Friday, March 21, 2014

दिल में दिल का प्यारा है मगर मिलता नहीं

छ्न्नूलाल के सुरों का अनूठा जादू
अच्छा संगीत भी भूख मिटाता है। यह दिल और दिमाग का भोजन है। भले ही आप अच्छा गा नहीं हो सकते हैं पर अच्छा सुनना भला किसके कानों को सुखकर नहीं लगता। जब गाने वाला अपने सुरों के माध्यम से आपको एक साथ कई तरह के संगीत का रसास्वादन कराए तो मजा और भी बढ़ जाता है। 
ऐसी ही एक शाम सजी थी दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में और गायक थे पंडित छन्नूलाल मिश्रा तो सुनने वालों में थे लार्ड मेघनाद देसाई, बाल्मिकी प्रसाद सिंह, भीष्म नारायण सिंह समेत 200 से ज्यादा सुधी श्रोता। बनारस के शास्त्रीय संगीत के ये महान सुरों के साधक जब मंच पर आए तो कहा नोम तोम करूंगा तो काफी वक्त चला जाएगा। इसलिए एक घंटे में आपको संगीत के कई रंग में डुबाने की कोशिश करूंगा। और उन्होंने कजरी, सोहर, ठुमरी सब कुछ सुनाया। हालांकि वे पूरबी अंग की ठुमरी के लिए खास तौर पर जाने जाते हैं पर उन्होंने लाजवाब कर दिया ऊर्दू के शायर अनवर की नज्मों को शास्त्रीय धुन में सुनाकर...
दिल में दिल का प्यारा है मगर मिलता नहीं
आंखों में आंखों का तारा है मगर मिलता नहीं
ढूंढते फिरते हैं उसको दर बदर और खू ब खू
हर तरफ हर नजर
है मगर मिलता नहीं
शेख ढूंढे हरम में  बरहम दैर में
हर जगह वो आशिकारा है मगर मिलता नहीं
मेरे दिल में वही खेले और खेला मुझसे वो दुलारा
है मगर मिलता नहीं
क्या कहूं कुछ बस में नहीं अनवर
दिलबर हमारा यहां बज्म में है मगर मिलता नहीं
( भटियाली धुन में )

लोकप्रिय शास्त्रीय सुरों के साधक छन्नू लाल मिश्र जब उर्दू शायर की इन पंक्तियों को शास्त्रीय धुनों में पिरोकर श्रोताओं के सामने पेश करते हैं तो शास्त्रीय और सूफी का अदभुत संगम नजर आता है और श्रोता उसमें डूबते चले जाते हैं।

 शास्त्रीय संगीत में भोजपुरी के गीत और कबीर के पद तो सुनने को मिलते हैं तो पर उर्दू के नज्म दुर्लभ हैं। कुमार गंधर्व ने ज्यादातर कबीर के भजनों को सुर दिया। पर छन्नूलाल ख्याल गायकी के हर फन के मौला हैं। वे ऐसे लोगों का भी मनोरंजन करने में कामयाब हैं जो शास्त्रीय संगीत की एबीसी नहीं समझते। हर कोई छन्नू लाल की ओर से तुरत-फुरत में सुरों के बसाए संसार में रम जाता है।
पर पद्मभूषण छन्नूलाल मिश्र जाने जाते हैं अपनी खास काशी की होली के लिए जो वे हर जगह सुनाते हैं। शिव की होली। दिगंबर खेले मशाने मे होली....
और अंत में उनकी आवाज में.ये निर्गुण – दुनिया दर्शन का है मेला...अपनी करनी पार उतरनी...चाहे गुरू चाहे चेला...कंकड चुनि चुनि महल बनाया...लोग कहें घर मेरा...न घर तेरा न घर मेरा...चिड़िया  रैन बसेरा।

- विद्युत प्रकाश मौर्य 

( 25 दिसंबर 2013, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, महामना मालवीय जयंती, BHU, DELHI, VARANASI, MAHAMANA, MALVIYA, OLD STUDENT MEET ) 

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