Monday, January 13, 2014

मणिपुर में बसता है बड़ा भोजपुरी समाज

मणिपुर की राजधानी इंफाल में गांधी जी की प्रतिमा। 
इंफाल के एमजी एवेन्यू की सुहानी सुबह। सड़क पर टहलते हुए कान में गूंजती है खालिस भोजपुरी आवाज। फुटपाथ पर बैठा एक मजदूर अपने मोबाइल फोन से खांटी भोजपुरी में गांव में बैठी अपनी लुगाई से खेतीबाडी का हिसाब ले रहा था। वह अपनी पत्नी को खेतों में डाले जाने वाले खाद बीज के बारे में निर्देश जारी कर रहा था। यानी नौकरी मणिपुर में और रोज खबर लेना घर की।

बड़ी संख्या में मणिपुर कोने कोने में रहने वाले मजदूर मोबाइल फोन के कारण अब 24 घंटे अपने परिवार के संपर्क में रहते हैं। लेकिन दो तीन दशक पहले ये बहुत मुश्किल था। चाहे सेनापति हो, इंफाल हो या फिर चूड़ा चांदपुर हर जगह भोजपुरी भाई फैले हुए हैं। खेतों में मजदूरी करने वाले, शहर के होटलों में काम करने वाले, रूई धुनने वाले तो राज मिस्त्री का काम करने वाले हर क्षेत्र में बिहार के लोग यहां दिखाई देते हैं। तो बड़े उद्योग धंधों में भी यूपी बिहार के लोगों का अच्छा खासा हस्तक्षेप है।

गोरखपुर के गुप्ता जी मणिपुर में गल्ले की दुकान चलाते हैं। तो शाहपुर पटोरी के यादव जी की मिठाई की दुकान इंफाल में लोकप्रिय है।

एमजी एवेन्यू के टूर एंड ट्रेवल एजेंट के दफ्तर के बाहर बड़ी भीड़ लगी है। लोग अपने घर जाने के लिए डिमापुर तक के लिए टैक्सी और बस के टिकट बुक कराने में लगे हैं। इंफाल से कोहिमा का किराया 450 रुपये प्रति व्यक्ति हो गया। आगे का सफर तो ट्रेन से करना ही है। लेकिन क्या करें साल में एक या दो बार घर जाना भी तो जरूरी है।

गुवाहाटी रेलवे स्टेशन पर एक भाई आकर पूछते हैं – डिमापुर जाए खातिर ट्रेन कब मिली। मैंने तपाक पूछा – आगे कहंवा जाए के बा। जवाब मिला- चूड़ा चांदपुर। सालों से चूड़ा चांदपुर में रहकर मेहनत मजदूरी कर रहे हैं। मणिपुर में भी कई तरह की चुनौतियां लेकिन यहां दिल लग गया तो अब और कहां जाएं।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य 

(IMPHAL, BHOJPURI, DIMAPUR)


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