Friday, January 31, 2014

ये कोई सरकारी दफ्तर नहीं सब्जी बाजार है...

उदयपुर का सब्जी बाजार। 
त्रिपुरा के छोटे से कस्बे उदयपुर में मुझे के बड़ी सी चार मंजिला बिल्डिंग दिखाई देती है। मुझे दूर से अभास हुआ मानो ये कोई सरकारी दफ्तर होगा। पर आसपास के लोगों ने बताया कि ये स्थानीय सब्जी बाजार है। सब्जी बाजार, यानी गुदरी बाजार, हाट या पेठिया। वहां जाने पर बेतरतीब में लगाई गई दुकानें, सड़ी हुई सब्जियों की बजबजाटहट, पार्किंग का कोई इंतजाम नहीं, गंदी नालियां, सड़ांध जैसी तस्वीर उमड़ती है। पटना के मुख्य बाजार की सड़क सब्जी बाजार से निकलने वाली दिनभर की गंदगी से जाम हो जाती है। पर यहां वैसा नजारा नहीं था।

सब्जी बाजार के भवन के मुख्य द्वार से अंदर दाखिल होने पर सब कुछ करीने से सजा नजर आया। हरी सब्जियों का अलग बाजार, मछली, मांस, मुर्गे की अलग लाइन, अनाज की दुकानों की अलग लाइन। सब्जियों के अवशिष्ट को फेंकने के लिए बेहतर इंतजाम। हर दुकानदार को पक्की दुकान आवंटित की गई है। अपनी दुकान बंद करके घर चले जाएं। अगले दिन तय समय पर आकर अपनी दुकान खोलें।

उदयपुर- माताबाड़ी मंदिर का बाजार । 
 यानी त्रिपुरा सरकार ने हाट बाजार में खुले में सामान बेचने वालों के लिए बहुमंजिला बाजार बनाकर दिया है। ऐसे बाजार सिर्फ उदयपुर में ही नहीं बल्कि हर जिला मुख्यालय और उप जिला मुख्यालय में बनाए गए हैं। यहां दुकानदारों को अपनी दुकान के लिए किराया भरना पड़ता है पर वह लोगों को भारी नहीं लगता। इतने अच्छे इंतजाम जो हैं। दुकानदारों के लिए टायलेट और मंडी बोर्ड के दफ्तर भी इन भवनों में बनाए गए हैं।

इतना ही नहीं हर पंचायत में भी स्थानीय सब्जी बिक्रेताओं के लिए पक्के शेड बनवाए गए हैं। जहां वे बारिश की परवाह किए बिना बेतकल्लुफ होकर सब्जियां बेच सकते हैं। यानी आम आदमी के दुख दर्द का पूरा ख्याल रखने की कोशिश सरकार ने की है।

ग्रामीण सब्जी बाजार की ये जो परिकल्पना है इससे दूसरे राज्यों को प्रेरणा लेने की जरूरत है। भले की लोग गुजरात के नरेंद्र मोदी के विकास के माडल का हवाला देते हों पर गांवों में पक्की सड़कों के निर्माण में त्रिपुरा गुजरात से आगे निकल चुका है। त्रिपुरा के तमाम गांव पक्की सड़कों से जुड गए हैं।

गुजरात के विकास का बार बार ढोल पीटा जाता है पर वहां के गांवों की तमाम सड़कें अभी कच्ची हैं और वहां ध्वनि और वायु प्रदूषण फैलाने वाले छकड़े चलते हैं। त्रिपुरा के लगभग हर पंचायत का अपना पक्का भवन है। पंचायत संकुल में चिकित्सालय का भवन, सरकारी कर्मचारी का भवन बना है।


मधुपुर के पंचायत भवन में वाचनालय भी है। यहां गांव के लोग बांग्ला का अखबार पढ़ते दिखाई दिए। हर पंचायत भवन के पास एक सीपीएम का पार्टी दफ्तर भी दिखाई देता है। इससे ये पता चलता है कि पार्टी का कैडर जमीनी स्तर पर कितना मजबूत है। स्कूलों का पक्का भवन है। उसमें पेयजल के लिए पानी की टंकी और नलके और शौचालय का भी इंतजाम दिखाई देता है।


-    विद्युत प्रकाश मौर्य 
VEGETABLES  MARKET AGARTALA  TRIPURA  )



Thursday, January 30, 2014

त्रिपुरा की आदर्श ग्राम पंचायत


कमला सागर जाने के रास्ते में त्रिपुरा राज्य के आदर्श ग्रामीण परिवेश से हमारा साक्षात्कार होता है। कमलासागर से पहले मधुपुर नामक गांव आता है। गांव का पंचायत भवन पक्के का बना हुआ है। पंचायत भवन के बगल में ही पंचायत सचिव का दफ्तर है। यहां जमीन के कामकाज से जुडे मामले देखे जाते हैं। रोज नियत समय पर पंचायत सचिव यहां आकर बैठता है।

पंचायत संकुल में ही एलोपैथिक और आयुर्वेदिक चिकित्सालय भी है। इन चिकित्सालयों में रोज समय पर डाक्टर आकर बैठते हैं। गांव के लोग बताते हैं कि राज्य के ज्यादातर ग्राम पंचायतों के भवन इसी तरह पक्के के बन चुके हैं। पंचायत भवन के बगल में ही सीपीएम का पक्का दफ्तर भी बना हुआ। इस दफ्तर में सीपीएम के कार्यकर्ता अखबार पढ़ते हुए नजर आते हैं। यहां तीन बांग्ला के अखबार रोज आते हैं जो अगरतला से प्रकाशित होते हैं। कुल मिलाकर पंचायत संकुल मिनी सचिवालय है। हर पंचायत में सड़क के किनारे गांव के कृषि उपज को बेचने के लिए प्लेटफार्म बना हुआ दिखाई देता है।


