Saturday, March 8, 2014

कोलकाता के मारवाड़ी बासा में भरपेट खाना

कोलकाता शहर का बड़ा बाजार इलाका ऐसा क्षेत्र है जहां हिंदी का प्रभाव ज्यादा दिखाई देता है। ये इलाका मारवाड़ी बहुल है।राजस्थान से आए मारवाड़ी हैं इसलिए हिंदी बोलते हैं लोग। 1991 में पिताजी माताजी और भाई बहनों के साथ जब कोलकाता पहुंचा तो कुछ दिनों के लिए हमारा ठिकाना बना बड़ा बाजार इलाके में सत्यनारायण पार्क के समाने स्थित फूलचंद मुकीम जैन धर्मशाला में।

अब आवास मिल गया तो खाने की तलाश शुरू हुई। शाकाहारी और पारिवारिक माहौल में भोजन चाहिए था। हमें लोगों ने बताया कि बगल वाली बिल्डिंग जिसे बहुजी की कोठी कहते हैं उसमें मारवाडी बासा है। हम पहुंचे बहुजी की कोठी। पूछने पर पता चला कि मारवाड़ी बासा सबसे ऊपर है।

सात मंजिल की सीढ़ियां चढ़ते हुए हम लोग सबसे ऊपर खुली छत पर जा पहुंचे। यहीं दो कमरे में एक राजस्थानी भाई चलाते थे मारवाड़ी बासा। एक कमरे में रसोई दूसरे में बैठकर खाने की व्यवस्था। कोई कुरसी टेबल नहीं। नीचें जमीन पर पालथी मार कर बैठ जाइए। मारवाड़ी बासा में मिलती है थाली।
इसलिए आर्डर करने जैसी कोई बात नहीं। हर किसी के बैठते ही सामने लाकर रख दी जाती है थाली। दो सब्जियां, गाढ़ी दाल, भुजिया, पापड़, सलाद, अचार। चपाती चाहे जितनी खाओ। कोई गिनती नहीं। बासा के मालिक खुद बैठकर रोटियां बनाते थे। राजस्थानी रोटी को फुलका कहते हैं। उनके हाथों की बनाई रोटी तवे पर फुल कर नृत्य करने लगती थी। वह नजारा देखने लायक होता था। हर कोने से पकी हुई रोटी का स्वाद लाजबाव होता था। हालांकि मेरी मां भी काफी अच्छी रोटियां बनाती हैं। पर वे इस मारवाड़ी बासे की रोटी खाकर कहती थीं। मैं भी ऐसी रोटियां नहीं बना सकती।
सात दिन हम कोलकाता में रहे। रोज का रुटीन बन गया।

सात मंजिला इमारत बहुजी की कोठी में सीढियां चढ़कर मारवाड़ी बासा पहुंचना। खाना फिर सीढ़ियां उतरना। दिन भर कोलकाता घूमने के बाद शाम को खाना फिर इसी मारवाड़ी बासा में। हालांकि अब उत्तर भारत के शहरों में मारवाड़ी बासा खत्म होते जा रहे हैं।

इसके बाद कई बार कोलकाता जाना हुआ। पर साल 2016 के कोलकाता यात्रा में एक बार फिर मैं थोड़े समय के लिए बड़ा बाजार इलाके में गया। बहुजी की कोठी में चलने वाला मारवाड़ी  बासा तो बंद हो गया था। पर फूल चंद मुकीम जैन धर्मशाला में चौथी मंजिल पर एक नया शाकाहारी भोजनालय चल रहा है। यह पिछले कुछ सालों से संचालित है। यह मारवाड़ी बासा तो नहीं कहा जाएगा। यहां बैठने के लिए टेबल और बेंच लग गई है। पर अब 80 रुपये की थाली है।

 आपकी जितनी मर्जी रोटी और चावल खाएं। कई सालों बाद एक बार फिर रात्रि भोजन इस इलाके में करने का मौका मिला। अगर आप धर्मशाला में नहीं ठहरे हैं और खाना चाहते हैं तो आपको 5 रुपये का एक कार्ड बनवाना पड़ता है। यह कार्ड आप जितने दिन कोलकाता में हैं उतने दिन के लिए वैध माना जाएगा। 
हां, फूलचंद मुकीम जैन धर्मशाला में भी काफी बदलाव दिखाई दिया। अब इसके कमरे बेहतर हो गए हैं। कमरों का किराया 300 से 800 तक हो गया है। एसी रूम भी उपलब्ध हो गए हैं। 

-    विद्युत प्रकाश मौर्य
(KOLKATA, MARWARI BASA, FOOLCHAND MOOKIM JAIN DHARMSHALA ) 

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