Sunday, July 13, 2014

रजरप्पा - मां छिन्नमस्तिके का दरबार

असम के कामाख्या के बाद बड़े शक्तिपीठ के रूप में रजरप्पा का मां छिन्नमस्तिके मंदिर लोकप्रिय है। रामगढ़ के पास दामोदर और भैरवी नदी के संगम स्थल पर मां छिन्नमस्तिके का मंदिर है। यहां महाकाली मंदिरसूर्य मंदिरदस महाविद्या मंदिर,बाबाधाम मंदिरबजरंगबली मंदिरशंकर मंदिर और विराट रूप मंदिर जैसे सात मंदिर भी हैं।
कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण छह हजार वर्ष पहले हुआ था तो कोई इसे महाभारत युग का मानता है।



मां छिन्नमस्तिके की तीन आंखें हैं। बायां पांव आगे की ओर बढ़ाए हुए वह कमल पुष्प पर खड़ी हैं। पांव के नीचे विपरीत रति मुद्रा में कामदेव और रति शयनावस्था में हैं। मां का गला सर्पमाला तथा मुंडमाल से सुशोभित है। बिखरे और खुले केशजिह्वा बाहरआभूषणों से सुसज्जित मां नग्नावस्था में हैं। दाएं हाथ में तलवार तथा बाएं हाथ में अपना ही कटा मस्तक है। इनके अगल-बगल डाकिनी और शाकिनी खड़ी हैं जिन्हें वह रक्तपान करा रही हैं और स्वयं भी रक्तपान कर रही हैं। मां गले से रक्त की तीन धाराएं बह रही हैं।  मंदिर का मुख्य द्वारा पूरब मुखी है।

मां छिन्न मस्तिके की आदि कथा
मां छिन्नमस्तिके की महिमा की कई कथाएं प्रचलित हैं। प्राचीन काल में छोटानागपुर में रज नामक एक राजा राज करते थे। राजा की पत्नी का नाम रूपमा था। इन्हीं दोनों के नाम से इस स्थान का नाम रजरूपमा पड़ा जो बाद में रजरप्पा हो गया। एक कथा के अनुसार एक बार भगवती भवानी अपनी सहेली जया और विजया के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने गईं। स्नान करने के बाद भूख से उनका शरीर काला पड़ गया। सहेलियों ने भी भोजन मांगा। देवी ने उनसे प्रतीक्षा करने को कहा। बाद में सहेलियों के विनम्र आग्रह पर उन्होंने दोनों की भूख मिटाने के लिए अपना सिर काट लिया। कटा सिर देवी के हाथों में गिरा गले से तीन धाराएं निकलीं। वह दो धाराओं को सहेलियों की ओर प्रवाहित करने लगीं। तभी से ये छिन्नमस्तिके कही जाने लगीं। 
बलि और प्रदूषण
कामाख्या, तारापीठ और त्रिपुर सुंदरी मंदिरों की तरह रजरप्पा में भी बलि चढाने की परंपरा चली रही है। मंदिर के सामने बलि-स्थान पर रोज सौ-दो सौ बकरों की बलि चढ़ाई जाती है। श्रद्धालु मंदिर परिसर में बकरों की बलि चढ़ाने के बाद उसी स्थल में मांस भोज करते हैं। पत्तलप्लेट आदि नदी में बहा देते हैं। 

बलि किए गए बकरों का मुंडन भी पास के भैरवी नदी के बीचों बीच किया जाता है और उसकी गंदगी खून आदि नदी की धारा में बहा दी जाती है। इसके कारण मां छिन्नमस्तिका मंदिर परिसर में पर्यावरण का खतरा मंडरा रहा है।
मंदिर परिसर के पास अवस्थित भैरवी दामोदर नदी भी पर्यावरण प्रदूषण की चपेट में हैं। पास में स्थित सीसीएल का प्रोजेक्ट और जिला प्रशासन की और मंदिर और आसपास के पर्यावरण को  बचाने की कोशिशें बेअसर दिखाई देती हैं।

कैसे पहुंचे
झारखंड के जिला मुख्यालय रामगढ़ से शहर से रजरप्पा की दूरी 27 किलोमीटर है। रामगढ़ बोकारो हाईवे (एनएच 320) पर 16 किलोमीटर आगे जाने के बाद रजरप्पा मोड ( चित्तरपुर) आता है। यहां से 11 किलोमीटर का सफर स्टेट हाईवे से है। पीडब्लूडी की सड़क बहुत शानदार बनी है। रामगढ़ से रजरप्पा के लिए टेकर, मैक्सिमो जैसी छोटी गाड़ियां हमेशा मिलती हैं। वापसी के लिए शाम 6 बजे के बाद कोई वाहन नहीं मिलता। रामगढ़ शहर रामगढ़ कैंट, रांची रोड और बरकाकाना जैसे तीन बड़े रेलवे स्टेशनों से जुड़ा हुआ है।

कहां ठहरें
मंदिर के आसपास ठहरने के लिए समान्य धर्मशाला बने है। खाने के लिए बेहतर रेस्टोरेंट नहीं है। थोडा बेहतर ठहरने खाने का विकल्प चाहिए तो आपको रामगढ़ शहर में ही अपना ठिकाना बनाना चाहिए। वैसे आप झारखंड की राजधानी रांची या बोकारो स्टील सिटी से सुबह चलकर मां के दर्शन कर दोपहर तक लौट भी सकते हैं।

-  विद्युत प्रकाश मौर्य 
( RAJRAPPA, DAMODAR, BHAIRWI, SANGAM, JHARKHAND, RAMGARH ) 




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