Wednesday, April 30, 2014

दुनिया की सबसे छोटी नैरो गेज लाइन

ये दुनिया की सबसे छोटी नैरो गेज लाइन है जो अभी चालू है। कुल दो किलोमीटर का सफर पूरी मस्ती से तय करती है, लेकिन यात्री नहीं ढोती। माल ढुलाई के काम आती है। असम के तिनसुकिया के पास तिपोंग में चलती है ये ट्रेन। 


तिपोंग कोलरी इस रेलवे ट्रैक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस रेलवे ट्रैक पर दुनिया की सबसे छोटे लोको का इस्तेमाल किया जा रहा है। ए क्लास 0-4-0 सेडल टैंक लोको छोटे-छोटे मालगाड़ी के डिब्बों को खींचता है। ये लोको काफी साल पहले दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे में इस्तेमाल किया जा रहा था। इस ए क्लास लोको का नाम तिपोंग वैली डेविड दिया गया है। इस ए क्लास लोको से शंटिंग आदि काम लिया जाता है। वहीं तिपोंग नार्थ इस्टर्न कोलफील्ड्स ( एनईसी) के कोलयरी के कोयला ढुलाई के काम के लिए बी क्लास के इंजन इस्तेमाल किए जाते हैं जिन्हें दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे से सेकेंड हैंड के तौर पर खरीदा गया है।

ये रेलवे लाइन भारतीय रेल के मीटर गेज रेलवे स्टेशन के पास से आरंभ होता है। इसके दो किलोमीटर के मार्ग में एक सुरंग और कई छोटे छोटे पुल आते हैं। साथ साथ सड़क भी है। छोटे से मार्ग में हरियाली और खूबसूरत नजारे हैं। बांस और फूस के बने लोगों के घर रास्ते में पड़ते हैं। हालांकि 1998 में कोलयरी में एक बार इस रेलवे लाइन को हटाकर सड़क बनाने का प्रस्ताव आया लेकिन ऐसा नहीं किया जा सका। इस रेलवे लाइन 2014 में भी माल ढुलाई का काम जारी है। हालांकि इस छोटे से मार्ग के रखरखाव में काफी समस्याएं आती हैं। कई तरह के कल पुर्जे नहीं मिलते।
तिपोंग लाइन को ठीक करने की कोशिश। 
नैरोगेज की बात करें तो इसका मतलब 2 फीट 6 ईंच ( 762 एमएम) पटरियों के बीच की चौड़ाई वाली रेलवे लाइन। हालांकि कुछ नैरोगेज लाइनों की चौड़ाई दो फीट भी है। भारत में पहली 762 एमएम की नैरोगेज लाइन 1863 में बडौदा स्टेट रेलवे ने बिछाई। यह रेलवे बड़ौदा के गायकवाड रियासत के अंतर्गत आती है। 1897 में बारसी लाइट रेलवे की शुरूआत हुई जो लंबी रेलवे लाइन थी।

नैरोगेज रेलवे के फायदे
नैरोगेज लाइन बिछाने में खर्च कम आता है। इसे कम जमीन में बिछाया जा सकता है। कई बार ये सड़कों किनारे फुटपाथ पर भी बिछा दी जाती है। रेलवे पुल और सुरंग आदि बनाने में भी खर्च कम आता है। नैरोगेज रेल ब्राडगेज की तुलना में ज्यादा तीखे मोड़पर आसानी से घूम जाती है। इसलिए ऐसी रेल पहाड़ों के लिए मुफीद है। ऐसी रेल पहाड़ों के पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाती है। घ्वनि प्रदूषण और वायु प्रदूषण भी ऐसी लाइन से कम मात्रा में होता है। शहरों में इसे घनी आबादी वाले इलाकों में भी आसानी से चलाया जा सकता है।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com