छतदार प्लेटफार्म बना है यानी बारिश से बचने का भी पूरा इंतजाम है। राज्य में मानिक सरकार की अगुवाई में चल रही सीपीएम की सरकार की छाप गांव गांव में दिखाई देती है। मानिक दादा ऐसे समावेशी विकास की बात करते हैं जिसका असर समाज के हर तबके पर दिखाई दे। यानी विकास की लाभ गांव के दलित पिछड़े और गरीबों तक पहुंच सके।
गांव में कृषि उत्पादों की बिक्री के लिए बना शेड। 
मुझे पंचायत भवन के पास ही गांव का सरकारी स्कूल नजर आता है। स्कूल बंद है। पर मैं देखता हूं कि स्कूल में बच्चों के लिए शौचालय बने हुए हैं, लड़कियों के लिए अलग और लड़कों के लिए अलग। स्कूल में पेयजल के लिए टंकी भी बनी है। नलों में पानी आ रहा है। मुझे अपने बचपन का बिहार के गांव का स्कूल याद आता है। वहां शौचालय नहीं थे। पीने के पानी के लिए एक हैंडपंप था जो अक्सर खराब हो जाता था।

अगरतला लौटते हुए एक साप्ताहिक हाट दिखाई देता है। इस हाट में सूअर की मंडी लगती है। लोग छोटे छोटे सूअर खरीद कर ले जाते हैं, फिर इन्हें पाल कर बड़ा करते हैं। बाद में ये उंचे दामों पर बिकते हैं। छोटे सूअरों को पैक करने के लिए चटाई बुनने वाली सामग्री की पैकिंग मिलती है। इसमें छोटे सूअर का मुंह और पूंछ बाहर रहता है बाकी हिस्सा पैक। मंडी से सूअर खरीदकर छोटे किसान गांव ले जाते हैं।
 हमें कमला सागर में एक बोर्ड दिखाई देता है रूरल टूरिज्म का। यानी राज्य सरकार की ओर सैलानियों को गांव दिखाने के इंतजाम भी किए जाते हैं। वाह अलबेला है त्रिपुरा... 

-    विद्युत प्रकाश मौर्य  ( ADARSH GRAM PANCHYAT, MADHUPUR, KAMLA SAGAR, AGARTALA)


Wednesday, January 29, 2014

कमला सागर - जय काली मां कसबे वाली

कमला सागर में मां काली का मंदिर त्रिपुरा राज्य का अदभुत मंदिर है। पंद्रहवीं सदी का बना यह मंदिर अब बिल्कुल बांग्लादेश की सीमा पर है। मंदिर के बगल में विशाल सुंदर सरोवर है। इस सरोवर में असंख्य कमल के पुष्प खिले हैं। सरोवर के तट पर सामने ऊंचाई की ओर जाती सीढ़ियां काली माता के दरबार की ओर जा रही हैं।

आस्था और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है कमला सागर में। कमला सागर में स्थित काली मां के मंदिर को कसबे वाली काली मां भी कहते हैं। आजादी के बाद कस्बा नामक छोटा सा कस्बा तो बांग्लादेश में चला गया पर काली मां का मंदिर हिंदुस्तान में ही रहा। कमला सागर मंदिर के ठीक बगल में बांग्लादेश सीमा की बाड़ लगी है। बाड़ के उस पार बांग्लादेश के नागरिक अपने खेतों में काम करते हुए दिखाई देते हैं।

तब खोल दी जाती है सीमा - साल में एक बार भाद्रपद आमवस्या पर  मंदिर में मेला लगता है। इस पूजा के खास अवसर पर बांग्लादेश के हिंदू परिवारों को भी काली मां के पूजा की अनुमति दी जाती है। यहां तैनात सीमा सुरक्षा बल के जवान इसके लिए खास तौर पर बंग्लादेशी श्रद्धालुओं को रास्ता उपलब्ध कराते हैं। मां काली की पूजा करने के बाद वे श्रद्धालु वापस लौट जाते हैं। दो देशों के बीच सरहदें जरूर बन गई हैं आस्था को दीवार नहीं जुटा कर सकी है। 




काली मां का ये  मंदिर महाराजा धन माणिक्य का कार्यकाल  15वीं सदी में बनवाया गया। धन माणिक्य त्रिपुरा में माणिक्य वंश के सबसे प्रतापी राजा थे, उन्होंने कई मंदिर बनवाए। कहा जाता है ये मंदिर उनकी पत्नी कमला देवी ने बनवाया था। उन्होंने ही मंदिर के पास विशाल पुष्करणी सरोवर भी खुदवाया जिसका नाम महारानी कमला देवी के नाम पर कमला सागर रखा गया। कमला देवी बड़ी ही परोपकारी और सहृदय महारानी थी।कहा जाता है कि उन्होंने अपने राज्य में चली आ रही नरबलि प्रथा को खत्म कराया था।

कमला सागर का ये मंदिर बाकी काली मंदिरों से थोड़ा अलग है। मंदिर में दसभुजा धारी महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा है। साथ में शिव भी स्थापित हैं। हर रोज मां की प्रतिमा का सुरूचिपूर्ण ढंग से श्रंगार होता है। हर साल भाद्रपद आमस्वया के समय यहां बड़ा मेला लगता है। मंदिर का परिसर बड़ा ही मनोरम है। हमारे आटो रिक्शा वाले बताते हैं कि नए साल के मौके पर यहां पिकनिक मनाने वालों की बड़ी भीड़ जुटती है। बाकी साल अगर आप पहुंचे तो यहां अद्भुत आध्यात्मिक शांति का एहसास होता है।



कमला सागर से बांग्लादेश के कस्बा के खेत घर और काम करते हुए लोग दिखाई देते हैं। सीमा के उस पार के रेलगाड़ी की सिटी भी सुनाई देती है। कस्बा बांग्लादेश के चटगांव डिविजन का एक उप जिला है। 

कैसे पहुंचे- कमला सागर की दूरी अगरतला शहर से 28 किलोमीटर है। अगरतला से कमला सागर जाने के लिए नगरजल बस स्टैंड से टैक्सी या बस ली जा सकती है। उदयपुर मार्ग पर बिशालगढ़ से पहले गोकुल नगर स्टैंड पर उतर जाएं।

गोकुल नगर से आटो रिक्शा कमला सागर जाते हैं। रास्ते में मधुपुर नामक गांव आता है। इस मार्ग में त्रिपुरा से आदर्श ग्रामीण परिवेश से साक्षात्कार होता है। आप चाहें तो अगरतला से सीधे टैक्सी बुक करके कमला सागर जा सकते हैं। इससे आपका समय बचेगा।

