Friday, February 28, 2014

आल्हा उदल की आराध्या - मैहर की मां शारदा देवी

देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है मैहर का मां शारदा देवी का मंदिर। सतना जिले के मैहर कस्बे में मैहर शहर है मां शारदा का मंदिर। यहां श्रद्धालुगण माता का दर्शन कर आशीर्वाद लेने उसी तरह पहुंचते हैं जैसे जम्मू में मां वैष्णो देवी का दर्शन करने जाते हैं। मां शारदा लोकगाथाओं के महान वीर आल्हा और उदल की देवी हैं।

मैहर मतलब मां का हार - मैहर शब्द का का मतलब है मां का हार। कहा जाता है यहां सति का हार गिरा था। मां शारदा देवी महान वीर आल्हा और उदल की देवी हैं। मां शारदा देवी के मंदिर के आसपास इसी पहाड़ी पर कालभैरवी, हनुमानजी, देवी काली, दुर्गा, गौरीशंकर, शेषनाग, फूलमति माता, ब्रह्मदेव और जलापा देवी के भी मंदिर हैं।

कहा जाता है वीर अल्हा और उदल जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध किया था, वे माता शारदा के बड़े भक्त थे। इन्ही वीरों ने सबसे पहले जंगलों के बीच शारदा देवी के इस मंदिर की खोज की। आल्हा ने इस मंदिर में 12 सालों तक तपस्या कर देवी को प्रसन्न किया था। माता ने आल्हा को अमरत्व का आशीर्वाद दिया था। आल्हा माता को शारदा माई कह कर पुकारता था। तभी से ये मंदिर माता शारदा माई के नाम से प्रसिद्ध हो गया। 
आज भी कहा जाता है कि माता शारदा के दर्शन हररोज सबसे पहले आल्हा और उदल ही करते हैं। मंदिर के पीछे पहाड़ों के नीचे एक तालाब है जिसे आल्हा तालाब कहा जाता है। तालाब से 2 किलोमीटर और आगे एक अखाड़ा है, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां आल्हा-उदल कुश्ती लड़ते थे। मां शारदा देवी के मंदिर में बलि देने की प्रथा थी जिसे 1922 में सतना के राजा ब्रजनाथ जूदेव ने प्रतिबंधित कराया।

सीढ़ियां और रोपवे का है विकल्प - मां मैहर देवी के मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को 1063 सीढ़ियों का सफर तय करना पड़ता है। सीढ़ियां चढ़ने से पहले छोटा सा बाजार है जहां आप प्रसाद ले सकते हैं। अपना भारी भरकम सामान छोड़ कर चढ़ाई शुरू कर सकते हैं। हालांकि 2009 के बाद अब यहां रोपवे बन गया है। जो श्रद्धालु सीढिया नहीं चढ़ना चाहते वे रोपवे से जा सकते हैं। रोपवे का संचालन दामोदर रोपवे कंपनी करती है। कंपनी की वेबसाइट है- www.ropeways.com/ropeway_completed.html

कैसे पहुंचे – सतना-कटनी रेलमार्ग पर मैहर रेलवे स्टेशन है। मैहर शहर मां शारदा देवी के अलावा मैहर सीमेंट फैक्ट्री के लिए जाना जाता है। रेलवे स्टेशन से 5 किलोमीटर की दूरी पर त्रिकुटा पहाड़ी पर स्थित है मां शारदा देवी का मंदिर। मैहर पहुंचने के लिए इलाहाबाद, जबलपुर,  दिल्ली से सीधी रेलगाड़ियां हैं। आप अगर मैहर आ रहे हैं बांधवगढ़ नेशनल पार्क जाने का भी कार्यक्रम बना सकतें हैं।

शास्त्रीय संगीत का मैहर घराना - मैहर शहर शास्त्रीय संगीत के मैहर घराने के लिए लोकप्रिय है। दिग्गज संगीतकार उस्ताद अलाउद्दीन खान (1972 मृत्यु ) यहां रहते थे। इस घराने की परंपरा में अन्नपूर्णा देवी (अलाउद्दीन खान की बेटी) उस्ताद अली अकबर खान (अलाउद्दीन खान के पुत्र), पंडित रविशंकर,  पंडित पन्नालाल घोष, पंडित निखिल बनर्जी जैसे प्रसिद्ध नाम हैं।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य 
(MAIHAR DEVI, SHAKTIPEETH) 

Thursday, February 27, 2014

दक्षिणेश्वर की काली और बेलुर मठ

कोलकाता के काली घाट में मां काली का प्रचीन मंदिर है तो शहर के उत्तरी हिस्से दक्षिणेश्वर में मां काली का भव्य मंदिर है। स्वामी विवेकानंद के गुरू रामकृष्म परमहंस इस मंदिर में मां काली की उपासना किया करते थे। इस मंदिर की काफी मान्यता है, क्योंकि मंदिर से विवेकानंद के गुरु से इस मंदिर का नाता है। दक्षिणेश्वर में हुगली नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित काली के इस मंदिर को सारी दुनिया रामकृष्ण परमहंस की वजह से ज्यादा जानती है। यहां काली का भवतरणी के स्वरूप में विराजती हैं।


काली मां का मंदिर 46 फुट चौड़ा तथा 100 फुट ऊंचा है। इस मंदिर में 12 गुंबद हैं जिनका संयुक्त सौंदर्य दूर से भी विलक्षण प्रतीत होता है। दक्षिण की ओर स्थित यह मंदिर तीन मंजिला है। ऊपर की दो मंजिलों पर नौ गुंबद समान रूप से फैले हुए हैं। गुंबदों की छत पर सुंदर आकृतियां बनाई गई हैं।
मंदिर के गर्भगृह में शिव की छाती पर पांव रखकर खड़ी काली की प्रतिमा चांदी के हजार पंखुडि़यों वाले कमल पर स्थापित है। मुख्य मंदिर के चारों तरफ 12 एक जैसे शिव मंदिर बने हैं। गंगा के किनारे बने शिव मंदिर छह और छह की दो श्रंखला में हैं। मंदिर परिसर में एक विष्णु मंदिर और एक राधाकृष्ण मंदिर भी है। इस मंदिर के पास पवित्र हुगली नदी जो बहती है। इन नदी में खिले कमल के पुष्प से मां काली की पूजा की जाती है।

