Monday, October 28, 2013

ओडिशा का अनूठा जैविक उद्यान – नंदन कानन


ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर के बाहरी इलाके में स्थित नंदन कानन उद्यान देश के सुंदरतम चिड़ियाघरों में से एक है। इसके साथ खास बात यह है कि प्राकृतिक वन क्षेत्र में ये जैविक उद्यान बनाया गया है। कुल 990 एकड़ में फैला नंदन कानन पार्क देश का अनूठा चिड़ियाघर है। भुवनेश्वर शहर से 20 किलोमीटर दूर चंदका के जंगलों के एक हिस्से को प्राणी उद्यान में परिणत किया गया है। इस उद्यान की स्थापना 1960 में हुई। यह देश का पहला जू है जो वर्ल्ड एसोशिएशन ऑफ जू एंड एक्वेरियम का सदस्य है।

सफेद बाघों का निवास -  नंदन कानन सफेद बाघों के लिए प्रसिद्ध है। यहां सफेद बाघ 1980 से निवास कर रहे हैं। यहां पर घड़ियालों का भी प्रजनन किया जा रहा है। 1991 से यहां टाइगर सफारी की भी शुरूआत की गई। यहां आप पेंगोलिन और माउस डियर को भी देख सकते हैं। जैविक उद्यान क्षेत्र में राष्ट्रीय महत्व का कांजिया लेक भी स्थित है। नंदन कानन जू के नाम पर अब दिल्ली से ओडिशा के लिए एक ट्रेन चलने लगी है नंदन कानन एक्सप्रेस।



वैसे तो नंदन कानन देखने के लिए भुवनेश्वर में रहकर जाना बेहतर है। ऐसे कार्यक्रम में आप दिन भर नंदन कानन में गुजार सकते हैं। जो सैलानी जगन्नाथ पुरी घूमने जाते हैं। वे अक्सर भुवनेश्वर, कोणार्क और नंदन कानन पार्क घूमते हैं। पुरी से आरंभ होने वाले दिन भर के बस पैकेज टूर में आप नंदन कानन भी घूम सकते हैं। इसमें टूरिस्ट बस के सैलानी तकरीबन दो घंटे ही नंदन कानन की सैर कर पाते हैं।
मुझे 1991 के अपने ओडिशा दौरे की याद आती है। पुरी से हम श्रीराम बस सर्विस में सवार हुए थे। हमारे गाइड जिनका अब मुझे नाम याद नहीं आ रहा है, बडी रोचकता से स्थानों का परिचय करा रहे थे। उन्होंने कहा कि वे नंदन कानन की सैर में गाइड करने के लिए अंदर भी आपके साथ रहेंगे। हमलोग जैविक उद्यान के अंदर प्रवेश करने ही वाले थे कि मेरी सबसे छोटी नन्ही बहन रूठ गई। मैं थक गई हूं अब और नहीं चल सकती। सब लोग आगे बढ़े जा रहे थे। काफी समझाने पर भी वह चलने की तैयार नहीं हुई। थक तो मैं भी गया था इसलिए गोद उठाने में आलस आ रहा था। खैर बहन को गोद उठाना ही पड़ा। हम नंदन कानन के अंदर। गाइड महोदय ने एक हाथी से मिलवाया। वह हाथी उनके हर आदेश को मानता था। हाथी गाने पर डांस करके दिखाता था। नमस्ते करता था। अपने सूंड से पानी निकालकर फेंकता था। गाइड महोदय के कहने पर हाथी ने मेरी एक बहन को चूम लिया। यह मेरी बहन को पसंद नहीं आया। वह घर आने पर महीनों उस कपड़े से दूर रही जिसे हाथी ने चूमा था।
अब नंदन कानन जैविक उद्यान में सुविधाएं और भी बढ़ गई हैं। यहां पर झील में नौकायान यानी बोटिंग का भी आनंद उठाया जा सकता है।



प्रवेश का समय - नंदन कानन जैविक उद्यान में आप सुबह 8 से 5 बजे के बीच जा सकते हैं। ( अक्तूबर से मार्च) शेष काल में 7.30 से 5.30 तक।  हर सोमवार को पार्क बंद रहता है। अब इसे पालीथीन मुक्त जोन घोषित कर दिया गया है। साथ ही यहां बाहरी खाद्य पदार्थ लेकर आना भी मना है। अगर आप समूह में पिकनिक मनाने जाना चाहते हैं तो नंदन कानन प्रशासन उसके लिए आपको मामूली शुल्क पर सुविधाएं प्रदान करता है।  http://www.nandankanan.org/