कहां ठहरें - कमला सागर में रहने के लिए कोमिला गेस्ट हाउस बना है। वैसे आप अगरतला शहर में ही रुक कर कमला सागर आ सकते हैं। कमला सागर में आपको खाने पीने के लिए एक दो छोटी दुकानें दिखाई देती हैं।  मंदिर परिसर में प्रसाद की दुकानें और कैफेटेरिया आदि भी है। यहां आप थोड़ी से पेट पूजा कर सकते हैं, या फिर दोपहर का भोजन भी ले सकते हैं। 




-    विद्युत प्रकाश मौर्य

(KAMLA SAGAR, TEMPLE, BANGLADESH BORDER, BSF, TRIPURA, AGARTALA ) 

Tuesday, January 28, 2014

माताबाड़ी यानी त्रिपुर सुंदरी का मंदिर- शक्तिपीठ

त्रिपुरा राज्य का नाम माता त्रिपुर सुंदरी के नाम पर पड़ा है। अगरतला शहर से 55 किलोमीटर दूर नेशनल हाईवे नंबर 44 पर उदयपुर नामक एक कस्बा है जहां त्रिपुर सुंदरी का मंदिर स्थित है।

गोमती नदी के तट पर स्थित उदयपुर कभी त्रिपुरा के राजतंत्र की राजधानी हुआ करता था। उदयपुर से पांच किलोमीटर आगे है माताबाड़ी। त्रिपुरा के लोग इस मंदिर को माताबाड़ी कहते हैं। माताबाड़ी यानी मां का घर।

यह देश के
 51 शक्तिपीठों में से एक है। इस कूर्म पीठ कहा गया है। मंदिर का वास्तु भी कछुए की पीठ की तरह का है। यहां सती के बाएं पांव का अंगूठा गिरा था। ये मंदिर 11वीं सदी का बना हुआ बताया जाता है।



सोलहवीं सदी का मंदिर - वर्तमान मंदिर का गर्भ गृह 1501 में महाराजा ध्यान माणिक्य ने बनवाया था। मंदिर का परिसर बड़ा ही साफ सुथरा, मनोरम और सुंदर है। यहां सालों भर हर रोज बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। वहीं मंदिर परिसर में दीवाली पर बहुत बड़ा मेला लगता है।

अभी भी जारी है बलि की प्रथा -  वैसे सालों भर रोज यहां बकरा और भैंसे आदि की बलि चढ़ाई जाती है। यह देश के उन कुछ दर्जन मंदिरों में शामिल है जहां अभी बलि की प्रथा बंद नहीं कराई जा सकी है।

माता का निरामिष दिन - पर हर पक्ष की दसमी की तारीख माता के निरामिष भोग का दिन होता है। मैं जिस दिन पहुंचा हूं संयोग से यह निरामिष भोज का दिन है। इस दिन कोई बलि नहीं चढ़ती। पुजारी जी मुझे ये जानकारी देते हैं तो बड़ा संतोष होता है कि आज बलि का दिन नही है। 

हर रोज सुबह आठ बजे मंदिर के पट खुलते हैं और माता का पहला दर्शन होता है। मंदिर के गर्भ गृह में श्रद्धालुओं के जाने की मनाही है। पुजारी आपका नाम और गोत्र पूछते हैं और आपका प्रसाद माता के चरणों में अर्पित करते हैं। नवरात्र के समय और छुटटियों के दिन मंदिर में श्रद्धालुओं की काफी भीड़ उमड़ती है। 

मंदिर के पीछे विशाल कल्याण सागर सरोवर - 


मंदिर के पीछे कल्याण सागर सरोवर

मंदिर के पीछे कल्याण सागर सरोवर है जो साढ़े छह एकड़ में फैला हुआ है। इस सरोवर का निर्माण महाराजा कल्याण मल माणिक देव वर्मा ने 1501 में करवाया था। सरोवर में स्नान करने के लिए सुंदर घाट बने हुए हैं। सरोवर में मछलियां पाली गई हैं। श्रद्धालु इन्हें दाना भी देते हैं। 


त्रिपुर सुंदरी मंदिर परिसर और सरोवर मिलकर अदभुत आध्यात्मिक वातावरण का निर्माण करते हैं। परिसर में आगे और पीछे कई दर्जन पूजा और प्रसाद की दुकाने हैं। खाने पीने के लिए भी कई शाकाहारी होटल हैं। मंदिर के आसपास अब ठहरने के लिए कुछ सस्ते होटल भी उपलब्ध हो गए हैं। पास में बाजार और बैंक की शाखा भी है। 

सरकार देती है मंदिर को दान - अब त्रिपुर सुंदरी मंदिर की पूरी व्यवस्था सरकार देखती है। हमें यह पता चला कि वामपंथी सरकार इस मंदिर के लिए हर महीने एक निश्चित राशि साफ सफाई और व्यवस्था के लिए जारी करती है। दरअसल इस मंदिर को राज्य सरकार अपने राज्य का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण मंदिर मानती है। इसलिए इसके सौंदर्यीकरण और इंतजामात पर सरकार की खास नजर रहती है। हमें मंदिर परिसर की सफाई व्यवस्था उत्तम कोटि की नजर आती है। 

यूपी के कन्नौज से आए थे पंडित - जब त्रिपुर सुंदरी का मंदिर बनकर तैयार हो गया तब उसमें पूजा के लिए योग्य पुजारी का संकट आया। तब त्रिपुरा के राजा ने उत्तर भारत से पंडित बुलाने का फैसला लिया। अपने विद्वान मंत्रियों की सलाह पर त्रिपुर सुंदरी मंदिर में पूजा के लिए महाराज ने तब उत्तर प्रदेशके कन्नौज से दो पंडित परिवारों को बुलाया। इन पुजारियों को सपरिवार  उदयपुर में बसाया गया।

तब कन्नौज से लक्ष्मी नारायण पांडे और गदाधर पांडे नामक दो पुजारी परिवार के साथ  यहां पहुंचे थे। अब उन दो परिवारों का कुनबा काफी बढ़ चुका है। इन्ही पुजारियों का परिवार माता त्रिपुर सुंदरी के मंदिर में पूजा पाठ करता है। ये था उत्तर और पूरब का सुंदर संगम।




कैसे पहुंचे - त्रिपुर सुंदरी का मंदिर उदयपुर शहर से पांच किलोमीटर आगे है।उदयपुर के बस स्टैंड से माताबाड़ी के लिए शेयरिंग आटोरिक्शा मिल जाते हैं। अगरतला से उदयपुर के लिए हमेशा बस और टैक्सी सेवा उपलब्ध है। अब उदयपुर अगरतला से रेल सेवा से भी जुड चुका है। माताबाड़ी के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन उदयपुर त्रिपुरा (UDPU) है। दूसरा निकटम रेलवे स्टेशन सबरूम लाइन पर गरजी (GARJI) है। 

