Friday, May 30, 2014

103 सुरंगों से होकर गुजरती है कालका शिमला रेल (( 04 ))

बड़ोग सुरंग के सामने ( सन 2000 की तसवीर ) 

कालका शिमला के 94 किलोमीटर के सफर के बीच कुल 103 सुरंगे आती हैं। हालांकि कुछ सुरंगे काफी छोटी-छोटी हैं। पर इनमें बड़ोग की सुरंग एक किलोमीटर से ज्यादा लंबी है। यह भारतीय नैरो गेज रेलवे की सबसे लंबी सुरंग है। वहीं कोटी की सुरंग भी 700 मीटर लंबी है।

 केएसआर की सबसे लंबी सुरंग - बड़ोग
कालका शिमला मार्ग पर 33 नंबर की सुरंग है बड़ोग। ये सुरंग 1143.61 मीटर लंबी है। यानी एक किलोमीटर से ज्यादा। 25 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से ट्रेन गुजरती है तो सुंरग को पार करने में तीन मिनट से ज्यादा का समय लगता है। अपने निर्माण के समय ये दुनिया की सबसे लंबी सुरंग थी। जैसे ही सबसे लंबी सुरंग में ट्रेन घुसती है सारे डिब्बों में बैठे बच्चे समवेत स्वर में चिल्लाना शुरू कर देते हैं। चार मिनट से ज्यादा बिल्कुल अंधेरा होता है। जब ट्रेन सुरंग से गुजरती है न सिर्फ बच्चों का बल्कि बड़ों का भी रोमांच देखने लायक होता है।

पहाड़ों को चिरकर सुरंग बनाना वह भी 1893 से 1900 से बीच बहुत मुश्किल काम था। पर इसे कुछ असफलताओं के बाद सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया। बड़ोग रेलवे स्टेशन पर आने वाली और जाने वाली ट्रेनें देर तक रुकती हैं। ये स्टेशन सबसे लंबे सुरंग खत्म होने के के ठीक बाद आता है। यहां आप खूब सारी तस्वीरें खिंचवा सकते हैं और चाय नास्ता भी कर सकते हैं। कालका शिमला मार्ग पर यही एक स्टेशन है जहां पर रिफ्रेंशमेंट के नाम पर कुछ उपलब्ध होता है। 
असफलता से दुखी हो बड़ोग ने की थी आत्महत्या
स्टेशन का नाम पर कालका शिमला रेल मार्ग बनवाने वाले इंजीनियर जेम्स क्लार्क बड़ोग के नाम पर रखा गया है। पहले बड़ोग इस सबसे लंबी सुरंग के निर्माण का जिम्मा सौंपा गया था। लेकिन उनकी पहली कोशिश असफल रही।
कई महीने तक सुरंग की खुदाई जारी रही। हुआ यह था कि बड़ोग सारे तकनीकी जोड़ घटाव करके पहाड़ के दोनों ओर से सुरंग के लिए खुदाई शुरू कराई। पर कई दिनों बाद दोनों छोर के रास्ते बीच में मिल नहीं पाए। इस तरह सारी मेहनत बेकार चली गई।
बड़ोग की इस असफलता से सरकार नाराज हो गई। तब बड़ोग पर सरकार ने एक रुपये का आर्थिक दंड भी लगाया। इस दंड और अपनी असफलता पर बड़ोग पर बड़ी आत्मग्लानि हुई। एक दिन चुपचाप बड़ोग अपने प्यारे कुत्ते के साथ जंगल में गए और वहां खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर ली। इस तरह उनका दुखद अंत हुआ, लेकिन उनकी कोशिश बेकार नहीं गई।
बडोग सुरंग के सामने अनादि ( 2012 ) 


बाद में सुरंग बनाने में सफलता मिली - कहते हैं कि सफलता का रास्ता असफलताओं से होकर जाता है। बाद में इसी सुरंग के बगल में नई सुरंग बनाई गई, जिससे होकर आजकल रेल गुजरती है। अभियंता एच एस हैरिंगटन के पर्यवेक्षण में साधु बाबा भलकू की सलाह से नई सुरंग बनाई गई। साधु बाबा भलकू हिमाचल के स्थानीय व्यक्ति थे पर उनका पहाड़ों का ज्ञान अदभुत था। ब्रिटिश सरकार ने उनकी मदद प्राप्त की। पर बड़ोग की बनाई नाकामयाब सुरंग अभी भी अस्तित्व में है। जो वर्तमान सुरंग के एक किलोमीटर बगल में है।
बाद में बड़ोग के कामकाज को सरकार ने पहचाना और 33 नंबर की इस सुरंग का नाम बड़ोग सुरंग रखा गया। साथ ही रेलवे स्टेशन का नाम भी बड़ोग रखा गया। बड़ोग की मजार भी यहीं पर बनाई गई है। रेलवे स्टेशन से तीन किलोमीटर चलकर बड़ोग की मजार तक पहुंचा जा सकता है। 


