Tuesday, December 31, 2013

नगाओं का देस - नागालैंड – मिथ और हकीकत

मेरा नागालैंड का दौरा अच्छी और यादगार स्मृतियां लिए हुए समाप्त हुआ। जब मैंने दिल्ली से चलने से पहले एक संस्थान के निदेशक के सामने नागालैंड जाने की इच्छा जताई थी तो उन्होंने मुझे इस राज्य में जाने की सलाह देते हुए कहा था कि मैंने सुना है वहां इंसानों का भी शिकार होता है। (मैन हंटिग)। वे पढ़े लिखे सख्श हैं और ऐसा विचार रखते हैं तो आम आदमी की बिसात। लेकिन नागालैंड काफी बदल चुका है और तेजी से बदल रहा है। हालांकि 1963 में बने इस राज्य की कई राजनैतिक समस्याएं हैं जिसका हल नहीं निकाला जा सकता है। पर पिछले दो दशक से नागालैंड में युद्ध विराम के हालात हैं। इसलिए राज्य में आमतौर पर शांति है।
बेधड़क घूम सकते हैं नागालैंड - आप एक सैलानी के तौर पर यहां घूम सकते हैं। जरूरत है कि हम भी पूर्वोत्तर के इस राज्य के बारे में अपना नजरिया बदलें। नागालैंड के लोग खुद्दार हैं। खुद सम्मान पाना चाहते हैं और सामने वाले का सम्मान करते हैं। महिलाओं के सम्मान के मामले में तो ये राज्य दिल्ली से काफी आगे है। यहां कोई अकेली महिला दिन या रात में घूमे उसके साथ छेड़छाड़ या बलात्कार जैसी घटनाएं सुनने को नहीं मिलेंगी।

नागालैंड में क्या देखें - अगर आप नागालैंड घूमने का कार्यक्रम बना रहे हैं तो कम से कम 5 दिन रखे यहां के लिए तो अच्छा रहेगा। अब नागालैंड टूरिज्म और उससे सबंद्ध आपरेटर सैलानियों के लिए नागालैंड का टूर पैकेज भी बना रहे हैं। नागालैंड में आप डिमापुर कोहिमा के अलावा भी कुछ स्थलों को देखने जा सकते हैं। 
खोनामा और मोकोचुंग भी सैलानी जाते हैं। खोनामा की ग्रीन विलेज की दूरी कोहिमा से 20 किलोमीटर है। किसामा नागालैंड का हेरिटेज विलेज है। इसके अलावा तोफेमा टूरिस्ट विलेज भी जाया जा सकता है। म्यांमार सीमा पर  अनूठे गांव लोंगवा की सैर कर सकते हैं। इस गांव का आधा हिस्सा म्यांमार में तो आधा भारत में है। अब बात करते हैं नागालैंड के मुख्यमंत्री रियो के एक बयान की जो मुझे एक अखबार में पढ़ने को मिला था।

नेफियो रियो, मुख्यमंत्री, नागालैंड ( फोटो सौ - लाइव मिंट) 
पूर्वोत्तर के बारे में बहुत कम जानते हैं देशवासी : रियो
नागालैंड के मुख्यमंत्री नेईफुई रियो ने कहते हैं कि देश के बाकी हिस्से के लोग पूर्वोत्तर के राज्यों के बारे में कम जानते हैं। उन्हें पूर्वोत्तर को समझने तथा यहां के लोगों को यह जताने की आवश्यकता है कि वे भारत के हिस्सा हैं। नागालैंड की राजधानी कोहिमा के नजदीक किसामा गांव में इलेक्ट्रिक यंग लीडर्स कनेक्ट-2 सम्मेलन को शनिवार को सम्बोधित करते हुए रियो ने कहा,  यह सच है कि देश के बाकी हिस्से के लोग इस क्षेत्र के बारे में बहुत कम जानते हैंजोकि निश्चित तौर पर भारत ही हैलेकिन दुर्भाग्यवश एक असमान भारत है।
उन्होंने कहा, "इस क्षेत्र के केवल एक प्रतिशत लोग ही देश की मुख्यधारा से जुड़े हैंजबकि हमारी 99 प्रतिशत भौगोलिक सीमा अंतर्राष्ट्रीय है। इस क्षेत्र के लोग शेष भारत से जुड़ने में जिस दूरीविलगाव तथा उपेक्षा का अनुभव कर रहे हैंवह राष्ट्रीय चिंता का विषय है।  (21 अक्तूबर 2012 देशबंधु से साभार )

इसके साथ ही अब नागालैंड को अलविदा, इस वादे के साथ फिर फिर यहां आने की इच्छा बनी रहेगी। आप भी कुछ दिन गुजारें पूर्वोत्तर के इस स्वीटरजरलैंड में।
 -- विद्युत प्रकाश मौर्य

 ( NAGALAND, KOHIMA, TOURISM, STATE ) 


Monday, December 30, 2013

नागालैंड – यानी लैंड ऑफ फेस्टिवल्स

फोटो सौ - http://www.hornbillfestival.com/
पूर्वोत्तर के नागालैंड राज्य की टैगलाइन ही नागालैंड लैंड आफ फेस्टिवल्स। इस राज्य की खास बात है कि यहां सालों भर हर महीने कोई न कोई उत्सव मनाया जाता है। पर इनमें हर साल दिसंबर के पहले हफ्ते में मनाया जाने वाला उत्सव  हार्नबिल फेस्टिवल सबसे बड़ा उत्सव है। ये एक अंतरराष्ट्रीय उत्सव है जिसमें नागालैंड की संस्कृति का हर रंग देखने को मिलता है।

इस
 मौके पर  सिर्फ देश से बल्कि बांग्लादेशम्यामांरतिब्बत और चीन से लोग भी उत्सव में हिस्सा लेने कोहिमा पहुंचते हैं। साल 2013 के हार्निबल फेस्टिवल का उदघाटन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने किया। कोहिमा शहर से 12 किलोमीटर आगे इंफाल रोड पर किसमा गांव में हार्नबिल उत्सव का आयोजन हर साल एक से 7 दिसंबर तक होता है। पर इसकी तैयारी काफी पहले से आरंभ हो जाती है।