कहां ठहरें -  उदयपुर शहर में मंदिर के पास ठहरने के लिए त्रिपुरा सरकार ने गुनाबती यात्री निवास भी बनवाया है। वैसे उदयपुर शहर में कई और रियायती होटल हैं जहां पर ठहरा जा सकता है।

मंदिर परिसर में प्रसाद की कई दुकाने हैं। यहां प्रसाद में मुख्य रूप से पेड़ा चढ़ाया जाता है। इनमें से एक है छत्रास्वरि पेड़ा भंडार। मैं इस दुकान में अपने जूते बैग आदि जमा करके दर्शन के लिए जाता हूं।  माता बाड़ी मंदिर परिसर में इस पेड़े वाले दुकानदार ने हमें उदयपुर और मंदिर के बारे में ढेर सारी रोचक जानकारियां दीं। हम उनका दिल से धन्यवाद  देना चाहेंगे। दूर देस में बहुत कम लोग मिलते हैं जो आपके साथ दिल से बातें करें और अच्छी अच्छी जानकारियां दें। 

उदयपुर में कई और मंदिर - माणिक्य राजाओं की राजधानी रहे उदयपुर में  गुणावती समूह के मंदिर और भुवनेश्वरी मंदिर भी देखा जा सकता है। भुवनेश्वरी देवी के मंदिर का जिक्र कविगुरू रविंद्र नाथ टैगोर के दो नाटकों में राजर्षि और विसर्जन में भी आता है।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य 


(TRIPURA, TRIPUR SUNDARI TEMPLE, UDAIPUR, SHAKTIPEETH ) 

Monday, January 27, 2014

अगरतला से कोलकाता वाया ढाका

अखौरा बार्डर पर शाम को मुझे यहां एक परिवार मिला जो ढाका से अगरतला आ रहा था। पूछने पर नौजवान भाई ने बताया कि अगरतला में मेरी मौसी का घर है। वास्तव में पूरी त्रिपुरा राज्य तीन तरफ से बांग्लादेश से घिरा हुआ है।

यह दूरी के लिहाज से भारत के सबसे दूरस्थतम राज्यों में से एक है। अगर हम दिल्ली से ट्रेन से अगरतला जाना चाहें तो 60 घंटे लग जाएंगे यानी कन्याकुमारी से भी ज्यादा। गुवाहाटी से लमडिंग होकर अगरतला का ट्रेन का सफर 24 घंटे का है।

अगर कोलकाता से अगरतला की दूरी की बात करें तो ये वाया गुवाहाटी, न्यू जलपाईगुड़ी होकर 1700 किलोमीटर से ज्यादा है। भारत के मानचित्र में अगर त्रिपुरा को देखें तो ये बांग्लादेश के उसपार दिखाई देता है। यानी कोलकाता की घड़ी में सुबह के दस बजते हैं तो ढाका में साढ़े दस और फिर से अगरतला पहुंचे तो दस बज जाते हैं। ये टाइम जोन की गड़बड़ी भी अगरतला में मालूम होती है। शेष भारत से पहले यहां सुबह होती है लेकिन घड़ी में समय दिल्ली वाला ही रहता है।

कोलकाता से अगरतला गुवाहाटी होकर 1700 किलोमीटर है लेकिन अगर ढाका होकर जाया जाए तो ये महज 400 किलोमीटर रह जाता है। इसलिए कोलकाता से बेनापोल बार्डर और ढाका और फिर अखौरा बार्डर से अगरतला होकर बस सेवा चलाई जा रही है। इस रास्ते से लोग अधिकतम 8 घंटे में अगरतला पहुंच जाते हैंलेकिन इस बस सेवा का लाभ उठाने के लिए आपके पास पासपोर्ट होना चाहिए। कोलकाता से सड़क मार्ग से लंबी दूरी होने के कारण ही अगरतला के लोग ट्रेन या बस के बजाय कोलकाता आने के लिए हवाई मार्ग का चयन करते हैं। ट्रेन से कोलकाता पहुंचने में 40 घंटे लग जाते हैं तो हवाई सफर महज 40 मिनट में पूरा हो जाता है।

 दरअसल पूरा पश्चिम बंगाल बांग्ला भाषी है और बांग्लादेश भी बांग्लाभाषी। लेकिन बांग्लादेश बनने के बाद बांग्लाभाषी त्रिपुरा कोलकाता से बहुत दूर हो गया। 1947 से पहले कोलकाता और अगरतला के बीच ऐसी देश की सीमा और इतनी दूरी नहीं थी। तभी तो कविगुरु टैगोर कोलकाता से ढाका और अगरतला चले जाते थे और सचिनदेव बर्मन अगरतला से कोलकाता आ जाते थे।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य  
 ( AGRTALA, KOLKATA, DHAKA, AKHAURA BORDER ) 


Sunday, January 26, 2014

अखौरा बार्डर – बांग्लादेश में आपका स्वागत है....

अगरतला में बांग्लादेश का चेकपोस्ट है जिसे अखौरा बार्डर कहा जाता है। अखौरा बार्डर इसलिए क्योंकि उस पार बांग्लादेश का कस्बा अखौरा है। अगरतला शहर के सिटी सेंटर बट्टला से अखौरा चेकपोस्ट की दूरी सिर्फ तीन किलोमीटर है। पैदल या आटोरिक्शा से जाया जा सकता है। अखौरा बार्डर से ढाका के लिए आवाजाही होती है। यहां से ढाका तीन घंटे का ही रास्ता है।


अगरतला से ढाका की दूरी 140 किलोमीटर के आसपास है। अखौरा चेकपोस्ट से बांग्लादेश और भारत के बीच कई वस्तुओं की तिजारत भी होती है। आजकल बांग्लादेश से अगरतला की ओर ट्रकों से मछलियां और सड़क निर्माण में प्रयुक्त होने वाली गिट्टी मंगाई जा रही है।