बड़ोग में होता था शाही ठहराव -   ब्रिटिश काल में जब कालका से शिमला के लिए इस टॉय ट्रेन से ब्रिटिश अफसर और उनकी मेम साहब चलती थीं, तो ट्रेन बड़ोग में एक घंटे रुकती थी। यहां पर साहब लोगों का शाही भोजन का पड़ाव होता था। 1800 मीटर की ऊंचाई पर बड़ोग की दूरी सोलन से 7 किलोमीटर है। बड़ोग  में कालका शिमला रेलवे का म्यूजियम भी बनाया गया है। यहां पर आप इस रेल सिस्टम के बारे में अपने ज्ञान में इजाफा कर सकते हैं। साथ ही सैलानियों के रहने के लिए एक विश्राम गृह भी बना हुआ है। अगर आप कालका शिमला रेलवे को और गहराई से समझना चाहते हैं तो बड़ोग में विश्राम भी कर सकते हैं। ठहरने के लिए यहां पर हिमाचल टूरिज्म का होटल पाइनवुड और होटल बड़ोग हाइट्स भी विकल्प के तौर पर उपलब्ध है।

बाबा भलकू रेल संग्रहालय- कालका शिमला रेलवे के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाने वाले स्थानीय साधु की याद में शिमला में साल 2011 में बाबा भलकू रेल म्युजियम की स्थापना की गई। ओल्ड बस स्टैंड के पास स्थित ये संग्रहालय 7 जुलाई 2011 को उत्तर रेलवे के अंबाला डिविजन की ओर से खोला गया। कालका शिमला रेलवे से जुड़े तमाम पहलुओं से लोगों का साक्षात्कार कराता है। इसका प्रवेश टिकट 20 रुपये का है। इस संग्रहालय में कालका शिमला रेल में इस्तेमाल हुई क्राकरी से लेकर नायब तस्वीरों का संग्रह देख सकते हैं।

कालका शिमला रेल रेल - एक नजर
कुल दूरी 94 किलोमीटर, गेज 2 फीट , 6 ईंच
शुरुआत वर्ष 1903, कुल स्टेशन - 19
कहां से कहां तक कालका ( हरियाणा) से शिमला ( हिमाचल प्रदेश)
यूनेस्को से विश्व धरोहर का दर्जा 2008 में


- विद्युत प्रकाश मौर्य
(  KSR, KALKA SHIMLA RAIL, NARROW GAUGE  ) 
REF.
1. http://www.nr.indianrailways.gov.in/KSR/11.pdf 

Thursday, May 29, 2014

कालका शिमला रेल – इतिहास और बदलती तकनीक ((03 ))


साल 1884-85 के दौरान ब्रिटिश सरकार ने शिमला को रेल से जोड़ने की योजना पर काम शुरू किया। पहाड़ों के प्राकृतिक वातावरण को बचाए रखने के लिए इस क्षेत्र में नैरो गेज लाइन बिछाने का प्रस्ताव दिया गया। 1891 तक कालका रेलवे लिंक से जुड़ चुका था। अंबाला कालका रेलवे कंपनी और सरकार के बीच कालका शिमला रेल लाइन बिछाने के लिए 1899 में अनुबंध होने के बाद काम प्रारंभ हुआ।

 2 फीट 6 इंच गेज का चयन पहले इस मार्ग पर 2 फीट चौड़ाई वाली पटरी बिछाने पर सहमति बनी पर बाद में उसे सेना के आग्रह पर 2 फीट 6 इंच ( 762 मिलीमीटर) कर दिया गया। रेल पटरियों के लिए लेमिनेटेड स्टील का इस्तेमाल किया गया जबकि स्लीपर के लिए लकड़ियों का इस्तेमाल हुआ। तकरीबन चार साल के लगातार कार्य के बाद 9 नवंबर 1903 को इस मार्ग पर ट्रैफिक आरंभ हो गया। तत्कालीन वायसराय एवं भारत के गवर्नर जनरल लार्ड कर्जन ने इसका उदघाटन किया। पर इसी साल हिमाचल में हुई भारी बर्फबारी और भूस्खलन से इस मार्ग को अस्थायी तौर पर बंद करना पड़ा। इसके बाद कई बार बर्फबारी का इस मार्ग पर असर पड़ता है।

केएसआर के बदलते लोकोमोटिव - 
केएसआर के नेटवर्क पर लोकोमोटिव के क्षेत्र में भी खूब प्रयोग हुए। शुरुआत में केएसआर के मार्ग पर दार्जिलिंग हिमालयन रेल से परिस्कृत किए गए लोको (इंजन) को लाकर भी चलाया गया था।पहले लोको के तौर पर 4 पहियों वाले इंजन इस्तेमाल में लाए गए। बाद में 6 पहिए वाले और फिर 10 पहियों वाले इंजन इस मार्ग पर प्रयोग में लाए गए। इनमें से कई लोकोमोटिव  ग्लासगो के स्टीवर्ट एंड कंपनी ने बनाए थे। ये लोको बिना ज्यादा बदलाव के 1953 तक संचालन में थे। बाद में इन लोको को जर्मन कंपनी हंसले ने परिस्कृत किया और इसमें कोयला और पानी डालने की क्षमता बढ़ाई गई।


