Monday, June 30, 2014

महान सेनानी बिरसा मुंडा का शहर - रांची

रांची शहर की कई पहचान है, उसमें एक महान क्रांतिकारी बिरसा मुंडा की यादें भी हैं। झारखंड के लोग उन्हें सम्मान से बिरसा भगवान कहते हैं। कौन थे बिरसा मुंडा जो 25 साल से कम उम्र में भगवान कहे जाने लगे थे। बिहार झारखंड के छात्र तो स्कूली पुस्तकों में उनके बारे में पढ़ चुके हैं, पर पूरे देश बिरसा जैसे क्रांतिकारियों के बारे में कम ही मालूम है।
रांची शहर के एयरपोर्ट का नाम बिरसा के नाम पर बिरसा मुंडा एयरपोर्ट रखा गया है। वहीं रांची के कांके स्थित प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय का नाम बिरसा कृषि विश्वविद्यालय है। पर बिरसा सिर्फ झारखंड के ही नहीं देश स्वतंत्रता आंदोलन के उन महान क्रांतिकारियों में शुमार हैं जिन्होंने महज 25 साल की उम्र में अपने प्राण भारत मां के चरणों में न्योछावर कर दिए। बिरसा उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में देश के क्रांतिकारियों की फेहरिस्त में सबसे ज्यादा चमकते हुए सितारे थे।  
उलगुलान को अंजाम दिया - बिरसा मुंडा 19वीं सदी के प्रमुख आदिवासी जननायकों में से थे। उनके नेतृत्‍व में मुंडा आदिवासियों ने 19वीं सदी के आखिरी वर्षों में के महान आन्दोलन उलगुलान को अंजाम दिया। इसीलिए बिरसा को मुंडा समाज के लोग भगवान के रूप में पूजा करते हैं।
सुगना मुंडा का सपूत - बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को रांची जिले के उलिहतु गांव में हुआ था। बिरसा के पिता का नाम सुगना मुंडा और माता का नाम करमी हटू था। मुंडा रीति रिवाज के अनुसार उनका नाम गुरुवार के हिसाब से बिरसा रखा गया था। गांव में प्रारंभिक पढ़ाई के बाद बिरसा चाईबासा इंग्लिश मिडिल स्कूल में पढने गए। बिरसा मुंडा के मन में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बचपन से ही विद्रोह का भाव भर गया था।
रांची में बिरसा भगवान की समाधि पर। 
 
बिरसा को अपनी जमीन और संस्कृति से गहरा लगाव था। जब वह अपने स्कूल में पढ़ते थे तभी से उन्हें मुंडाओं की छिनी गई भूमि पर उन्हें दुख था। वे वाद-विवाद में हमेशा प्रखर तरीके से  आदिवासियों की जल, जंगल और जमीन पर हक की वकालत करते थे।
बगावती बिरसा स्कूल से निकाले गए - उन्हीं दिनों एक पादरी डॉक्टर नोट्रेट ने लोगों को लालच दिया कि अगर वह ईसाई बनें और उनके अनुदेशों का पालन करते रहें तो वे मुंडा सरदारों की छीनी हुई भूमि को वापस करा देंगे। पर 1886-87 में मुंडा सरदारों ने जब भूमि वापसी का आंदोलन किया तो इस आंदोलन को न केवल दबा दिया गया बलिक ईसाई मिशनरियों द्वारा इसकी भर्त्सना भी की गई जिससे बिरसा मुंडा को गहरा आघात लगा। उनकी बगावत को देखते हुए उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया। वे 1890 में पिता के साथ चाईबासा से वापस आ गए।
धरती बाबा और महापुरुष - बिरसा की गतिविधियां अंग्रेज सरकार को रास नहीं आई और उन्हें 1895 में गिरफ्तार कर लिया गया। बिरसा को हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में दो साल के लिए जेल की सजा दी गई।  पर बिरसा और उनके समर्थकों ने तो अकाल पीड़ित जनता की सहायता करने की ठान रखी थी। उनके सेवा भाव के कारण युवा काल में ही उन्हें महापुरुष का दर्जा मिल गया।  उन्हें इलाके के लोग धरती बाबा के नाम से पुकारने लगे। 
बिरसा कृषि विश्वविद्यालय रांची में बिरसा भगवान की प्रतिमा। 
अंग्रेजी फौज से तीर कमान लेकर भिड़े - साल 1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच कई युद्ध हुए।  बिरसा और उसके चाहने वालों अंग्रेजों को नाको चने चबाने को मजबूर कर दिया। अगस्त 1897 में बिरसा और उसके 400 सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूंटी थाने पर धावा बोला। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेना से हुई जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गयी लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं की गिरफ़्तार किया गया। जनवरी 1900 में जहां बिरसा अपनी जनसभा संबोधित कर रहे थे, डोमबाड़ी पहाड़ी पर एक और संघर्ष हुआ, जिसमें बहुत सी औरतें और बच्चे मारे गए। बाद में बिरसा के कुछ समर्थकों की भी गिरफ्तारी हुई।  बिरसा भी 3 फरवरी, 1900 को चक्रधरपुर में गिरफ्तार किए गए।


रांची में बिरसा की समाधि - 9 जून 1900 को रांची जेल में बिरसा की मौत हो गई। रांची शहर में बिरसा की समाधि बनाई गई है। मैं इस समाधि स्थल पर पहुंचता हूं। उस महान क्रांतिकारी को याद करके श्रद्धा से सिर झुक जाता है, जो कांग्रेस पार्टी की स्थापना के 15 साल बाद ही इस दुनिया को अलविदा कह गया। ब्रिटिश सरकार का जैसा उग्र विरोध कांग्रेस और दूसरे नेताओं ने 1930-40 के दशक में शुरू किया, बिरसा वैसा विद्रोह काफी पहले कर चुके थे। अपने पच्चीस साल के छोटे जीवन में ही बिरसा ने जैसी क्रांति की लौ जलाई , उसकी नजीर कहीं और नहीं मिलती।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
-         (BIRSA MUNDA, RANCHI, JHARKHAND )



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