 
हार्नबिल नागालैंड का राजकीय पक्षी है...
हार्नबिल नागालैंड राज्य का राजकीय पक्षी है जो अब विलुप्त हो चुका है। वैसे हार्नबिल यानी धनेश कर्नाटक राज्य का भी राजकीय पक्षी है। हार्नबिल को कुछ लोग हिंदी में धनेश भी कहते हैं। इस उत्सव के मौके पर यहां नागा संस्कृति के हर रंग देखने को मिलते हैं।

एक माह पहले से आरंभ-  हार्नबिल फेस्टिवल की नवंबर माह से कोहिमा उत्सव की शुरूआत हो जाती है। जो दिसंबर में हार्नबिल फेस्ट और उसके बाद क्रिससम और नए साल तक चलती रहती है। हार्नबिल उत्सव के दौरान कोहिमा शहर के सभी होटल बुक रहते हैं। अगर आप इस दौरान जाने की योजना बना रहे हैं तो होटलों की बुकिंग पहले ही करा लें। हार्नबिल के आयोजन स्थल किसमा में नागा हेरिटेज विलेज भी बना हुआ है। जहां आप किसी नागा का परंपरागत गांव देख सकते हैं।


हार्नबिल फेस्टिवल में नागालैंड के प्रमुख 16 आदिवासी समुदाय के लोग हिस्सा लेते हैं। इस दौरान पारंपरिक नागा नृत्य, कई तरह की पारंपरिक प्रतियोगिताओं का आयोजन होता है। इस उत्सव में अब आधुनिकता का रंग भी मिलता जा रहा है। अब इस उत्सव के मौके पर इसमें कार रेस बाइक रेस जैसी प्रतियोगिताएं भी देखने को मिलती हैं। जाहिर है यहां आप नागा फूड का भी आनंद उठा सकते हैं।

उत्सव स्थल सारी रात गुलजार रहता है। इस दौरान नागा संस्कृति के अनुरूप मेला स्थल पर रहने के लिए आवास भी तैयार किए जाते हैं। इस उत्सव के दौरान बड़ी संख्या में सैलानी नागालैंड पहुंचते हैं। पर ठहरिए सिर्फ हार्नबिल ही नहीं बल्कि बाकी के महीनों में भी राज्य के अलग अलग हिस्से में कई उत्सव आयोजित होते हैं। दिसंबर के अंतिम सप्ताह में पेरेन में नगा नगी उत्सव का आयोजन होता है तो जनवरी के अंतिम सप्ताह में डिमापुर में बुशु उत्सव का आयोजन होता है।


कोहिमा शहर का नजारा। 
 वैसे नागालैंड की बात करें तो राज्य के अलग अलग जिलों में सालों भर हर महीने में किसी न किसी उत्सव का आयोजन होता ही रहता है। यानी की नागालैंड के लोग उत्सव प्रेमी हैं। तभी तो नागालैंड को लैंड ऑफ फेस्टिवल्स कहते हैं। अगर आप हार्नबिल फेस्टिवल के समय ही नागालैंड के दौरे पर जाना चाहते हैं तो रहने लिए होटल की बुकिंग पहले ही करा लें। क्योंकि इस समय कोहिमा के होटल खाली नहीं मिलते। 
-    विद्युत प्रकाश मौर्य  (NAGALAND, HORNBILL FESTIVAL, LAND OF FESTIVALS, KOHIMA, DIMAPUR ) 

Sunday, December 29, 2013

नागालैंड - अंडरग्राउंड टैक्स के बिना कारोबार नहीं


नागालैंड में अंडरग्राउंड टैक्स दिए बिना किसी भी तरह का कारोबार संभव नहीं है। कोहिमा या डिमापुर शहर में दुकानदारों को सरकार को दिए जाने वाले कर के अलावा अंडरग्राउंड संगठनों को भी टैक्स देना पड़ता है। जिस इलाके में जिस संगठन का वर्चस्व है वहां वे टैक्स की वसूली करते हैं। कोई दुकानदार इस टैक्स का विरोध नहीं कर सकता। 

विरोध करने पर हत्या - अगर विरोध किया तो जान से हाथ धोना पड़ सकता है। इन संगठनों से जुडे़ हुए लोग दुकानदारों के पास आकर एक पर्ची थमा जाते हैंजिसमें दी जाने वाली राशि लिखी होती है साथ ही कब किसे देना है इसका भी जिक्र होता है। टैक्स आमतौर पर साल भर के लिए होता है। टैक्स की राशि संगठन के लोग दुकानदार का व्यापारी की हैसियत देखकर तय करते हैं। आप इस राशि में कोई रियायत नहीं करा सकते हैं। कोहिमा में ऐसी कई घटनाएं हुई हैं कि टैक्स देने से आनाकानी करने पर दुकानदार की हत्या हो गई। हां टैक्स अदा कर देने के बाद आप बेधड़क होकर व्यापार कर सकते हैं। आमतौर पर नागा दुकानदार या व्यापारियों से ये टैक्स नहीं वसूला जाता। पर बिहार या यूपी के व्यापारी या मारवाड़ियों को ये टैक्स देना ही पड़ता है। इस टैक्स के अलावा कई बार छात्र संगठन के लोग भी चंदा मांगने आ धमकते हैं। 

जाहिर है इस तरह के टैक्स के कारण दुकानदारों को अपने कारोबार में मार्जिन भी ज्यादा रखना पड़ता है। इस कारण से नागालैंड में दुकान उपभोक्ता वस्तुओं को महंगा बेचने पर मजबूर हैं। इसलिए नागालैंड की दुकानों में अन्य राज्यों की अपेक्षा महंगाई ज्यादा है। चाहे आपकी दुकान फुटपाथ पर हो या फिर कोई बड़ा बिजनेस बिना अंडरग्राउंड टैक्स के यहां गुजारा नहीं है। इन हालातों के बीच भी यहां व्यापार करने में यूपी बिहार के लोग या फिर मारवाड़ी लोग ही सफल हैं। 