1905 का स्टीम लोकोमोटिव तंदुरुस्त -  केएसआर पर 1905 में लाया गया स्टीम लोकोमोटिव 520 को साल 2017 में भी सफलता पूर्वक चलाया जा चुका है। ये इंजन 1905 में लंदन की एक कंपनी नॉर्थ ब्रिटिश लोकोमोटिव तैयार किया था। कालका-शिमला रेलमार्ग पर सबसे पुराना धरोहर  लोकोमोटिव है जो सौ साल के बाद भी रेलवे ट्रैक दौड़ रहा है।  

स्टीम की जगह डीजल लोको - 1952 के बाद कालका शिमला मार्ग पर भाप इंजन की जगह डीजल लोको का इस्तेमाल शुरू किया गया। 1980 में इस मार्ग पर आखिरी भाप इंजन का प्रयोग किया गया।
पर साल 2001 में पुरानी परंपरा को याद करते हुए एक स्टीम इंजन को इस मार्ग पर फिर से लाया गया। सैलानियों के लिए आज भी प्रसिद्ध बी क्लास स्टीम इंजन मौजूद है जिसे खास मौकों पर चलाया जाता है। चार पहियों वाले बोगी भी अभी भी इस मार्ग पर इस्तेमाल में हैं।
पेट्रोल से चलने वाला लोको भी-  कालका शिमला रेल पर कभी भाप इंजन से चलने वाली ट्रेनें अब डीजल इंजन से चलती है। लेकिन ये एक मात्र रेलवे मार्ग है जिस पर कभी पेट्रोल से चलने वाले लोको भी चलाए गए। 1911 में इस रेल मार्ग पर पेट्रोल चलित पार्सल वैनों का संचालन किया गया। इस इंजन का निर्माण ड्रेवरी कार कंपनी लंदन ने किया था। इसमें 17 हार्स पावर का इंजन लगा था। इस रेल इंजन को राष्ट्रीय रेल संग्रहालय दिल्ली में रखा गया है।

1932 में डीजल मोटर कार - वहीं डीजल इलेक्ट्रिक मोटर कार इस मार्ग पर 1932 में इस्तेमाल में लाया गया। इस मोटर कार की खिड़कियां चौड़ी हैं जिससे नजारे देखने का आनंद बढ़ जाता है। ये रेल मोटरकार अभी भी इस्तेमाल में है। कई बार एक परिवार के लोग या पूरा एक समूह इसे बुक कराकर इसमें सामूहिक सफर का आनंद उठाता है। 


- विद्युत प्रकाश मौर्य

(  KSR, KALKA SHIMLA RAIL, NARROW GAUGE ) 

Wednesday, May 28, 2014

विश्व धरोहर कालका शिमला रेल ((02))

केएसआर के सौ साल पर जारी डाक टिकट। 
संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनेस्को ने कालका शिमला रेल नेटवर्क को विश्व धरोहर का दर्जा दे रखा है। जुलाई 2008 में इस रेल मार्ग को यूनेस्को से वर्ल्ड हेरिटेज साइट का दर्जा पाने का सौभाग्य मिला। कनाडा के क्यूबेक सिटी में इसे विश्व धरोहर की सूची में शामिल करने पर फैसला लिया गया।
इतना ही नहीं इसे विश्व के सबसे भरोसेमंद रेल सेवाओं में शामिल किया गया।

इससे पहले 2003 में सफल संचालन के 100 साल पूरे करने पर भारत सरकार ने कालका शिमला रेलवे पर एक पांच रुपये का डाक टिकट भी जारी किया था। अपने अनूठे नेटवर्क के लि पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे और तमिलनाडु के नीलगिरी माउंटेन रेलवे को इससे पहले ही ये दर्जा मिल चुका था। तो बात करते हैं इसकी कुछ अनूठी विशेषताओं की।

केएसआर का एक रेलवे स्टेशन भवन। 
रोमन शैली के पुल - कालका शिमला रेलवे लाइन के सभी पुल रोमन शैली में बनाए गए हैं। इन पुलों का डिजाइन इस तरह बनाया गया कि ये हवा और पानी का दबाव झेल सकें।

रास्ते में आने वाली गहरी घाटियों की कम चौड़ाई पर कार्य करने की समस्या से निपटने के लिए उन घाटियों की ऊंचाई को काटकर तथा समतल बनाकर बड़ी बुद्धिमानी से कई पुलों का निर्माण किया गया। गिनीज बुक ऑफ रेल फैक्ट्स एंड फीटने इसे द ग्रेटेस्ट नैरो गेज इंजीनियरिंग ऑफ इंडियाबताया है। 