मंदिर का इतिहास -  मंदिर का निर्माण सन 1847 में प्रारम्भ हुआ था। जान बाजार की महारानी रासमणि ने स्वप्न देखा था, जिसके अनुसार मां काली ने उन्हें निर्देश दिया कि मंदिर का निर्माण किया जाए। सन 1855 में मंदिर का निर्माण पूरा हुआ। यह मंदिर 25 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। कहा जाता है कि रानी रासमणि चूंकि निम्न जाति से आती थीं, इसलिए मंदिर में देवी की स्थापना के समय काफी विवाद हुआ। 

इस मंदिर के पहले पुजारी रामकुमार चट्टोपाध्याय बने। बाद में उनके छोटे भाई गदई या गदाधर भी उनके साथ रहने लगे। ये गदाधर ही बाद में रामकृष्ण परमहंस बने। एक साल बाद रामकुमार की मृत्यु हो जाने पर रामकृष्ण यहां के मुख्य पुजारी बन गए। तब से तीस साल बाद 1886 में अपनी मृत्यु तक रामकृष्ण इसी मंदिर में बने रहे। प्रसिद्ध विचारक रामकृष्ण परमहंस ने मां काली के मंदिर में देवी की आध्यात्मिक दृष्टि प्राप्त की थी। इसी स्थल पर बैठ कर उन्होंने धर्म-एकता के लिए प्रवचन दिए थे।

कैसे पहुंचे  दक्षिणेश्वर की काली मां के दर्शन के लिए आपको कोलकाता के मुख्य बस स्टैंड धर्मतल्ला या हावड़ा से स्थानीय बसें मिल जाएंगी। लोकल ट्रेन से भी आप बेलुर स्टेशन आकर वहां से पुल से हुगली नदी पार कर दक्षिणेश्वर पहुंच सकते हैं। बेलुर मठ से दक्षिणेश्वर के लिए लगातार फेरी सेवा भी चलती है जिससे दक्षिणेश्वर पहुंचा जा सकता है। आप कोलकाता के किसी भी कोने से टैक्सी बुक करके भी यहां तक पहुंच सकते हैं। सियालदह डानकुनी रेल मार्ग पर दक्षिणेश्वर रेलवे स्टेशन भी है। यहां सियालदह रेलवे स्टेशन से भी पहुंचा जा सकता है। यह रेलवे स्टेशन हुगली नदी पर बने विवेकानंद ब्रिज से ठीक पहले आता है। 

दक्षिणेश्वर काली मंदिर परिसर में स्वामी विवेकानंद की मूर्ति ( मार्च 2014 ) 
मंदिर खुलने का समय- मंदिर सुबह 6.30 बजे से दोपहर 12.30 बजे तक खुला रहता है। इसके बाद मंदिर दुबारा दोपहर 3.30 बजे खुलता है। मंदिर शाम को 8.30 बजे तक ही खुला रहता है। वहीं अप्रैल से सितंबर तक मंदिर रात्रि 9 बजे तक खुला रहता है।  

- विद्युत प्रकाश मौर्य
( KALI, KOLKATA, DEVI, VIVEKANAND, RAM KRISHNA PARAMHANS ) 



Wednesday, February 26, 2014

कालीघाट – यहां देवी का प्रचंड रूप देखें

कोलकाता का कालीघाट क्षेत्र अपने काली माता के मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। कालीघाट का काली मंदिर देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है। हिन्दू धर्म के पौराणिक कथाओं के अनुसार जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आए। इसलिए ये अत्यंत पावन तीर्थस्थान कहलाए। कालीघाट भी उन्हीं में से एक है। 


सती के पांव की उंगली गिरी थी यहां - ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव के ताण्डव के समय सती के दाहिने पैर की ऊंगली इसी जगह पर गिरी थी।कालीघाट में देवी काली के प्रचंड रुप की प्रतिमा स्थापित है। इस प्रतिमा में देवी काली भगवान शिव के छाती पर पैर रखी हुई हैं। उनके गले में नरमुण्डों  की माला है। उनके हाथ में कुल्हाड़ी है। सुंदर मंदिर के अंदर माता काली की लाल-काली रंग की कास्टिक पत्थर की मूर्ति स्थापित है। 


एक अनुश्रुति के अनुसार देवी किसी बात पर गुस्‍सा हो गई थीं। इसके बाद उन्‍होंने नरसंहार शुरू कर दिया। उनके मार्ग में जो भी आता‍ वह मारा जाता। उनके क्रोध को शांत करने के लिए भगवान शिव उनके रास्‍ते में लेट गए। देवी ने गुस्‍से में उनकी छाती पर भी पांव रख दिया। इसी दौरान उन्‍होंने शिव को पहचान लिया। इसके बाद ही उनका गुस्‍सा शांत हुआ और उन्‍होंने नरसंहार बंद कर दिया।
ये मंदिर 1809 का बना हुआ बताया जाता है। कालीघाट शक्तिपीठ में स्थित प्रतिमा की प्रतिष्ठा कामदेव ब्रह्मचारी (संन्यास पूर्व नाम जिया गंगोपाध्याय) ने की थी। 1836 में धार्मिक आस्था संपन्न जमींदार काशीनाथ राय ने इसका निर्माण कराया था।  पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक दस महाविद्याओं में प्रमुख और शक्ति-प्रभाव की अधिष्ठात्री देवी काली का प्रभाव लाखों कोलकाता वासियों के मन पर है।

मां काली का मुख काले पत्थरों से निर्मित है। उनकी जीभ, हाथ और दांत सोने से मढ़े हुए हैं। उनको लेकर भक्तों में नारा प्रसिद्ध है-  जय काली कलकत्तेवाली तेरा वचन न जाए खाली..... कहा जाता है कि कलकत्ता में काली की दया से आदमी भूखा नहीं सोता। ऐसे मुहावरों और शक्ति की देवी की कथाएं इसी सोने की जीभ के कारण ही पैदा हुई हैं।

गर्भगृह के ठीक सामने बने नाट्य मंदिर से देवी की प्रतिमा का भव्य दर्शन मिलता है। मंदिर में ही बने जोर बंगला में देवी पूजन का कर्मकांड होता है। यहां काली के अलावा शीतला, षष्ठी और मंगलाचंडी के भी स्थान है।


सचिन तेंदुलकर ने की थी पूजा - महानगर के दक्षिणी हिस्से में गंगा के तट पर बसे कालीघाट में न सिर्फ कोलकाता वासी बल्कि दूर दूर से श्रद्धालु यहां पूजा अर्चना करने आते हैं। 99 शतक लगाने के बाद क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर ने भी यहां आकर मां की पूजा की थी।