नागालैंड में कहीं कहीं दक्षिण भारत के लोग भी व्यापार कर रहे हैं। नागा लोगों की प्रवृति दुकानदार बनने के लायक नहीं हैं। वे वीर बहादुर और लड़ाके लोग हैं। तिजारत के लिए वांक्षित व्यवहार कौशल और सहज माधुर्य उनकी व्यक्तित्व का हिस्सा नहीं है। इसलिए वे अगर व्यापार करें भी तो उन्हें उतनी सफलता नहीं मिल पाती। वे बिहार यूपी के दुकानदारों की तरह मोलभाव करने की शैली में निपुण नहीं होते। अक्सर नागा लोग जब किसी बिहार यूपी के दुकानदार के यहां खरीदारी करने पहुंचते हैं तो मोल भाव करते हैं। खरीददारी के साथ वे दुकानदार से बख्शिश भी मांगते हैं। इन 
सारी परिस्थितियों के बीच देसवालिया लोग यहां सफलतापूर्वक व्यापार कर रहे हैं।
कब खत्म होगा ये टैक्स -  क्या उम्मीद की जा सकती है कभी नागालैंड जैसे राज्य में अंडरग्राउंड टैक्स का वातावरण खत्म हो सकेगा। आशा की किरण दिखाई दे रही है। 
नागालैंड पोस्ट के 17 दिसंबर 2013 के अंक में एक खबर प्रकाशित है। राज्य के सबसे बड़े त्यूनसांग जिले के शामाटोर शहर के लोगों ने रैली निकालकर अंडरग्राउंड संगठनों को शहर से बाहर जाने के कहा। हो सकता है आने वाले दिनों में बाकी शहरों में भी इस तरह का बेहतर वातावरण बने। 
 नागालैंड में सक्रिय नागा अंडरग्राउंड संगठन
नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैण्ड (इसाक-मुईवा ) - एनएससीएन आईएम। इसके प्रमुख टी. मुइवा हैं। 
एनएससीएन (खापलौंग गुट )
नागा स्टूडेन्ट्स फेडरेशन (एन.एस.एफ.) नागालैंड
यूनाइटेड नागा काउंसिल (यू.एन.सी.) मणिपुर
आल नागा स्टूडेन्ट्स एसोसिएशनमणिपुर (ए.एन.एस.ए.-एम.)
 नागालैंड के प्रमुख क्षेत्रीय अखबार - 
मोरूंग एक्सप्रेस www.morungexpress.com/ 
नागालैंड पोस्ट www.nagalandpost.com/
इस्टर्न मिरर - www.easternmirrornagaland.com/
-    -  विद्युत प्रकाश मौर्य  ( NAGALAND, UNDERGROUND TAX ) 


Saturday, December 28, 2013

शाम के पांच बजते ही बंद हो जाता है कोहिमा शहर

कोहिमा - शाम 5 बजे के बाद खाना नहीं ...
कोहिमा के रेस्टोरेंट में दोपहर का खाना खाने के बाद निकलते हुए मैंने रेस्टोरेंट वाले से पूछ लिया कि आपके यहां रात को कितने बजे तक खाना मिल जाता है। उसने कहा पांच बजे। मैंने अचरज किया। इतनी जल्दी। उसने कहा हां भाई साहब यहां शाम को पांच बजे सारी दुकानें बंद हो जाती हैं। ये सच्चाई है। कोहिमा में आज भी शाम को 5 बजे सारी दुकानों के शटर गिर जाते है। फुटपाथी दुकानें स्टाल आदि भी बंद हो जाते हैं। वैसे यहां 5 बजे सूरज भी ढल जाता है। 
इसके साथ ही सड़क पर सिटी बस टैक्सी और वाहनों की आवाजाही भी बंद हो जाती है। अगर आप शाम को 5 बजे के बाद सड़क पर निकलते हैं तो यह आपके रिस्क पर है। पुलिस से भी किसी सुरक्षा की उम्मीद मत किजिए। लोगों ने अपने आदत में शुमार कर लिया है पांच बजे सब कुछ बंद कर घर में बंद हो जाने को। ऐसा क्यों है। 
कई साल से चली आ रही परंपरा - कई साल पहले से यहां शाम को 5 बजे के बाद अलग अलग अंडरग्राउंड संगठनों से जुड़े कार्यकर्ता आ जाते हैं। आते जाते लोगों को लूट लेते हैं। विरोध करने पर मार सकते हैं। इसलिए लोग सारा कारोबार बंद कर देना ही बेहतर समझते हैं। हालांकि अब कोहिमा शहर की फिजां काफी बदली है लेकिन लोगों का 5 बजे सब कुछ बंद कर देने का अनुशासन नहीं बदला है।


कोहिमा बस स्टैड के पास बोनांजा लॉज...

अगर आप किसी अच्छे होटल में हैं तो अपने मैनेजर को कमरे में रात का खाना भिजवाने का निर्देश दे सकते हैं। वर्ना आप रात के खाने पीने का सामान दिन में ही पैक कराकर अपने कमरे में ले जाएं। या दूसरा विकल्प है कि भूखे पेट ही सो जाएं। 
हालांकि नागालैंड में सुबह भी शेष भारत से 40 मिनट पहले ही हो जाती है। मैं नवंबर के आखिरी महीने में वहां पहुंचा था। सुबह 5 बजे उजाला हो जाता था। और सवा पांच बजे तक तो सूरज की लालिमा नजर आने लगती है। तो कोहिमा शहर की दुकानें भी सुबह 5 बजे ही खुल जाती हैं। सुबह छह बजे तक सभी होटलों में सुबह का नास्ता और खाना मिलना भी शुरू हो जाता है। अगर आप 5 बजे जग जाते हैं तो शाम 5 बजे तक भी दिन काफी बड़ा लगता है। यहां घरों में रहने वाले भी ज्यादातर लोग शाम 7 बजे तक भोजन करके रात 9 बजे तक जरूर सो जाते हैं। 


तो अगर आप नागालैंड के दौरे पर हैं तो सुबह जल्दी उठकर घूमने और शाम को जल्दी होटल में लौट आने की आदत डालें। अगर किसी के घर के मेहमान हैं तो भी आपको ऐसा ही करना पड़ेगा। हां अच्छी बात ये है कि यहां बाजार चहल पहल भी सुबह 5 बजे से ही शुरू हो जाती है। 
विद्युत प्रकाश मौर्य 


( KOHIMA, ALL SHOP CLOSED AT 5PM ) 