ऐसा है नंदन कानन

126 प्रजातियों को जानवर है यहां
202 बाड़ों में रखा गया है जानवरों को
812 पक्षी और 134 रेप्टाइल ( सरीसृप) भी देखे जा सकते हैं।
32 विदेशी प्रजाति के जानवर भी हैं यहां



- vidyutp@gmail.com ( NANDAN KANAN ZOO, ODISHA, WHITE TIGER ) 



Saturday, October 26, 2013

पिपली- हजारों साल पुराना शिल्पकारों का गांव

पुरी से भुवनेश्वर के मार्ग पर आता है पिपली गांव। पिपली ओडिशा का शिल्पकारों का गांव है। गांव से गुजरते ही कला शिल्प की खुशबू का एहसास होने लगता है। सड़क के किनारे विशाल बाजार लगा है। इस बाजार में खासतौर पर रंग बिरंगे लैंप शेड लोगो को खूब प्रभावित करते हैं। इन लैंपशेड की आप खरीददारी तो कर ही सकते हैं। इसके साथ ही आप पिपली से हैंड बैग और दूसरे तमाम तरह के हस्तशिल्प के बने उत्पाद खरीद सकते हैं। पिपली की खास बात है कि यहां शिल्पकार खुद अपना सामान बेचते हैं। बीच में कोई मिडलमैन यानी बिचौलिया नहीं होता। इसलिए आपको यहां हस्तशिल्प उत्पाद सस्ते में मिल सकते हैं।
पिपली के कलाकार रंग बिरंगी साड़ियों का भी निर्माण करते हैं। महिलाओं को ये साड़ियां खूब पसंद आती हैं। इस गांव में कुछ वक्त गुजरने के बाद ये लगता है कि पिपली जैसे गांव देश के दूसरे राज्यों में भी होना चाहिए। पिपली की प्रसिद्धी देश के बाहर दुनिया के कई देशों तक पहुंच चुकी है। 


यहां के कलाकार कपड़े के एक टुकड़े पर तरह तरह की कलाकृतियों का निर्माण करते हैं। ये कलाकृतियां आपका ड्राईंग रुम सजाने के काम भी आती हैं। दूर-दूर से आने वाले सैलानी यहां से कुछ न कुछ खरीद कर ले जाना पसंद करते हैं।पिपली के कलाकार रंग बिरंगी साड़ियों का भी निर्माण करते हैं। इस गांव में कुछ वक्त गुजरने के बाद ये लगता है कि पिपली जैसे गांव देश के दूसरे राज्यों में भी होना चाहिए। 


हजारों साल पुरानी परंपरा - पिपली गांव का इतिहास बहुत पुराना है। इस गांव में दसवीं सदी से ही शिल्पकार अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। तब गांव के लोग सालाना जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए छाता और कैनोपी (छतरियां) का निर्माण किया करते थे। तब कलाकार जगन्नाथ मंदिर और राजा की जरूरतों के हिसाब से निर्माण कार्य में लगे रहते थे। 11वीं सदी में पिपली गांव का कलाशिल्प चरम पर था। गांव के कलाकारों को राजा का संरक्षण प्राप्त था। 

पिपली गांव के कलाकार पुरी में होने वाली रथयात्रा के दौरान भगवान कृष्ण, बलभद्र और शुभद्रा के रथों के सजावट के लिए तमाम कलाकृतियां तैयार किया करते थे। यह कलाकारों द्वारा भगवान जगन्नाथ को की जाने वाली एक सेवा हुआ करती थी। यहां आज भी आप कलाकारों को सुंदर कठपुतलियां और पपेट आदि का निर्माण करते हुए भी देख सकते हैं।
पिपली के कलाकार अपनी कलाकृतियों के लिए कोलकाता से सूता मंगाते हैं तो कई सामग्री गुजरात के सूरत से आती है। छतरियों के निर्माण में वाटरप्रूफ रंगों का इस्तेमाल इनकी खासियत है। पिपली में निर्मित कपड़े की कलाकारी में देवी देवताओं का चित्रांकन देखा जा सकता है। खास तौर पर आप इसमें सूरज, चांद और राहु आदि का चित्रण देख सकते हैं। पिपली के शिल्पी हाथ से काम के अलावा आजकल सिलाई मशीन का इस्तेमाल भी बड़े पैमाने पर करते हैं। पर वे दर्जी न होकर कलाकार हैं। 

