Sunday, May 25, 2014

कांगड़ा घाटी रेल का एक सफर (( 5 ))

बचपन में दूरदर्शन पर कांगड़ा घाटी रेल पर एक डाक्यूमेंटरी देखी थी, तब से इस रेल पर सफर करने की एक इच्छा थी। साल 2001 का जुलाई का महीना था हमलोग सपरिवार वैष्णो देवी के दर्शन कर पठानकोट पहुंचे। योजना बन चुकी थी कांगडा घाटी रेल से धर्मशाला और आसपास के स्थलों के दर्शन की। शाम को पठानकोट पहुंचने पर पता चला कि कांगड़ा की रेल सुबह ढाई बजे खुलेगी। हमलोग कांगड़ा मंदिर तक का टिकट लेने के बाद कई घंटे प्लेटफार्म पर ही इंतजार करते रहे। ढाई बजे की ट्रेन के लिए आधा घंटे पहले ही पहुंचने पर पता चला ट्रेन तो ठसाठस स्थानीय लोगों से भर चुकी है। खैर जाना तो था ही बड़ी मुश्किल से ट्रेन में जगह मिल पाई। लोगों ने यह जानकर की हम बाहर से आए सैलानी हैं हमारे लिए उदारता से थोड़ी जगह बनाई।

पंजाब के कुछ स्टेशन तो अंधेरे में गुजर गए उजाला हुआ तो ट्रेन बारयाल हिमाचल में थी। अपनी क्षमता से अधिक वजन उठाए ट्रेन पहाड़ों की हसीन वादियों के बीच हौले हौले आगे बढ़ रही थी। पता चला ब्रजेश्वरी देवी में अष्टमी का मेला है इसलिए इतनी भीड़ है। ट्रेन के एक सहयात्री को पता चला कि हम देवी दर्शन के लिए जा रहे हैं तो उसने मुझे एक 10 रुपये का नोट देते हुए कहा हमारी तरफ से देवी को चढ़ा देने हम किसी काम से दूसरी जगह जा रहे हैं। पहाड़ के लोगों की ब्रजेश्वरी देवी में अगाध श्रद्धा है। हम कुछ घंटे बाद कांगड़ा मंदिर स्टेशन पहुंच गए थे। 

स्टेशन के बगल से एक नदी बहती है। पुल पारकर हमलोग कांगड़ा शहर में ब्रजेश्वरी देवी के मंदिर के पास पहुंचे। दो दिन कांगड़ा प्रवास में धर्मशाला, मैक्लोडगंज, भागसू, नड्डी, चामुंडा मंदिर आदि घूमने के बाद हमलोग फिर कांगड़ा मंदिर स्टेशन पहुंचे। आगे के सफर के लिए। पता चला ट्रेन दो घंटे लेट है। इंतजार किया। इस बार ट्रेन में जगह आसानी से मिल गई। 

समलोटी, नगरोटा, चामुंडा मार्ग, पारोह, सुलह हिमाचल, पालमपुर,  पट्टी राजपुरा, पंचरुखी, मझरैन हिमाचल जैसे छोटे छोटे स्टेशनों से होती हुई ट्रेन बैजनाथ पपरोला पहुंच गई। हमें जाना था बैजनाथ मंदिर जो अगला स्टेशन था। पर आगे ट्रैक पर पेड़ गिर जाने के कारण ट्रेन का सफर यहीं खत्म हो गया। मंदिर यहां से एक किलोमीटर की ही दूरी पर था पर बीच में छोटी नदी थी जिस पर पुल से रेल की पटरियां गुजर रही थीं। सड़क पुल काफी दूर था। लिहाजा बाकी लोगों की तरह हमने भी सावधानी से पांव रखते हुए रेल पुल से ही नदी को पार किया और पहुंच गए बैजनाथ मंदिर।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य 
( KANGRA VALLEY RAILWAYS, KVR, NARROW GAUGE  RAIL SYSTEM) 

No comments:

Post a Comment