार्यालय में सद्भावना रेल यात्रियों का पहला स्वागत हुआ। हमारा कार्यक्रम पहले से तय है। पास के गांव अमरपुर काशी जाने का। रात्रि विश्राम भी अमरपुर काशी गांव में  ही है। पंजाब की रावी और गुरप्रीत बीमार हो गई हैं। मेरे पास दफ्तर का काम फैला पड़ा है। इसलिए मैं भी अमरपुर काशी नहीं जा सका। आज मैंने कई सारे दफ्तर के मैटर इलेक्ट्रोटाइप कराए। इसके साथ ही रेलयात्रा के दौरान ली गई तस्वीरों के प्रिंट भी निकलवाए। रेलयात्रियों के साथ नहीं जाने पर मुझे भोजन के लिए रेलवे स्टेशन की कैंटीन या फिर आसपास के ढाबे या रेस्टोरेंट का आसरा लेना पड़ता है।
 मुरादाबाद बहुत भीड़भाड़ वाला शहर है। रेलवे स्टेशन के आसपास का इलाका ज्यादा सुंदर नहीं दिखाई देता। कुछ रेल यात्रियों ने शहर जाकर अपने लिए प्रतीकात्मक पीतल के कुछ सजावटी सामानों की खरीददारी भी की। शहर के कई लोग हमारी सद्भावना रेल को देखने आ रहे हैं। वे रेलगाड़ी को बड़े कौतूहल से देख रहे हैं। अलग अलग डिब्बों पर लिखे संदेशों को पढ़ रहे हैं।



रेल यात्रा चूंकि रेल मंत्रालय द्वारा समर्थित है इसलिए हर रेलवे स्टेशन पर दोपहर में रेलवे बोर्ड की ओर से किसी अधिकारी का फोन आता है। रेलवे स्टेशन मास्टर के पास आए फोन को कई बार मुझे जाकर सुनना पड़ता है। वे रेलयात्रा के इंतजाम के बारे में पूछते हैं। वे स्टेशन पर मिलने वाली सुविधा के बारे में पूछते हैं। अगर हमने कोई शिकायत कर दी तो समझो उस स्टेशन के स्टेशन मैनेजर की खाट खड़ी हो गई। अक्सर सद्भवना यात्रा स्पेशल ट्रेन को रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर जगह दी जाती है ताकि दिन भर स्थानीय लोग इस ट्रेन को देखने आ सकें। क्योंकि ये 14 डिब्बों की ट्रेन अपने आप में अनूठी है। लोग कौतूहल वश इसे देखते हैं और सदभावना के संदेशों को पढ़ते हैं।


भोपाल, बरेली समेत सदभावना रेल यात्रा का अलग शहरों में स्वागत। 
ट्रेन के साथ एक चलती फिरती पुस्तक प्रदर्शनी भी है। प्रदर्शनी इंचार्ज ट्रेन रुकने पर अपने साहित्य की स्टाल प्लेटफार्म पर लगा देते हैं। इस स्टाल से आते जाते यात्री गांधी और सर्वोदय से जुड़ा साहित्य खरीदते हैं।
कई बार रेल यात्री जिन्हे किसी ट्रेन में अपने घर जाने के लिए आरक्षण नहीं मिल पाया है वे इतनी शानदार ट्रेन को देश भर में यूं ही घूमती हुई देखकर कोसते भी नजर आते हैं। मुरादाबाद में मुझे कुछ ऐसे लोगों का गुस्सा सुनने को मिला। 


Sunday, August 24, 2014

शिवानंद आश्रम, ऋषिकेश में ((39))


( पहियों पर जिंदगी 39)
31 अक्तूबर 1993  हमारी ट्रेन ऋषिकेश पहुंच चुकी है। हरिद्वार से ऋषिकेश की दूरी मामूली सी है। पर ऋषिकेश हमारा एक दिन का पड़ाव है। हमारी साइकिल रैली रेलवे स्टेशन से निकलकर शिवानंद आश्रम की ओर चली। रास्ते में गोविंद घाट आया जहां यात्री थोड़ी देर के लिए रूके और पतित पावनी गंगा की निर्मल जलधारा का नजारा लिया। सुबह का भोजन 11 बजे शिवानंद आश्रम में ही हुआ। शुद्ध सात्विक शाकाहारी भोजन। कई शहरों की भीड़ भाड़ भरे सड़कों पर घूमते हुए ऋषिकेश पहुंचने के बाद एक अलग तरह के आनंद और शांति की अनुभूति हो रही है।