Tuesday, April 29, 2014

देश में पहली ट्राम सेवा मुंबई में

देश की पहली ट्राम मुंबई में 1873 में परेल से कोलाबा के बीच चली थी। इस ट्राम को 6 से 8 घोड़े खींचा करते थे। मुंबई में ट्राम सेवा को खींचने के लिए 900 घोड़े अस्तबल में बहाल किए गए थे।
9 मई 1874 को घोड़े से खिंचने वाले ट्राम मुंबई में चले थे। पर 7 मई 1907 को बिजली से चलने वाली ट्राम सेवा मुंबई में आरंभ हुई। यह तकरीबन छह दशक तक सफलतापूर्वक चली। 31 मार्च 1964 को आखिरी बिजली चलित ट्राम सेवा मुंबई में संचालित हुई। यह बोरी बंदर और दादर के बीच चल रही थी। कोलाबा जंक्शन कार्नर मुंबई ट्राम सेवा का मुख्य केंद्र था। इस ट्राम सेवा का संचालन बेस्ट कंपनी किया करती थी। साल 2016 में सड़क के लिए मुंबई के फ्लोरा फाउंटेन इलाके में खुदाई के दौरान सड़क के नीचे दबे ट्राम के ट्रैक अचानक दिखाई दे गए।
 बाद में ट्राम सेवा महाराष्ट्र के नासिक शहर में भी शुरू की गई थी लेकिन ये 1933 में बंद कर दी गई। वहीं चेन्नई में चलने वाली ट्राम सेवा को 1950 में बंद किया गया। उत्तर प्रदेश के बड़े शहर कानपुर में भी 1907 में ट्राम सेवा आरंभ हुई थी जिसे 1933 में बंद कर दिया गया। वहीं ऐतिहासिक शहर कराची जो तब ब्रिटिश भारत का हिस्सा हुआ करता था, में भी ट्राम की सेवा काफी लोकप्रिय थी।
कराची की सड़कों पर ट्राम। 

पटना की सड़कों पर ट्राम
उन्नीसवीं सदी के अंतिम कालखंड में बिहार की राजधानी पटना के ऐतिहासिक अशोक राजपथ पर ट्राम दौड़ा करती थी। पर ये ट्राम कोलकाता या दिल्ली के ट्राम सेवाओं थोड़ी अलग थी। गंगा नदी के समांतर गांधी मैदान से बांकीपुर की तरफ चलने वाली ट्राम को मुंबई की तरह ही घोड़े खींचा करते थे। तब ये प्रदूषणमुक्त सेवा पटना शहर की शहरी ट्रांसपोर्ट का महत्वपूर्ण हिस्सा हुआ करता था। कभी पटना शहर की सड़के सजीले टमटम और रंगीले कोचवानों के लिए जानी जाती थी। 

घोड़ों की मदद से चलने वाली इस ट्राम सेवा का पूर्वी टर्मिनल सब्जीबाग (पीरबहोर थाने के पास) हुआ करता था। तब पटना शहर में नगरपालिका हुआ करती थी जो इस ट्राम सेवा का संचालन करती थी। पर लोकप्रियता में कमी के कारण 1903 में इस ट्राम सेवा को बंद कर दिया गया। हालांकि तब इसे इलेक्ट्रिक इंजन से चलाने और अन्य मार्गों पर विस्तार का भी प्रस्ताव आया था। पटना में ट्राम सेवा के दुबारा शुरू करने की योजना थी पर ये कभी परवान नहीं चढ़ सकी।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य
( TRAM , MUMBAI, PATNA ) 


Sunday, April 27, 2014

ऑनलाइन करें होटल बुक रहें निश्चिंत

जब आप किसी नए शहर में घूमने जाते हैं तो आपके लिए प्रमुख चिंता होती है वहां कहां ठहरने का इंतजाम होगा। अगर आप किसी नए शहर में ठहरने का इंतजाम पहले से ही कर लेते हैं तो आपकी यात्रा काफी सुगम हो जाती है। इससे शहर में उतरने के बाद होटल ढूंढने में बरबाद होने वाला वक्त बच जाता है साथ ही आप होटलो के स्थानीय दलालों के चंगुल में आकर ठगे जाने से भी बच जाते हैं।


पहले से कर लें चयन 

इसका सुगम तरीका है कि आप जिस शहर में जा रहा हैं वहां अपने बजट के अनुकूल होटल या गेस्ट हाउस की बुकिंग आनलाइन कर लें। आनलाइन होटल बुकिंग के लिए कई वेबसाइट हैं जहां व्यवस्थित तरीके से बुकिंग की जा सकती है। पर कई सालों तक देश के कई राज्यों में घूमने के मेरे अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि इनमें स्टेजिला डाट काम काफी अच्छी साइट है।

 इस साइट की खास बात ये है कि ये छोटे शहरों के सस्ते होटलों की भी बुकिंग उपलब्ध कराती है। इस साइट पर 250 रुपये से लेकर ऊंचे बजट वाला स्टार होटलों की भी बुकिंग करा सकते हैं। ये साइट एक ही शहर में सबसे ज्यादा होटलों का विकल्प भी देती है।