कैसे पहुंचे - पिपली की दूरी पुरी से 40 किलोमीटर है। वहीं राजधानी भुवनेश्वर से पिपली 26 किलोमीटर की दूरी पर है। अक्सर पुरी-कोणार्क-भुवनेश्वर जाने वाली बसें पिपली गांव में जरूर रुकती हैं। इस ठहराव के दौरान आप वहां से शापिंग कर सकते हैं। अगर आप अपने वाहन से हैं तो पुरी या फिर भुवनेश्वर कहीं से भी पिपली जा सकते हैं।
vidyutp@gmail.com 
(PIPLI VILAGE, ODISHA, HANDICRAFTS ) 


Thursday, October 24, 2013

शांतिस्तूप की ओर - 11 नंबर की बस से धौली पहाड़ी का सफर

धौली शांति स्तूप के बाहर ( 1991) 
पुरी से भुवनेश्वर तक का रास्ता समंदर के साथ साथ चलता है। जुलाई के महीने में हल्की हल्की बारिश के बीच गरमी छूमंतर थी और सफर सुहाना लग रहा था। जुलाई 1991 का समय। हम पुरी से श्रीराम बस सेवा बुक कर ओडिशा दर्शन पर निकले थे। हमारे गाइड बड़ी ही मजेदार शैली में आसपास के स्थलों के बारे में जानकारी दे रहे थे। कोणार्क के सूर्य मंदिर, पीपली गांव, चंद्रभागा समुद्र तट के बाद हमारी अगली मंजिल थी धौली पहाड़ी। हमारे गाइड ने बताया कि ये बस शांति स्तूप तक नहीं जाएगी। पार्किंग में बस रूक जाएगी उसके बाद आपको आगे का सफर 11 नंबर की बस से करना होगा। 11 नंबर की बस। मन में कौतूहल हुआ। ये कौन सी बस है। थोड़ा दिमाग घुमाने पर समझ में आया। आपके दो पांव। कदम ताल करते हुए हम धौली की पहाड़ी पर स्थित शांति स्तूप पहुंचे।

धौली में है कलिंग युद्ध की यादें
ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से कुछ किलोमीटर पहले पुरी भुवनेश्वर मार्ग पर है धौली पहाड़ी। धौली पहाड़ी पर विशाल शांति स्तूप बना है जो कलिंग युद्ध की याद दिलाता है। इस युद्ध के बाद महान सम्राट अशोक का ह्रदय परिवर्तन हुआ था और उसने आगे सम्राज्य विस्तार के उद्देश्य से युद्ध कर खून नहीं बहाने का संकल्प लिया था। हालांकि इसका मतलब यह कत्तई नहीं था कि अशोक ने कायरता का साथ दिया था।



धौली में बने इस विशाल शांति स्तूप के चारों ओर अलग-अलग मुद्राओं में बुद्ध की चार मूर्तियां हैं। यहां भगवान बुद्ध की लगी प्रतिमाएं संगमरमर की है। स्तूप में जातक कथाओं से जुड़े हुए प्रसंग पत्थरों पर उकेरे गए हैं। यहां पत्थरों पर तराशा गया हाथी का मुख भी है। साथ ही शांति स्तूप में शेर की प्रतिमाएं भी बनी हैं। अशोक के तेरहवें अभिलेख के अनुसार उसने अपने राज्याभिषेक के आठ वर्ष बाद कलिंग युद्ध लडा। कलिंग विजय उसकी आखिरी विजय थी। यह युद्ध 262-261 ईस्वी पूर्व में लड़ा गया।

शांति स्तूप के चारों ओर हरियाली का सुंदर नजारा मनमोहक है। काफी लोग इसे धौली बौद्ध मंदिर भी कहते हैं।