Friday, December 27, 2013

कोहिमा में भी है यूपी और बिहार

मैं कोहिमा के बस स्टैंड पर जैसे ही पहुंचा तो सुनता हूं, अखबार बेचने वाला हॉकर मोबाइल पर भोजपुरी में बातें कर रहा था। बड़े प्रेम से घर का कुशल क्षेम पूछ रहा था। पूछने पर पता चला भाई मोतिहारी का रहने वाले हैं। यहां कई सालों से अखबार का काम कर रहे हैं। आगे बढ़ने पर जूता बनाने वाले मोची बाबू बलिया निवासी मिले।वहीं स्टेशनरी दुकान वाले बिहारी बाबू। तो यहां के एकमात्र शाकाहारी व्यंजन परोसने वाले यूपी राइस होटल वाले भी यूपी के बलिया जिले के निवासी हैं।


पूरे कोहिमा शहर में हार्डवेयर, कपड़े, सौंदर्य प्रसाधन, राशन की दुकान से लेकर सब्जी बेचने वाले ज्यादातर दुकानदार लोग भोजपुरी इलाके के हैं। पूरे कोहिमा शहर की बात करें तो 70 फीसदी दुकानदार बिहार यूपी के हैं। वे कई दशकों से कोहिमा में पहुंच गए हैं और यहां कारोबार कर रहे हैं। यहां लोग परिवार के साथ रहते हैं। साल में एक या दो बार अपने गांव का भी चक्कर लगा आते हैं। लेकिन तमाम मुश्किलात के बीच नागालैंड के न होकर भी नागालैंड के हो ही गए हैं। नागालैंड के नहीं हुए हैं क्योंकि यहां वे जमीन खरीद कर स्थायी तौर पर बस नहीं  सकते। यहां की  मतदाता  सूची  में  नाम  नहीं  जुड़  सकता। अपने पूजा स्थल मंदिर आदि नहीं बना सकते। अगर पूजा पाठ करना है तो घर के अंदर ही करना पड़ता है। 


कोहिमा शहर में घूमते हुए लगता है कि पूरा यूपी बिहार यहां बसता है। सड़कों पर बेधड़क भोजपुरी जुबान बोलते हुए लोग मिल जाते हैं। अगर कोई बिहार यूपी से घूमने यहां पहुंच गया तो अपने जवार के लोगों के साथ बड़े प्रेम से पेश आते हैं। सिर्फ कोहिमा ही नहीं नागालैंड के कई छोटे कस्बों और शहरों तक भी भाई लोग पहुंच गए हैं तिजारत करने। अब यहां की ठंडी आबोहवा में सालों से जम गए हैं तो फिर रम भी गए हैं।


भले यूपी बिहार से आए लोगों ने कोहिमा को  इन्होंने अपना  लिया है  पर कोहिमा ने  इन्हें  पूरी  तरह नहीं अपनाया। एक तरह से दोयम दर्जे का जीवन है यहां पर। कोहिमा में रहने वाले बिहार यूपी के लोगों अपना व्यापारिक इनर लाइन परमिट साथ रखना पड़ता है। इस परमिट को ही वे लोग समय सीमा खत्म होने पर नवीकृत कराते रहते हैं। कभी यहां की स्थायी नागरिक नहीं हो सकते।
अंडर ग्राउंड टैक्स जैसी कई और परेशानियां हैं। पर यूपी बिहार के लोग कारोबार करना जानते हैं। वहीं दुकानदारी करना नागा लोगों के खून में नहीं है। वे अपने स्वभाव के कारण बिजनेस मे ज्यादा सफल नहीं हो पाते, वहीं बिहार यूपी के लोग अपने श्रम के साथ अपनी व्यवहार कुशलता के कारण हर जगह सफल हो जाते हैं। इसलिए बिहार यूपी के लोग यहां भी कारोबार में सफल हैं। पर बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिनका मानाना है कि नागरिकता नहीं मिली तो क्या हुआ, अब इनका यहां से जाने का भी दिल भी नहीं करता। भला जो बात कोहिमा में है वह बलिया गाजीपुर में कहां।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य  

  ( UP AND BIHAR PEOPLE, NO TEMPLE IN KOHIMA  ) 

Thursday, December 26, 2013

कोहिमा के वे दो यादगार भोज

भले कोहिमा में शाकाहारियों को खाने पीने में दिक्कत हो पर मुझे अपनी यात्रा के दौरान के कोहिमा के दो भोज हमेशा याद रहेंगे। हमारे स्थानीय मित्र अमित गुप्ता ने मुलाकात के साथ ही बताया कि आज शनिवार है और कोहिमा के हाई स्कूल जंक्शन इलाके के सभी बिहार यूपी के दुकानदारों की ओर से एक वनभोज यानी पिकनिक का आयोजन किया गया है। शनिवार को दुकान बाजार बंद रहते हैं। तो दुकानदार भाइयों का ये पिकनिक हाई स्कूल के पीछे के जंगलों में आयोजित था। मैं अपने दोस्तों के साथ इस पिकनिक में पहुंचा। इसमें बिहार यूपी दुकानदारों के साथ नागा साथी भी शामिल थे।

भैंसे का मांस चिकेन और चावल - पिकनिक के मीनू में भैंसे का मांसचिकेन और चावल प्रमुख था। हां अल्पसंख्यक शाकाहारियों के लिए दाल और सलाद भी बनाई गई थी। सलाद का मतलब हरी पत्तेदार सब्जियों को उबाल दिया गया था। हालांकि ये सेहत के लिए काफी अच्छी हैं भले ही बेस्वाद लगती हों। पिकनिक के मुख्य द्वार पर शहीद हुए भैंसे के सिर को पेड़ से लटका दिया गया था। नागा महिलाएं भोज की सूत्रधार थीं। अस्थायी चूल्हों में जंगल की लकड़ी से आंच दी जा रही थी। बड़े बडे़ भगोने में मांस पक रहा था। इस चलाने के लिए बांस के बने बेलचों का इस्तेमाल किया जा रहा था। लेकिन महिलाएं उसी बेलचे से भैंसे का मांस और उसी चिकेन भी चला रही थीं।