महज 10 फीसदी में बुकिंग

स्टेजिला की दूसरी खास बात है कि ये महज 10 फीसदी राशि चुका कर बुकिंग की सुविधा भी देता है जो किसी और वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है। बाकी की राशि आप चेक इन के तीन दिन पहले तक दुबारा वेबसाइट पर लागिन करके जमा कर सकते हैं या फिर होटल में भी चुका सकते हैं। वैसे एडंवास में राशि जमाकर देने का लाभ ये है कि आपको होटल के बिल के नकद राशि लेकर चलने की कोई जरूरत नहीं रहती है।

मेरा अनुभव

मैंने अपनी गुजरात यात्रा के दौरान अहमदाबाद, पोरबंदर और सोमनाथ जैसे शहरों में स्टेजिला के द्वारा बुकिंग कराई। इसके अलावा दीव के सम्राट होटल में भी मैंने इसी साइट से बुकिंग कराई। मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि कई बार तो स्टेजिला की ओर से फोन आया कि आपने होटल में चेक इन कर लिया है और आपको कोई असुविधा तो नहीं हुई। चेन्नई में इस वेब पोर्टल का मुख्यालय है और इसकी सूची में देश के 15 हजार से होटल उपलब्ध हैं।  यहां पहुंचें- http://www.stayzilla.com/

Saturday, April 26, 2014

वेधशाला है वाराणसी का मान मंदिर महल

वाराणसी में दशाश्वमेध घाट के ठीक बगल में स्थित है मान मंदिर महल। ये महल वास्तव में एक वेधशाला है। दिल्ली के जंतर मंतर की तरह। इस महल के साथ ही है मान मंदिर घाट। वहीं मान मंदिर महल की खिड़कियों से गंगा की लहरों का नजारा भी किया जा सकता है। मान मंदिर महल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से  संरक्षित इकाई है। इसमें प्रवेश के लिए 5 रुपये का टिकट तय है। सूर्योदय से सूर्यास्त तक महल में प्रवेश किया जा सकता है।

मान मंदिर के नाम से विख्यात इस महल का निर्माण राजस्थान के आमेर के राजा मान सिंह द्वारा 1600 ईश्वी के आसपास कराया गया। इसके बाद जयपुर शहर के संस्थापक राजा सवाई जय सिंह द्वितीय ( 1699-1743) ने इस महल के छत पर वेधशाला का निर्माण कराया। सवाई जय सिंह की खगोल शास्त्र में खास रूचि थी। इसलिए वाराणसी के अलावा दिल्ली, जयपुर, मथुरा और उज्जैन में सवाई जय सिंह ने ऐसी ही वेधशालाओं का निर्माण कराया।
वाराणसी की वेधशाला  में ये यंत्र हैं-
1.    सम्राट यंत्र – इस यंत्र द्वारा ग्रह नक्षत्रों की क्रांति विशुवांस, समय आदि का ज्ञान होता है।
2.    लघु सम्राट यंत्र – इस यंत्र का निर्माण भी ग्रह नक्षत्रों की क्रांति विशुवांस, समय आदि का ज्ञान के लिए किया गया था।
3.    दक्षिणोत्तर भित्ति यंत्र- यस यंत्र से मध्यान्ह के उन्नतांश मापे जाते हैं।
4.    चक्र यंत्र – इस यंत्र से नक्षत्रादिकों की क्रांति स्पष्ट विसुवत काल आदि जाने जाते हैं।

5.    दिगंश यंत्र – इस यंत्र से नक्षत्रादिकों दिगंश मालूम किए जाते हैं।
6.    नाड़ी वलय दक्षिण और उत्तर गोल – इस यंत्र द्वारा सूर्य तथा अन्य ग्रह उत्तर या दक्षिण किस गोलार्ध में हैं इसका ज्ञान होता है। इसके अलावा इस यंत्र द्वारा समय का भी ज्ञान होता है।
मान मंदिर महल का आसपास बहुत साफ सुथरे हाल में नहीं है। यहां पहुंचने के लिए आपको दशाश्वमेध के सब्जी बाजार की गलियों से होकर जाना होता है। हालांकि मान मंदिर घाट को गंगा के तट से भी देखें को तो काफी भव्य लगता है।


-    विद्युत प्रकाश मौर्य 

( VARANASI, BANARAS, UTTRAR PRADESH)

Friday, April 25, 2014

जौनपुर का शाही पुल - पुल पर लगता है बाजार

जौनपुर का शाही पुल - पुल पर लगने वाले बाजार के बारे में सुना है। यह भारत में अपने ढंग का अनूठा पुल है जौनपुर में गोमती नदी पर बना शाही पुल। जहां पुल पर बाजार लगाने के लिए कलात्मक गुमटियां बनाई गई हैं। शाही पुल जौनपुर शहर के बीचों बीच बना हुआ है। 