खून से लाल हो गई थी नदी
शांति स्तूप से नीचे दया नाम की नदी बहती दिखायी देती है। कहा जाता है कलिंग युद्ध के समय ये नदी ओडिशा के पराजित हुए सैनिकों के खून से लाल हो गई थी। इस नदी की रक्त रंजित जलधारा का देखकर अशोक मन विक्षिप्त हो गया। यहां अशोक के काल राजकीय आदेशों को भी पढ़ा जा सकता हैं। कलिंग युद्ध के बाद अशोक की शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की थी जो यहां एक पत्थर पर खुदी हुई  है। धौली का बौद्ध स्तूप  सुबह 6 बजे से रात के आठ बजे तक खुला रहता है।

इधर कुछ सालों से ओडिशा सरकार के पर्यटन विभाग की ओर से ऐतिहासिक धौली पहाड़ पर कलिंग महोत्सव का आयोजन किया जाने लगा है। तीन दिन तक चलने वाले इस महोत्सव देश भर के कलाकार शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति देते हैं। शांति के सुर फूटते हैं, लोग मगन हो जाते हैं। धौली पहाड़ी के रास्ते में काजू के पेड़ दिखाई देते हैं। हालांकि आप इन्हें तोड़कर खा नहीं सकते। क्योंकि काजू के बारे में कहा जाता है कि इसके फलों की प्रोसेसिंग होती है जिससे इसका खट्टापन दूर किया जाता है फिर ये खाने लायक हो पाता है।




( DHAULI, ODISHA, BUDDHA STUP, KALINGA WAR, ASHOKA  ) 


Tuesday, October 22, 2013

सेबों का राजा - किन्नौर के सेब


वैसे तो सेब अपनी गुणवत्ता के लिए फलों में खास स्थान रखता है। पर हर जगह के सेब की अपनी खासियत होती है। भारत में उत्पादित होने वाले सेब में हिमाचल प्रदेश के किन्नौर के सेब अपनी प्राकृतिक मिठासरंग और रसीलेपन के लिए जाने जाते हैं।

कश्मीर में सोपियां जिले का सेब बेहतर माना जाता है। पर करीब 10 हजार फुट की ऊंचाई पर पैदा होने वाले किन्नौर के सांगला और पोह ब्लॉक में पैदा होने वाले इस सेब की दो प्रजातियां-रॉयल और गोल्डन-बेहद लोकप्रिय हैं। बीते साल इसका औसतन मूल्य 250 रुपये प्रतिकिलो था और किन्नौर के चांगोमें हर साल एक लाख पेटी (10 किलोग्राम की एक पेटी) सेब का उत्पादन होता है।

हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले के सेब बाजार पहुंचते हैं तो इन्हें दिल्लीचण्डीगढ़ जैसे शहरों के साथ पंजाब और हरियाणा में सबसे ऊंची कीमत मिलती है। अन्य जिलों से आ रहे सेब के मुकाबलले 25-30 फीसदी महगा बिकता है किन्नौरी सेब।
किन्नौर में 10 हजार फुट से अधिक ऊंचे क्षेत्रों में सेब के बागान हैं। ये बागान मुख्यत: सांग्लाकल्पाचांगोनिहार और पूह जिले में हैं। कई बार खुदरा कारोबारी  हिमाचल प्रदेश के अन्य हिस्सों के सेब को किन्नौरी सेब बताकर बेचना शुरू कर देते हैलेकिन सच्चाई यह है कि किन्नौरी सेब अक्टूबर में ही बाजार में पहुंचने शुरू होते हैं।

अगर पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो किन्नौर जिला में हर साल सेब की पैदावार कम हो रही है। इस कारण यहां के बागवानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। वहींहर साल कम हो रही सेब की पैदावार भी बागवानों के लिए भी चिंता का कारण बना गया है। वहींकिन्नौर में लगातार धंस रही जमीन और मौसम में बदलाव भी एक कारण है। 