अघोर साधना और तांत्रिक साधना के लिए प्रसिद्ध - कालीघाट का मंदिर अघोर साधना और तांत्रिक साधना के लिए भी प्रसिद्ध है। कालीघाट के पास स्थित केवड़तला श्मशान घाट को किसी जमाने में शव साधना का प्रमुख केंद्र माना जाता था।  
कालीघाट परिसर में मां शीतला का मंदिर भी है। मां शीतला को भोग में समिष भोज चढ़ाया जाता है। यानी मांस, मछली अंडा सब कुछ।  मंदिर में मंगलवार और शनिवार को श्रद्धालुओं की भीड़ ज्यादा होती है। मैंने देखा लोग मंदिर में बने काउंटर से से मांसाहारी प्रसाद खरीदते हैं और मां को अर्पित कर उसे प्रसाद के रुप में वहीं ग्रहण करते हैं। 

खुलने का समय -  कालीघाट मां का मंदिर सुबह 5 बजे खुल जाता है।  दोपहर 12 से 3.30 बजे तक बंद रहता है। शाम को 5 बजे से रात्रि 10 बजे तक फिर मंदिर खुला रहता है। अगर आप मंदिर दर्शन करने आए हैं तो यहां पंडों से सावधान रहें। विजयादशमी और बंगला नव वर्ष के दिन यहां अपार भीड़ उमड़ती है।

काली घाट स्थित मिशनरीज ऑफ चैरिटी का कार्यालय। 
कैसे पहुंचे -  अगर आप कोलकाता में हैं तो यहां के मुख्य स्थल धर्मतल्ला से बस मेट्रो और ट्राम से कालीघाट पहुंचा जा कता है। कालीघाट में कोलकाता मेट्रो का स्टेशन भी है। कालीघाट ट्राम से भी पहुंचा जा सकता है। हावड़ा रेलवे स्टेशन से कालीघाट की दूरी सात किलोमीटर है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का पुश्तैनी घर काली घाट इलाके में ही है।

मुख्य सड़क जहां आप ट्राम से उतरते हैं, कालीघाट मंदिर का विशाल प्रवेश द्वार बना हुआ है। इस सड़क पर आधा किलोमीटर चलने के बाद बायीं तरफ मां काली का मंदिर नजर में आ जाता है।

मिशनरीज ऑफ चेरिटी का मुख्यालय बगल में -  


काली घाट की ही सड़क पर मदर टेरेसा की संस्था मिशनरीज आफ चेरिटी यानी निर्मल हृदय का मुख्यालय भी है। यहीं से महान समाज सेविका मदर टेरेसा ने कई दशक तक अपनी गतिविधियों का संचालन किया। उन्हें अपने महान कार्यों के लिए सेवा का नोबल पुरस्कार भी मिला। 
इस मार्ग पर एक ओर प्रचंड रुप में कालीघाट में देवी मां यहां विराज रही हैं पर कालीघाट के मंदिर के मार्ग पर कोलकाता का सबसे पुराना रेडलाइट एरिया भी है। यहां भरी दोपहरी में भी महिलाएं अपने ग्राहकों का इंतजार करती नजर आती हैं। शक्ति की अधिष्ठात्री देवी के मंदिर के पास नारी शक्ति की ये कैसी विवशता है मां... 
 -    विद्युत प्रकाश मौर्य 
( KOLKATA, KALIGHAT, DEVI ) 

Tuesday, February 25, 2014

मन की इच्छा पूरी करती हैं मां मनसा देवी


पंचकूला में स्थित मां मनसा देवी नौ देवियों में से एक हैं। यह 51 शक्तिपीठों में से भी एक है। कहा जाता है कि यहां मां का मस्तक गिरा था। मां का मंदिर चंडीगढ़ शहर के बिल्कुल पास पंचकूला (हरियाणा) में है। मंदिर का परिसर विशाल है। यह 100 एकड़ में फैला हुआ है। शिवालिक श्रेणी की पर्वतमाला की तलहटी में होने के कारण मंदिर के आसपास का वातावरण बड़ा मनोरम है। इस मंदिर की व्यवस्था एक सरकारी ट्रस्ट देखता है। यह ट्रस्ट हरियाणा सरकार के अधीन है।

चैत्र नवरात्र के समय यहां विशाल मेला लगता है। तब यहां लाखों श्रद्धालु जुटते हैं। वैसे मंदिर में सालों भर चहल पहल रहती है। बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालु यहां समय समय पर लंगर भी लगाते हैं।

मनसा देवी मंदिर का निर्माण -  मनसा देवी मंदिर का निर्माण उन्नीसवीं सदी में हुआ। निर्माण के लिहाज से यह ज्यादा प्राचीन नहीं है। इसका निर्माण  1811-1815 के बीच मनी माजरा के राजा गोपाल सिंह ने कराया था। मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर से 200 मीटर की दूरी पर पटियाला के महाराजा करम सिंह ने 1840 में एक और मंदिर बनवाया जिसे पटियाला मंदिर कहा जाता है। यहां आने वाले श्रद्धालु पटियाला मंदिर के भी दर्शन करने जाते हैं। 

राजा को सपने में आई देवी - इस मंदिर के निर्माण को लेकर एक कथा है। कहा जाता है कि एक बार महाराजा गोपाल सिंह को देवी सपने में आईं। उन्होंने राजा को इस स्थल पर मंदिर बनवाने का कहा। देवी के निर्देश को मानते हुए राजा ने यहां पर भव्य मंदिर बनवाया। 

मंदिर में मनसा देवी की प्रतिमा तीन सिर और पांच भुजाओं वाली है। मंदिर परिसर में ही चामुंडा और लक्ष्मीनारायण का मंदिर है। मंदिर के परिक्रमा में भी विभिन्न देवी देवताओं की मूर्तियां बनाई गई हैं। इससे मंदिर का परिसर काफी मनोरम लगता है। मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहां 40 दिन नियमित आकर पूजा करने वाले की मुरादें मां पूरी करती हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु मंदिर के मनोरम परिसर में खो जाते हैं। वे कई घंटे मंदिर परिसर में ही गुजारते हैं। आजादी के बाद इस मंदिर का प्रबंधन निजी हाथों में था। तब इसकी व्यवस्था अच्छी नहीं रहती थी। बाद में हरियाणा सरकार ने इसका अधिग्रहण कर ट्रस्ट का निर्माण किया। इसके बाद इसके इंतजामात में काफी सुधार हुआ है। मंदिर की अधिकृत वेबसाइट पर जा सकते हैं - http://mansadevi.nic.in/ 


