Thursday, May 22, 2014

कांगड़ा घाटी रेल - धौलाधार की वादियों का मोहक सौंदर्य (( 2))

छुक छुक के साथ पंजाब के गेहूं यानी कनक  के खेतों को पीछे छोड़ती कांगड़ा की रेल आपको ले जाती है धौलाधार पर्वत माला के बीच। इस सफर के दौरान कभी मस्ती में झूमते हुए जंगल आते हैं  तो कभी पहाड़ आते हैं, तो कभी दिखाई देते हैं विस्तारित चाय के हर भरे बगान। कांगड़ा घाटी रेलवे का तो मुख्य आकर्षण सम्मोहित कर देने वाले प्राकृतिक नजारे ही हैं। साथ ही उत्तरी पर्वत सीमा की प्राकृतिक विशालता, अद्भुत घाटियां और जल धाराएं भी लोगों का मन मोह लेती हैं। 
कांगड़ा घाटी का विस्तार हिमालय की धौलादार श्रेणी में उत्तर से दक्षिण तक है। मोटे तौर देखें तो यह एक आयताकार पट्टी है जो 90 मील लंबी और 30 मील चौड़ी है। उत्तर की तरफ पहले तो शिखरों की निम्न श्रंखला है, फिर चोटियों की विस्तृत श्रंखला है जिनकी ऊंचाई 7000 से 9000 फीट तक है।


कांगड़ा घाटी रेल से धौलाधार की पहाड़ों पर बर्फ का नजारा - फोटो दिसंबर 2015 - विद्युत प्रकाश 

इसके पीछे वाले शिखर समूहों की ऊंचाई 13,000 से 16,000 फीट तक है। उसके बाद की बात करें तो बर्फ ही बर्फ है। यहां आपको दूर-दूर तक कुहरे में लिपटी पहाडि़यां देखने को मिलेंगी। पहाड़ियों पर बर्फ ऐसे लगती है मानो हरेभरे समुद्र में सफेद हिम खंड तैरते नजर आ रहे हों।
कांगड़ा घाटी रेल मार्ग इस बात को प्रमाणित करता है कि रेलवे ऐसे रेल मार्ग का निर्माण कर सकता है जो यहां की सुंदरता और रहस्यमय परिवेश में सामंजस्य बनाए रखता हो। इस क्षेत्र में यह काम प्राकृतिक सौंदर्य को छेड़े बिना बड़ी कुशलता से किया गया है तभी तो यह यहां आने वाले सैलानियों के लिए परी लोक सा वातावरण प्रस्तुत करता है।


इस रेल मार्ग को पहाड़ों और घाटियों की भूल-भुलैया से निकालने की बजाय यदि किसी और तरीके से बनाया गया होता तो कहा जा सकता है कि इसकी स्वभाविक सुंदरता ऐसी बिल्कुल नहीं रह पाती।

घुमावदार और तीखे मोड़ों की बजाय इस रेल मार्ग को सीधा और आसान बनाया गया है जिसमें यात्रियों को कभी भी घबराहट या चक्कर नहीं आता जैसा कि अक्सर पहाड़ी क्षेत्रों की यात्रा में यात्रियों के साथ होता है। घाटी का सबसे खूबसूरत और सुरम्य भाग मंगवाल से कांगड़ा तक का 18 मील लंबा फैलाव है। उसके साथ-साथ बाण गंगा नामक संकरी घाटी और कांगड़ा दर्रा भी लुभावने स्थल हैं। 

रेल से पालमपुर पहुंचते ही हिमाच्छादित पर्वतों की श्रंखला जिसकी ऊंचाई 15 हजार से 16 हजार फीट है, मुश्किल से 15 किलोमीटर तक ही दूर रह जाती है। इसके आगे धौलादार पर्वत श्रेणी के समानांतर चलता रेल मार्ग हिम शिखरों के इतने करीब से गुजरता है जितना कि भारत का कोई दूसरा रेल मार्ग नहीं गुजरता। 
पूरी यात्रा के दौरान प्राकृतिक नजारे अत्यंत आकर्षक है। विशेषकर कांगड़ा पहुंचने से कुछ मील पहले वाले दृश्य तो बहुत ही मनोरम हैं। कांगड़ा का राजपूत किला जो कि 1805 में आए भूकंप में ध्वस्त हो गया था, दूसरी सुरंग से निकलने के बाद आपको दिखाई देने लगता है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य
( KANGRA VALLEY RAILWAYS, KVR, NARROW GAUGE ) 

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