Saturday, August 11, 2012

डीएचआर - लाखों लोगों को करा रही थी सफर ((04))

दार्जिलिंग हिमालयन रेल से सफर करने वाले यात्रियों की बात करें तो 1909-1910 में डीएचआर हर साल 1 लाख 74 हजार यात्रियों को ढो रहा था जबकि 47 हजार टन माल की भी ढुलाई हो रही थी। खास तौर पर दार्जिलिंग से चाय ट्रेन से तराई में पहुंचाई जाती थी। जब हिल कार्टरोड पर सिलिगुड़ी से दार्जिलिंग के बीच बस और टैक्सी सेवा चलने लगी तब इस खिलौना ट्रेन में सवारियों की कमी आने लगी क्योंकि टैक्सी तीन घंटे में दार्जिलिंग पहुंचाती है तो ट्रेन छह घंटे में।
भूकंप के खतरे झेले - 1897 में डीएचआर को एक बड़े भूकंप का भी सामाना करना पड़ा। वहीं 1899 में एक तूफान को भी इस रेल मार्ग ने झेला। 1934 में बिहार बंगाल में आए भूकंप का दार्जिलिंग पर बहुत बुरा असर पड़ा। तब इस रेल मार्ग को भी बंद करना पड़ा था। बाद में ररखाव के बाद इसे चालू किया गया।
दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान मददगार - दूसरे विश्व युद्ध के दौरान घूम और दार्जिलिंग इलाके में सेना के शिविरों  में रसद आदि पहुंचाने में इस डीएचआर रेल मार्ग की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही। देश आजाद होने के बाद डीएचआर का भारत सरकार ने अधिग्रहण कर लिया। ये पहले आसाम रेलवे संगठन का हिस्सा बना। 1952 में यह नार्थ इस्टर्न रेलवे जोन का हिस्सा बन गया। 1958 में ये नार्थ इस्ट फ्रंटियर रेलवे जोन का हिस्सा बना।
विश्व धरोहर का दर्जा -  1881 में चालू हुई दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे को यूनेस्को ने 1999 में विश्व धरोहर का दर्जा दिया। ऐसा दर्जा पाने वाली तब ये दुनिया की दूसरी रेलवे लाइन थी। 
इससे पहले 1998 में आस्ट्रिया के सेमरिंग रेलवे को विश्व धरोहर का दर्जा मिला था। पहाड़ पर जाने वाले सैलानियों की हमेशा चाहत होती है कि वे ट्रेन से ही दार्जिलिंग पहुंचे। इसके साथ ही 125 साल से ज्यादा पुरानी इस रेल का सफर अनवरत जारी है।

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(डीएचआर 4) पहली कड़ी के लिए यहां जाएं
DARJEELING HIMALYAN RAIALWAY,

REMEMBER IT IS A WORLD HERTAGE SITE 

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