शहर को दो भागों में बांटने वाला पुल आज भी गुलजार है। शाही पुल को पैदल पार किजिए और अपनी जरूरत की चीजें भी खरीदते हुए चले जाइए। दोपहर की चिलचिलाती गरमी में शाही पुल की गुमटी में धूप से बचते हुए युवा धड़कते हुए दिल भी मिल सकते हैं।
तारीख मुइमी के अनुसार जौनपुर के इस वि‍ख्‍यात शाही पुल का र्नि‍माण अकबर के शासनकाल में उनके आदेशानुसार सन् 1564 ई 1569 ई के बीच में मुनइन खानखाना ने करवाया था। यह भारत में अपने ढंग का अनूठा नदी पुल है। गोमती नदी पर बनाए गए इस पुल की डिजाइन अफगानी वास्तुकार अफजल अली ने तैयार की थी। यह पुल मुगल वास्तुशिल्प शैली में बने जौनपुर के उन कुछ महत्वपूर्ण स्थलों में से हैजिनका अस्तित्व आज भी बचा हुआ है।
शाही पुल की चौड़ाई 26 फीट है जि‍सके दोनो तरफ 2 फीट 3 इंच चौड़ी मुंडेर बनी है। दो ताखों के संधि‍ स्‍थल पर गुमटि‍यां र्नि‍मित है। पहले इन गुमटि‍यों में दुकाने लगा करती थी। पुल के मध्‍य में चतुर्भुजाकार चबूतरे पर एक वि‍शाल सिंह की मूति है जो अपने अगले दोनो पंजों पर हाथी के पीठ पर सवार है। पुल के द्वारों के मेहराब में मछलियों के ऐसे चित्र उत्कीर्ण किए गए हैं।
इस पुल का निर्माण विशाल खंभों पर किया गया है और पानी के बहने के लिए 10 द्वार बनाए गए हैं। पुल से इतर इस पर खंभों पर टिकी अष्ठभुजीय आकार की गुंबजदार छतरी भी बनी हुई है। इस छतरी में लोग खुद को पुल पर दौड़ती वाहनों से सुरक्षित रखते हुए नदी की बहती धाराओं का विहंगम नजारा देखते हैं। हालांकि गोमती नदी का पानी यहां भी गंदला रुप ले चुका है।सन 1971 में गोमती नदी में आई बाढ़ ने शहर में भारी तबाही मचाई। तब ये ऐतिहासिक पुल काफी हद तक डूब गया था। आज शहर के शान जौनपुर के इस ऐतिहासिक पुल और गोमती नदी के जल दोनों को संरक्षण की जरूरत है।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य  ( SHAHI BRIDGE, JAUNPUR ) 


Wednesday, April 23, 2014

सासाराम का ऐतिहासिक गुरुद्वारा चाचा फग्गूमल

सासाराम शहर शेरशाह के मकबरे के लिए प्रसिद्ध है। पर इस शहर में सिख इतिहास से जुडी महत्वपूर्ण स्मृति है। शहर के जानी बाजार में है ऐतिहासिक गुरुद्वारा चाचा फग्गूमल, जहां सिखों के नौंवे गुरू तेगबहादुर जी 21 दिनों तक रहे और संगतों को अपने आशीर्वाद से निहाल किया।
पर सासाराम रेलवे स्टेशन पर इस ऐतिहासिक गुरुद्वार के बारे में जानकारी देती हुई कोई पट्टिका नहीं लगाई गई है। रेलवे स्टेशन से इस गुरुद्वारे की दूरी महज दो किलोमीटर है। हालांकि जाने का रास्ता संकरी गलियों से होकर है। श्रद्धालु शहर के धर्मशाला रोड से होकर गोला फिर नवरतन बाजार होते हुए जानी बाजार पहुंच सकते हैं। या फिर पोस्ट आफिस चौक से लश्करीगंज  होते हुए भी जानी बाजार पहुंचा जा सकता है।


यहां तक पहुंचने का सुगम साधन रिक्शा ही है क्योंकि बड़ी गाड़ियों के पहुंचने के लिए अच्छी सड़के नहीं हैं। साल 2016-17 में सिखों के दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी का 350वां प्रकाश पर्व मनाया जा रहा है। इसके लिए उनके जन्मस्थान पटना साहिब में भव्य तैयारियां की जा रही हैं। इस सिलसिले में थोड़ा सा ध्यान गुरुद्वारा चाचा फग्गूमल के आसपास के सौंदर्यीकरण पर भी दिया जाता तो बेहतर होता।

