Monday, March 31, 2014

कोलकाता का ऐतिहासिक सत्यनारायण पार्क

कई दिनों तक कोलकाता के बड़ा बाजार इलाके में सत्यनारायण पार्क में रहने के बाद पता चला कि इस पार्क के नीचे एक अंडरग्राउंड बाजार है। दिल्ली के पालिका बाजार की तरह। ये दो मंजिला वातानुकूलित बाजार है। इसलिए इस पार्क का नाम सत्यनारायण पार्क एसी मार्केट रखा गया है। इस मार्केट में कपड़ों की और इलेक्ट्रानिक सामानों की दुकाने हैं। इस बाजार मे 200 से ज्यादा दुकाने हैं और ये कोलकाता वासियों का लोकप्रिय शापिंग सेंटर बन चुका है। यह कोलकाता के प्रसिद्ध एमजी रोड से लगा हुआ ही है। फिर हमने एक दिन पार्क के अंडरग्राउंड बाजार का मुआयना किया। बाद में पता चला कि आजादी के आंदोलन के समय सत्यनारायण पार्क क्रांतिकारी संगठनों की कई बड़ी बैठकों का साक्षी रहा है। कांग्रेस पार्टी की कई बैठकें इस पार्क में हो चुकी हैं। आजादी के बाद भी यहां राजनीतिक दलों की नुक्कड़ जनसभाएं होती रहती हैं। देश के तमाम बड़े नेता सत्यनारायण पार्क में रैलियों को संबोधित कर चुके हैं।

सत्यनारायण पार्क कोलकाता का मारवाडी इलाका है। बड़ा बाजार किसी जमाने में देश के सभी बड़े मारवाड़ी सेठों की गद्दियां इसी इलाके में हुआ करती थीं। बड़ा बाजार में कुल 25 कटरे हैं जो अपने के अनुरूप अलग अलग चीजों के व्यापार के लिए प्रसिद्ध हैं। जैसे फैंसी पट्टी, धोती पट्टी आदि। राजा कटरा का निर्माण बर्दवान के राजा ने करवाया था। इसके आसपास अमरतल्ला स्ट्रीट, कलाकार स्ट्रीट, जगमोहन मलिक लेन,  बड़तल्ला, काटन स्ट्रीट, जमनालाल बजार स्ट्रीट जैसी गलियां है। कविगुरु रविंद्रनाथ टैगोर का घर जोरासाकू में हुआ करता था। टैगोर बाड़ी भी इसके पास ही है। अब उनके घर में म्यूजियम बन गया है।


श्री सत्यनारायण मंदिर - 
सत्यनारायण पार्क के इलाके में कई हिंदू मंदिर भी हैं। इनमें सत्यनारायण मंदिर, लक्ष्मीनारायण मंदिर काफी प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र में राधाकृष्ण मंदिर, हनुमान मंदिर जैसे कई और मंदिर हैं जो मारवाड़ी समाज द्वारा बनवाए गए हैं।
सत्यनारायण मंदिर में विष्णु और लक्ष्मी की चांदी की सुंदर प्रतिमा बनी है। साथ में सरस्वती भी विराज रही हैं। मंदिर में सालों भर त्योहारों के समय विशेष कार्यक्रम मनाए जाते हैं।
बड़ा बाजार के इस सत्यनारायण मंदिर के भक्तों ने फेसबुक पर एक कम्युनिटी भी बना ली है। इसमें वे मंदिर में होने वाले आयोजनों का अपडेट और तस्वीरें जारी करते रहते हैं। www.facebook.com/SriSriSatayanarayanBhagwanMandirBurrabazarKolkata
मंदिर में सावन महीने मे झूलनोत्सव तो दीपावली और वसंत पंचमी के त्योहार धूमधाम सेमनाए जाते हैं। मंदिर का फागुन में होली उत्सव तो अनूठा होता है। भक्त भगवान के साथ मिलकर होली के रंगों में डूब जाते हैं।
सत्याबाबा मां लक्ष्मी हिल मिल खेले होली... झूमे नाचे गाए भक्तों की टोली... मंदिर का फागुन महोत्सव सबसे बड़ा आयोजन होता है। तब मंदिर से विशाल शोभायात्रा निकाली जाती है जो हावड़ा में जाकर खत्म होती है।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य
( SATYANARAYAN PARK, BARA BAZAR, KOLKATA ) 