कालका शिमला रेल में विश्व का सबसे ऊंचा मल्टी आर्क गैलरी ब्रिज बना है तो अपने समय की सबसे लंबी सुंरग बनी थी। पहाड़ों पर इस तरह की रेल का उदाहरण दुनिया के किसी और देश में नहीं है। पहाड़ों के पर्यावरण को बिना किसी तरह का नुकसान पहुंचाए ये ट्रेन सौ साल बाद भी यात्रियों को सेवा दे रही है। खासतौर पर हिमालय क्षेत्र के पहाड़ों की चट्टानें कोमल हैं। इस कारण यहां चट्टान दरकने, भूस्खल और मौसम के बदलाव से होने वाले खतरे ज्यादा हैं।


18 स्टेशन, 96 किलोमीटर का सफर - कालका शिमला के 96 किलोमीटर के सफर के बीच कुल 103 सुरंगे हैं। कुल 18 रेलवे स्टेशन हैं रास्ते में। कालका से चलने के बाद रास्ते में टकसाल, गुम्मन, कोटी, जाबली, सनावर, धर्मपुर, कुमार हट्टी डगशाई, बड़ोग, सोलन, सलोगड़ा, कंडाघाट, कनोह, कैथलीघाट, शोघी, तारादेवी, जतोग, समर हिल स्टेशन आते हैं।


टकसाल में अनूठा घुमावदार सफर - कालका शिमला रेल के निर्माण में तकनीक के कमाल का उदाहरण टकसाल रेलवे स्टेशन के पास देखने को मिलता है। यहां पर रेल एक ही स्थान पर चक्कर काटती हुई पहाड़ों पर ऊंचाई की ओर पहुंचती है। आप सफर के दौरान उन नीचे की पटरियों को देख सकते हैं जहां से चलते हुए आपकी ट्रेन ऊंचाई पर आई है। एक ही स्थान पर चक्कर काटते हुए ट्रेन कई सौ फीट की ऊंचाई प्राप्त कर लेती है। और यहीं पर आपको पहाड़ों के मौसम बदलने का एहसास होने लगता है जो आगे शिमला तक जारी रहता है।

केएसआर में चार तरह के कोच-
कालका शिमला रेल मार्ग पर यात्रियों के लिए चार तरह के कोच चलाए जाते हैं। इनमें डिलक्स, फर्स्ट क्लास और सेकेंड क्लास में दो तरह के कोच शामिल हैं। सेकेंड क्लास में लकड़ी की सीट वाले कोच हैं तो कुछ गद्दे वाली सीटें भी हैं। इस मार्ग पर वातानुकूलित कोच नहीं है। सदाबहार मौसम होने के कारण उसकी जरूरत भी महसूस नहीं की गई।
आज देश भर के ट्रेनों एलुमिनियम के इस्तेमाल वाले एलएचबी कोच लगाए जा रहे हैं पर कालका शिमला रेल मार्ग के कोच के वजन को कम करने के लिए एलुमिनियम का इस्तेमाल पहले से ही ज्यादा मात्रा में किया जा रहा है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

 (  KSR, KALKA SHIMLA RAIL, NARROW GAUGE ) 

Tuesday, May 27, 2014

कालका शिमला रेल - शताब्दी का सफर ((01))

देश के सबसे लोकप्रिय हिल स्टेशन शिमला को जोड़ती कालका शिमला रेल। नौ नवंबर 1903 से शुरू हुआ कालका-शिमला रेल का सफर 114 सालों के बाद भी अनवरत जारी है। कालका-शिमला रेल को संक्षेप में केएसआर ( कालका शिमला रेल) कहते हैं। कालका शिमला रेल सैलानियों की खास पसंद है। शिमला जाने वाले सैलानी बस के बजाय इस खिलौना ट्रेन से शिमला जाने को प्राथमिकता देते हैं। क्योंकि इस खिलौना ट्रेन का सफर इतना सुहाना है कि जितना मजा शिमला की हसीन वादियों में घूमने में आता है उतना आनंद ये छह घंटे का सफर आपको देता है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर घोषित कर रखा है। कालका-शिमला रेल को संक्षेप में केएसआर कहते हैं। बीसवीं सदी के आरंभ में देश के सबसे लोकप्रिय हिल स्टेशन शिमला को रेल से जोड़ने वाली केएसआर का शुरू हुआ सफर में छोटी छोटी बाधाओं को दूर कर जारी है। ये सर्दी गर्मी बरसात हर मौसम में देशी-विदेशी सैलानियों को शिमला का मजेदार सफर कराती है।