चंडीगढ़ और उसके आसपास के लोगों की मां मनसा देवी में अगाध श्रद्धा देखने को मिलती है। मुरादें पूरी होने पर लोग यहां लंगर लगाते हैं। मनसा देवी मंदिर के परिसर में हमेशा आप भंडारा चलता देख सकते हैं। कई संस्थाओं द्वारा यहां सालों भर भंडारा चलाया जाता है।


आवास की भी सुविधा - मंदिर में श्रद्धालुओं के रहने के लिए निशुल्क आवास की सुविधा भी उपलब्ध है।इसके अलावा 200 रुपये प्रतिदिन पर सुविधायुक्त आवास भी उपलब्ध है। मंदिर प्रबंधन की ओर से श्रद्धालुओं के लिए चिकित्सालय तथा कई और सेवाएं भी संचालित की जाती हैं।सरकार के प्रयास से मंदिर परिसर में लगातार विकास और जन कल्याण से जुड़ी कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। 

हरिद्वार में भी मनसा देवी मंदिर - मनसा देवी नाम का एक मंदिर हरिद्वार में भी है। हालांकि ये शक्तिपीठ में नहीं गिना जाता पर इस मंदिर की लोकप्रियता काफी है। हर की पैड़ी के पास से मनसा देवी के मंदिर के लिए रोपवे संचालित होता है। वैसे आप 20 मिनट की पैदल चढ़ाई करके भी हरिद्वार के मनसा देवी मंदिर में जा सकते हैं।

कैसे पहुंचे - यह मंदिर मनीमाजरा से आगे पंचकूला के बिलासपुर गांव में स्थित है। यह चंडीगढ़ मुख्य बस स्टैंड से 10 किलोमीटर और पंचकूला बस स्टैंड से 4 किलोमीटर की दूरी पर है। आप चंडीगढ़ शहर से पंचकूला की ओर जाने वाली बसों से मनसा देवी पहुंच सकते हैं। मनसा देवी का मंदिर मनी माजरा की पहाड़ियों पर स्थित है। यह चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन से भी काफी करीब है।चंडीगढ शहर और पंचकूला के किसी भी हिस्से से मनसा देवी आसानी से पहुंचा जा सकता है।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य
MANSA DEVI,  TEMPLE, PANCHKULA HARYANA, SHAKTIPEETH )



पंचकूला के मनसा देवी मंदिर परिसर स्थित यज्ञशाला 

Monday, February 24, 2014

रोशनी की देवी - नैना देवी


नौ देवियों में प्रमुख नैना देवी को रोशनी की देवी माना जाता है। नैना देवी का मंदिर हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में शिवालिक पर्वत मालाओं के बीच स्थित मनोरम वादियों में स्थित है। नैना देवी का मंदिर  51 शक्तिपीठों में से एक हैं।यह हिमाचल के बिलासपुर जिले में समुद्रतल से 1177 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। 
बस स्टैंड से करीब सवा किलोमीटर की चढ़ाई के बाद सबसे ऊंची चोटी पर माता का मंदिर स्थित है। सफेद रंग के सुंदर मंदिर को संगमरर से मढ़ा गया है। मुख्यद्वार के दोनों तरफ माता की सवारी शेर विराजमान हैं। मंदिर के गर्भगृह में मध्य में नैना देवी और बायीं और दायीं और मां काली और गणेश जी की प्रतिमाएं हैं। गर्भ गृह में माता की मूर्ति में उनके दो आंखों को प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया है। 
सैकड़ो साल पुराना पीपल का पेड़- 
मंदिर से लगा हुआ एक पीपल का पेड़ है जो सैकड़ो साल पुराना है। यह पीपल का पेड़ मंदिर के सौंदर्य को और बढ़ा देता है। मंदिर परिसर में 70 फीट लंबी एक गुफा भी है। मंदिर के पास खप्पर महिषासुर कुंड, कृपाली कुंड आदि भी देखे जा सकते हैं। 

सती के दोनों नेत्र गिरे थे यहां  कहा जाता है कि यहां सती के दो नेत्र गिरे थे इसलिए नाम है नैना देवी।कहा जाता है कि नैना गूजर देवी का बड़ा भक्त था। जब अपनी गाय चराते हुए वह वर्तमान मंदिर स्थल के पास पहुंचा तो उसकी अनब्याही गायों से अपने आप दूध निकलने लगे। इसे देवी का चमत्कार मानकर उस स्थल को हटाया तो वहां पिंडी रूप में उसे देवी के दर्शन हुए। तब माता ने उसे सपने में आकर इस स्थल पर मंदिर बनवाने को कहा। उनकी इच्छा से पहाडों पर माता का सुंदर मंदिर बना है। नैना देवी के मंदिर में श्रावण मास के अष्टमी पर सर्वाधिक श्रद्धालु पहुंचते हैं।


500 सीढ़ियों की लंबी चढ़ाई - नैना देवी के मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को बस स्टाप से 500 से ज्यादा सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। ये सीढ़ियां हालांकि सीधी नहीं हैं। घुमावदार सीढ़ियों के आसपास लोगों के घर और बाजार भी आते हैं। आप धीरे-धीरे आराम फरमाते हुए नैना देवी के दरबार तक पहुंच सकते हैं।

रोपवे से पहुंचे नैना देवी - नैना देवी के बस स्टैंड से नैना देवी के मंदिर तक अब नैनादेवी रोपवे से भी पहुंचा जा सकता है। इसका टिकट 170 रुपये प्रति व्यक्ति ( जाना और आना ) है। गणपति रोपवे और दामोदर रोपवे कोलकाता के सौजन्य से यहां रज्जु मार्ग का संचालन किया जाता है। यह सेवा 1997 में आरंभ हुई। इस रोपवे में कुल 24 केबिन बने हुए हैं। गरमी में सुबह 8 बजे से शाम 7 बजे तक और सरदियों में सुबह 9 बजे से रोपवे की सेवा उपलब्ध रहती है।
अब नैना देवी और आनंदपुर साहिब शहर के बीच लंबा रोपवे यानी रज्जुमार्ग बनाने का भी प्रस्ताव है। ऐसा होे पर यह सैलानियों के लिए बड़ा आकर्षण का केंद्र बन जाएगा।  नैना देवी के मंदिर चैत्र और आश्विन नवरात्र के समय श्रद्धालुओं की सर्वाधिक भीड़ उमड़ती है। उस दौरान दिन रात यहां मेले जैसा वातावरण रहता है।