हालांकि मैं चिकेन कभी कभी खा लेता हूं लेकिन यहां खाने को दिल नहीं माना। फिर भी दोस्त साथ देने के लिए कुछ कौर खा लिया। कई बिहार यूपी के भाई लोग पिकनिक में आए जरूर थे पर उन्हें भी खाने से गुरेज था। वे लोग घर में चिकेन और मछली खाते हैं पर बाजार और भोज में खाने से बचते हैं। अमित के घर पहुंचने पर भाभी जी ने राजफाश किया - यहां पर आकर न कई ठो बिहारी लोग अनजाने में गड़बड़-सड़बड़ खाकर अपना धर्म भ्रष्ट कर लिया है।  तो भाभी जी बातें सुनने के बाद ..मुझे लगा अच्छा हुआ मैं अपना धर्म भ्रष्ट करने से बच गया। 

अब बात दूसरे भोज की। मुझे दूसरे दिन दोपहर में एक और भोज में जाने का मौका मिला। यहां बीआरटीएफ ( बार्डर रोड टास्क फोर्स) के शिविर में गुरुनानक जयंती मनाई जा रही थी। इस मौके पर कैंप के गुरुद्वारे में विशेष रुप से गुरू के लंगर का आयोजन किया गया था।

जब कैंप के प्रशासनिक अधिकारी को मेरे आने की सूचना मिली तो उन्होंने बड़ी आत्मीयता से मुझे भी आमंत्रित किया। इस लंगर के भोज में खाना दिव्य था। मीनू में बासमती चावल का शानदार पुलाव, दाल, सब्जी, रायता, खीर, सलाद, रसगुल्ले सब कुछ थे। खाना इतना स्वादु था और लोग इतने आत्मीयता से परोस रहे थे कि अपना पंजाब याद आ गया। बीआरटीएफ के भाई लोग हर सिविलियन को पूछ पूछ कर बड़ी आत्मीयता से खिला रहे थे। मैंने तो कोहिमा में ऐसे किसी भोज की उम्मीद नहीं की थी।
लंगर के बाद बीआरटीएफ के अधिकारी यादव जी ने जो वाराणसी के पास के शिवपुर के रहने वाले थे ने पूर्वोत्तर में बीआरटीएफ के काम काज के बारे में बताया। दुरुह इलाकों के नेशनल हाईवे के निर्माण और रखरखाव और सुरक्षा की जिम्मेवारी इधर बीआरटीएफ के हवाले है। सीमांत क्षेत्र में जंगलों में बीआरटीआफ मुश्किल हालात में सड़के बनाता है और उनका रखरखाव करता है। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य  ( NAGALAND, KOHIMA, BHOJ, BRTF ) 

Wednesday, December 25, 2013

आखिर शाकाहारी क्या खाएं नागालैंड में

डिमापुर रेलवे स्टेशन के पास पंजाबी होटल 
अगर आप शाकाहारी हैं तो आपको नागालैंड में दिक्कत हो सकती है। लेकिन आपके लिए यहां खाने के विकल्प मौजूद है। कीडा़ बाजार में बिक रहे सैकड़ों किस्म के कीड़ों के अलावा यहां सब्जियां भी बिकती हैं। तो आप कच्ची सब्जियां खरीदकर सलाद बनाकर खा सकते हैं। यह अच्छा विकल्प हो सकता है। क्योंकि रेस्टोरेंट में तो सब्जियां मिलती नहीं हैं।

वैसे कोहिमा में महंगाई का आलम तो है। शेष हिंदुस्तान से यहां महंगाई और ज्यादा है। सेब और प्याज दूर से आता है इसलिए महंगा है, पर चिंता न करें स्थानीय सब्जियां सस्ती हैं। अगर कोहिमा में आपका घर है, अपनी रसोई है तो बाजार से कई किस्म की सब्जियां लाकर बना सकते हैं। पर रेस्टोरेंट में सब्जियां नहीं मिलती हैं। अगर आप किसी होटल में ठहरे हैं तो खाने के लिए अपने होटल वाले से आग्रह करें, वह कोई इंतजाम करेगा आपके लिए।
फलों की बात करें तो इनमें पाइनएपल और संतरे इधर सस्ते मिलते हैं, क्योंकि इनकी उपज पूर्वोत्तर में खूब होती है। तो आप यहां अनानास और संतरे से दोस्ती करें। अगर आप शाकाहारी हैं तो बाजार से अलग अलग तरह के जूस के बोतल भी खरीद सकते हैं। यहां न सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि म्यांमार और थाइलैंड के बने जूस भी मिल जाते हैं।

बेकरी उत्पादों का सहारा  नागालैंड में घूमते हुए एक और विकल्प है बिस्कुट और बेकरी खाना। कोहिमा शहर में कई प्रसिद्ध बेकरी की दुकाने हैं। इसके लिए आप पापुलर बेकरी (पीआर हिल्स) जा सकते हैं। इसके प्रोपराइटर शशि कुमार हैं। अपने गुणवत्ता और स्वाद के लिए ये बेकरी कोहिमा में काफी लोकप्रिय है। वैसे आप बेक्स एंड केक्स, रुस्ता बेकरी जा सकते हैं। इन बेकरी में मिठाइयां जूस और बिस्कुट आदि भी मिल जाते हैं। बेकरी से आप ब्रेड खरीदकर भी काम चला सकते हैं।


कोहिमा के मेले में जलेबी...
दूध के ब्रांड डिमूल और कोमूल - नागालैंड के दो प्रमुख दूध के ब्रांड है डिमूल और कोमूल। दोनों सहकारी समिति के उत्पाद हैं। डिमूल मतलब डिमापुर डिस्ट्रिक्ट मिल्क प्रोड्यूसर्स यूनियन। इसका ब्रांड नाम डिमूल है। पहले यह कोमूल नाम से जाना जाता था।

वैसे दूध यहां थोड़ा महंगा है पर डिमूल की मीठी लस्सी मिल जाती है पैकिंग में महज 10 रुपये में। स्वाद भी अच्छा है। डिमूल मीठी लस्सी के अलावा पास्चराइज्ड लस्सी, पेड़ा आदि उत्पाद भी बेचता है। राज्य में 2000 से ज्यादा डेयरी फार्मर डिमूल से जुड़े हैं। डिमूल हर रोज 10 हजार लीटर से ज्यादा टोंड दूध बेचता है। तो डिमूल नागालैंड में आए शाकाहारियों का सहारा हो सकता है। आप शाकाहारी हैं तो कोहिमा या डिमापुर में इसका स्वाद जरूर लें।

