Sunday, February 2, 2014

त्रिपुरा- चाय और रबर ने बदली तकदीर

त्रिपुरा  में रबर के पेड़। 
चाय के बगान और रबर के खेतों ने त्रिपुरा के लोगों की तकदीर बदल दी है। विकास की नई इबारत लिखी है। आम तौर पर हमलोग रबर के लिए केरल का नाम लेते हैं। पर अब त्रिपुरा भी लेटेक्स (रबर) का बड़ा सप्लायर हो गया है। यहां रबर से बनने वाले कुछ उद्योग भी लग गए हैं, वहीं बड़े पैमाने पर बाहरी कंपनियों को रबर की सप्लाई की जा रही है।
त्रिपुरा का सदाबहार मौसम रबर की खेती के लिए अनुकूल है। जब हम रबर का एक नया पौधा लगाते हैं तो वह पांच साल बाद रबर निकालने लायक हो जाता है। इस पौधे से हम अगले 25 सालों तक रबर निकाल सकते हैं। जब ये पेड़ रबर देना बंद कर देता है तब भी ये बेकार नहीं होता। 

उदयपुर रोड पर गोकुल नगर के पास चाय बगान। 
रबर के पेड़ की लकड़ी भी काफी महंगी बिकती है क्योंकि रबर के फर्नीचर भी सागवान की तरह की काफी कामयाब होते हैं। अगरतला के मणिगोपाल देवनाथ कहते हैं कि अगर किसी ने गांव में दो बीघा खेत में रबर लगा दिया है तो समझो उसके घर में दो बच्चों की सरकारी नौकरी से आने वाली मासिक तनख्वाह के बराबर पैसे तो रबर से आने लगते हैं। रबर के पेड़ों को काटकर उसके दूध निकाला जाता है। इस दूध को दिन भर कटोरी में जमा किया जाता है। इस दूध से रबर तैयार होता है। आज दुनिया की बहुत सारी जरूरतें रबर पर टिकी हुई हैं। रबर के वाहनों के टायर बनते हैं तो हमारे पांव के चप्पल और जूते रबर से बनते हैं। इसलिए रबर की भारी मांग बनी हुई है।

वैसे तो असम चाय का बहुत बड़ा उत्पादक है। पर अब चाय उत्पादन करने वालों लोगों की नजर त्रिपुरा पर भी पड़ी है। राज्य के सीढीदार इलाकों में चाय के बगान बनाए गए हैं और त्रिपुरा से चाय का भी उत्पादन होने लगा है। अगरतला सबरूम हाईवे पर विशालगढ़ से पहले गोकुलनगर में ऐसा ही एक चाय का बगान दिखाई दिया। ऐसे कई चाय बगान त्रिपुरा के अलग अलग हिस्सों में दिखाई दे जाते हैं।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य   
( BAMBOO,   BLOSSOM, TEA , RUBBER, AGARTALA ) 

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