कालका रेलवे स्टेशन - सफर की शुरुआत कालका शहर से होती है। कालका हरियाणा राज्य का रेलवे स्टेशन है जो चंडीगढ़ से थोड़ा आगे है। कालका ब्राड गेज का आखिरी रेलवे स्टेशन है। कालका स्टेशन के ब्राडगेज प्लेटफार्म से ही कालका शिमला छोटी लाइन का प्लेटफार्म जुड़ा हुआ है। अगर आप दिल्ली से हिमालयन क्वीन से सुबह अपना सफर शुरू करते हैं तो दोपहर में कालका से शिमला जाने वाली ट्रेन आपको मिलती है। अगर आप किसी और समय में कालका पहुंचे हैं तो कालका रेलवे स्टेशन के आसपास होटलों में ठहर कर अगले दिन सुबह कालका से शिमला जाने वाली ट्रेनों से आगे का सफऱ कर सकते हैं।


शिमला रेलवे स्टेशन - तकरीबन 2100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित शिमला रेलवे स्टेशन कुछ-कुछ दार्जिलिंग रेलवे स्टेशन से मिलता-जुलता लगता है। दोनों के एक तरफ ऊंचा शहर तो दूसरी तरफ गहरी घाटी है। 

 समुद्र तल से 2075 मीटर की ऊंचाई पर शिमला रेलवे स्टेशन बड़ा खूबसूरत और साफ-सुथरा है। स्टेशन अपने आप में रेलवे का म्यूजियम सा लगता है। यहां कालका शिमला रेल के बारे में काफी जानकारी चित्रों में उपलब्ध है। स्टेशन पर अच्छा सा स्टोरेंट भी है। यहां 55 रुपये में स्पेशल थाली का स्वाद लिया जा सकता है। खाने पीने की दरें आपकी जेब के लिए महंगी नहीं है।


शिमला में सेकेंड क्लास और प्रथम श्रेणी के यात्रियों के लिए अच्छे प्रतीक्षालय बने हैं। स्टेशन पर विश्रामलय भी है। पहले से इसमें ठहरने के लिए भी बुकिंग कराई जा सकती है। शिमला उतरने पर अगर आप भूखे हैं तो यहीं से कुछ पेट पूजा करके ही आगे बढ़ें। क्योंकि आगे कहीं भी जाने के लिए चढ़ाई है।


शिमला रेलवे स्टेशन से शहर के दिल यानी मॉल की दूरी महज एक किलोमीटर है। आप टहलते हुए भी जा सकते हैं।

फिल्मों में कालका शिमला रेल - बॉलीवुड की बात करें तो 1960 में शम्मी कपूर की फिल्म ब्याय फ्रेंड का गाना मुझको अपना बना लो...कालका शिमला रेल पर शूट हुआ था। वहीं सन 2000 में आई प्रीति जिंटा की फिल्म क्या कहना में भी कालका-शिमला रेल और उसके कुछ स्टेशनों की छवि देखी जा सकती है।


- विद्युत प्रकाश मौर्य
 ( KSR, KALKA SHIMLA RAIL, NARROW GAUGE, HIMACHAL   )

Monday, May 26, 2014

विरासत की याद - कांगड़ा घाटी रेलवे का स्टीम लोकोमोटिव (( 6 ))

कांगड़ा के रेल में सेवा देने वाले स्टीम लोकोमोटिव में जेडएफ 107 की चर्चा महत्वपूर्ण है। यह नैरोगेज रेलवे सिस्टम का एक शक्तिशाली लोकोमोटिव था। कांगड़ा घाटी रेलवे को लंबे समय तक सेवाएं देने वाला एक लोकोमोटिव इन दिनों नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पहाड़गंज वाले निकास द्वार के पास आराम फरमा रहा है। जेडएफ 107 लोको काफी समय तक पठानकोट लोको शेड में मौजूद था, उसे अब नई दिल्ली स्टेशन के बाहर लाकर रखा गया है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद के काल में भारतीय रेलवे के नैरोगेज सिस्टम के लिए लोकोमोटिव को विकसित करने के लिए काफी प्रयास किए गए। 1925 में छह प्रकार के नैरोगेज लोकोमोटिव के माडल को विकसित किया गया। इन माडलों के नाम जेड ए से लेकर जेड एफ तक रखे गए। पर वास्तव में जेड ए, जेड सी और जेड डी श्रेणी के लोकोमोटिव तो कभी बने ही नहीं।

 साल 1935 मे जेड एफ श्रेणी का लोकोमोटिव बनाया गया। यह तब नैरोगेज के लोकोमोटिव में सबसे बड़ा था। इस लोकोमोटिव के पहियो की संरचना 2-6-2 थी। यानी दो आगे 6 बीच में और दो पीछे की ओर। इसके धुरे पर 8 टन का वजन था। यह देखने में कालका शिमला रेलवे मे चलने वाले 1904 में बने के टाइप इंजन जैसा ही था।  पर यह 16.25 वर्ग फीट वाला बड़े आकार का था। इसका बायलर काफी बड़ा था और इसमें सुपर हीटर लगा था।