भारत बांग्लादेश के बीच सड़क मार्ग से प्रवेश और व्यापार का दूसरा रास्ता पश्चिम बंगाल में बेनापोल बार्डर है। इन दोनों ही सीमाओं पर शाम को बीटिंग रीट्रिट की रस्म अदा की जाती है। हालांकि ये रस्म अमृतसर के पास अटारी में वाघा बार्डर पर अदा की जाने वाली रस्म जैसी नहीं होती। यहां पाकिस्तान की तरह सीमा पर ज्यादा तनाव नहीं दिखाई देता। लोगों की भीड़ भी ज्यादा नहीं उमड़ती। यूं कहें कि बांग्लादेश की सीमा पर दोस्ताना माहौल ज्यादा है बनिस्पत के पाकिस्तान की सीमा के।


अखौरा बार्डर पहुंचने पर बार्डर सिक्योरिटी फोर्स के जवान तैनात दिखाई देते हैं। कस्टम और एक्साइज विभाग के दफ्तर बने हैं। साथ ही बांग्लादेश आने जाने वालों की औपचारिकताएं पूरी करने के लिए स्वागत कक्ष और दफ्तर बने हुए हैं।


हर रोज कुछ लोग सीमा देखने पहुंचते हैं। इसके साथ ही बड़ी संख्या में लोग पासपोर्ट वीजा जैसी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद भारत या बांग्लादेशमें प्रवेश करते हैं।

जरूरी जांच पड़ताल के बाद दोनों देशों की ओर से माल ढुलाई वाली ट्रकों की आवाजाही भी होती है। यहां तैनात बीएसएफ के जवानों और अधिकारियों का व्यवहार काफी अच्छा है। वे सीमा पर पहुंचने वालों के साथ बड़ी ही शालीनता से पेश आते हैं। सीमा पर रामानंद सागर की प्रसिद्ध फिल्म आंखे का गीत बड़े से बोर्ड पर अंकित किया गया है।
 उस मुल्क की सरहद को को कोई छू नहीं सकता...जिस मुल्क पर निगेहबान है आंखें।

सीमा के उस पर लगे बोर्ड पर लिखा है बांग्लादेशमें आपका स्वागत है। तो इस पार लिखा है वेलकम टू इंडिया। बांग्लादेश शून्य किलोमीटर। अगरतला 03 किलोमीटर। मैं बांग्लादेश शून्य किलोमीटर के बोर्ड के पास खड़ा होकर तस्वीरें खिंचवता हूं। एक पांव और आगे बढ़ाऊं तो हिंदुस्तान से बाहर बांग्लादेश में प्रवेश कर जाउंगा। पर अभी नहीं फिर कभी सही। 
वापसी में मुझे कुछ परिवार मिलते हैं जो बांग्लादेश से त्रिपुरा में अपने रिश्तेदारों के घर चलकर आए हैं। अगरतला से ढाका या बांग्लादेश जाने के लिए वीजा पाने की प्रक्रिया अब आसान हो गई है। 


-    विद्युत प्रकाश मौर्य
( AKHAURA BORDER, BANGLADESH ) 


Saturday, January 25, 2014

अगरतला का दिल - हरिगंगा बसाक रोड

अगरतला शहर का दिल है हरिगंगा बसाक रोड। शहर का मुख्य और सबसे व्यस्त बाजार। शहर के बट्टला चौक से ये सड़क शुरू होती है कमान चौमुहानी पर जाकर समाप्त होती है। बीच में पोस्ट आफिस चौमुहानी आती है। अगरतला पुलिस का मुख्यालय इसी सड़क पर है। चौड़ी सड़क के दोनो तरफ मुख्य बाजार और शोरूम है। अगरतला पूरी  तरह बंगाली शहर है। सौ फीसदी लोग बांग्ला बोलते नजर आते हैं। बट्टला चौराहा से आगे बढ़े तो इस सड़क पर अगरतला सिटी सेंटर बना है जो शहर का प्रमुख मार्केटिंग कांप्लेक्स है।

शहर
 में बिकने वाले सभी अखबार बांग्ला के हैं। स्थानीय आवाजाही के लिए आटो रिक्शा चलते हैं। वैसे अब टाटा मैजिक और सिटी बसें भी  गई हैं। हरिगंगा बसाक रोड जिसे एचजीबी रोड भी कहते हैं इस पर बना है अगरतला सिटी सेंटर जो पब्लिक प्राइवेट पार्टनशिप में बना शहर का मॉल है। इसी रोड पर सीपीएम का दफ्तर ( कानून सन्याल भवन) और कांग्रेस पार्टी का दफ्तर और पुलिस हेडक्वार्टर भी है।



एचजीबी रोड पर सभी प्रमुख ब्रांड के शोरुम खुल गए हैं। मोबाइल फोन, कैमरे, लैपटाप की मंहगी दुकाने, ट्रैवेल एजेंटों के दफ्तर, होटल, रेस्टुरेंट सब कुछ इस सड़क पर है। शहर के किसी भी कोने में जाने के लिए आपको आटो रिक्सा यहीं से मिल जाएंगे।
शहर के बीचोबीच ही हावड़ा नदी बहती है जिसका पानी गंदला हो चुका है। एचजीबी रोड शहर का पुराना इलाका है। शहर का ज्यादा विस्तार अब एयरपोर्ट रोड की तरफ हो रहा है। उसी तरफ नया सचिवालय और प्रमुख सरकारी दफ्तर हैं।

देर रात तक खुलते हैं बाजार - अगरतला में हालात इंफाल या कोहिमा जैसे नहीं हैं। यहां एचजीबी रोड पर दुकानें रात 10 बजे के बाद तक खुली हुई हैं। रात 12 बजे तक भी लोग सड़कों पर आवाजाही कर रहे हैं। एचजीबी रोड पर बट्टला चौक के पास ही होटल राज पैलेस मेरा ठिकाना बना। यह साफ-सुथरा अच्छा होटल है। दरें भी वाजिब हैं। रेस्टोरेंट नहीं है पर खाने पीने की सेवाएं देते हैं। वैसे इस रोड पर सिटी पैलेस, रामजी पैलेस जैसे कई और होटल हैं। होटलों का चेकआउट टाइम 12 बजे दोपहर का है।
अगरतला शहर की आबादी चार लाख के आसपास है। शहर में ठंड बहुत कम है। अगरतला का मौसम सदाबहार कहा जाता है। तभी ये शहर कवि गुरू रविंद्रनाथ टैगोर को काफी पसंद थ। गर्मियों में ज्यादा गर्मी भी नहीं पड़ती तो ठंड में ज्यादा ठंड भी नहीं लगती।