Sunday, March 30, 2014

दशमेश पिता गुरु गोबिंद सिंह की जन्मस्थली - पटना साहिब

पटना में दसवें गुरु की याद में बना है हरि मंदिर साहिब गुरुद्वारा।  सिख इतिहास में पटना साहिब का खास महत्व है। सिखों के दसवें और अंतिम गुरू, गुरू गोबिंद सिंह जी का जन्म यहीं 22 दिसंबर 1666 में हुआ। यहां बना गुरुद्वारा सिखों के पांच तख्तों में से एक है। पांच तख्तों में दरबार साहिब अमृतसर के बाद इसका दूसरा स्थान है। बाकि के तीन तख्त आनंदपुर साहिब, तलवंडी साबो और नांदेड़ साहिब (महाराष्ट्र) में हैं। सिक्खों के आखिरी गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म पटना में हुआ और यहीं उनका बचपन गुजरा । पटना का हरमंदिर साहिब उन्हीं की याद में बनाया गया है जहाँ उनके स्मृति चिन्ह हैं। 



पटना का तख्त श्री हरिमंदिर साहिब पटना सिटी में चौक के पास झाउगंज मुहल्ले में स्थित है। कभी ये इलाका कूचा फरूख खान के नाम से जाना जाता था। अब इसे हरमंदिर गली के रूप में जाना जाता है। इसके आसपास तंग गलियों में व्यस्त बाजार है। श्री गुरूगोबिंद सिंह जी का जन्म अपने ननिहाल में ही हुआ। नौंवे गुरू तेगबहादुर यहां अपने मामा कृपाल जी और माता गुजरी के साथ सासाराम गया होते हुए यहां पधारे थे। श्री गुरूगोबिंद सिंह जी का जन्म अपने ननिहाल में ही हुआ। पटना में पालन पोषण होने के कारण दसवें गुरू गोबिंद सिंह बचपन में बिहारी हिंदी बोलते थे। 

ऐतिहासिक चोला साहिब- पटना के हरिमंदिर साहिब में जब आप जाएंगे तो आपको यहां ऐतिहासिक चोला साहिब देखने को मिलेगा। ये चोला गुरू गोबिंद सिंह जी ने 15 साल की उम्र में धारण किया था। लंबे समय तक ये चोला खंडवा ( मध्य प्रदेश ) के एक श्रद्धालु के पास सुरक्षित रहा बाद में उसने इस चोला को पटना के हरिमंदिर साहिब को दिया। सिख श्रद्धालु अपने जीवन में एक बार हरिमंदिर साहिब आकर खुद को धन्य मानते हैं।



हरि मंदिर साहिब में एक अजायब घर भी है। गुरुगोबिंद सिंह जी का बचपन में नाम गोबिंद राय था। उनका माता का नाम माता गुजरी था। गुरूगोबिंद सिंह पिता गुरू तेग बहादुर की मृत्यु के उपरान्त महज नौ साल की उम्र 11 नवम्बर सन 1675 को गुरू बने। वे एक महान योद्धा, कवि एवं आध्यात्मिक नेता थे। उन्होने सन 1699 में बैसाखी के दिन खालसा पन्थ की स्थापना की जो सिखों के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है। साल 2017 में दसम पिता के जन्म का 350 साल पूरे हो गए हैं। 