 ऋषिकेश में गंगातट पर बना शिवानंद आश्रम आध्यात्म योग का बड़ा केंद्र है। बड़ी संख्या में इस आश्रम में विदेशी भी योग और ध्यान सीखने आते हैं। वास्तव में हमारे देश के पास अनूठी संपदा है आध्यात्म की, दुनिया के धन धान्य से अघाए हुए मुल्क के लोगों को शांति की तलाश यहां सदियों से खींचती रहती है। इस शिवानंद आश्रम का वातावरण बड़ा मनोरम है। मुख्य सड़क के बायीं और दाहिनी तरफ आश्रम का परिसर है।


यहां बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक आध्यात्म का कोर्स करते रहते हैं। शिवानंद आश्रम के ठीक सामने शिवानंद झूला पुल बना हुआ है। गंगा नदी पर बना ये झूला पुल ठीक लक्ष्मण झूला की तरह की झूलता हुआ पुल है। इस पुल से गंगा नदी पार करने के बाद उस पार स्वर्गाश्रम आता है।

मैं इस शिवानंद आश्रम में दूसरी बार पहुंचा हूं। 1991 में नवंबर के आखिरी दिनों में भूकंप राहत शिविर के लिए जाते समय सारे स्वयंसेवक यहां एक दिनों के लिए रूके थे। इस बार की यात्रा में हमलोग शिवानंद आश्रम की संचालिका से मिले और उनका आशीर्वाद लिया। हमारी शाम की सर्वधर्म प्रार्थना आश्रम में ही हुई। पर यहां कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं हुआ।




ऐसा लगा मानो कि हम देश के कोने कोने से आए सदभावना यात्री इस आश्रम की पवित्र धरती से कुछ सीखने आए हैं। कुछ देने नहीं बल्कि कुछ लेने आए हैं। हम यहां आध्यात्मक की ऊर्जा से खुद को रीचार्ज करना चाहते हैं। आगे अभी तो पूरे देश का सफऱ करना है।

शिवानंद आश्रम में दिन भर के प्रवास के दौरान हमें कुछ घंटे का खाली समय मिला। इस दौरान हमलोग पैदल चलकर शिवानंद झूला से लक्ष्मण झूला तक गए। वहां लक्ष्मण झूला के पास 11 मंजिला और 13 मंजिले दो विशालकाय मंदिर हैं। कई रेल यात्री इन मंदिरों में दर्शन करने गए। मैं 13 मंजिले मंदिर में दर्शन कर चुका हूं। हमलोग टहलते हुए वापस आए।


शिवानंद झूला का विहंगम नजारा। झूले के उस पार स्वर्गाश्रम है। 

शिवानंद झूले के पुल से थोड़ी देर गंगा में मछलियों को दाना खिलाया। शिवानंद झूले से पुल पार कर गंगा के उस पार जाते ही जिला बदल जाता है। ये इलाका पौड़ी गढ़वाल जिले में आता है।
हमलोग स्वर्गाश्रम में असली चोटीवाला के रेस्टोरेंट में पहुंचे। चोटीवाला के बाहर एक आदमी लंबी सी चोटी लगाए बैठा रहता है। इस चोटीवाला के रेस्टोरेंट में समोसे और आइसक्रीम खाई। मंदिर के बाहर एक आडियो कैसेट शॉप से फिर तेरी कहानी याद आई का आडियो कैसेट खरीदा। मैं अक्सर किसी नए शहर से किताबें या फिर आडियो कैसेट खरीदता हूं। रात गहराने के साथ ऋषिकेश की फिंजा में गुनगुनी ठंड बढ़ गई है। हमलोग शिवानंद आश्रम से रेलवे स्टेशन पहंचे। हमारी ट्रेन एक नए पड़ाव के लिए चल पड़ी।

Saturday, August 23, 2014

एक बार फिर शांतिकुंज हरिद्वार में ((38))

( पहियों पर जिंदगी 38)
30 अक्तूबर 1993  आध्यात्मिक नगरी हरिद्वार की सुबह आज सभी रेल यात्रियों को हरिद्वार में गंगा स्नान का मौका मिला है। हरिद्वार वह जगह है जहां गंगा नदी पहाड़ों से उतरकर मैदानी भाग में प्रवेश करती है। यहां गंगा स्नान करने के लिए विशाल घाट हर की पौड़ी ब्रिटिश काल का बना हुआ है। यहां गंगा का जल वाराणसी पटना की तुलना में ज्यादा निर्मल है।
हरिद्वार जंक्शन पर सुबह सुबह अचानक मैंने देखा कि एक सामने वाली ट्रेन से हमारे हाजीपुर के मित्र शिवपूजन कुमार, भारती भाभी और उनकी बहन सीता उतर रहे हैं। वे लोग शांति कुंज जाने के लिए आए हैं। 