 देखने में यह विशालकाय लगता है। इसे देखकर नहीं लगता है कि नैरोगेज का लोकोमोटिव है। इस लोकोमोटिव का इस्तेमाल पहले कालका शिमला खंड में और बाद में पठानकोट जोगिंदर सेक्शन में किया गया। 

इस लोकोमोटिव का निर्माण कासेल लोकोमोटिव वर्क्स में  हंसेल एंड सोहन ने किया था। अपने समय का यह कोयला इंजन से चलने वाला नैरोगेज का उत्कृष्ट लोकोमोटिव था जो लंबे समय तक अपनी सेवाएं देता रहा।  दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे के एक लोकोमोटिव को आप रेल भवन के बाहर देख सकते हैं तो कांगड़ा घाटी के इस लोकोमोटिव को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर देखा जा सकता है।

( KANGRA VALLEY RAILWAYS, KVR, NARROW GAUGE )


Sunday, May 25, 2014

कांगड़ा घाटी रेल का एक सफर (( 5 ))

बचपन में दूरदर्शन पर कांगड़ा घाटी रेल पर एक डाक्यूमेंटरी देखी थी, तब से इस रेल पर सफर करने की एक इच्छा थी। साल 2001 का जुलाई का महीना था हमलोग सपरिवार वैष्णो देवी के दर्शन कर पठानकोट पहुंचे। योजना बन चुकी थी कांगडा घाटी रेल से धर्मशाला और आसपास के स्थलों के दर्शन की। शाम को पठानकोट पहुंचने पर पता चला कि कांगड़ा की रेल सुबह ढाई बजे खुलेगी। हमलोग कांगड़ा मंदिर तक का टिकट लेने के बाद कई घंटे प्लेटफार्म पर ही इंतजार करते रहे। ढाई बजे की ट्रेन के लिए आधा घंटे पहले ही पहुंचने पर पता चला ट्रेन तो ठसाठस स्थानीय लोगों से भर चुकी है। खैर जाना तो था ही बड़ी मुश्किल से ट्रेन में जगह मिल पाई। लोगों ने यह जानकर की हम बाहर से आए सैलानी हैं हमारे लिए उदारता से थोड़ी जगह बनाई।

पंजाब के कुछ स्टेशन तो अंधेरे में गुजर गए उजाला हुआ तो ट्रेन बारयाल हिमाचल में थी। अपनी क्षमता से अधिक वजन उठाए ट्रेन पहाड़ों की हसीन वादियों के बीच हौले हौले आगे बढ़ रही थी। पता चला ब्रजेश्वरी देवी में अष्टमी का मेला है इसलिए इतनी भीड़ है। ट्रेन के एक सहयात्री को पता चला कि हम देवी दर्शन के लिए जा रहे हैं तो उसने मुझे एक 10 रुपये का नोट देते हुए कहा हमारी तरफ से देवी को चढ़ा देने हम किसी काम से दूसरी जगह जा रहे हैं। पहाड़ के लोगों की ब्रजेश्वरी देवी में अगाध श्रद्धा है। हम कुछ घंटे बाद कांगड़ा मंदिर स्टेशन पहुंच गए थे। 

स्टेशन के बगल से एक नदी बहती है। पुल पारकर हमलोग कांगड़ा शहर में ब्रजेश्वरी देवी के मंदिर के पास पहुंचे। दो दिन कांगड़ा प्रवास में धर्मशाला, मैक्लोडगंज, भागसू, नड्डी, चामुंडा मंदिर आदि घूमने के बाद हमलोग फिर कांगड़ा मंदिर स्टेशन पहुंचे। आगे के सफर के लिए। पता चला ट्रेन दो घंटे लेट है। इंतजार किया। इस बार ट्रेन में जगह आसानी से मिल गई। 

समलोटी, नगरोटा, चामुंडा मार्ग, पारोह, सुलह हिमाचल, पालमपुर,  पट्टी राजपुरा, पंचरुखी, मझरैन हिमाचल जैसे छोटे छोटे स्टेशनों से होती हुई ट्रेन बैजनाथ पपरोला पहुंच गई। हमें जाना था बैजनाथ मंदिर जो अगला स्टेशन था। पर आगे ट्रैक पर पेड़ गिर जाने के कारण ट्रेन का सफर यहीं खत्म हो गया। मंदिर यहां से एक किलोमीटर की ही दूरी पर था पर बीच में छोटी नदी थी जिस पर पुल से रेल की पटरियां गुजर रही थीं। सड़क पुल काफी दूर था। लिहाजा बाकी लोगों की तरह हमने भी सावधानी से पांव रखते हुए रेल पुल से ही नदी को पार किया और पहुंच गए बैजनाथ मंदिर।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य 
( KANGRA VALLEY RAILWAYS, KVR, NARROW GAUGE  RAIL SYSTEM) 