पटना में हरिमंदिर साहिब के आसपास के रास्ते का अगर थोड़ा सौंदर्यीकरण कर दिया जाए तो इस ऐतिहासिक धार्मिक स्थल को और खूबसूरत बनाया जा सकता है। पटना शहर और आसपास हरिमंदिर साहिब के अलावा सात और गुरूद्वारे हैं जिनका सिख धर्म में ऐतिहासिक महत्व है। पटना साहिब आने वाले सिख श्रद्धालु उन्हें भी देखने जाते हैं।

कैसे पहुंचे - निकटतम रेलवे स्टेशन पटना साहिब है। वैसे आप गुलजारबाग, राजेंद्रनगर, पटना जंक्शन, पाटलिपुत्र या फिर दानापुर से उतरकर भी यहां पहुंच सकते हैं। वायुसेवा से आने पर पटना में लोकनायक जय प्रकाश नारायण हवाई अड्डा भी है। यहां गुरुद्वारा तकरीबन 15 किलोमीटर है।

पटना के अन्य गुरुद्वारे -  पटना साहिब में गुरुगोबिंद सिंह के जन्मस्थान गुरुद्वारा के अलावा गुरुद्वारा बाल लीला और गायघाट का गुरुद्वारा देखा जा सकता है। यहां से 20 किलोमीटर आगे दानापुर में गुरुद्वारा हांडी साहिब स्थित है। पटना के आसपास राजगीर में गुरुनानक देव जी से जुड़ा हुआ गुरुद्वारा शीततल जल कुंड स्थित है। वहीं पटना से 160 किलोमीटर दूर सासाराम में नवम गुरु गुरुतेगबहादुर से जुड़ा हुआ गुरुद्वारा चाचा फग्गूमल स्थित है।  गुरु नानक देव के दूसरे पुत्र द्वारा वैशाली जिले के लालगंज शहर के रेपुरा मोहल्ले में गुरुद्वारा की स्थापना की गई थी। पर यह नानकशाही गुरुद्वारा आज खस्ताहाल है।
बिहार में सिख इतिहास से जुड़े गुरुद्वारे
-   पटना सिटी क्षेत्र -  तख्त श्री हरिमंदिर साहिब, गायघाट गुरुद्वारा, पटना। गुरु का बाग, मालसलामी (कभी नवाब करीमबक्श रहीम बक्श का बाग हुआ करता था)  कंगन घाट गुरुद्वारा। बाल लीला गुरुद्वारा 
-          गुरुद्वारा हांडी साहिब, दानापुर ( पंजाब जाने के क्रम में पहली बार गुरु गोबिंद सिंह जी यहां रुके थे)
-          नानकशाही गुरुद्वारा, रैपुरा, लालगंज (वैशाली)
-           नानकशाही गुरुद्वारा, फतुहा ( गुरुनानक देव जी और कबीर की यहां हुई थी मुलाकात)
-           गुरुद्वारा चाचा फग्गूमल,  सासाराम,  गुरुद्वारा गुरु का बाग और गुरुद्वारा टकसाली संगत।
-           गुरुद्वारा नानकशाही संगत, अकबरपुर, रजौली संगत, नवादा
-          राज्य के भागलपुर, कटिहार, गया और मुंगेर में भी ऐतिहासिक गुरुद्वारे हैं । 



 - विद्युत प्रकाश मौर्य
तख्त श्री हर मंदिर साहिब की वेबसाइट- 

( PATNA SAHIB, GURU GOBIND SINGH, TENTH GURU ) 

Saturday, March 29, 2014

आधा आना में मोनो रेल का सफर ((03 ))

पंजाब के पटियाला स्टेट मोनो रेल में सफर के लिए 1908 में किराया महज आधा आना हुआ करता था। यह किराया पूरे सफऱ के लिए था। जबकि माल ढुलाई का किराया एक आना से शुरू होता था। इसके 1927 में बंद होने तक किराया यही रहा। सरहिंद मोरिंडा लाइन में 1908 में तकरीबन 20 हजार लोग इस रेल पर हर महीने सफर किया करते थे।