कैसे पहुंचे - यहां पहुंचने का सुगम रास्ता पंजाब के रुपनगर जिले में नंगल से है। जो श्रद्धालु आनंदपुर साहिब जा रहे हों तो वहां से नैना देवी कुछ किलोमीटर की ही दूरी पर हैं। आनंदपुर साहिब के आगे नंगल आता है। वही नंगल जहां भाखड़ा नदी पर विशाल भाखड़ा डैम बना है। इस डैम से होकर नैना देवी का रास्ता आगे जाता है। नंगल के आगे का आप पंजाब से हिमाचल प्रदेश में प्रवेश कर जाते हैं। आगे का रास्ता पहाड़ी और मनोरम है।

कहां ठहरें - नैना देवी के मंदिर के पास रहने के लिए मंदिर की धर्मशाला में निशुल्क आवासीय सुविधा उपलब्ध है। मंदिर ट्रस्ट की ओर से मातृ शरण और मातृ आंचल नामक दो अतिथिगृह का निर्माण कराया गया है जहां किराया देकर ठहरा जा सकता है। वहीं मंदिर के आसपास के लोग श्रद्धालुओं को उचित राशि लेकर अपने घरों में ठहरने के लिए भी कमरा उपलब्ध करा देते हैं। आप मंदिर के पास पहुंचेंगे तो कई लोग कमरा देने का प्रस्ताव लेकर आपके पास आते हैं।
पहली बार नैना देवी के द्वार पर-  साल 2002 में जब मैं पहली बार जालांधर से नैनादेवी के दर्शन के लिए पहुंचा तो होशियारपुर, उना नंगल होते हुए बसें बदलकर नैना देवी पहुंचते हुए शाम हो गई थी। इसलिए सीढ़ियों से माता के भवन तक पहुंचने के बाद मैंने एक कमरा ले लिया किराये पर 70 रुपये में। शाम को मंदिर में दर्शन के बाद मंदिर ट्रस्ट के लंगर में भोजन किया। रात नैनादेवी मंदिर के प्रचीर से आनंदपुर साहिब शहर का नजारा करना अदभुत लगा। हालांकि तब मैंने आनंदपुर साहिब शहर का दौरा नहीं किया था। पर ऊंचे पहाड़ों से देखते हुए इस पवित्र शहर में जाने की इच्छा जागृत हो उठी।
मंदिर प्रशासन की ओर से लंगर भी -  नैना देवी मंदिर प्रशासन की ओर से श्रद्धालुओं के लिए निशुल्क लंगर भी चलाया जाता है। लंगर का समय तय है। इसमें सुबह का नास्ता, दोपहर का भोजन और रात्रि भोजन परोसा जाता है। नैना देवी की चढ़ाई में थकान हो जाती है। इसलिए कई श्रद्धालु यहां पहुंचने और मंदिर दर्शन के बाद यहीं रूक जाना पसंद करते हैं।
मंदिर ट्रस्ट की दुकान से मिठाई -  मंदिर ट्रस्ट की ओर से संचालित दुकान से आप हलवा, बेसन लड्डू, बर्फी और जलेबी खरीद सकते हैं। मंदिर परिसर में यह दुकान बिना लाभ हानि के 1994 से चलाई जा रही है। यह दुकान मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार के पास स्थित है।

प्नमुख स्थानों से दूरी - पंजाब के आनंदपुर साहिब से नैना देवी की दूरी 24 किलोमीटर है। वहीं पंजाब के नंगल से नैना देवी की दूरी 40 किलोमीटर है। चंडीगढ़ से नैनादेवी की दूरी 115 किलोमीटर है। 
-    विद्युत प्रकाश मौर्य  ( NAINA DEVI, NINE GODDESS, HIMACHAL, PUNJAB, VYAS RIVER, ROAPWAY ) 

Sunday, February 23, 2014

धन धान्य की देवी माता शाकुंभरी

नौ देवियों में से एक हैं मां शाकुंभरी देवी। इनका मंदिर उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में है। कल कल छल छल बहती नदी की जल धारा ऊंचे पहाड़ और जंगलों के बीच विराजती हैं माता शाकुंभरी। माता का मंदिर यूपी और उत्तराखंड की सीमा पर राजाजी नेशनल पार्क से लगते हुए वन क्षेत्र में है। इलाका अत्यंत मनोरम है। कहा जाता है शाकंभरी देवी लोगों को धन धान्य का आशीर्वाद देती हैं। इनकी अराधना करने वालों का घर हमेशा शाक यानी अन्न के भंडार से भरा रहता है।

शाकुंभरी देवी के गर्भ गृह में मां शाकुंभरी के बगल में भीमा देवी और शताक्षी देवी विराजमान हैं। वहीं दरबार में भ्रामरी देवी और गणेशजी भी विराजमान हैं। मां को शाक यानी हरी सब्जियां जो धन धान्य का प्रतीक है इसकी देवी माना गया है। इसलिए मां के दरबार में आने वाले भक्त मां को प्रसाद के तौर पर हरी सब्जियां, मूली, गाजर, किस्म किस्म साग, पपीता आदि सब कुछ चढ़ाते हैं। इसके साथ यह कामना करते हैं उनका घर हमेशा धन धान्य से भरा रहे। सैनी समाज माता शाकुंभरी को अपनी कुल देवी मानता है। वरिष्ठ पत्रकार शंभुनाथ शुक्ला कहते हैं कि शाकुंभरी देवी एक लोकदेवी हैं जिसकी स्थापना सैनी समाज के लोगों ने ही की थी। अब इनकी पूजा सारे ही बिरादरी के लोग करते हैं।

जंगलों में बसती हैं मां - शाकुंभरी देवी (शाकंभरी) के बस स्टाप से मंदिर के लिए एक किलोमीटर का रास्ता पैदल तय करना पड़ता है। मंदिर नदी तट के किनारे है। अगर नदी में पानी न हो तो बसें मंदिर तक चली जाती हैं। मां का मंदिर शिवालिक पर्वतमाला के घने जंगल में नदी के किनारे है। मंदिर तक पहुंचने के लिए शाकंभरी नदी से होकर रास्ता जाता है। थोड़ा रास्ता जंगल से होकर भी है। पथरीली राहों के साथ ही बरसात के दिनों में नदी में पानी भी रहता है। पहाड़ों पर तेज बारिश होने पर नदी में पानी बढ़ जाता है। तब मंदिर जाना मुश्किल है। हांलाकि कुछ घंटों में पानी तेजी से कम भी हो जाता है। नदी में पानी नहीं होने पर लोग अपने निजी वाहनों से बाइक और बड़ी जीपों को नदी से निकालते हुए मंदिर पहुंच जाते हैं। 