राज्य में शराब पर है पूरी तरह पाबंदी  , पर मिल जाती है...
नागालैंड की तीखी मिर्च- खाएंगे क्या...
नागालैंड में वैसे तो शराब पर पाबंदी है। गुजरात के बाद ऐसा दूसरा राज्य है जहां शराबबंदी है। 1989 के नागालैंड ल्यूकर टोटल प्रोबिटेशन एक्ट ( एनएलटीपी) के तहत यहां शराब नहीं बेचने का कानून है। चर्च के प्रभाव में लंबे संघर्ष के बाद यहां शराबबंदी का कानून आया। नागालैंड बेपटिस्ट चर्च काउंसिल ( एनबीसीसी) के प्रयासों से यहां शराबबंदी लागू हो सकी थी। पर व्यवहार में नागालैंड में हर जगह शराब मिल जाती है। गांवों देसी शराब बनाई जाती है। वैसे शहर के तमाम दुकानों में शराब अवैध तरीके से बिकती है। खरीदने वाले इशारों में मांग करते हैं और बोतलों को लिफाफे में छिपाकर ले जाते हैं। पर यहां सार्वजनिक स्थलों पर कोई पीता हुआ नजर नहीं आएगा। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य 
( NAGALAND, FOOD, WINE, MILK BRAND DIMUL ) 

Tuesday, December 24, 2013

ये कोहिमा का कीड़ा बाजार है...

नागालैंड में जगह जगह मांस की दुकानें तो मिल ही जाएंगी। इसके साथ ही यहां लोगों में कई तरह के कीड़े खाने का भी चलन है। इन कीड़ों को वैसे ही खाया जाता है जैसे हम अपने घरों में सब्जी और भुजिया बनाकर खाते हैं। राजधानी कोहिमा में सब्जी बाजार की तरह ही कीडा बाजार भी है। यहां तक की बस स्टैंड के आसपास सड़कों पर महिलाएं टोकरी में कई तरह की कीडे़ बेचती नजर आती हैं। ये कीड़े जीवित होते हैं। वे टोकरी में रेंकते रहते हैं। ऐसे कीड़े सिर्फ नागालैंड में ही नहीं बल्कि पड़ोसी राज्य अरुणाचल प्रदेश में भी खाया जाता है।
कोहिमा में सिल्क वर्म खाएंगे क्या...

अभी तक हमने सिल्क वर्म के बारे में जाना था कि यह एक आर्थिक तौर पर उपयोगी कीड़ा है जो रेशम बनाने में प्रमुख कारक है। पर सिल्क वर्म भोजन भी हो सकता है, यहीं आकर पता चला। हमने अपने गांव में कुछ जातियों के बारे में सुना था कि वे चूहा और घोंघा जैसी चीजों को मारकर खाते हैं। पर नागालैंड में तमाम तरह के कीड़ों को मार कर चाव से खाया जाता है। इन कीड़ों में सिल्क वर्म लोगों में काफी लोकप्रिय है। नागा लोगों की इन कीड़ों को पकाने की अपनी विधि है। काफी लोग इसे डिप फ्राई करके खाते हैं। चीन में भी लोग बड़ी संख्या में सिल्क वर्म खाते हैं। आप कोहिमा के कुछ रेस्त्रां में भी सिल्क वर्म की डिश खा सकते हैं। इन पानी देर तक उबालने के बाद प्याज,अदरक, लहसुन, मिर्च आदि के साथ फ्राई करके खाया जाता है।

अगर आप पूर्ण शाकाहारी हैं तो आपको कोहिमा के बाजार में खाने पीने में दिक्कत आ सकती है। हमने बस स्टैंड से आगे बढ़ने के बाद किसी शाकाहारी होटल के बारे में जानकारी लेने की कोशिश की। वहां एक जूता बनाने वाले मोची और एक अखबार बेचने वाले भाई मिल गए जो अपने भोजपुरी इलाके के थे। इन लोगों ने हमें जानकारी दी आप आगे राइजू जंक्सन पर जाएं वहां यूपी राइस होटल है जहां आपको शाकाहारी खाने का विकल्प मिल जाएगा। उनकी सलाह पर मैं यूपी राइस होटल ढूंढता हुआ आगे बढ़ा। होटल का बोर्ड देखकर खुशी हुई। इस होटल को चलाने वाले यूपी के गाजीपुर के हैं। पर इस होटल के मीनू में भी मांस मछली के सारे विकल्प मौजूद थे। 

कोहिमा का एकमात्र होटल जहां चावल, दाल सब्जी और पूरी भी मिल जाती है। 
यूपी राइस होटल में हमारे पास शाकाहारी के नाम पर नास्ते में पूरी सब्जी और खाने में चावल दाल और सब्जी का विकल्प था। तो मैंने पूरी सब्जी खाना तय किया। सब्जी के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति थी। दाल भी थी तो वह काम चलाउ सी ही थी। पर पूरे कोहिमा में यही एक यूपी राइस होटल है जहां पर शाकाहारी के नाम पर कुछ मिल जाता है। पर उनके बरतनों से भी अंडे की गंध आती रहती है। तो भाई यूपी राइस होटल में भी खाने के बाद मन नहीं भरा मेरा, क्योंकि मुझे अंडे से एलर्जी है।



खैर खाने से संतोष तो नहीं हो सका तो क्या। मैं तो घूमने आया हूं तो मैं यहां से आगे बाजार में बढ़ा।  देखता हूं स्टेडियम के पास एक मेला लगा हुआ था। इस मेले में अपने देस के लोगों की कुछ दुकानें सजी थीं, जहां पापड़, जलेबियां और समोसे बनाए जा रहे थे। यहां पर हमने कुछ पापड़ खाकर दिल को तसल्ली पहुंचाई। पर यहां भी अंडे के गंध ने मेरा साथ नहीं छोड़ा। अगर आप कुछ दिनों के लिए कोहिमा में हैं और आप शाकाहारी हैं तो आपको दिक्कतें आ सकती हैं। तो अपने लिए कुछ विकल्प तैयार रखें।