यहां आप बांग्लादेशी उत्पादों की सस्ती शापिंग कर सकते हैं। बट्टला चौराहा के पास सब्जी बाजार और सस्ते कपड़ों का बाजार है। वहीं एचजीबी रोड पर और शकुंतला रोड पर प्रमुख शोरूम और दूसरे बाजार हैं। 

-    विद्युत प्रकाश मौर्य

होटल राज पैलेस – ( 0381-2319281, 9436122845 ) होटल रामजी पैलेस, होटल सिटी पैलेस। 


HARI GANGA BASAK ROAD  AGARTALA) 

Friday, January 24, 2014

अगरतला पैसेंजर से त्रिपुरा की ओर (( त्रिपुरा -01 ))

सटर-पटर...सटर-पटर...सटर-पटर...अगरतला पैसेंजर अपनी रौ में आगे बढ़ती जा रही है। आने वाला हर रेलवे स्टेशन हमारे लिए नया। इसलिए मेरा पूरा ध्यान बांई और दांई तरफ खिड़की के बाहर है। असम के गांव, घर खेत खलिहान दिखाई दे रहे हैं जो एक एक कर पीछे छूटते जा रहे हैं। 

हमारे साथ अगरतला जा रहे शमीम साहब कहते हैं देखिए हर घर के आगे एक तालाब जरूर बना हुआ है। घर के लोग अपनी पानी की दैनिक जरूरतें अपने घर के आगे बने तालाब से ही पूरी करते हैं। उसमें बरतन धोना
, कपड़े धोना नहाना सब कुछ। तांबूल के पेड़ बहुतायत हैं। कहीं कहीं घाटियां आ जाती हैं तो कहीं कहीं-कहीं पहाड़ों को काटकर बनाई गई सुरंगें। जहां तक आपकी नजर जाती है हरितिमा का विस्तार नजर आता है। कुदरत के कैनवस पर बनी अद्भुत पेंटिंग जिसे देखते हुए जी नहीं भरता। ट्रेन तो ऐसे कुलांचे भर रही है मानो डीजल से नहीं हरे भरे मौसम से चार्ज होकर ऊर्जा प्राप्त कर रही हो। 


चुराईबाड़ी- त्रिपुरा का पहला रेलवे स्टेशन। 

इलाके के लोगों की लंबे संघर्ष के बाद साल 2008 में अगरतला रेल नेटवर्क पर आया। इससे पहले कुमार घाट तक ही रेल आती थी। ये लाइन अभी मीटरगेज है। इसे ब्राडगेज करने का काम भी अब तेजी से चल रहा है। और आ गया चुराईबाड़ी। ये त्रिपुरा में प्रवेश करने के बाद पहला रेलवे स्टेशन है। इसके बाद धर्मनगर, कुमारघाट और मनु जैसे प्रमुख स्टेशन आते हैं। धर्मनगर के पास बारामूरा सुरंग आती है जो 1126 मीटर लंबी है। ट्रेन अपने निर्धारित समय 17.35 से 10 मिनट पहले ही अगरतला पहुंच गई। 
अगरतला रेलवे स्टेशन का भवन। 

अगरतला रेलवे स्टेशन की सफेद की रंग की लंबी चौड़ी इमारत राजभवन जैसी लगती है। इसे बाहर से उज्ज्यंत पैलेस के जैसा बनाया गया है। शहर का मुख्य चौराहा बट्टला यहां से 5 किलोमीटर आगे है। रेलवे स्टेशन से शेयरिंग आटो रिक्शा मिल जाते हैं। अगरतला से 110 किलोमीटर आगे सबरूम तक रेलमार्ग के विकास का काम तेजी से चल रहा है। कुछ सालों में त्रिपुरा हर हिस्से में रेल होगी। अगरतला से बांग्लादेश के बार्डर अखौरा को भी रेल से जोड़ा जा रहा है। इस मार्ग से बांग्लादेश की राजधानी ढाका भी रेल नेटवर्क से जुड़ जाएगी।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य        (यात्राकाल - दिसंबर 2013 )  
( कुमारघाट, धर्मनगर, मनु, बारामूरा सुरंग , AGARTALA, KUMARGHAT, DHARMNAGAR, MANU, BARAMURA TUNNEL ) 


Marinos Guest house, M -8414953484 ( near railway stn.)  


Thursday, January 23, 2014

कब खत्म होगा मणिपुर में उग्रवाद

इंफाल में सैनिक स्कूल के एक मणिपुरी छात्र के साथ। 
पूर्वोत्तर के कई राज्यों में उग्रवादी संगठन शांत पड़ गए हैं पर मणिपुर में कई संगठन अभी भी उत्पात मचा रहे हैं। कोहिमा के शहीद स्थल वार सिमेट्री में मेरी मुलाकात एक मणिपुरी युवक से हुई। उसने ओडिशा के सैनिक स्कूल में कई साल पढ़ाई की थी। युवक ने कहा, हमारे मणिपुर के गांव गांव सुंदर हैं। पर कई इलाकों में उग्रवाद के कारण बाहर से सैलानी वहां नहीं पहुंच पाते।

मणिपुर में छोटे बड़े करीब तीन दर्जन उग्रवादी संगठन सक्रिय हैं। इनमें कूकी नेशनल आर्मी (केएनए) कूकी नेशनल फ्रंट ( केएनएफ) और कूकी लिबरेशन आर्मी ( केएलए) कूकी नेशनल आर्गनाइजेशन प्रमुख हैं। दूसरे सक्रिय संगठनों में यूनाइटेड रेवोल्यूशनरी फ्रंट’ (यूआरएफ), पीपुल्स रेवोल्यूशनरी पार्टी ऑफ कांगलीपाक और कांगलेई यावोल कानलुप, कंगलीपाक कम्युनिस्ट पार्टी पखांगलाक्पा (केसीपी-पी) प्रमुख हैं। मणिपुर में कूकी जनजाति के लोग भी अलग राज्य की मांग कर रहे हैं।  कूकी लोगों की पुरानी मांग है कि सेनापति जिले के सदर हिल्स अनुमंडल को एक अलग जिला बना दिया जाए जबकि नगा जनजाति के लोग इस मांग का शुरू से ही विरोध कर रहे थे। कूकी जनजाति के संगठन कई बार अपने लिए अलग राज्य की मांग करते हुए आंदोलन की धमकी देते हैं।