सासाराम में 21 दिनों तक रहे नवम गुरु तेगबहादुर


कहा जाता है नवम पातशाही गुरु तेगबहादुर के सुमिरन से नौ निधियों का घर में वास होता है। सासाराम के लोग धन्य रहे जिन्हें हिंद की चादर नवम पातशाही का कई दिनों तक आशीर्वचन सुनने को मिला। साल 1666 में गुरु तेगबाहदुर अपने लाव लश्कर के साथ पूरब की उदासी ( यात्रा) पर निकले। इस यात्रा के दौरान नाम जपो किरत करो वंड छको का संदेश देते हुए वे काशी से पटना की यात्रा पर थे।
इस दौरान वे सासाराम में 21 दिनों तक रुके। यहां पर वे नानकशाही संत चाचा फग्गूमल की कुटिया में रहे। उनके साथ माता नानकी, उनकी धर्मपत्नी माता गुजरी और पत्नी भ्राता बाबा कृपाल चंद भी थे।
नवम पातशाही ने इस ऐतिहासिक शहर को पवित्र करने के साथ ही यहीं पर रहकर कई रचनाएं भी की। उन्होंने यहां पर राग जैजैवंती महला, धूर की वाणी, रामु सुमरी रामु सुमरी इहे तेरे काजि है, मैया को सरनि तियागु प्रभू के सरनि लागू, जगत सुख मानु मिथिया झूठो सब साझु है.. की गुरुवाणी बक्शीश की थी। इसकी चर्चा गुरु ग्रंथ साहिबजी के 1352 पन्ने पर शोभायमान है।

इन ऐतिहासिक तथ्यों की पुष्टि पंथ प्रमाणित ग्रंथ सूरज प्रकाश और तवारीख गुरु खालसा में भी होती है। गुरुनानक देव विश्वविद्यालय अमृतसर और पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला में इस पर शोध भी हो चुका है।

नवम पातशाही की कई स्मृतियां हैं यहां
चाचा फग्गूमल नानकशाही संत थे जो पंजाब के फगवाड़ा शहर से पंथ प्रचार के लिए बिहार आए थे। उसके बाद वे यहीं के होकर रह गए। नवम गुरु तेगबहादुर जब सासाराम आए तो चाचा फग्गूमल ने उनका सत्कार किया। सासाराम के इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे में नवम पातशाही से जुड़ी कई स्मृतियां हैं।

दर्शनी दरवाजा या छोटा दरवाजा
दर्शनी दरवाजा के नाम से विख्यात यह 45 इंच ऊंचा, 35 ईंच चौड़ा छोटा दरवाजा है जिससे होकर नवम पातशाही जी ने चाचा फग्गूमल की कुटिया में दर्शन दिया था। इस दरवाजे को मूल स्वरूप में आज भी देखा जा सकता है। नवम पातशाही द्वारा साध संगत को भेंट किया गया शस्त्र साहिब, चाचा फग्गूमल का खड़ाऊ और नाम सिमरनी माला के भी दर्शन इस गुरुद्वारे में किए जा सकते हैं। इस माला में 76 मनके हैं।

गुरुजी द्वारा लगाया गया 350 साल से ज्यादा पुराना बेर का पेड़ गुरुद्वारा परिसर में मौजूद है। यह पेड़ अब भी हरा भरा है। इसमें सालों भर फल लगते हैं। वहीं उस चौकी के दर्शन किए जा सकते हैं जिस पर गुरु जी अपने सासाराम प्रवास के दौरान हर रोज स्नान किया करते थे।