शिवपूजन को विवाह के बाद उनके पिताजी शांतिकुंज जाकर संस्कार सीखने की प्रेरणा दी है। इसलिए वे कुछ दिनो तक शांतिकुंज की कुटिया में निवास करेंगे। फिलहाल आज शिवपूजन दिन भर हमारे साथ ही रहे।


हमारी आज की साइकिल रैली हर की पौड़ी होते हुए गोबिंदगढ़ धर्मशाला पहुंची। हमारा रात्रि भोजन वहीं पर है। भोजन के बाद हमलोगों ने शांतिकुंज के लिए प्रस्थान किया। हरिद्वार ऋषिकेश मार्ग पर शांतिकुंज गायत्री परिवार का मुख्यालय है। सभी सद्भावना यात्री शांति कुंज के विशाल सभा कक्ष में बैठे। यहां शांतिकुंज के ब्रजमोहन गौड़ ने स्वागत भाषण दिया। शांतिकुंज के लोग हरिद्वार में सद्भवना यात्रा के स्वागत के लिए पहले से ही तैयार थे। कुछ स्टेशन पहले शांति कुंज के प्रतिनिधि बलराम सिंह परिहार रेल यात्रा के दौरान हमारे पास आए थे। तब उन्होंने शांतिकुंज में हमारे कार्यक्रम की रुपरेखा तय की थी।

शांतिकुंज की संगीत मंडली द्वारा यहां प्रेरक गीत पेश किया गया। सोया जाग वीर बलिदानी जाग...कैसे बैठा है चुपचाप। मंच पर श्री वीरेश्वर उपाध्याय और सुब्बराव जी साथ बैठे हैं। वीरेश्वर उपाध्याय जी का बौद्धिक प्रवचन में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में भी सुन चुका हूं। वे इंजीनियरिंग का कैरियर छोड़ आध्यात्म की ओर प्रवृत हो गए हैं। शांतिकुंज न सिर्फ आध्यात्मिक संगठन है बल्कि देश में आपदा आने पर इसके स्वंयसेवक हर जगह सेवा के लिए भी पहुंचते हैं। वे हमारे सद्भावना के अभियान के प्रशंसक हैं।

शांतिकुंज भी मैं दूसरी बार पहुंचा हूं। पहली बार मैं उत्तर काशी शिविर से लौटने के बाद सुब्बराव जी के साथ ही यहां आया था। हालांकि गायत्री परिवार के संग हमारे परिवार का जुड़ाव बचपन से ही रहा है। सारे रेल यात्रियों शांति कुंज द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न प्रकल्पों को देखा, समझा और प्रेरणा ली। रात्रि भोजन यहीं पर था। हमलोग भोजन के बाद अपनी ट्रेन पर  हरिद्वार जंक्शन लौट आए। रात को हमारी ट्रेन ऋषिकेश के लिए खुली।



-vidyutp@gmail.com 

शांति कुंज की वेबसाइट पर जाएं - http://www.awgp.org/

( HARIDWAR, RISHIKESH, SHANTI KUNJ, LIFE ON WHEELS)
सदभावना रेल यात्रा का वृतांत शुरू से पढ़ने के लिए यहां पर क्लिक करें। 

Friday, August 22, 2014

आस्था की नगरी हरिद्वार में ((37))


( पहियों पर जिंदगी 37)
29 अक्तूबर 1993  सुबह हो गई है। हमारी ट्रेन हरिद्वार रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर तीन पर खड़ी है। हरिद्वार राष्ट्रीय युवा योजना के सौजन्य से मैं तीसरी बार पहुंच रहा हूं। उत्तरकाशी में भूकंप राहत शिविर में जाने से पहले और शिविर से लौटने के बाद हमलोग हरिद्वार में ही रुके थे। सुबह सुबह साइकिल रैली लंबी दूरी तय कर यराम आश्रम पहुंची।


यहां पर दोपहर का भोजन हुआ और छोटी सी सभा हुई। आश्रम में एक बेहतरीन संग्रहालय है जिसे मैंने टिकट खरीदकर देखा। शाम को हमारी रैली भारत माता मंदिर पहुंची। ये अत्यंत सुंदर बहुमंजिला राष्ट्र मंदिर है। इसमें देवी देवताओं की जगह भारत माता और आजादी की लड़ाई से जुड़े महापुरुषों की मूर्तियां हैं। देश में दो ही भारत माता मंदिर हैं। एक हरिद्वार में और दूसरा वाराणसी से काशी विद्यापीठ के परिसर में। भारत माता मंदिर में थोड़ा विश्राम का मौका मिला तो रेल यात्री पास में बहती गंगा की निर्मल धारा को देखने गए। मैं भी साथियों के साथ गंगा दर्शन के लिए गया। 