Saturday, May 24, 2014

कांगड़ा की जीवन रेखा है घाटी की रेल ((4))

पहाड़ों में यात्री रेल सेवा का सबसे शानदार उदाहरण है कांगड़ा घाटी रेल। यह 19वीं शताब्दी के भारतीय तकनीक से बने रेल लाइन का आदर्श उदाहरण है। इस रेल लाइन से पहले कांगड़ा घाटी में पैदल सफर करने या फिर जानवरों की पीठ पर माल ढुलाई के अलावा कोई साधन नहीं था। इस रेलमार्ग ने घाटी के लोगों को सफर का विकल्प प्रदान किया। अगर देखा जाए तो 100 मील से ज्यादा सफर कराने वाला ये दुनिया का सबसे लंबा नैरो गेज रेल मार्ग है जो लोगों को अपनी सेवाएं दे रहा है। आज कांगड़ा घाटी रेल इलाके की पहचान के साथ विरासत भी बन चुका है। कांगड़ा घाटी क्षेत्र के लोगों के सामाजिक आर्थिक विकास में इस रेल मार्ग की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
कांगड़ा वैली रेल 19वीं सदी की इंजीनियरिंग का नायाब नमूना है। 1926 में बने जब इस रेलवे लाइन की शुरुआत हुई तब की बनाई हुआ आधारभूत संरचना का आज भी इस रेल मार्ग पर इस्तेमाल हो रहा है। स्टेशनों के भवन तब के ही बने हुए हैं जिनका अभी भी इस्तेमाल किया जा रहा है। उनका डिजाइन खूबसूरत है जो किसी काटेज जैसा एहसास देते हैं। इनकी दीवारे पतली हैं और पहाड़ों को देखते हुए लकड़ी का इस्तेमाल निर्माण में किया गया है। बड़े बरामदे लकड़ी के स्तंभ और आसपास में फूलों के पेड़ स्टेशनों को आकर्षक बनाते हैं। इनकी मूल संरचना को आज भी बचाए रखा गया है।

इस मार्ग पर चलने वाले लोको ( इंजन) भी पुराने और अब विरासत का हिस्सा बन चुके हैं। रेल मार्ग का सिग्नल सिस्टम भी 1926 का बना हुआ है। कभी कांगड़ा घाटी रेल में कालका शिमला रेल की तरह ही स्टीम इंजनों का इस्तेमाल किया जाता था। हालांकि अब इस मार्ग पर डीजल इंजन चलाए जा रहे हैं। पर एक स्टीम इंजन को आज भी सैलानियों के लिए चालू हालत में रखा गया है। कई पुराने यंत्र आज भी इस रेल मार्ग पर प्रचलन में हैं। ट्रैक के लिए रॉड से चलने वाले स्विच, कैरोसीन लैंप और टोकन निकालने वाली मशीन यहां देखी जा सकती है।

नैरो गेज रेलों के इतिहास में देखें तो कांगड़ा घाटी रेल का अलग महत्व है। दुनिया के ज्यादातर नैरोगेज रेल 1850 के आसपास अस्तित्व में आए। पर ज्यादातर नैरोगेज लाइन छोटी दूरी के हैं। वे 10 से लेकर 10 किलोमीटर का सफर तय करते हैं। पर कांगड़ा वैली रेल का सफर 160 किलोमीटर से ज्यादा का है। इसकी दूसरी खास बात इसे औरों से अलग करती है वो है कि इस लाइन का निर्माण माल ढुलाई के लिए हुआ था। बाद में इसे यात्रियों के लिए खोला गया।

दुनिया के कई हिस्सों में शुरू की गई नैरोगेज रेलों को घाटे का सौदा मानकर बंद कर दिया गया या उन्हें ब्राडगेज में बदल दिया गया। पर कांगड़ा घाटी रेल आठ दशक से अधिक से क्षेत्र के लोगों को सेवाएं दे रही है। यह रेल मार्ग न सिर्फ इलाके के लोगों की चहेती है बल्कि सैलानियों को भी लुभाती है। कई बार इस लाइन को बदल कर ब्राडगेज लाइन बिछाने की बात की जाती है। पर कांगड़ा की घाटियों के लिए ब्राडगेज लाइन व्यवहारिक नहीं है। नैरोगेज लाइन पहाड़ के पर्यावरण से बेहतर संतुलन बनाते हुए चल रही है। इसका सफर तो यूं ही जारी रहना चाहिए। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य 

( KANGRA VALLEY RAILWAYS, KVR, NARROW GAUGE ) 

Friday, May 23, 2014

कांगड़ा रेल - 933 पुल 484 मोड़ और 164 किलोमीटर का सफर ((3))