साल 2013 की बात करें तो हर महीने राज्य में कहीं न कहीं कोई उग्रवादी वारदात की घटना जरूर सुनने में आई है। अब शासन की कड़ाई के बाद बड़ी संख्या में उग्रवादी संगठनों के सदस्य पकड़े जा रहे हैं या फिर सरेंडर कर रहे हैं। हालांकि राज्य में नागालैंड की तरह शांति वार्ता की प्रक्रिया नहीं शुरू हो सकी है। तीन दर्जन गुटों को शांति प्रक्रिया के लिए एक छतरी के नीचे लाना सरकार के लिए मुश्किल काम है।
राज्य में तीन प्रमुख जनजातियां नागा, कूकी और मैतेई  हैं। मैतेई लोग वैष्णव हिंदू धर्म को मानते  हैं। लंबे समय से चले आ रहे नागा कूकी संघर्ष का खामियाजा मणिपुर के लोगों को भुगतना पड़ा है।
सिलचर तक टैक्सी में साथ सफर कर रहे एक मणिपुर पुलिस के जवान आशावादी नजरिए से कहते हैं। कोई उग्रवादी भी अब अपने बच्चे को उग्रवाद की आग में नहीं झोंकना चाहता। वह चाहता है कि उसकी अगली पीढ़ी मुख्य धारा में जुड़े और अपना भविष्य संवारे।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य  
(  (MANIPUR, INSURGENCY, ARMED CONFLICT ) 


Wednesday, January 22, 2014

मणिपुर के अमर शहीद - पाओना ब्रजबाशी


मेजर जनरल पाओना ब्रजबाशी मणिपुर के इतिहास में सबसे बड़े शहीद हैं जिन्होंने ब्रिटिश आर्मी के खिलाफ लड़ते हुए खोंगजोम के युद्ध में अपने प्राणों की आहुति दी।

पाओना ब्रजबाशी की विशाल प्रतिमा मणिपुर की राजधानी इंफाल और जिरिबाम शहर में लगाई गई है। हर साल उनकी शहादत को राज्य के लोग बड़ी श्रद्धा से याद करते हैं और उनकी प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करते हैं।

मणिपुर दो हजार साल से स्वाधीन राज्य रहा। यहां के राजाओं ने हिंदू वैष्णव धर्म अपनाया था। पर 1891 में अंग्रेजों ने धोखे से मणिपुर को अपने सम्राज्य में मिलाने की कोशिश की। महाराजा चंद्रकीर्ति के मृत्यु के बाद राज कुमारों में एकता के अभाव में ब्रिटिश शासन को मणिपुर पर कब्जा करने का मौका मिल गया। हालांकि ब्रिटिश सेना के नापाक इरादे के खिलाफ मैतेई योद्धा बहादुरी से लड़े पर खेत रहे। 1891 का आंग्ल मणिपुर युद्ध जिसे खोंगजोम युद्ध भी कहते हैं मणिपुर के इतिहास में काफी अहम महत्व रखता है। मेजर जनरल पाओना ब्रजबाशी ने युद्ध में अपनी सेना के साथ अंग्रेजों का बहादुरी से मुकाबला किया। पर 23 अप्रैल को वे शहीद हो गए। पाओना ब्रजबाशी का जन्म 1933 में हुआ था। उन्हें मणिपुर में शहीदे आजम का दर्जा है।



अंग्रेजी सेना ने मणिपुर को तीन तरफ से घेरा था। कोहिमा की तरफ से माओ गेट पर सिलचर की तरफ से जिरिबाम में और बर्मा की ओर से तमू में।

अंतिम मुकाबला खोंगजोम में हुआ। खोंगजोम इंफाल से 40 किलोमीटर आगे है। यहां इंफाल से 28 किलोमीटर दूर खेबाचिंग में खोंगजोम वार मेमोरियल का भी निर्माण हुआ है। यहां युद्ध की यादों को संजोया गया है। हर साल 23 अप्रैल को उनकी शहादत को याद किया जाता है।
 आंग्ल मणिपुर युद्ध को भारतीय इतिहास में अति महत्वपूर्ण युद्ध में गिना जाता है। अंग्रेजों के साथ युद्ध में पराजय के बाद 27 अप्रैल 1891 को मणिपुर प्रिंसले स्टेट के तौर पर ब्रिटिश सम्राज्य का अंग बन गया।
   विद्युत प्रकाश मौर्य
(MANIPUR, SHAHEED, ANGLO MANIPUR WAR ) 

Tuesday, January 21, 2014

नूंगबा में दोपहर की मणिपुरी थाली ((05))

 इंफाल जिरीबाम हाईवे पर पांच घंटे के लगातार सफर के बाद दोपहर के दो बज गए हैं। अब पेट में चूहे कूदने लगे हैं और सफर है कि खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। एक छोटा सा कस्बा आता है नूंगबा। गले में आई कार्ड लटकाए एक मणिपुरी युवक गाड़ी को पार्क करने का इशारा करता है। नूंगबा में टैक्सियां भोजन के लिए रुकती हैं। नूंगमा मणिपुर के तामेंगलांग जिले की तहसील है। हमारी टैक्सी मैतेई होटल के सामने रूकी।
यहां के होटल में खाने के मीनू में मछली, चिकेन आदि था। शाकाहारी विकल्प भी मौजूद था। हमने शाकाहारी थाली मंगाई 70 रुपये की थाली। खाने में चावल, गाढी दाल, सब्जी, सलाद आदि था। कोई भी चीज आप चाहें जितना खाएं। यानी खाना अनलिमिटेड। भूख लगी थी सो जमकर खाया। ये परवाह न करते हुए कि आगे भी अभी आधे दिन का सफर टैक्सी से करना है। हमारे साथ चल रही दो बालाओं ने पहाडी रास्ते में उल्टी होने के डर से नहीं खाया। पर हमारे ड्राइवर साहब बडे संयमित ढंग से गाड़ी चला रहे थे सो मैं उल्टी न होने को लेकर आश्वास्त था।