शरद और चैत्र नवरात्र में मेला - शाकुंभरी देवी के मंदिर में भक्तों के आने का सिलसिला सालों भर लगा रहता है। लेकिन शरद और चैत्र नवरात्र में खासी भीड़ उमड़ती है। पौष की पूर्णिमा और बाकी पूर्णिमा के दिन भी यहां भक्त बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। मां के दरबार में न सिर्फ उत्तर प्रदेश बल्कि उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और पंजाब से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। श्रद्धालु निजी बसों और ट्रकों से पूरी तैयारी के साथ आते हैं।  इस दौरान मंदिर का पास मेले लग जाते हैं। अलग अलग जगहों से आए श्रद्धालु यहां भंडारा लगाते हैं। 

मां के भंडारे में कड़ी, चावल, हलवा, पूरी आदि का प्रसाद होता है। इस दौरान प्रशासन भी अपनी ओर से खास इंतजाम करता है। लेकिन बरसात के दिनों में माता शाकुंभरी के मंदिर के पास नदी में पानी आ जाता है। इसलिए बरसात में दर्शन करने वालों को थोड़ी सावधानी बरतनी चाहिए।

माता शाकुंभरी के मंदिर के पास प्रसाद की दुकानें और खाने पीने से स्टाल है। मंदिर पास रहने के लिए कुछ आश्रम और धर्मशालाएं भी हैं। अगर मंदिर पहुंचने में शाम हो जाए और लौटना मुश्किल हो तो वहीं रूका जा सकता है। मंदिर के पास एक संस्कृत स्कूल और जिला प्रशासन का बनवाया गया रैन बसेरा भी है। हालांकि यहां बेहतरीन इंतजाम वाले होटल या गेस्ट हाउस नहीं हैं। उसके लिए आपको साहरनपुर में रुकना होगा।

शाम को 5.45 बजे के बाद माता शाकुंभरी से वापस आने के लिए बसें नहीं मिलतीं। ऐसी हालत में आपको मंदिर के पास ही रूकना पडेगा। मंदिर के आसपास बिल्कुल प्राकृतिक वातावरण है। कई मोबाइल कंपनियों का नेटवर्क भी नहीं मिलता। सहारनपुर से शाकुंभरी देवी तक जाने का रास्ता बड़ा ही मनोरम है। मां की कृपा इलाके में प्रकृति पर खूब बरसी है। रास्ते में खूब हरियाली दिखाई देती है। आम के बड़े-बड़े बाग हैं। यहां से आप सहारनपुर के प्रसिद्ध चौसा आम खरीद सकते हैं।


कैसे पहुंचें - शाकुंभरी देवी का मंदिर यूपी में सहारनपुर शहर से 42 किलोमीटर की दूरी पर है। नजदीकी कस्बा बेहट से शाकुंभरी देवी का मंदिर 16 किलोमीटर की दूरी पर है। आप देश के किसी भी कोने से सहरानपुर रेल या बस द्वारा पहुंच सकते हैं। सहारनपुर में रेलवे स्टेशन से बेहट बस अड्डे पहुंचे। यहां शाकुंभरी देवी के लिए बसें हर थोड़ी देर पर मिलती हैं। सहारनपुर से बेहट कसबे की दूरी 23 किलोमीटर है। बेहट से मां का मंदिर 16 किलोमीटर की दूरी पर चकराता रोड पर है। यह रास्ता तकरीबन डेढ घंटे का है।अगर आप परिवार के साथ या समूह में हैं तो सहारनपुर से टैक्सी बुक करके भी शाकुंभरी देवी के मंदिर जा सकते हैं। शाकुंभरी देवी के मंदिर से हिमाचल प्रदेश का पांवटा साहिब भी निकट है। यहां पर देहरादून या हरियाणा के शहर अंबाला से भी सुगमता से पहुंचा जा सकता है। 
 -  विद्युत प्रकाश मौर्य  

( SHAKUMBHARI DEVI, NINE DEVI, TEMPLE, BEHAT, SAHRANPUR, UP ) 


Saturday, February 22, 2014

जय मां कालका - बिगड़ी बनाने वाली मां

शक्ति की देवी दुर्गा के नौ रुपों में एक हैं मां काली। हालांकि देश में मां काली के कई मंदिर हैं पर उनमें से प्रमुख मां कालका देवी का मंदिर हरियाणा के पंचकूला जिले के कालका शहर में हैं। भक्तगण मां को चमत्कारी मानते हैं। इन्हें बिगड़ी बनाने वाली देवी माना जाता है। हालांकि इस मंदिर को 51 शक्तिपीठों में नहीं गिना जाता है। पर मान्यता है कि शिव तांडव के दौरान सती की केश राशि के कुछ अंश यहां भी गिरे थे।हालांकि काली का मुख्य मंदिर कोलकाता के काली घाट के काली मंदिर को माना जाता है। जहां सती की केश राशि गिरी थी। पर पंजाब, हरियाणा, हिमाचल के लोगों की कालका के कालिका मंदिर में अगाध श्रद्धा है। इधर के श्रद्धालुओं में मान्यता है कि ये मां काली का ये मंदिर भी शक्तिपीठ है।


महिषासुर वध के बाद यहां प्रकट हुईं थी काली- 

यह भी मान्यता है कि शास्त्रों से विभूषित हो कर मां रन भूमि में प्रगट होकर महिषासुर आदि सभी दैत्यों का वध करके जिस स्थान में प्रगट हुई थी वो आज काली माता मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है जो कि हरियाणा के पंचकूला जिला कालका में स्थित है।

कालिका मंदिर में यहां सिर्फ देवी का सिर दिखाई देता है। मंदिर में मां के दर्शन पिंडी रूप में किए जाते हैं। मां के मूर्ति के बगल में दो सुनहले शेर नजर आते हैं जो युद्ध में माता की सवारी हुआ करते थे। हर रोज मंदिर में मां का श्रंगार भव्यता से किया जाता है। कभी फूलों से तो कभी फलों से। उनका सुबह और शाम का श्रंगार देखने लायक होता है।


मां के चमत्कार की कई कहानियां - मां के चमत्कार की कई कथाएं कही जाती हैं। वे भक्तों पर कृपा करती हैं। पर एक दंतकथा के मुताबिक कहा जाता है देवी ने नाराज होकर राजा जयसिंह देव का शाप दिया था। उसके बाद राजा न सिर्फ युद्ध में हार गया बल्कि उसका राजपाट भी नष्ट हो गया। ये शहर भी मां के कोप से बरबाद हो गया जो काफी समय बाद फिर आबाद हो सका। कहा जाता है आराधना करने वाले का कालका मां दुख हरती हैं और बिगड़ी बनाने वाली हैं। नवरात्र में कालका मंदिर में विशाल मेला लगता है। खास तौर पर अष्टमी के दिन श्रद्धालुओं के दर्शन की भारी भीड़ उमड़ती है।उस दिन इतनी लंबी लाइन लगती है कि वह कई बार हरियाणा के परवाणु शहर तक पहुंच जाती है।