कांगड़ा घाटी रेल लाइन की लंबाई 164 किलोमीटर है। कांगड़ा घाटी रेल रेल मार्ग में दो सुरंगें हैं। जिनमें से एक 250 फुट लंबी और दूसरी 1,000 फुट लंबी है। ट्रेन 2 फीट 6 इंच चौड़ाई वाले पटरियों पर कुलांचे भरती है। इस लाइन का सबसे ऊंचा प्वाइंट आहजू रेलवे स्टेशन पर है जो 3901 फीट ऊंचा है। कांगड़ा घाटी क्षेत्र में औसत ऊंचाई 2400 फीट की है। पठानकोट रेलवे स्टेशन 383 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है जबकि आखिरी रेलवे स्टेशन जोगिंदर नगर 1184 मीटर की ऊंचाई पर है। इस रेल मार्ग में कुल 933 पुल आते हैं। कुल 484 मोड़ आते हैं। 


इतिहास - इस रेलवे लाइन का निर्माण कार्य 1925 में आरंभ हुआ। एक दिसंबर 1928 को मालगाड़ियों के लिए इस मार्ग को खोला गया। वास्तव में इस लाइन का निर्माण जोगिंदरनगर के आगे बन रहे हाइड्रोलिक पावर प्रोजेक्ट के लिए माल ढुलाई के वास्ते किया गया था। पर अप्रैल 1929 में इस मार्ग पर पैसेंजर ट्रेनों का संचालन भी शुरू किया गया।
बारह साल की बंदी -  दूसरे विश्वयुद्ध के समय यह रेलमार्ग बंद हो गया। तब रसद की सप्लाई के लिए इस मार्ग के ट्रैक को 1941-42 में बंद कर दिया गया। 12 सालों के बाद 1954 में इस मार्ग को दुबारा चालू किया गया। 1973 में पोंग डैम के निर्माण के समय कांगड़ा घाटी का 25 किलोमीटर मार्ग एक बार फिर बंद करना पड़ा।

फिलहाल इस मार्ग पर सात जोड़ी सवारी गाड़ियां चलाई जाती हैं। सभी पैंसेजर गाड़ियां हैं जो सारे स्टेशनों पर रुकती हैं। अब मार्ग पर ट्रेनों के संचालन के लिए डीजल लोकोमोटिव का इस्तेमाल किया जा रहा है पर एक स्टीम लोको को पठानकोट रेलवे स्टेशन पर संरक्षित रखा गया है। इस मार्ग पर ट्रेन अधिकतम 45 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से चलती है जबकि औसत स्पीड 20 किलोमीटर प्रति घंटे होती है।

तीन हिस्सों में बंटा मार्ग- ये रेलमार्ग मुख्य रुप से तीन हिस्सो में बंटा है। पहला पठानकोट से चक्की पुल का 12 किलोमीटर का हिस्सा। यह हिस्सा पंजाब के पठानकोट जिले में आता है। पठानकोट में केवीआर का लोकोमोटिव शेड भी है। पठानकोट से चक्की नदी तक का इस रेल मार्ग का इलाका कम ऊंचाई वाला है।
चक्की नदी के पुल से बैजनाथ पपरोला तक 130 किलोमीटर का क्षेत्र धार्मिक पर्यटन वाला इलाका है। इसी क्षेत्र में रेल मार्ग की दो सुरंगे ढुंढी और दौलपुर आती हैं। कांगड़ा शहर की बात करें तो ये इस रेलमार्ग के बीच में आता है।
कांगड़ा से पालमपुर की ओर बढ़ने पर इस मार्ग पर चाय के बगान दिखाई देते हैं तो पहाड़ो की मनोरम चोटियों के भी दर्शन होते हैं। तीसरा खंड बैजनाथ से जोगिंदर नगर का है जो 22 किलोमीटर लंबा है और औसत ऊंचाई 979 मीटर की है।

कांगड़ा घाटी रेलवे के स्टेशन

1 पठानकोट जंक्शन -      2 डलहौजी रोड- 
3 नूरपुर रोड               4 तेलरा 
5 भारमौर                6 जवांवाला शहर
7 हरसार डेहरी             8 मेघराजपुरा
9 नगरोटा सूरियां         10 बारयाल हिमाचल
11 नंदपुर               12 गुलेर
13 त्रिपाल               14 ज्वालामुखी रोड
15 कोपरलाहार           16 कांगड़ा
17 कांगड़ा मंदिर           18 समलोटी
19 नगरोटा              20 चामुंडा मार्ग
21 पारोह                22 सुलह हिमाचल
23 पालमपुर
24 पट्टी राजपुरा
25 पंचरुखी 
26 मझरैन हिमाचल -
27 बैजनाथ पपरोला - 
28 बैजनाथ मंदिर -
29 आहजू- केवीआर का यह सबसे ऊंचाई पर स्थित रेलवे स्टेशन है। 
30 चौंतरा बातरेह -
31 जोगिंदर नगर -  ( आखिरी रेलवे स्टेशन)

--- विद्युत प्रकाश मौर्य
( KANGRA VALLEY RAILWAYS, KVR, NARROW GAUGE )