आगे पढ़िए - शाकाहारी क्या खाएं कोहिमा में... ) 

 - विद्युत प्रकाश मौर्य
( KOHIMA, INSECT MARKET, KIDA BAZAR, SILK WORM, UP RICE HOTEL, NAGALAND, UP RICE HOTEL ) 


Monday, December 23, 2013

कुकुर मांस खाया जाता है नागालैंड में

कोहिमा में अपने होटल से स्नानादि से निवृत होकर बाहर निकला सोचा थोड़ी पेट पूजा कर ली जाए। सबसे पहले अपने होटल के रेस्टोरेंट में गया। पूछा खाने में क्या है। जवाब मिला- कुकुर मांस, गोरू मांस और कई तरह के मांस आपको क्या चाहिए। मैं चौंक गया। सुन रखा था कि नागालैंड में लोग कुत्ते का मांस खाते हैं। लेकिन कोहिमा में देखा कि ज्यादातर होटलों में कुकुर मांस सुलभ है। इसके अलावा भैंसे का मांस, सूअर का मांस, गाय का मांस, मटन, चिकेन, मछली सब कुछ यहां के होटलों में मिलता है।

जो लोग धार्मिक भावना से शाकाहारी हैं उन्हें थोड़ी मुश्किल हो सकती है नागालैंड में आकर। पर खान पान के तौर तरीकों के कारण नागालैंड बाकी हिंदुस्तान के हिस्सों से काफी अलग नजर आता है। पूरे कोहिमा शहर में कोई पूर्ण शाकाहारी होटल बिल्कुल नहीं है। एक रेस्टोरेंट के बाहर लिखा था - हमारी खासियत है पोर्क इंटेस्टाइन का मांस महज 40 रुपये में।

कुत्ते का मांस सबसे लोकप्रिय -

नागालैंड वासी तो कुत्ते के मांस को सबसे बेहतरीन मानते हैं स्वाद और सेहत के लिए। कुछ लोगों का मानना है कि इस मांस को खाने से बुद्धि तीक्ष्ण होती है। इसलिए यहां सड़कों पर कुत्ते नजर नहीं आते। 

डिमापुर से कोहिमा आते समय बस में एक महिला मिली थी। वह अपने साथ दो पिल्ले लेकर आ रही थी। उसने बताया कि वह उन्हे 500-500 में खरीद कर ला रही है। हमने जानना चाहा कि वह इन कुत्तों के पिल्लों का क्या करेगी तो उसने कुछ बताने में थोड़ा संकोच किया. पर साथ चल रहे एक फौजी भाई ने बताया कि कुछ साल तक पालपोस कर इन्हें बड़ा करेगी। हमारे साथ चल रहे फौजी भाई ने भी राजफास किया कि ये कुत्ते बड़े होने पर 4 से 5 हजार रुपये में बिकेंगे।


सबसे महंगा है कुत्ते का मांस -  कुत्ते का मांस नागालैंड में सबसे महंगा बिकता है। मैं जब नवंबर 2013 में यहां हूं तो कुत्ते का मांस 300 रुपये किलो तक बिक रहा है। वहीं भैंसे का 120 रुपये किलो का भाव है। तो चिकेन और मटन भैंसे के मांस से थोड़े महंगे हैं। यानी 150 रुपये किलो।

प्रतिबंध की भी मांग उठी -  नागालैंड में कुत्ते के मांस की इतनी मांग है कि कुत्ते यहां दूसरे राज्यों से लाने पड़ते हैं। राज्य के 23 छोटे बड़े शहरों में सब्जी बाजार के साथ स्थित मांस मछली के बाजार में कुत्ते का मांस भी बिकता है। हालांकि कई बार यहां कुत्ते के मांस पर प्रतिबंध लगाने की मांग भी उठी है। राज्य सरकार इस पर प्रतिबंध लगाने का विचार कर रही है।
सबसे बड़ी बात है कि कुत्ते के मांस की आपूर्ति के लिए नागालैंड में कुत्तों की दूसरे राज्यों से गैर कानूनी तरीके से खरीद बिक्री की जाती है। वैसे सिर्फ नगालैंड ही नहीं अरुणाचल प्रदेश से लेकर बंगाल के दार्जिलिंग तक भी कुत्ते का मांस खाया जाता है। एक नगा दोस्त ने यह भी राज की बात बताई की कुत्ते का मांस खाने से बुद्धि तीक्ष्ण होती है।
कुत्ते के मांस को लेकर मेरे के दोस्त ने मजेदार किस्सा सुनाया। एक नागालैंड का छात्र जो दिल्ली में पढ़ता था छुट्टियों में अपने गांव गया। उसने अपने घर में एक कुत्ता पाल रखा था। पिता को बेटे के आने की खुशी थी सो रात को शानदार भोज हुआ। सुबह बेटे ने देखा घर में उनका पालतू कुत्ता नहीं है। पिता ने पूछने पर बताया रात के भोज के लिए उसे कुत्ते को बलि दे दी।

भारत देश के किसी दूसरे कोने में जब कुछ नागा लोग आ जाते हैं तो लोगों को शक होता है कि वे कुत्ते को मार कर खा जाएंगे। कई बार ऐसा होता भी है। पर अब कुत्ते का मांस सिर्फ नागालैंड में ही नहीं बल्कि अरुणाचल और दार्जिलिंग में भी खाया जाता है।


हरी सब्जियों की बहार है नगालैंड में - 

भले ही नागालैंड में कुत्ते समेत कई तरह के मांसाहार लोकप्रिय हों पर नागालैंड में हरी सब्जियां खूब बिकती हैं। प्रकृति ने नागालैंड का जमकर हरियाली बक्शी है। आप घर में लाकर खूब हरी सब्जियां बना सकते हैं पर रेस्टोरेंट में ऐसी हरी सब्जियों से बने व्यंजनों का मिल जाना मुश्किल है।



जब आप नगालैंड के सब्जी बाजार में जाएंगे तो वहां कई किस्म की हरी सब्जियां देखने को मिलेंगी। हमारे एक पंजाब के साथी
 अनूप वत्स मैक्सिको गए थे एक महीने के लिए लौट कर आने पर उन्होंने बताया कि मैक्सिको में सब कुछ खाया जाता है। वहां कहावत है- इट एवरीथिंग दैट मूव्स। वे शाकाहारी थे जाहिर है उन्हें काफी दिक्कत हुई थी। कुछ ऐसा ही नजारा कोहिमा शहर का है। यहां भी वह सब कुछ खाया जाता है जो चीजें मूव करती यानी घूमती हैं।

-    --- विद्युत प्रकाश मौर्य- Email - vidyutp@gmail.com
(  ( NAGA FOOD, DOG MEAT, PORK INTESTINE ) 

Sunday, December 22, 2013

जब घर जाना अपने याद दिलाना मेरी...


