Monday, December 2, 2013

नील पर्वत वासिनी मां कामाख्या

गुवाहाटी शहर में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे नील पर्वत पर मां कामाख्या निवास करती हैं। ऊंचाई पर स्थित मांके मंदिर को देखकर लगता है मानो यहां से पूरे शहर को आशीष दे रही हों।  कहा जाता है जो व्यक्ति गुवाहाटी गया और मां के दर्शन करने नहीं पहुंचा उसे मां कहीं भी हो बुला लेती हैं। देश भर के हिंदू समाज में मां कामाख्या को लेकर गजब की आस्था है। इसलिए मंदिर में सालों भर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगी रहती है।

सती की योनि गिरी थी यहां - यह मंदिर शक्ति की देवी सती का है। कहा जाता है शिव के तांडव नृत्य के दौरान यहां सती की योनि गिरी थी। इसलिए यहां मां के दर्शन योनि स्वरूप में होते हैं। पुराणों के अनुसार जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे,  वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आए। इसलिए ये माता के 51 शक्तिपीठों में से एक है। हिन्दूओं के प्राचीन 51 शक्तिपीठों में कामाख्या शक्ति पीठ को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। ये मंदिर जो असम राज्य के समृद्ध ऐतिहासिक विरासत की दास्तां बयान करता है। तो यह पवित्र मंदिर असम शहर का हृदय है। कामाख्या मंदिर देश भर में तंत्रमंत्र साधना के लिए भी विख्यात है। इसी तरह की साधना उत्तर प्रदेश के विंध्याचल में मां विंध्यवासिनी देवी के मंदिर में भी की जाती है।


नीलांचल पर्वत को कामगिरी पर्वत भी कहते हैं। मां कामाख्या मंदिर का दर्शन करने के बाद श्रद्धालुओं को असम के वैभव और शक्ति का अहसास हो जाता है। वर्तमान में भव्य एवं प्रभावोत्पादक मां कामाख्या का जो  मंदिर है वह वर्ष 1565 ई. का बना हुआ है। इसे कूच बिहार के महाराजा विश्व सिंह और उनके पुत्र नर नारायण सिंह ने बनवाया था। ऐसा विवरण मिलता है कि मां के प्राचीन मंदिर को 1564 ई में बंगाल के कुख्यात कला विध्वंसक काला पहाड़ ने तोड़ दिया था।

ऐसा माना जाता है कि मां कामाख्या में स्थित देवी-दर्शन पूजन किए बिना यदि कोई असम छोड़ कर स्थाई रूप से देश के किसी अन्य भाग में बस जाना चाहता है तो मां कामाख्या उसे अपने पास सात बार बुला लेती हैं।

अंबुवाची पर्व पर बंद होते हैं कपाट - विश्व प्रसिद्ध शक्तिपीठ कामाख्या मंदिर के पट अंबुवाची पर्व के मौके पर तीन दिनों के लिए बंद कर दिए जाते है। कहा जाता है कि इस दौरान देवी मां रजस्वला होती हैं। तब मंदिर परिसर में बड़ा मेला लगता है। इसे पूरब का महाकुंभ कहा जाता है। इस चार दिवसीय मेले के दौरान हर साल देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं।​ हालांकि कामाख्या मंदिर परिसर में अभी भी बलि दी जाती है। देश के कई मंदिरों में ये प्रथा बंद हो चुकी है लेकिन यहां बदस्तूर जारी है।
मां का मंत्र - 
कामाख्ये वरदे देवी नील पर्वत वासिनी।
त्वं देवी जगतं माता योनि मुद्रे नमोस्तुते।।

-    - - विद्युत प्रकाश मौर्य
( ( MAA KAMAKHYA TEMPLE, SHAKTIPEETH, GUWAHATI, ASSAM ) 





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