Tuesday, July 31, 2012

जगन्नाथ मंदिर, पुरी - बलभद्र-सुभद्रा के संग विराजते हैं कान्हा


चार धाम में से एक है पुरी का जगन्नाथ मंदिर। पुराणों में जगन्नाथ पुरी को इस धरती का बैकुंठ कहा गया है। ब्रह्म और स्कंद पुराण के अनुसारपुरी में भगवान विष्णु ने पुरुषोत्तम नीलमाधव के रूप में अवतार लिया था। 

ओडिशा स्थित यह धाम भी द्वारका की तरह समुद्र तट पर है। यहां जगन्नाथ मंदिर विराजते हैं भगवान कृष्ण अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ। पुरी का जगन्नाथ मंदिर अपनी सुंदरता और वास्तुकला में अद्भुत है साथ ही यहां भगवान का विग्रह भी अत्यंत मनोरम है।मंदिर अपनी विशिष्ट पूजा पद्धति के लिए भी विख्यात है। पुरी एक ओडिशा का एक छोटा सा समुद्र तटीय शहर है। पर भगवान जगन्नाथ के रथयात्रा के समय यहां देश दुनिया से लाखों श्रद्धालु उमड़ पड़ते हैं। 

जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा में श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्रा के रथ। 
आदि शंकराचार्य जी ने चार पीठों की स्थापना की थी। उत्तर में बद्रीनाथदक्षिण में श्रृंगेरीपूर्व में गोवर्धन तथा पश्चिम में द्वारका। चार धामों में तीन तो उन्हीं में से हैं केवल  श्रृंगेरी के बदले रामेश्वरम को एक धाम माना जाता है। आदि शंकराचार्य (सन 788 – 820) का पुरी में आगमन हुआ था। कहा जाता है कि अपनी विद्वत्ता से उन्होंने वहां के बौद्ध मठाधीशों के दांत खट्टे कर दिए और उन्हें सनातन धर्म की ओर आकृष्ट करने में सफल रहे और आत्मसात कर लिए गए। शंकराचार्य जी ने यहां अपना एक पीठ भी स्थापित किया जिसे गोवर्धन पीठ कहते हैं​।

मंदिर का निर्माण -  वर्तमान जगन्नाथ मंदिर का निर्माण बारहवीं सदी में हुआ है। गंग वंश के ताम्र पत्रों से यह ज्ञात होता है कि वर्तमान जगन्नाथ मंदिर के निर्माण कार्य को कलिंग राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव ने आरम्भ कराया था। मंदिर के जगमोहन और विमान भाग के शासन काल 1078 -1148 के बीच बने थे। इसके बाद 1197  में जाकर ओडिया शासक अनंग भीम देव ने इस मंदिर को वर्तमान रूप दिया था। मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां, एक रत्न मण्डित पाषाण चबूतरे पर गर्भ गृह में स्थापित हैं। कहा जाता है इन मूर्तियों की अर्चना मंदिर निर्माण से कहीं पहले से की जाती रही है। यह भी सम्भव है कि यह प्राचीन जनजातियों द्वारा भी पूजा की जाती रही हो।

 प्रसाद पकाने की अनूठी व्यवस्था - जगन्नाथ मंदिर की विशाल रसोई है। इस रसोई में प्रसाद पकाने के लिए सात बर्तन एक-दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं. यह प्रसाद मिट्टी के बर्तनों में लकड़ी पर ही पकाया जाता है. इस दौरान सबसे ऊपर रखे बर्तन का पकवान पहले पकता है फिर नीचे की तरफ से एक के बाद एक प्रसाद पकता जाता है। 

जुलाई में  रथयात्रा - हर साल जुलाई में पुरी में विशाल रथयात्रा का आयोजन होता है। इस रथयात्रा के दौरान जब भगवान अपने मंदिर से निकल कर बलभद्र और सुभद्रा के साथ अपनी मौसी के घर गुंडिचा चले जाते हैं। इस दौरान पुरी में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। भगवान के ऱथ को खींचने में सहभागी बनकर लोग अपना जीवन सफल मानते हैं। पुरी में बाकी के 11 महीने में ज्यादा भीड़ नहीं होती।

कैसे पहुंचे -  पुरी आप रेल मार्ग हावडा से या फिर खड़गपुर से पहुंचा जा सकते है। अगर आप चेन्नई की तरफ से आ रहे हैं तो खुर्दा रोड से उतर कर पुरी पहुंच सकते हैं।

कहां ठहरें -  पुरी में ठहरने के लिए सस्ते धर्मशाला भी हैं,या आप समुद्र तट पर किसी अच्छे होटल में ठहर सकते हैं। पुरी के समुद्र तट पर कई सौ होटल हैं। पुरी के समुद्र तट पर लोकप्रिय होटलों में से एक है -पुरी होटल। http://www.purihotel.in/ पुरी रेलवे स्टेशन पर हर ट्रेन के पहुंचन के साथ इस होटल की बस यात्रियों को निःशुल्क अपने होटल ले जाने के लिए तैयार रहती है। 
--   माधवी रंजना
(JAGANNATH MANDIR, PURI, ODISHA ) 


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