Thursday, January 30, 2014

शक्तिपीठ है त्रिपुर सुंदरी का मंदिर

त्रिपुरा राज्य का नाम माता त्रिपुर सुंदरी के नाम पर पड़ा है। अगरतला शहर से 55 किलोमीटर दूर नेशनल हाईवे नंबर 44 पर उदयपुर नामक एक कस्बा है जहां त्रिपुर सुंदरी का मंदिर स्थित है। गोमती नदी के तट पर स्थित उदयपुर कभी त्रिपुरा के राजतंत्र की राजधानी हुआ करता था। उदयपुर से पांच किलोमीटर आगे है माताबाड़ी। त्रिपुरा के लोग इस मंदिर को माताबाड़ी कहते हैं। माताबाड़ी यानी मां का घर।  यह देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है। इस कूर्म पीठ कहा गया है। मंदिर का वास्तु भी कछुए की पीठ की तरह का है। यहां सती के बाएं पांव का अंगूठा गिरा था। ये मंदिर 11वीं सदी का बना हुआ बताया जाता है।
सोलहवीं सदी का मंदिर - वर्तमान मंदिर का गर्भ गृह 1501 में महाराजा ध्यान माणिक्य ने बनवाया। मंदिर परिसर में दीवाली पर बड़ा मेला लगता है। वैसे सालों भर रोज यहां बकरा और भैंसे आदि की बलि चढ़ाई जाती है। पर हर पक्ष की दसमी की तारीख माता के निरामिष भोग का दिन होता है। मैं जिस दिन पहुंचा हूं संयोग से यह निरामिष भोज का दिन है। इस दिन कोई बलि नहीं चढ़ती।

हर रोज सुबह आठ बजे मंदिर के पट खुलते हैं और माता का पहला दर्शन होता है। मंदिर के गर्भ गृह में श्रद्धालुओं के जाने की मनाही है। पुजारी आपका नाम और गोत्र पूछते हैं और आपका प्रसाद माता के चरणों में अर्पित करते हैं।

मंदिर के पीछे कल्याण सागर सरोवर

मंदिर के पीछे कल्याण सागर सरोवर

मंदिर के पीछे कल्याण सागर सरोवर है जो साढ़े छह एकड़ में फैला हुआ है। इस सरोवर का निर्माण महाराजा कल्याण मल माणिक देव वर्मा ने 1501 में करवाया था। सरोवर में स्नान करने के लिए सुंदर घाट बने हुए हैं। सरोवर में मछलियां पाली गई हैं। श्रद्धालु इन्हें दाना देते हैं। 
मंदिर परिसर और सरोवर मिलकर अदभुत आध्यात्मिक वातावरण का निर्माण करते हैं। अब त्रिपुर सुंदरी मंदिर की पूरी व्यवस्था सरकार देखती है। हमें यह पता चला कि वामपंथी सरकार इस मंदिर के लिए हर महीने एक निश्चित राशि साफ सफाई और व्यवस्था के लिए जारी करती है। मंदिर परिसर की सफाई व्यवस्था उत्तम कोटि की है। 

यूपी के कन्नौज से आए थे पंडित - जब त्रिपुर सुंदरी का मंदिर बनकर तैयार हो गया तब उसमें पूजा के लिए योग्य पुजारी का संकट आया। तब त्रिपुरा के राजा ने उत्तर भारत से पंडित बुलाने का फैसला लिया। अपने विद्वान मंत्रियों की सलाह पर त्रिपुर सुंदरी मंदिर में पूजा के लिए महाराज ने तब उत्तर प्रदेशके कन्नौज से दो पंडित परिवारों को बुलाया। इन पुजारियों को सपरिवार  उदयपुर में बसाया गया। तब कन्नौज से लक्ष्मी नारायण पांडे और गदाधर पांडे नामक दो पूजारी परिवार के साथ  यहां पहुंचे थे। अब उन दो परिवारों का कुनबा काफी बढ़ चुका है। इन्ही पूजारियों का परिवार माता त्रिपुर सुंदरी के मंदिर में पूजा पाठ करता है। ये था उत्तर और पूरब का सुंदर संगम।

कहां ठहरें -  उदयपुर शहर में मंदिर के पास ठहरने के लिए त्रिपुरा सरकार ने गुनाबती यात्री निवास भी बनवाया है। माणिक्य राजाओं की राजधानी रहे उदयपुर में  गुणावती समूह के मंदिर और भुवनेश्वरी मंदिर भी देखा जा सकता है। भुवनेश्वरी देवी के मंदिर का जिक्र कविगुरू रविंद्र नाथ टैगोर के दो नाटकों में राजर्षि और विसर्जन में भी आता है।

 परिसर में प्रसाद की कई दुकाने हैं। यहां प्रसाद में मुख्य रूप से पेड़ा चढ़ाया जाता है। इनमें से एक है छत्रास्वरि पेड़ा भंडार। मैं इस दुकान में अपने जूते बैग आदि जमा करके दर्शन के लिए जाता हूं।  माता बाड़ी मंदिर परिसर में इस पेड़े वाले दुकानदार ने हमें उदयपुर और मंदिर के बारे में ढेर सारी रोचक जानकारियां दीं। हम उनका दिल से धन्यवाद  देना चाहेंगे। दूर देस में बहुत कम लोग मिलते हैं जो आपके साथ दिल से बातें करें और अच्छी अच्छी जानकारियां दें। 

-    विद्युत प्रकाश मौर्य 
(TRIPURA, TRIPUR SUNDARI TEMPLE, UDAIPUR, SHAKTIPEETH ) 

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