Thursday, March 13, 2014

आरा सासाराम लाइट रेलवे - बंदी की ओर ((5))

 साल 1950 से 1970 के दशक में आरा सासाराम लाइट रेलवे को अच्छी संख्या में पैसेंजर मिल रहे थे। पर 1975 के आसपास लगातार यात्रियों की संख्या में कमी आने लगी। रेलमार्ग के समांतर चल रहे सड़क पर चलने वाली बसों की स्पीड रेल से ज्यादा थी। लिहाजा यात्रियों के लिए रेल का सफर ज्यादा समय लेने वाला होने लगा। यात्रियों की कमी के कारण मार्टिन कंपनी को आरा सासाराम लाइट रेलवे से घाटा होने लगा।

आखिरी दिनों में मार्टिन कंपनी को आरा सासाराम लाइट रेलवे के संचालन से काफी घाटा होने लगा था। कंपनी की देश में चल रही बाकी रेल परियोजनाएं भी बंद हो चुकी थीं। आरा सासाराम रेल मार्ग पर दौड़ने वाली पैसेंजर ट्रेनों की स्पीड कम थी। इससे तेजी से अब बसों से मंजिल तक पहुंचा जा सकता था। माल ढुलाई से कमाई में काफी गिरावट आने लगी थीलिहाजा कंपनी ने अपना कारोबार समेटने का फैसला लिया।

बंदी का कारण – 1974 के बाद आरा सासाराम लाइट रेलवे के प्रबंधन ने घोषणा कर दिया था साल दर साल घाटा होने के कारण कंपनी में तालाबंदी के हालात बन आए हैं। कंपनी को 1970 के बाद सड़क परिवहन की ओर से जबरदस्त प्रतिस्पर्धा मिल रही थी। वहीं रेलमार्ग का रोलिंग स्टॉक, पटरियां और अन्य परिसंपत्तियों पुरानी पड़ने लगी थीं। इनका उचित रखरखाव नहीं हो पा रहा था। उनके रखरखाव के लिए बड़े खर्च की आवश्यकता थी, जो खर्च कंपनी करने को तैयार नहीं थी।

भारतीय रेलवे ने अधिग्रहण नहीं किया - अब दो विकल्प थे या रेल मार्ग को बंद करना या फिर लाइट रेलवे का भारतीय रेलवे द्वारा राष्ट्रीयकरण किया जाना।  पर जब रेलवे इसका प्रबंधन संभालने पर विचार किया तो जांच परख में पता चला कि ऐसा करना बड़े घाटे का सौदा होगा। न केवल उपकरणों को बदलने और सुधारने में भारी मात्रा में धन खर्च करना होगा बल्कि इसकी परिचालन लागत भी बहुत अधिक होगी। हालांकि भारतीय रेलवे ने मार्टिन के ही शाहदरा-सहारनपुर लाइट रेलवे का अधिग्रहण कर लिया था, पर आरा सासाराम लाइट रेलवे को लेकर यह नीति नहीं अपनाई गई। 

भारत सरकार ने दी मदद  - साल 18 दिसंबर 1974 को कंपनी ने पहली बार इस रेल मार्ग को बंद करने के लिए एक नोटिस जारी किया। लेकिन भारत सरकार, रेलवे बोर्ड की ओर से इस लाइट रेलवे कपंनी आर्थिक सहायता दी गई। ढाई लाख रुपये के एडवांस दिए जाने के बाद कंपनी ने अगले तीन साल तक और इस रेल मार्ग का संचालन किया। तीन साल का सहायता काल पूरा हो जाने के बाद 29 अक्तूबर 1977 को केंद्र सरकार ने कंपनी को रेल परिचालन बंद करने का निर्देश दिया।
इतनी भीड़ होती थी - हरे भरे खेतों के बीच से गुजरती आरा सासाराम लाइट रेलवे ( 1968) Photo - www.internationalsteam.co.uk

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15 फरवरी 1978 को आखिरी सफऱ - भारत में ज्यादातर निजी क्षेत्र की रेल परियोजनाएं बंद हो चुकी थीं या फिर उनका राष्ट्रीयकरण होने के बाद में वे भारतीय रेल का हिस्सा बन चुकी थीं। इस दौर में मार्टिन एंड कंपनी ने 1977 में कलकत्ता हाईकोर्ट से रेलमार्ग को बंद करने के लिए औपचारिक तौर पर आदेश प्राप्त किया। 6 दिसंबर 1977 को कंपनी ने रेलवे बोर्ड को पत्र लिखकर सूचना दी की वह इस रेल मार्ग पर संचालन बंद करने जा रही है। आरा सासाराम लाइट रेलवे मार्ग पर 15 फरवरी 1978 को आखिरी पैसेंजर ट्रेन ने सफर किया। इसके बाद आरा सासाराम लाइन पर नैरो गेज ट्रेनों का सफर इतिहास बन गया।

मार्टिन की संपत्ति को लेकर विवाद - 1978 में जब ये रेल मार्ग बंद हुआ तो आरा सासाराम लाइट रेलवे की संपत्ति को लेकर विवाद लंबा चला। कई लोगों ने इसके स्टेशन भवनों पर कब्जा कर लिया। बिक्रमगंज में तो एक डाक्टर ने अपना क्लिनिक खोल दिया। रेलमार्ग के निर्माण के लिए निजी कंपनी को जमीन 99 साल के लिए लीज पर दी गई थी। उस जमीन पर अलग-अलग संस्थाओं ने एक बार फिर दावा किया, इसका मुकदमा कलकत्ता हाईकोर्ट में लंबा खींचा। अभी मार्टिन रेलवे की कई एकड़ संपत्ति आरा शहर में मौजूद है। इसके अलावा कुछ प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर भी कई एकड़ संपत्ति मौजूद है जिसको लेकर मुकदमे चल रहे हैं। आरा के अलावा कंपनी का गड़हनी, पीरो, हसनबाजार, बिक्रमगंज और सासाराम में भी भू संपत्तियां हैं, जिसको लेकर लंबे समय तक मुकदमा चला। लाइट रेलवे के बंद होने के बाद मार्टिन कंपनी की 15 एकड़ जमीन आरा में है। वहीं नोखा में 6 एकड़ जमीन है, बिक्रमगंज में 9 एकड़ जमीन है। सासाराम में भी तीन एकड़ के आसपास कंपनी की जमीन है। मार्टिन कंपनी का मुख्यालय कोलकाता में है। कई लोगों ने कंपनी की संपत्ति पर कब्जा जमा लिया है। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य  ( ASLR 5)

(ARA SASARAM LIGHT RAILWAY, MARTIN AND BURN, BIHAR ) 


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