कैसे पहुंचे - पंचकूला जिले का कालका शहर चंडीगढ़ से शिमला मार्ग पर स्थित है। चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन से कालका की दूरी 37 किलोमीटर है। यह ब्राडगेज का आखिरी रेलवे स्टेशन है साथ ही कालका शिमला लाइट रेलवे का पहला रेलवे स्टेशन है। रेलवे स्टेशन के पास ही बाजार में नेशनल हाईवे पर ही मां कालका का मंदिर है। आप चंडीगढ़ से शिमला जाते हुए किसी भी बस से कालका पहुंच सकते हैं। 

कहां ठहरें   - कालका शहर में ठहरने के लिए कई आवासीय होटल और धर्मशालाएं मौजूद हैं।  कालका से लगे हुए हिमाचल प्रदेश के औद्योगिक शहर परवाणु में भी पीडब्लूडी गेस्ट हाउस समेत कई होटल हैं।पंचकूला और चंडीगढ़ में भी रुक कर कालका, पिंजौर आदि घूमने का कार्यक्रम बनाया जा सकता है।

देश में और भी कालका मंदिर - देश में कालका नाम के कई और मंदिर हैं। देश की राजधानी दिल्ली में कालकाजी इलाके में भी कालका मंदिर है तो एक कालका मंदिर इंदौर के खजराना इलाके में भी है।


-    विद्युत प्रकाश मौर्य
KALKA DEVI TEMPLE. SATI, NINE GODDESS, HARYANA )

Friday, February 21, 2014

ज्वालामुखी- यानी जोता वाली मां- 51 शक्तिपीठों में श्रेष्ठ

मां ज्वालामुखी के दरबार को शक्ति की देवी दुर्गा के 51 शक्तिपीठों में सर्वोपरि माना जाता है। शिवालिक की मनोरम पर्वतमालाओं के बीच विराजने वाली नौ देवियों में से प्रमुख मां ज्वाला देवी का मंदिर हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में स्थित है। यह प्रदेश का प्रमुख तीर्थ है। सालों भर यहां श्रद्धालुओं की आवाजाही लगी रहती है। 

अनवरत जलती रहती है ज्वाला - पौराणिक आख्यानों के मुताबिक यहां सती की जिह्वा गिरी थी। इसलिए यह 51 शक्तिपीठ में शुमार है। इस मंदिर में कोई देवी प्रतिमा नहीं है। बल्कि इस तीर्थ पर देवी का दर्शन ज्योति के रूप में होता है। पहाड़ों की नौ चट्टानों से आने वाली यह ज्योति बिना किसी ईंधन के अनवरत जलती रहती है। यह अपने आप में बहुत आश्चर्यजनक घटना है। इसलिए ये स्थान ज्वालामुखी के नाम से प्रसिद्ध है।


साल -2003 , मां ज्वालामुखी के दरबार में 
मुक्ति और भक्ति प्रदान करती हैं देवी 
यहां कुल नौ ज्योत जलती हैं। मुख्य जोत का नाम महाकाली है जो मुक्ति और भक्ति प्रदान करने वाली मानी जाती हैं। बाकी ज्योत को अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अंबिका और अंजना देवी के नाम से जाना जाता है। कुंड में दर्शन देने वाली अंबिका देवी के बारे में ऐसी मान्यता है कि वह संतान सुख देती हैं। इसलिए यहां आने वाले श्रद्धालु सभी नौ जोत के दर्शन करते हैं और अपने जीवन में शांति समृद्धि की की कामना करते हैं।

एक ग्वाले ने देखी थी ज्वाला -  एक दंत कथा के मुताबिक यह मंदिर सतयुग के काल का है। एक ग्वाले ने राजा भूमिचंद्र को सूचना दी कि उसने धौलाधार के पर्वत पर ज्वाला जलती देखी है। उसके बाद राजा भूमिचंद्र ने आकर ज्वाला रूपि देवी के दर्शन किए और यहां एक छोटे से मंदिर का निर्माण कराया। कहा जाता है कि महाभारत के पंच पांडवों ने भी ज्वालामुखी मंदिर की यात्रा की थी और यहां मंदिर का जीर्णोद्धार भी कराया था। माता ज्वालामुखी का जो वर्तमान मंदिर है उसे 1835 में महाराजा रणजीत सिंह और राजा संसार चंद द्वारा बनवाया गया बताया जाता है।  
साल - 2003 - मां ज्वालामुखी के दरबार में 
गुरु गोरखनाथ ने की थी तपस्या  -  ज्वालाजी के मंदिर का नाथ संप्रदाय में भी काफी महत्व है। यहां आने वाले भक्त गोरख डिब्बी का दर्शन जरूर करते हैं। यह एक छोटे से कुंड में निरंतर खौलता रहता है। यह स्थान ज्वालामुखी मंदिर की परिक्रमा में दस सीढ़ियां ऊपर दाईं तरफ है। कहा जाता है यहां नाथ संप्रदाय के गुरू गोरखनाथ ने तपस्या की थी। वे अपने शिष्य नागार्जुन के पास डिब्बी रखकर खिचड़ी मांगने गए थे। पर वे इसके बाद वापस नहीं लौटे।

अकबर पहुंचे थे नंगे पांव - कहा जाता है कि ज्वालामुखी मां की महिमा ध्यानु भगत से सुनने के बाद मुगल बादशाह अकबर भी यहां नंगे पांव चलकर आए थे और माता के सम्मान में सोने का छत्र चढ़वाया था। हालांकि माता ने उनकी भेंट स्वीकार नहीं की। उनका छत्र खंडित रूप में आज भी माता के दरबार में है।

जोता वाली माता तेरी सदा ही जय हो - उत्तर भारत में जगह जगह होने वाले भगवती जागरण में बार बार जोता वाली माता का जिक्र आता है। वह जोता वाली माता ज्वालामुखी देवी ही हैं। कई जगह भगवती जागरण में माता की जोत लेने के लिए श्रद्धालु ज्वालामुखी पहुंचते हैं। कई श्रद्धालु तो माता की जोत लेकर नंगे पांव अपने गांव तक पहुंचते हैं। नवरात्र के समय माता के मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।