गुरुद्वारा चाचा फग्गूमल साल 2012 में नए दरबार साहिब का निर्माण किया गया है। इसका निर्माण में गुरुद्वारा बंग्ला साहिब के जत्थेदार संत बाबा हरिवंश सिंह की जी भूमिका है। अभी यहां लंगर हॉल और यात्री निवास का निर्माण कार्य कराने की कोशिशें जारी हैं। गुरुद्वारे में अरदास नियमित सत्संग श्री अकाल तख्त साहिब की मर्यादा में होता है।
और भी गुरुद्वारे हैं सासाराम में-  सासाराम का दूसरा प्रमुख गुरुद्वारा है गुरुद्वारा गुरु का बाग। कहा जाता है यहीं पर नवम पातशाही गुरु तेगबहादुर जी ने अपना घोड़ा बांधा था। गुरुद्वारा चाचा फग्गूमल के पास ही गुरुद्वारा टकसाल संगत, गुरुद्वारा छोटी संगत, गुरुद्वारा बड़ी संगत जैसे गुरुद्वारे हैं। सासाराम शहर में सिख समुदाय के लोगों अच्छी खासी संख्या है जो इन गुरुद्वारों के इंतजामात देखते हैं।
कैसे पहुंचे - सासाराम मुगलसराय गया रेलवे लाइन पर स्थित है। नई दिल्ली और कोलकाता से तमाम रेल गाड़ियां उपलब्ध है। यह शहर ऐतिहासिक जीटी रोड पर है। सड़क मार्ग से भी पहुंचा जा सकता है। निकटम एयरपोर्ट वाराणसी और गया में हैं।

कहां ठहरें - 1. होटल मौर्या रॉयल  ,रौजा रोड सासाराम  ( http://www.mauryaroyal.com/)
2. होटल रोहित इंटरनेशनल  , जीटी रोड सासाराम।
3 Shersah Vihar, Sasaram-821 152.  AC Room/Deluxe Room/Economy Room/Dormitory Beds
4 Gopal Deluxe Hotel GT ROAD Sasaram 821115
Phone +916184224366

-    विद्युत प्रकाश मौर्य  
  
( SASARAM, GURRUDWARA CHACHA FAGGUMAL, GURU TEG BHADUR, SIKH TEMPLE ) 


Tuesday, April 22, 2014

रबड़ी और कबाब का शहर सासाराम

सासाराम के जीटी रोड पर पोस्ट आफिस चौक से धर्मशाला रोड की ओर जाते हुए आपको स्ट्रीट फूड के तौर पर रबड़ी और कबाब की कई दुकानें मिलेंगी। सासाराम की सड़कों की रबड़ी और कबाब दशकों से लोकप्रिय है। आज भी आप वहां 10 रुपये और 20 रुपये प्रति कप रबड़ी खा सकते हैं। इस रबड़ी को मिट्टी के करूए में खाया जाए तो उसके स्वाद का आनंद और बढ़ जाता है। शहर के आनंदी सिनेमा के सामने कई रबडी वाले स्टाल लगाए दिखाई दे जाते हैं। तो आइए जानते हैं ये रबड़ी बनती कैसे है। 



रबड़ी एक प्रकार का पकवान है जो दूध को खूब उबाल कर व उसे गाढ़ा करके बनाया जाता है। बिना जल छोड़े दूध को जितना ही अधिक औंटाया जाये वह उतना ही अधिक गुणकारी, स्निग्ध (तरावट देने वाला), बल एवं वीर्य को बढ़ाने वाला  माना जाता है। रबड़ी का स्वाद लाजबाव होता है। खाना खाने के बाद रबड़ी खाने का मज़ा कुछ और ही है। रबड़ी को मालपुआ, जलेबी और इमरती के साथ भी खाते हैं। आम तौर पर रबड़ी बनाने में 1 लीटर दूध के अनुपात में  100 ग्राम चीनी, चौथाई कप बादाम, चौथाई कप पिस्ता डाला जाता है।

लखनऊ के टूंडे का कबाब आपने खाया होगा। और भी कई शहरों का कबाब बहुत प्रसिद्ध है। पर सासाराम का कबाब उससे कुछ अलग है। ये कबाब घर से बनाकर लाया जाता है और स्टाल वाले इसे प्लेट में परोसते हैं। चिकेन और मटन कबाब महज 10 और 20 रुपये में। कभी सासाराम जाएं तो वहां के कबाब का भी मजा जरूर लें।


सासाराम का अनरसा 

सासाराम की सबसे प्रसिद्ध मिठाई है अनरसा। ऐसा अनरसा आपको कहीं और खाने को नहीं मिलेगा। अनरसा की दुकानें धर्मशाला रोड पर गोला के पास जाकर आती हैं। वहां एक साथ अनरसा की कई दुकाने हैं। जब आप इस सड़क से गुजरते हैं तो ताजा अनरसे की खूशबु आपको इस ओर खिंचने लगती है। कभी अनरसा को मौसमी मिठाई माना जाता था। पर सासाराम में अब सालों भर अनरसा मिलता है। यहां से खरीदे गए अनरसा को छह दिनों तक रखा जा सकता है।