पंजाब के भाई अमनदीप सिंह और सतीश दुबारा आ चुके हैं। वे लोग कानपुर से संगरूर की आई बालिकाओं को वापस ले जाएंगे।
शाम की सभा भारत माता मंदिर में हुई जहां भाई जी के बहनोई मेजर ईश्वर जोइस ने सुब्बराव जी के परिवार का परिचय दिया। उन्होंने बताया- एस एन सुब्बराव जिनका पूरा नाम सेलम नानजुदैया सुब्बराव है, उनके पूर्वज तमिलनाडु के सेलम से कर्नाटक आए थे। वे स्थान परिवर्तन कर चिंतामणि के निकट आणेकर नामक ग्राम में आ गए। सुब्बराव जी के दादा जी अमलदार नामक पद पर कार्यरत थे। वे बड़े कुलीन परिवार और कुलीन खानदान से आते थे। सुब्बराव जी के पिता का नाम सेलम नानजुदैया था वे हाई कोर्ट में वकालत करते थे। वे बड़े ही ईमानदार वकील थे। बहुत कम कमाई के कारण कम खर्चे में किसी तरह परिवार का गुजारा चलता था। सुब्बराव जी के पांच भाई दो बहने हैं।

1 एस एन शिवस्वामी  मद्रास में विवाहित- एम एससी, असिस्टेंट डाइरेक्टर आल इंडिया रेडियो ( इनकी कोई संतान नहीं) 
2. एस एन चंद्रशेखर  कला और संगीत के क्षेत्र में रूचि, डेक्कन हेराल्ड अखबार के संपादक बने। इनकी पसंद की लड़की की शादी कहीं और हो गई तो आजीवन अविवाहित ही रहे।


3. प्रोफेसर नानजुदैया कृष्णास्वामी  विजया कॉलेज बेंगलुरू में लेक्चरार बने। बाद मे कॉलेज ऑफ मिलिट्री इंजीनयरिंग पुणे में भी पढ़ाया। अवकाश प्राप्त करने के बाद बेंगलुरु में रहते हैं। कई साल बाद साल 2016 में देखा की वे फेसबुक पर 90 साल से ज्यादा के उम्र में सक्रिय हैं। वे अपने छोटे भाई एस एन सुब्बराव से काफी स्नेह भाव रखते हैं। रोज उनकी खबर लेते रहते हैं।

4 श्रीमती सावित्री  सुब्बराव जी की बड़ी बहन। 
5 एसएन सुब्बराव  एलएलबी, एलएलएम ( 7 फरवरी 1929)
6. एस एन गणेशन - तबला वादक
7. उमा ईश्वर जोइस - ( इनका विवाह मेजर ईश्वर जोइस से हुआ है। 21 जून 2014 को वे हृदयाघात के बाद परलोक वासी हो गईं।)
हमें बेंगलुरु के आध्यात्मिक युवा शिविर के दौरान सुब्बराव जी के सभी भाई बहनों से मुलाकात करने का मौका मिला था। तब सुब्बराव जी ने एक भजन गाया था जहां एस एन गणेशन ने तबला वादन किया था।

भारत माता मंदिर की चौथी मंजिल पर सभा कक्षा है। यहां सभा में आज श्री मल्लिक आए हुए हैं। वे चंबल में डाकूओं के समर्पण के दौरान ग्वालियर हाईकोर्ट में न्यायाधीश थे। उन्होंने सत्तर के दशक में बागियों के दौर की चंबल की दास्तानें साझा कीं। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश को बोलने का काम नहीं आता। वह सिर्फ सुनता रहता है।
भारत माता मंदिर के सामने विनोबा सेवा आश्रम में स्वामी नित्यानंद सरस्वती जी मिले। उत्तरकाशी भूकंप राहत शिविर के दौरान उनसे मेरी मुलाकात हुई थी। तब हम इसी आश्रम में रुके थे। उनसे बातें करके कई पुरानी स्मृतियां ताजी हो गईं। रात्रि भोजन समन्वय कुटीर में हुआ। भोजन के उपरांत सभी लोग रेलवे स्टेशन पर वापस आकर अपने अपने कोच में सो गए।


vidyutp@gmail.com