कनक यानी गेहूं की ढुलाई - पटियाला मोनो रेल जिस मार्ग पर चलती थी वह पंजाब का कनक ( गेहूं) उत्पादन करने वाला इलाका है। इस रेल से न सिर्फ लोग सवारी करते थे बल्कि इसमें कनक भी ढोई जाती थी।

बंदी की ओर पटियाला मोनो रेल  1912 के बाद पंजाब की सड़कों पर मोटर वाहन आने लगे थे। सड़कों पर तेज गति वाले मोटर आ जाने के कारण 1927 आते आते मोनो रेल की लोकप्रियता काफी कम हो गई थी। लिहाजा इस सेवा को 1 अक्तूबर 1927 को महाराजा ने बंद करवा दिया। इसके बाद 1938 में महाराजा भूपिंदर सिंह की मौत हो गई। पर इसके कोच और इंजन कई दशक तक पटियाला के पीडब्लूडी शेड में अपनी जगह पर ही आराम फरमाते रहे।

रेल म्यूजिम में पटियाला मोनो रेल
यह संयोग है कि पटियाला मोनो रेल का एक इंजन और एक कोच आज भी चालू हालत में नई दिल्ली के चाणक्यापुरी स्थित नेशनल रेल म्यूजियम की शोभा बढ़ा रहे हैं। इसके सवारी डिब्बे पूरी तरह लकड़ी के बने हुए थे। जो किसी बग्घी के जैसे लगते हैं।


रेलों के इतिहास में रूचि रखने वाले लेख मि. माइक स्टा ने 1962 में इन्हें ढूंढा। बाद में उनके प्रयास से पटियाला मोनो रेल के कोच और लोको को अमृतसर में रेल यार्ड में संरक्षित किया गया। दिल्ली में रेल म्यूजियम बनाए जाने के बाद इसे दिल्ली लाया गया। इसका इंजन पीएसएमटी 4 रेल म्यूजियम में आराम फरमा रहा है। लंबे समय तक रेल संग्रहालय में इसे हर रविवार को छोटे से मार्ग पर चलाया जाता था। 

फिल्मों में पटियाला मोनो रेल - 1980 में आई बीआर चोपड़ा की लोकप्रिय  फिल्म द बर्निंग ट्रेन में पटियाला के मोनो रेल को चलता हुआ देखा जा सकता है। रेलगाड़ी पर केंद्रित इस फिल्म की कहानी के शुरुआती दृश्यों में ही मोनो रेल पर बच्चे चलते हुए दिखाए जाते हैं। इस फिल्म के कुछ हिस्सों की शूटिंग दिल्ली के नेशनल रेल म्यूजियम में की गई थी। 
-- विद्युत प्रकाश मौर्य  ( Email - vidyutp@gmail.com) 
( PATIALA STATE MONO RAIL TRAMWAY , PSMT ) 


Friday, March 28, 2014

पटियाला मोनो रेल का 80 किलोमीटर का सफर ((02))

पटियाला स्टेट मोनो रेल का कुल नेटवर्क 80 किलोमीटर का था। इसमें दो लाइनें थी। पहली लाइन सरहिंद से मोरिंडा के बीच 24 किलोमीटर की थी। इसे रोपड़ तक आगे बढ़ाने का प्रस्ताव था जो आकार नहीं ले सका। दूसरी लाइन 56 किलोमीटर की थी जो पटियाला से सुनाम के बीच चलाई गई थी। इस लाइन का निर्माण मुंबई की मार्सलैंड एंड प्राइस नामक कंपनी ने किया था। तब ट्रैक बिछाने में 70 हजार रुपये का खर्च आया था। 