गोला अनरसा का खाते समय कुरकुरा के साथ-साथ अन्दर से मुलायम होता है। गोल अनरसे बनाने के लिए आटे से छोटी छोटी लोइयां लेकर, तिल में लपेट कर, गोल करके, 4-5 अनरसे कढ़ाई में डाला जाता है। इसका स्वाद बाकी मिठाइयों से एकदम अलग होता है। अनरसा बनाने में चावल, चीनी, दही, घी और तिल का इस्तेमाल होता है। कई बार इसमें मैदा भी मिलाया जाता है। अनरसा खास तौर पर दीपावली के समय खाई जाने वाली मिठाई है। जब इन अनरसों में खोया मिला दिया जाता है तब इन्हें मावा अनरसा कहते हैं। ये सामान्य अनरसे की अपेक्षा अधिक नर्म और स्वादिष्ट होते हैं।


लिट्टी का अलग अंदाज – 

वैसे तो लिट्टी और चोखा दक्षिण बिहार के अधिकांश शहरों में बिकती हुई दिखाई देती है। यह बिहार का अति लोकप्रिय व्यंजन है। पर कोयले पर पकी लिट्टी को सासाराम में खाने का अलग अंदाज है। लिट्टी को पकाने के बाद बीच से काट कर गर्म तवे पर घी में सेंका जाता है। रेलवे स्टेशन के बाहर धर्मशाला चौराहे पर इस लिट्टी का भी स्वाद लें।


-         विद्युत प्रकाश मौर्य 
(SASARAM, RABARI, KABAB, ANARSA ) 

कैमूर की वादियों में विराजती हैं मां ताराचंडी


बिहार के ऐतिहासिक शहर सासाराम शहर से दक्षिण में कैमूर की पहाड़ी की मनोरम वादियों में मां ताराचंडी का वास है। ताराचंडी के बारे में स्थानीय लोगों का मानना है कि ये 51शक्तिपीठों में से एक है। कहा जाता है कि सती के तीन नेत्रों में से भगवान विष्णु के चक्र से खंडित होकर दायां नेत्र यहीं पर गिरा था। तब यह तारा शक्ति पीठ के नाम से चर्चित हुआ। कहा जाता है कि महर्षि विश्वामित्र ने इसे तारा नाम दिया था। दरअसल, यहीं पर परशुराम ने सहस्त्रबाहु को पराजित कर मां तारा की उपासना की थी। मां तारा इस शक्तिपीठ में बालिका के रूप में प्रकट हुई थीं और यहीं पर चंड का वध कर चंडी कहलाई थीं। यही स्थान बाद में सासाराम के नाम से जाना जाने लगा।
मां की सुंदर मूर्ति एक गुफा के अंदर विशाल काले पत्थर से लगी हुई है। मुख्य मूर्ति के बगल में बाल गणेश की एक प्रतिमा भी है। कहते हैं कि मां ताराचंडी के भक्तों पर जल्दी कृपा करती हैं। वे पूजा करने वालों पर शीघ्र प्रसन्न होती हैं। मां के दरबार में आने वाले श्रद्धालु नारियल फोड़ते हैं और माता को चुनरी चढ़ाते हैं।

चैत और शरद नवरात्र के समय ताराचंडी में विशाल मेला लगता है। इस मेले की प्रशासनिक स्तर पर तैयारी की जाती है। रोहतास जिला और आसपास के क्षेत्रों में माता के प्रति लोगों में अगाध श्रद्धा है। कहा जाता है गौतम बुद्ध बोध गया से सारनाथ जाते समय यहां रूके थे। वहीं सिखों ने नौंवे गुरु तेगबहादुर जी भी यहां आकर रुके थे।

कभी ताराचंडी का मंदिर जंगलों के बीच हुआ करता था। पर अब जीटी रोड का नया बाइपास रोड मां के मंदिर के बिल्कुल बगल से गुजरता है। यहां पहाड़ों को काटकर सड़क बनाई गई है। ताराचंडी मंदिर का परिसर अब काफी खूबसूरत बन चुका है। श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए बेहतर इंतजाम किए गए हैं। मंदिर परिसर में कई दुकानें भी हैं। अब मंदिर के पास तो विवाह स्थल भी बन गए हैं। आसपास के गांवों के लोग मंदिर के पास विवाह के आयोजन के लिए भी आते हैं।