नागालैंड की राजधानी कोहिमा की सबसे महत्वपूर्ण विरासत है, कोहिमा वार सिमेट्री। वह जगह जहां से आजादी की लड़ाई की यादें जुड़ी हैं। कोहिमा वार सिमेट्री यानी शहीदों की याद में बना स्मारक। वे लोग जो बेहतर कल के लिए लड़ते हुए इस दुनिया को अलविदा कह गए। इस स्मारक पर ये पंक्तियां लिखी हैं -

When you go home, Tell them of us and say.
For your tomorrow, We gave our today.

यानी जब घर जाना अपने, याद दिलाना मेरी, करना एक निवेदन, आपके कल के लिए हमने अपना आज किया समर्पण।  ये उन फौजियों का निवेदन है जो दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान लड़ते हुए शहीद हो गए। यहां दो सौ से ज्यादा शहीद होने वाले फौजियों का स्मारक बना हुआ है। कोहिमा के शहीद स्थल पर लिखे ये शब्द मैंने बचपन में अखबार के एक आलेख में पढ़ रखा था, तब से मेरे मन में एक सुशुप्त आकंक्षा थी यहां पहुंचने की और वीर सपूतों को नमन करने की। वह इच्छा अब जाकर पूरी हुई है। 


विश्व का सबसे बड़ा ब्रिटिश युद्ध - कोहिमा लंबे समय तक युद्ध का साक्षी रहा है। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान अप्रैल 1944 से जून 1944 तक यहां बड़ा युद्ध चलता रहा। ये विश्व का सबसे बड़ा ब्रिटिश युद्ध माना जाता है। रायल क्वीन केंट रेजिमेंट के बटालियन के फौजियों ने यहां शहादत दी। यहां श्रद्धा के फूल चढ़ाने न सिर्फ भारत से बल्कि विदेशों से भी लोग पहुंचते हैं। मैं युद्ध स्मारक पर घूमते हुए देखता हूं कि किसी ब्रिटिश नागरिक ने अपने पुरखे सैनिक को श्रद्धांजलि देते हुए फूल चढ़ाए हैं और वहां पर अपना कार्ड छोड़ रखा है। ऐसे कई लोग अपने पुरखों को तलाशते हुए यहां पहुंचते रहते हैं।

1421 वीर सैनिकों की याद - कोहिमा के सभी आकर्षणों में से कोहिमा वार सिमेट्री यानी युद्ध स्मारक सबसे खास है। यहां पर कुल 1421 स्लैब कोहिमा में हुए युद्ध के दौरान शहीद हुए सैनिकों की याद में खड़े किए गए हैं। यह स्थल दूसरे विश्व युद्ध के दौरान एशियाई क्षेत्र में सबसे प्रमुख युद्ध स्थलों में से एक था। यहां बनी सभी कब्रों में एक कांस्य प्लेट लगी हुई है जिस पर शहीदों का विवरण और उनका परिचय अंकित किया गया है।

राष्ट्रमंडल युद्ध स्मारक आयोग करता है देखभाल - कोहिमा युद्ध स्मारक की देखरेख राष्ट्रमंडल युद्ध स्मारक आयोग ( कामनवेल्थ वार ग्रेव्स कमीशन) के द्वारा की जाती है
यहां सेना ने अपने 1405 जवान गंवाए थे जिसमें 146 की पहचान नहीं हो सकी जबकि वायु सेना के 15 सैनिक शहीद हुए। अप्रैल 1944 में जापानियों के भारत में घुसपैठ को गैरिसन हिल पर रोका गया और यह जगह बड़े संघर्ष का गवाह बनी। इसी हिल पर ये स्मारक बनाया गया है। कोहिमा की ये वार सिमेट्री कोहिमा शहर के मुख्य बाजार के बिल्कुल पास में ही स्थित है। इसके सुंदर पार्क में स्कूली बच्चे घूमते हुए नजर आते हैं।


नेताजी सुभाषचंद्र बोस की भी यादें जुड़ी हैं कोहिमा से

नेताजी के आजाद हिंद फौज ने भारत की ओर कूच करते समय अपना निशाना इम्फाल व कोहिमा को बनाया। लेकिन यहां पर उन्हें अंग्रेजों से जमकर लोहा लेना पड़ गया। इस लड़ाई में अंग्रेज बहुत शक्तिशाली पड़ गए। तकनीक से भी और सैनिकों की संख्या के लिहाज से भी।

इम्फाल और कोहिमा से आजाद हिंद फौज को अपने कदम पीछे खींचने पड़े। जब यहां पर आजाद हिंद फौज की सेना अपने कदम पीछे खींचने लगी तो जापान की सेना ने नेताजी को भगाने का इंतजाम किया था। लेकिन नेताजी आसानी से पीछे हटने वाले नहीं थे। वे झांसी की रानी रेजीमेंट के साथ आगे बढ़ते रहे। इसी बीच दूसरे विश्वयुद्ध में जापान की करारी हार हो गई। जिसके कारण अब जापान का सहयोग मिलना मुश्किल हो गया था।
बदली हुई रणनीति के तहत 7 जुलाई 1944 को नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने अपने रेडियो से गांधीजी को संबोधित करते हुए उनका आशीर्वाद मांगा और गांधी जी को पहली बार उन्होंने सार्वजनिक तौर पर राष्ट्रपिता भी कहा।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य 
( NAGALAND 5, KOHIMA WAR CEMETRY, NETAJI SUBHASH CHANDRA BOSE )