कैसे पहुंचे - ज्वालामुखी देवी के मंदिर तक पहुंचने का आसान रास्ता पंजाब के होशियारपुर शहर से है। होशियारपुर शहर से अंब-चिंतपूर्णी- गोपीपुर होकर ज्वालामुखी मंदिर पहुंचा जा सकता है। होशियारपुर से ज्वालाजी की दूरी 54 किलोमीटर है। कांगड़ा शहर से भी बस से ज्वालामुखी पहुंचा जा सकता है। कांगड़ा से ज्वालामुखी की दूरी 30 किलोमीटर है।
यहां सड़क मार्ग के अलावा रेल मार्ग से पठानकोट जोगिंदर नगर लाइट रेलवे से ज्वालामुखी रोड नामक रेलवे स्टेशन से भी उतर कर पहुंचा जा सकता है। ज्वालामुखी रोड स्टेशन से  ज्वाला देवी मंदिर 21 किलोमीटर की दूरी पर है। स्टेशन से मंदिर के लिए मिनी बसें मिलती रहती हैं। 
कहां ठहरें - माता ज्वालामुखी मंदिर के आसपास कई छोटे-छोटे होटल और धर्मशालाएं बनी हैं। अब यहां कुछ लग्जरी होटल भी बन गए हैं। यहां पर श्रद्धालु रात्रि विश्राम कर सकते हैं। खाने पीने के लिए ढाबे भी हैं। वैसे यहां मंदिर प्रशासन की ओर श्रद्धालुओं के लिए लंगर का संचालन किया जाता है। इसके लिए आप लंगर भवन में जा सकते हैं। आप होशियारपुर, चिंकपूर्णी या कांगड़ा में रात्रि में रुककर भी दिन में ज्वालामुखी पहुंच सकते हैं।
आसपास में क्या देखें -  ज्वालाजी के मंदिर से 4 किलोमीटर की दूरी पर नगिनी माता का मंदिर है। वहीं पांच किलोमीटर की दूरी पर श्री रघुनाथ जी मंदिर है। इस मंदिर को भी पांडवों द्वारा निर्मित बताया जाता है। आप पास में तारा देवी मंदिर, अष्टभुजा मंदिर के दर्शन भी कर सकते हैं। 


-    विद्युत प्रकाश मौर्य

JWALAMUKHI TEMPLE. HIMACHAL, NINE GODDESS )

Thursday, February 20, 2014

मन की हर चिंता दूर करती है मां चिंतपूर्णी

पौराणिक नौ देवियों में से पांच देवियों के मंदिर हिमाचल प्रदेश में ही स्थित हैं। इनमें माता चिंतापूर्णी के बारे में कहा जाता है कि वे मन की हर तरह की चिंता को दूर कर सुख प्रदान करती हैं। वे पहाड़ों की नौ देवियों और देश के 51 शक्तिपीठों में से एक हैं। चिंतपूर्णी देवी का मंदिर हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में स्थित है।

मंदिर की कथा - पौराणिक कथा के अनुसार यहां पर शिव तांडव के दौरान माता सती के चरण गिर थे। इसलिए भक्तों में माता चरणों का स्पर्श करने को लेकर अगाध श्रद्धा है। चिंतपूर्णी देवी का मंदिर हिमाचल प्रदेश के सोला सिग्ही श्रेणी की पहाड़ी पर छपरोह गांव में स्थित है। अब ये स्थान चिंतपूर्णी के नाम से ही जाना जाता है। कहा जाता है चिंतपूर्णी देवी की खोज भक्त माई दास ने की थी। माई दास पटियाला रियासत के अठरनामी गांव के निवासी थे। वे मां के अनन्य भक्त थे। उनकी चिंता का निवारण माता ने सपने में आकर किया था।

मंदिर के पास भक्त माईदास का ढूंढा हुआ सरोवर भी है जिसके जल से वे माता की नियमित पूजा किया करते थे। अभी भी भक्त इस सुंदर तालाब से जल लेकर माता की पूजा करते हैं। तालाब तक जाने के लिए 200 सीढ़ियां उतरनी पड़ती है। मां के मंदिर का मुख्य प्रसाद हलवा है।

नवरात्र में विशाल मेला - चिंतपूर्णी मंदिर में चैत्र और शरद नवरात्र और चैत्र नवरात्र के समय यहां विशाल मेला लगता है। तब यहां लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। हर साल कई लोक गायक माता के सम्मान में भजनों के नए नए अलबम निकालते हैं। इस दौरान जिला प्रशासन की ओर से भी खास इंतजाम किए जाते हैं। मंदिर के आसपास दो किलोमीटर लंबा सुंदर सा बाजार है। चिंतपूर्णी में पंजाब के अलग-अलग शहरों के लोगों ने रहने के लिए कई धर्मशालाओं का भी निर्माण कराया है।


कैसे पहुंचे -  शिवालिक की मनोरम पहाड़ियों के बीच समुद्र तल से कुल  940 मीटर ऊपर  ( लगभग 3000 फीट) की ऊंचाई पर मां का दरबार स्थित है।

यह मंदिर ऊना जिले के हिल स्टेशन भरवाई से मात्र तीन किलोमीटर की दूरी पर है। यहां पहुंचने के लिए पंजाब के होशियारपुर शहर से बसें मिल जाती हैं। यह पुनीत स्थल पंजाब के होशियारपुर रेलवे स्टेशन से कोई 50 किलोमीटर की दूरी पर है। वैसे यहां पठानकोट जोगिंदर नगर रेल मार्ग से भी पहुंचा जा सकता है।

वैसे यहां तक पहुंचने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन ज्वालामुखी रोड है जो यहां से 21 किलोमीटर की दूरी पर है।

कहां ठहरें - मंदिर के पास अतिथियों के रहने के लिए कई आवास बने हुए है।यहां धर्मशालाएं और कुछ गेस्ट हाउस बने हैं। आप पंजाब के शहर होशियारपुर या जालंधर से एक दिन में चिंतपूर्णी जाकर लौट भी सकते हैं। पंजाब और हिमाचल के कई जिलों से श्रद्धालु माता चिंतपूर्णी के लिए साइकिल अथवा बाइक से यात्रा भी निकालते हैं। चिंतपूर्णी के मार्ग पर कई साइकिल जत्थों को मंदिर की ओर जाते हुए देखा जा सकता है।

---- विद्युत प्रकाश मौर्य

CHINTPURNI DEVI TEMPLE. HIMACHAL PRADESH, NINE GODDESS, DURGA )