नूंगबा बाजार के इस होटल को एक मणिपुरी ब्राह्मण परिवार चलाता है। ये लोग कबीर पंथियों की तरह गले में कंठी माला धारण करते हैं। पर ये शाकाहारी नहीं होते। पूरा परिवार मिलकर इस होटल को चलाता है। होटल वाले का व्यवहार अच्छा है। खाने के बाद आगे का सफर शुरू हुआ। शाम गहराने लगी। जिरीबाम निकट आने के साथ एक बार फिर अच्छी सड़कों के दर्शन हुए।

रास्ते में एक जगह चेकपोस्ट पर गाड़ी रूकी। वहां मणिपुरी बालाएं अनानास बेच रही थीं। पूरे पूर्वोत्तर में अनानास खूब सस्ता है। मैंने यहां भी अनानास खरीद कर खाया। खाते ही मैं बोला –अरे ये तो खट्टा है। मणिपुरी बाला ने तपाक से जवाब दिया हमने भी कोई चखकर थोड़े देखा है।
जिरीबाम से पहले सड़क थोड़ी बेहतर नजर आई। 

जिरीबाम पहुंचने की आहट नहीं आई थी पर सड़क पर अंधेरा गहरा गया था। जिरीबाम से पहले हाईवे पर आठ किलोमीटर लंबी ट्रकों की लाइन लगी थी।जाम के बीच जंगल में ट्रकों के चालक स्टोव पर अपना भोजन बनाने में व्यस्त थे। हमारे टैक्सी ड्राईवर ने बताया कि यहां सालों भर जाम के हालात रहते हैं। ट्रक खड़े पर थे, पर टैक्सी जैसी छोटी गाड़ियों को रास्ता मिल पा रहा था। इंफाल से जिरीबाम के 220 किलोमीटर के रास्ते में कोई ऐसा बड़ा शहर या कस्बा नहीं आता जहां कोई आवासीय होटल भी हो। शाम को 6 बजे के बाद गाड़ी जिरीबाम पहुंची तो थोड़ी राहत महसूस हुई। हालांकि अंधेरा गहरा चुका था। पर हमारे टैक्सी वाले ने कह दिया कि वह आगे नहीं जाएंगे। हमने किराया सिलचर तक का भरा था सो उन्होंने हमें आगे किसी और टैक्सी वाले हवाले कर दिया। जिरीबाम से सिलचर का रास्ता समतल है। 


-    विद्युत प्रकाश मौर्य
( IMPHAL TO SILCHAR -5, JIRIBAM, NUNGBA, MAITAI HOTEL, TAMENGLONG )

Monday, January 20, 2014

मणिपुर में संतरे का कटोरा - तामेंगलांग ((04))


हमारी टैक्सी मणिपुरी शाल के कस्बे तुपुल को पार करती हुई नोनी पहुंची। यहां भी चेकपोस्ट था। नोनी नुंगबा तहसील का एक छोटा सा गांव है। जांच औपचारिकताओं के बाद हम आगे बढ़े। करीब 110 किलोमीटर की दूरी पर आया खोंगसांग नामक गांव। स्थानीय महिलाएं सड़कों के किनारे संतरे बेच रही थीं। यह तामेंगलांग जिले का गांव है। यहां से एक रास्ता जिला मुख्यालय तामेंगलांग के लिए जा रहा था। 

तामेंगलांग मणिपुर के नौ जिलों में से एक जिला है जिसे प्रकृति ने अद्भुत सौंदर्य से संवारा है। एक ऐसा जिला जहां सैलानियों की नजर कम पड़ी है। ये मणिपुर का पूर्ण जनजातीय जिला है।
यहां पांच तरह की नागा और कूकी जनजातियां बसती हैं। बल खाती बराक नदी की सुरम्य घाटियां, घने जंगल, पहाड़, झरने, संतरे, हल्दी और दूसरे वनोत्पाद तामेंगलांग की खासियत है। जिले के 40 फीसदी हिस्से में संतरे की खेती होती है। रास्ते में दूर दूर तक संतरे के बगान नजर आते हैं। पूरे मणिपुर का 80 फीसदी संतरा तामेंगलांग जिले में उत्पादित होता है। इसलिए इसे मणिपुर के संतरे का कटोरा कहा जाता है। जिले का अधिकतम तापमान 30 डिग्री और न्यूनतम 4 डिग्री सेल्सियस के बीच रहता है जो संतरे की खेती के लिए आदर्श है।




दिसंबर में आरेंज फेस्टिवल-  हर साल दिसंबर महीने में जिला मुख्यालय में आरेंज फेस्टिवल का आयोजन किया जाता है। इस मेले में बेहतरीन संतरा उत्पादन करने वाले किसानों को पुरस्कृत भी किया जाता है। इस मेले में जिले के 200 से ज्यादा संतरा उत्पादक किसान हिस्सा लेते हैं। जिले किसानों को आर्गेनिक फार्मिंग का भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
सरकार की संस्था मणिपुर स्माल फारमर एग्रो बिजनेस कांसोरटियम किसानों को प्रशिक्षण और उनके उत्पादों की मार्केटिंग में मदद के सिलसिले में काम कर रही है। मणिपुर के अलावा संतरे की बड़े पैमाने पर खेती मेघालय में भी होती है, पर इस क्षेत्र के उत्पादित संतरोंकी मार्केटिंग बड़े पैमाने पर नहीं हो पा रही है।


तामेंगलांग जिला देश के उन क्षेत्रों में शामिल है जो देश आजाद होेने के बाद सड़क मार्ग से भी कहीं से नहीं जुड़ा हुआ था। यह जिला 1957 में इंफाल से सड़क मार्ग से जुड़ा। पर आज भी सड़कों की हालत दयनीय है। इन राज्यों में हाईवे की हालत में सुधार होने और रेल नेटवर्क बेहतर होने के बाद तामेंगलांग के संतरे के भी दिन बहुरेंगे।
खोंगसांग से हमारी गाड़ी आगे बढ़ी। चलते चलते बराक नदी पर पुल आया जो काफी जर्जर हाल में था। यहां सभी यात्रियों को उतरना पड़ा। गाड़ी लकड़ी के पुल पर धीरे धीर आगे बढ़ी। यहां नए स्थायी पुल का निर्माण कार्य जारी है।
-विद्युत प्रकाश मौर्य

( तुपुल, नोनी, खोंगसांग, तामेंगलांग, बराक नदी, संतरा, नुनंगबा, TAMENGLONG, ORANGE, MANIPUR, TUPUL )



( IMPHAL TO SILCHAR 4)