हालांकि आज की तारीख में इस ट्रैक का कोई स्मृति चिन्ह पटियाला, सुनाम, सरहिंद, मोरिंडा मार्ग पर नजर नहीं आता है। हालांकि इस लाइन के निर्माण से जुडे चीफ इंजीनियर कर्नल बावेल एक पत्र में लिखते हैं कि 
पटियाला शहर की लाइन नार्थ वेस्टर्न रेलवे के माल गोदाम से आरंभ होती थी। इसके बाद लाइन पटियाला शहर में मुख्य रेलवे लाइन को क्रास कर शहर की मंडी से होते हुए कैंटोनमेंट इलाके में जाती थी। वहां से भवानीगढ़ होते हुए सुनाम तक जाती थी।  

पहले खींचते थे खच्चर – पटियाला मोनो रेल को खींचने के लिए लंबे समय तक खच्चरों का इस्तेमाल किया गया है। राजा के अस्तबल में बड़ी संख्या में खच्चर थे, जिन्हें मोनोरेल को खींचने के लिए लगाया गया। दरअसल ये खच्चर युद्धकाल के लिए लाए गए थे। पर इनके खाली होने के कारण इनका इस्तेमाल परिवहन में किया गया। ऐसा पता चलता है कि पटियाला से सुनाम वाली लाइन  में स्टीम इंजन का इस्तेमाल किया गया। जबकि सरहिंद मोरिंडा लाइन के कोच को खच्चर ही खींचते रहे। पहले स्टीम इंजन का इस्तेमाल पटियाला स्टेशन और शहर की मंडी के बीच के एक किलोमीटर मार्ग में किया गया।

मोनो रेल का लोको ( इंजन) – पटियाला मोनो रेल में 0-3-0 माडल का लोको इस्तेमाल हुआ।ये ओरेनस्टीन एंड कोपेल ( ओ एंड के) द्वारा बनाया गया था। बर्लिन की कंपनी से इंजन 500 और 600 पाउंड में खरीदा गया था। डोनाल्ड डब्लू डीकेन्स अपने लेख में लोको के बारे में बताते हैं कि दाहिने तरफ का वाटर टैंक बड़ा था इसलिए इंजन का वजन लोहे की पटरी पर चलने वाले पहिए पर शिफ्ट कर जाता था। पटरी वाले  पहिए का व्यास 39 ईंच ( 990एमएम ) था। लोको पायलट के खड़े होने की जगह में अच्छा खासा केबिन स्पेस था।

मोनो रेल के कोच – पटियाला मोनो रेल के कोच 8 फीट लंबे और 6 फीट चौड़े थे। 1908 में पटियाला मोनो रेल के पास 15 पैसेंजर कोच और 75 मालगाड़ी के डिब्बे थे। इन डिब्बों का इस्तेमाल कनक (गेहूं) की ढुलाई के लिए भी किया जाता था। इनमें कुछ माल गाड़ी के डिब्बे ऐसे भी थे जिन्हें जरूरत पड़ने पर सवारी डिब्बे में भी बदल दिया जाता था। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य 

( PATIALA STATE MONO RAIL TRAMWAY , PSMT ) 

Thursday, March 27, 2014

राजा पटियाला ने चलवाई अनूठी मोनो रेल (01)

मोनो रेल मतलब एक पहिए पर चलने वाली रेल। मुंबई में 2 फरवरी 2014 से आसमान में खंभो पर चलने वाली मोनो रेल सेवा आरंभ हुई है। पर हम मोनो रेल के इतिहास में जाएं तो मूल रूप से मोनो रेल मतलब जिसका एक पहिया लोहे की पटरी पर चलता हो और दूसरा पहिया सड़क पर। इस तरह की मोनो रेल भारत में सबसे पहले महाराजा पटियाला ने अपने रियासत में चलवाई थी। मजे की बात कि इस मोनो रेल को पहले कोई इंजन नहीं बल्कि खच्चर खींचते थे। बाद में इसमें स्टीम इंजन लगाया गया।

पटियाला रियासत में मोनो रेल सेवा 1907 में आरंभ हुई और दो दशक तक अपनी सेवा देती रही। इसे 1927 में बंद कर दिया गया। कुल 80 किलोमीटर रेल सेवा के लिए दो लाइनें बिछाई गई थीं। इसकी कंपनी का नाम पटियाला स्टेट मोनो रेल ट्रामवे ( पीएसएमटी) था।

