Thursday, April 3, 2014

गंगा सागर स्नान-दान और तर्पण (3)

गंगा सागर तीर्थ एवं मकर संक्रांति पर लगने वाला मेला महाकुंभ के बाद मनुष्यों का दूसरा सबसे बड़ा मेला है। ऐसा कहा जाता है कि एक बार गंगा सागर में डुबकी लगाने पर 10 अश्वमेध यज्ञ और एक हजार गाय दान करने के समान फल मिलता है। इसलिए यहां स्नान करने के बाद लोग दान जरूर करते हैं। यहां दान करने की अनूठी परंपरा है। कैसा है ये दान... आइए देखते हैं....


गंगा सागर में डुबकी लगाने के बाद दान का महात्म्य है। यहां लोग श्वान कुत्तों को बिस्कुट खिलाते हैं। श्वान इंसान का सबसे अच्छा दोस्त है। वह बैकुंठ ले जाने के मार्ग में सहायक है। इसलिए कुत्तों को बिस्कुट खिलाने से आनंद की प्राप्ति होती है। सागर तट पर दान के समय सैकड़ों कुत्ते आपको घेर लेते हैं और एक खिलाड़ी के भांति आपके हवा में उछाले हुए बिस्कुट को लपक लेते हैं। कुत्तों को बिस्कुट दान हमें सह जीवन का भी संदेश देता है।

जहां गंगा-सागर का मेला लगता है। यह द्वीप के दक्षिणतम छोर पर गंगा डेल्टा में गंगा के बंगाल की खाड़ी में पूर्ण विलय (संगम) के बिंदु पर लगता है। बहुत पहले इस ही स्थानपर गंगा जी की धारा सागर में मिलती थी, किंतु अब इसका मुहाना पीछे हट गया है। अब इस द्वीप के पास गंगा की एक बहुत छोटी सी धारा सागर से मिलती है। 



गंगा सागर में कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट का यहां एक पायलट स्टेशन तथा एक लाइट हाउस भी है। यहां से कुछ दूरी उत्तर वामनखल स्थान में एक प्राचीन मंदिर है। उसके पास चंदनपीड़ी वन में एक जीर्ण मंदिर है और बुड़बुड़ीर तट पर विशालाक्षी का मंदिर है।

सागर द्वीप कुल क्षेत्रफल 300 वर्ग किलोमीटर है। इसमें 43 गांव हैं, जिनकी जनसंख्या एक लाख 60 हजार है। यहीं गंगा नदी का सागर से संगम माना जाता है। इस द्वीप पर ही रॉयल बंगाल टाइगर का प्राकृतिक आवास है। यहां दलदली इलाके, जलमार्ग और छोटी-छोटी नदियां, नहरें भी हैं।

कपिल मुनि का निर्माणाधीन मंदिर। 

कपिल मुनि का मंदिर – गंगा सागर तट पर कपिल मुनि का मंदिर है। गंगा सागर आने वाले लोग महर्षि कपिल मुनि के मंदिर में पूजा अर्चना जरूर करते हैं। मंदिर के अंदर मां गंगा की मूर्ति है। पुराणों के अनुसार कपिल मुनि के श्राप के कारण ही राजा सगर के 60 हजार पुत्रों की इसी स्थान पर तत्काल मृत्यु हो गई थी। यहां स्थित कपिल मुनि का मंदिर सागर सन 1973 में बहा ले गया। अब यहां अखिल भारतीय पंच रामानंदीय निर्वाणी अखाड़ा की ओर से स्थायी मंदिर का निर्माण कराया जा रहा है। पुराने मंदिर की मूर्ति अब कोलकाता में रहती है, और मेले से कुछ सप्ताह पूर्व पुरोहितों को पूजा अर्चना हेतु मिलती है। इस स्थान पर कुछ भाग चार वर्षों में एक बार ही बाहर आता है, शेष तीन वर्ष जलमग्न रहता है। 
-    विद्युत प्रकाश मौर्य
( GANGASAGAR, SUNDARBAN, BENGAL)
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