Sunday, July 6, 2014

टैगोर हिल - ज्योतिंद्र नाथ की आत्मा बसती है यहां

रांची के ऐतिहासिक मोरहाबादी मैदान से थोड़ी दूरी पर टैगोर हिल। 300 फीट ऊंची इस पहाड़ी का नाम कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई ज्योतिन्द्रनाथ टैगोर के नाम पर रखा गया है। मनोरम वातावरण, हवाओं में जादू के बीच यहां से सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा लेना यादगार है। टैगोर हिल की चोटी के रांची शहर का बर्ड आई व्यू दिखाई देता है।

कहा जाता है कि जब ज्योतिन्द्रनाथ टैगोर की पत्नी कादम्बरी देवी ने आत्महत्या कर ली तब उन्होंने पत्नी की याद में यहां एक आश्रम बनाया। यहां एक सौ साल पुराना विशाल वृक्ष है जिसकी चरणों में बैठक ज्योतिरींद्रनाथ ध्यान लगाया करते थे। यहीं पर बैठकर ज्योतिंद्रनाथ ने बाल गंगाधर तिलक की गीता रहस्य का अनुवाद किया था। ज्योतिरींद्रनाथ महर्षि देवेंद्रनाथ के पांचवें बेटे थे और रवींद्रनाथ टैगोर से 12 साल बड़े थे। वे संगीतकार, गायक, चित्रकार,  अनुवादक, नाटककार, कवि सब कुछ थे। वे पहली बार 1905 में रांची आए। यहां आबोहवा उन्हें इतनी अच्छी लगी की यहीं के होकर रह गए।

 1908 में उन्होंने टैगोर हिल के पहाड़ी के आसपास की जमीन खरीदी और यहां आगे लंबे समय तक रहे। टैगोर हिल पर चढ़ने के लिए उन्होंने सीढ़िया बनवाईं। अब इन सीढ़ियों की राज्य प्रशासन की ओर से मरम्मत कराई गई है। ज्योतिंद्र ब्रह्मसमाजी थे इसलिए पहाड़ी की चोटी पर साधना के लिए एक खुला मंडप बनवाया। ज्योतिदा ने अपने रहने के लिए यहां घर भी बनवाया। हालांकि कविगुरु रविंद्रनाथ टैगोर रांची कभी नहीं आए। लेकिन 4 मार्च 1925 को ज्योति दा ने यहीं पर अंतिम सांस ली। टैगोर हिल की चोटी पर पहुंचकर लगता है मानो उनकी आत्मा अभी भी यहीं बस रही हो।


टैगोर हिल पर साफ सफाई के इंतजामात अच्छे दिखाई नहीं देते। दोपहर से शाम तक टैगोर हिल रांची के इक्के दुक्के प्रेमी प्रेमिकाओं से गुलजार हो जाता है, जो प्रेमालाप के लिए एकांत ढूंढने इधर आते हैं। यहां खाने पीने के लिए कैंटीन बनाई गई है पर वह बंद रहती है। पहाड़ी पर सुरक्षा इंतजाम अच्छे नहीं हैं। इसलिए जब कभी जाएं तो समूह में ही जाने की कोशिश करें। रांची का जिला प्रशासन ध्यान दे तो टैगोर हिल की दशा में सुधार हो सकता है।

-         - विद्युत प्रकाश मौर्य
(TAGORE HILL, RANCHI, JYOTINDERNATH  ) 

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