केरल के मुन्नार में कांडला वैली रेलवे के बाद ये भारत की अपने तरह की दूसरी मोनो रेल सेवा थी। हालांकि 1908 में कांडला वैली मोनो रेल के नैरोगेज में बदल दिया गया पर पटियाला मोनो रेल 1927 तक सरपट दौड़ती रही।
महाराजा भूपिंदर सिंह का कोशिश रंग लाई - महाराजा सर भूपिंदर सिंह को अपने राज्य की जनता के लिए अनूठी रेल सेवा शुरू करने का ख्याल आया। इस परियोजना के चीफ इंजीनियर कर्नल सी डब्लू बावेल्स बनाए गए। कर्नल बावेल्स इस तरह के मोनो रेल तकनीक का प्रयोग पहले भी बंगाल नागपुर रेलवे में माल ढुलाई के ट्रैक के लिए कर चुके थे। महाराजा भूपिंदर सिंह ने उन्हें पीएसटीएम प्रोजेक्ट का मुख्य इंजीनियर नियुक्त किया। इस रेल के बग्घियों के खींचने के लिए रियासत में पाले गए 560 खच्चरों का इस्तेमाल किया गया। खच्चरों के अलावा इस मोनो रेल में बैलों और सांडों का भी इस्तेमाल किया गया।

पीएसएमटी के बारे में  1908 के इंपेरियल गजट के अलावा छपी हुई जानकारी कहीं नहीं मिलती है। इसमें लिखा गया है कि 1907 में एक मोने रेल सेवा आरंभ की गई है जो मोरिंडा को सरहिंद शहर से जोड़ती है।
दिल्ली के नेशनल रेल म्युजियम में संरक्षित पटियाला मोनोरेल का लोकोमोटिव। 

अनूठा एविंग सिस्टम – पटियाला मोनो रेल के संचालन में एविंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा था। इसमें किसी कोच का 95 फीसदी भार लोहे की पटरी पर चलने वाले पहिए पर पड़ता है जबकि महज 5 फीसदी भार सड़क पर चलने वाले पहिए पर पडता है। इस तरह संतुलन बना रहता है। जबकि समान्य रेल गाड़ियों में बराबर बराबर भार रेल के दोनो पटरियों पर चलने वाले पहियों में बंट जाता है। लोहे की पटरी पर चलने वाला पहिया छोटा था जबकि सड़क पर चलने वाला बड़ा।

मोनो रेल में समान्य रेल की तरह डिरेलिंग यानी पटरी से उतर जाने की समस्या नहीं रहती है। इसके साथ ही सड़क का समतल होना भी काफी जरूरी नहीं होता। साथ ही मोनो रेल की पटरियां बिछाने का खर्च भी समान्य रेल से काफी कम आता है। मोनो रेल को परंपरागत रेल से घुमाव के लिए कोण भी बहुत कम चाहिए।

पटियाला मोनो रेल पटियाला शहर के घनी आबादी के बीच भी आसानी से चलती थी। इससे सड़क पर चल रहे समान्य ट्रैफिक को कोई दिक्कत नहीं आती थी। मोनो रेल की ये तकनीक वास्तव में आज भी उन इलाकों के लिए लाभकारी हो सकती है जो भीड़ भाड वाले इलाके हैं जहां जगह की कमी के कारण मेट्रो ट्रेन या फिर ट्राम चलाना संभव नहीं है।  

- विद्युत प्रकाश मौर्य  
( PATIALA STATE MONO RAIL TRAMWAY , PSMT ) 

