Thursday, May 29, 2014

कालका शिमला रेल – इतिहास और बदलती तकनीक ((03 ))


साल 1884-85 के दौरान ब्रिटिश सरकार ने शिमला को रेल से जोड़ने की योजना पर काम शुरू किया। पहाड़ों के प्राकृतिक वातावरण को बचाए रखने के लिए इस क्षेत्र में नैरो गेज लाइन बिछाने का प्रस्ताव दिया गया। 1891 तक कालका रेलवे लिंक से जुड़ चुका था। अंबाला कालका रेलवे कंपनी और सरकार के बीच कालका शिमला रेल लाइन बिछाने के लिए 1899 में अनुबंध होने के बाद काम प्रारंभ हुआ।

 2 फीट 6 इंच गेज का चयन पहले इस मार्ग पर 2 फीट चौड़ाई वाली पटरी बिछाने पर सहमति बनी पर बाद में उसे सेना के आग्रह पर 2 फीट 6 इंच ( 762 मिलीमीटर) कर दिया गया। रेल पटरियों के लिए लेमिनेटेड स्टील का इस्तेमाल किया गया जबकि स्लीपर के लिए लकड़ियों का इस्तेमाल हुआ। तकरीबन चार साल के लगातार कार्य के बाद 9 नवंबर 1903 को इस मार्ग पर ट्रैफिक आरंभ हो गया। तत्कालीन वायसराय एवं भारत के गवर्नर जनरल लार्ड कर्जन ने इसका उदघाटन किया। पर इसी साल हिमाचल में हुई भारी बर्फबारी और भूस्खलन से इस मार्ग को अस्थायी तौर पर बंद करना पड़ा। इसके बाद कई बार बर्फबारी का इस मार्ग पर असर पड़ता है।

केएसआर के बदलते लोकोमोटिव - 
केएसआर के नेटवर्क पर लोकोमोटिव के क्षेत्र में भी खूब प्रयोग हुए। शुरुआत में केएसआर के मार्ग पर दार्जिलिंग हिमालयन रेल से परिस्कृत किए गए लोको (इंजन) को लाकर भी चलाया गया था।पहले लोको के तौर पर 4 पहियों वाले इंजन इस्तेमाल में लाए गए। बाद में 6 पहिए वाले और फिर 10 पहियों वाले इंजन इस मार्ग पर प्रयोग में लाए गए। इनमें से कई लोकोमोटिव  ग्लासगो के स्टीवर्ट एंड कंपनी ने बनाए थे। ये लोको बिना ज्यादा बदलाव के 1953 तक संचालन में थे। बाद में इन लोको को जर्मन कंपनी हंसले ने परिस्कृत किया और इसमें कोयला और पानी डालने की क्षमता बढ़ाई गई।


1905 का स्टीम लोकोमोटिव तंदुरुस्त -  केएसआर पर 1905 में लाया गया स्टीम लोकोमोटिव 520 को साल 2017 में भी सफलता पूर्वक चलाया जा चुका है। ये इंजन 1905 में लंदन की एक कंपनी नॉर्थ ब्रिटिश लोकोमोटिव तैयार किया था। कालका-शिमला रेलमार्ग पर सबसे पुराना धरोहर  लोकोमोटिव है जो सौ साल के बाद भी रेलवे ट्रैक दौड़ रहा है।  

स्टीम की जगह डीजल लोको - 1952 के बाद कालका शिमला मार्ग पर भाप इंजन की जगह डीजल लोको का इस्तेमाल शुरू किया गया। 1980 में इस मार्ग पर आखिरी भाप इंजन का प्रयोग किया गया।
पर साल 2001 में पुरानी परंपरा को याद करते हुए एक स्टीम इंजन को इस मार्ग पर फिर से लाया गया। सैलानियों के लिए आज भी प्रसिद्ध बी क्लास स्टीम इंजन मौजूद है जिसे खास मौकों पर चलाया जाता है। चार पहियों वाले बोगी भी अभी भी इस मार्ग पर इस्तेमाल में हैं।
पेट्रोल से चलने वाला लोको भी-  कालका शिमला रेल पर कभी भाप इंजन से चलने वाली ट्रेनें अब डीजल इंजन से चलती है। लेकिन ये एक मात्र रेलवे मार्ग है जिस पर कभी पेट्रोल से चलने वाले लोको भी चलाए गए। 1911 में इस रेल मार्ग पर पेट्रोल चलित पार्सल वैनों का संचालन किया गया। इस इंजन का निर्माण ड्रेवरी कार कंपनी लंदन ने किया था। इसमें 17 हार्स पावर का इंजन लगा था। इस रेल इंजन को राष्ट्रीय रेल संग्रहालय दिल्ली में रखा गया है।

1932 में डीजल मोटर कार - वहीं डीजल इलेक्ट्रिक मोटर कार इस मार्ग पर 1932 में इस्तेमाल में लाया गया। इस मोटर कार की खिड़कियां चौड़ी हैं जिससे नजारे देखने का आनंद बढ़ जाता है। ये रेल मोटरकार अभी भी इस्तेमाल में है। कई बार एक परिवार के लोग या पूरा एक समूह इसे बुक कराकर इसमें सामूहिक सफर का आनंद उठाता है। 


- विद्युत प्रकाश मौर्य

(  KSR, KALKA SHIMLA RAIL, NARROW GAUGE ) 

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