मां ताराचंडी का मंदिर सुबह 4 बजे से संध्या के 9 बजे तक खुला रहता है। संध्या आरती शाम को 6.30 बजे होती है, जिसमें शामिल होने के लिए श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। मंदिर की व्यवस्था बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद देखता है।
कैसे पहुंचे- ताराचंडी मंदिर की दूरी सासाराम रेलवे स्टेशन से 6 किलोमीटर है। मंदिर तक पहुंचने के लिए तीन रास्ते हैं। बौलिया रोड होकर शहर के बीच से जा सकते हैं। एसपी जैन कालेज वाली सड़क से या फिर शेरशाह के मकबरे के बगल से करपूरवा गांव होते हुए पहुंच सकते हैं। आपके पास अपना वाहन नहीं है तो सासाराम से डेहरी जाने वाली बस लें और उसमें मां ताराचंडी के बस स्टाप पर उतर जाएं।
-         माधवी रंजना











Monday, April 21, 2014

बहुत बदल गया है मेरा गांव- सोहवलिया

मेरा गांव सोहवलिया बहुत बदल गया है। बदले हुए गांव को देखकर खुशी हो रही है। गांव में पहुंचने के लिए तीन तरफ से सडके बन गई हैं। कुदरा से सोहवलिया पहुंचे या फिर परसथुआ से नेशनल हाइवे छोडकर तुरंत गांव पहुंच जाएं तो हमारे ब्लाक करगहर से भी गांव के लिए सीधी सड़क है। गांव मेंबिजलीभी गई है। एक छोटा ट्रांसफारमर लग गया है जिससे सारा गांव 18 घंटे रोशन रहता है। बाकी वक्त के लिए लोगों ने शहरों ती तरह इनवरटर भी लगवा लिए हैं।
मेरी मां बताती हैं कि जब मैं इस गांव में पैदा हुआ तो कुदरा तक 14 किलोमीटर का सफर पैदल करना पडता था। वह भी बारिश के दिनों में गांव शहर से कट जाता था क्योंकि कुदरा नदी उफान पर होती थी। नदी में पुल नहीं था। यही हाल परसथुआ में भी नदी का होता था। मेरी छोटी बहन जन्म तक बसही तक सड़क बन गई। फिर भी 4 किलोमीटर का रास्ता पैदल का तय करना पड़ता था खेतों की मेड से होकर। पर अब हालात बदल गए हैं।

गांव से सीधे बनारस के लिए बस जाती है। गांव गांव में सवारी ढोने लिए आटो रिक्शा, महिंद्रा जीवो, मैक्सिमो आदि चलने लगे हैं। हर गांव में लोगों के पास कई कई एसयूवी और स्टेशन वैगन जैसी बड़ी गाड़ियां गई हैं। एक गांव से दूसरे गांव में जाने के लिए वाहन चलने लगे हैं। लोगों के पास अपने वाहन हैं हीरो होंडा जैसे। मुझे याद आता है मेरे दादा जी को हितई गनई में पैदल जाना पड़ता था। अब ये बातें इतिहास बन चुकी हैं।
गांव में बिजली आने से लोगों ने कलर टीवी लगा लिए हैं। टाटा स्काई के सहारे सभी सेटेलाइट चैनल देखते हैं और देश दुनिया से बा-खबर रहते हैं। कई घरों में फ्रिज और वाशिंग मशीन भी पहुंचने लगे हैं।
सोहवलिया के एक किलोमीटर आगे का गांव बकसड़ा अब गांव के बड़े बाजार में तब्दील हो चुका है। इस गांव में अब सोना चांदी छोड़कर हर चीज की दुकानें खुल गई हैं। आपको किसी भी तरह की खरीददारी करनी हो तो शहर जाए बिना भी काम चल सकता है। कुदरा बाजार के कान्वेंट स्कूलों की बसें गांव के बच्चों को ले जाने के लिए आने लगी हैं। ये सब कुछ हो सका है सड़कों के बेहतर नेटवर्क से। इसके लिए प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना को श्रेय देना होगा। 
गांव की सड़क पर चहलकदमी करते अनादि ( मार्च 2014 ) 

केंद्र सरकार की निर्मल ग्राम योजना का असर भी दिखाई दे रहा है। हर घर में शौचालय बन चुके हैं। अब कोई बहरी अलंग नहीं जाता। सभी मोबाइल कंपनियों के नेटवर्क शानदार मिल रहे हैं गांव में। अब थ्री जी में नेटसर्फिंग का मजा यहीं बैठे लिया जा सकता है। मतलब की पंजाब के गांवों से मुकाबला करने लगा है अब मेरा गांव भी। हां, अब तो मेरा गांव ही मेरा देश है।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य 

( SOHAWALIA,  MY  VILLAGE, ROHTAS, BIHAR )