Wednesday, March 26, 2014

ताजगी का प्रतीक है पुदीना

छोटे-छोटे हरे हरे पत्ते में गुण बहुत हैं। लोग पुदीना की चटनी बना कर खाते हैं। पुदीना के गुणों के कारण इसके स्वाद वाली कैंडी और च्यूंगम कंपनियां बनाने लगी हैं। पिपरमिंट जैसा शीतलन प्रभाव के कारण इसे कैंडी और सांसों ताजगी के लिए बड़ा अच्छा माना जाता है। कई लोग ताजी पुदीने की पत्ती को चबाते हैं तो कई लोग पुदीने की स्वाद वाली चाय पीना पसंद करते हैं। पुदीना पाचन को आसान बनाते है साथ ही जाड़े की ठंड के कारण होने वाली रक्त की संकुलता से भी निजात दिलाता है। अधिकांश टूथपेस्ट कंपनियां पुदीने के इस गुण का इस्तेमाल करती हैं वहीं इसके अपने विज्ञापनों में भी प्रमुखता से बताती हैं।

पुदीना का बायोलाजिकल नाम मेन्था पिपेरिटा है। पर इसकी लगभग 25 प्रजातियां पाई जाती हैं। इसकी प्रजातियां यूरोप और एशिया में स्वदेशी हैं। पुदीने का इतिहास बड़ा पुराना है। सदियों से लोग इसका सेवन करते रहे हैं।
लोकश्रुति - एक यूनानी कथा के अनुसार मेंथे नामक एक परी इतनी सुंदर थी कि पाताल लोक का मालिक हैदस उसपर आकर्षित हो गया। हैदस ने मेंथे के साथ अवैध संबंध बना लिए। जब हैदस की पत्नी को इस रिश्ते के बारे में पता चला तो इसने शाप देकर मेंथे को एक छोटे से पौधे के रुप में परिवर्तित कर दिया ताकि लोग उसे पैरों से कुचल सकें। जब हैदस को इसके बारे में पता चला तो उसके जादू को तो वह खत्म नहीं कर सका पर उसने मेंथे को अनूठी खूशबु प्रदान कर दी। अब जब मेंथे को पैरों से कुचला जाता है तो उसकी खूशबु हवा में फैल जाती है।
पुदीने के इस्तेमाल सदियों से सब्जी को स्वादिष्ट बनाने पर और रसोई घर में मसाले के प्रमुख घटक के रुप में किया जा रहा है। जापान के लोग इसके तेल का इस्तेमाल मेंथेनाल बनाने में करते रहे हैं। हीपोक्रेटिस ने इसके बारे में लिखा है कि लोग इसका इस्तेमाल दांतो की सफाई के लिए करते हैं।
पुदीने के कई इस्तेमाल
प्रचीन काल से ही पुदीने के इस्तेमाल मसाले और दवा दोनों के रुप में होता रहा है। दुनिया भर में इससे चाय, शीतल पेय, जेली, सीरप, आइसक्रीम, मुरब्बा और मेमने के व्यंजनों में किया जाता है। रसोई घर में चाट मसाला, हरे पुदीने की चटनी और थाई करी में इसका इस्तेमाल होता रहा है।
पुदीना बहुत सी सब्जियों जैसे नए आलू, टमाटर, गाजर और मटर के साथ आसानी से मिल जाता है। इसकी कटी पत्तियां सलादों को ताजगी प्रदान करती हैं। भारत में ताजे पुदीने की चटनी बिरयानी के साथ परोसी जाती है तो अरब वासी पुदीने की चाय का आनंद लेते हैं।
पुदीना के औषधीय गुण
पुदीना पीड़ानाशक, उद्दीपक और भूख बढ़ाने वाला माना जाता है। पिपरमिंट के निर्माण में मेंथाल का सर्वाधिक प्रयोग होता है। पुदीने का नियमित इस्तेमाल जुकाम, फ्लू और बुखार में फायदेमंद है। यह अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि शिशुएं के लिए हानिकारक हो सकता है। पुदीने के पिपरमिंट का इस्तेमाल च्यूंगम बनाने में होता है जो ताजगी प्रदान करता है।
--- माधवी रंजना
(MENTHA, PUDINA, MINT )