किन्नौर के सेब की मांग देश के अलावा विदेश में भी है। यह सेब लंबे समय तक सुरक्षित रहता है। जबकि निचले क्षेत्र के अधिक मिठास और रस इस सेब में होता है। अंग्रेजी में कहा गया हैएन एपल ए डेकीप्स द डॉक्टर अवे। मतलब एक सेब रोज खाओ और डॉक्टर को दूर भगाओ। सेब पौष्टिक तत्वों से भरा है। ये न केवल रोगों से लड़ने में मदद करता है बल्कि आपके शरीर को भी स्वस्त रखता है। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि सेब के सेवन से ह्वदय रोगकैंसरमधुमेह के साथ ही दिमागी बीमारियों जैसे पार्किंसन और अल्जाइमर आदि में भी आराम मिलता है।
vidyutp@gmail.com

( APPLE, KINNOR, HIMACHAL, GOLDEN, ROYAL ) 

Sunday, October 20, 2013

मिट्टी के बरतन बड़े लाभकारी

अपने बचपन को याद किजिए, गांव में मिट्टी के बरतनों का खूब इस्तेमाल होता था। गांव में तो कभी घी भी मिट्टी की हांडी से ही निकालती थी और दही का मट्ठा भी मिट्टी की हांडी में ही बना करता था । कुछ दशक पहले तक गांव की शादियों में तो मिट्टी के बर्तन  ही उपयोग में आते थे। घरो में दाल पकाने, दूध गर्म करने चावल बनाने और अचार रखने के लिए मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग भी खूब होता रहा है। 
लोग मिट्टी के बरतनों को भूलते जा रहे थे, पर एक बार फिर महानगरों में मिट्टी के बरतन चर्चा में आ गए हैं। लोगों की जागरुकता मिट्टी के बरतनों को लेकर बढ़ी है। दिल्ली के कई बाजारों में मिट्टी के तवे मिल सकते हैं। इनमें सुविधा के लिए स्टील का हैंडल लगा दिया गया है।बताया जाता है कि देश में आज से दो सौ साल पहले ही मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग होना कम होने लगा। इसकी मुख्य वजह थी एल्युमिनियम के बर्तनों का ज्यादा इस्तेमाल करना, जो कि शरीर के लिए हानिकारक है। भले ही आज के विज्ञान ने हमें अपनी रसोई के लिए बहुत ही आधुनिक और सुविधाजनक बर्तन उपलब्ध कराए है किन्तु ऐसे नॉन स्टिक बर्तन तथा अन्य आधुनिक बर्तन भोजन की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।
देश में प्राचीन काल से ही मिट्टी के बर्तन में खाना बनाने की प्रथा रही है परन्तु आधुनिक युग में यह लाभदाययक प्रथा बहुत कम हो गई है। हम कोई भी सब्जी या फल या आहार लेते समय यह ध्यान रखते है कि वह सबसे अच्छी गुणवत्ता वाला हों। किन्तु उससे भी अधिक जरुरी है कि पकाते वक़्त और पकाने के बाद उसकी वही गुणवत्ता बनी रहें।
सबसे ज्यादा पोषक तत्व
मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाने से ऐसे पोषक तत्व मिलते हैं, जो हर बीमारी को शरीर से दूर रखते थे. इस बात को अब आधुनिक विज्ञान भी साबित कर चुका है कि मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाने से शरीर के कई तरह के रोग ठीक होते हैं। पीतल से 93, कांसे से 97 और मिटटी से 100फीसदी पोषक तत्व मिलते हैं।
 कई बीमारियों में लाभकारी
कई बार बैठे-बैठे लोग बड़ी-बड़ी डकारें लेते रहते हैं। ये गैस की समस्या है। अगर आपको भी बिना खाए-पिए बड़ी-बड़ी डकारें आती हैं तो मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल करें। खासकर रोटी मिट्टी के तवे पर ही बनाकर खाएं। कभी मिट्टी के बरतन में बिरयानी या दाल बनाकर देखें। स्वाद का फर्क मालूम हो जाएगा। अब भारतीय कुम्हारों के विदेशों से भी मिट्टी के बरतनों के आर्डर मिल रहे हैं

वास्तु में के अनुसार भी मंगलकारी
वास्तु शास्त्र के अनुसार मिट्टी के बर्तनों को बहुत शुभ माना जाता है। वास्तुशास्त्र की मानें तो घर में रखें मिट्टी के बर्तन  आपके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाते हैं। इसके साथ ही इनके घर या ऑफिस में होने से गुडलक, धन-वैभव, सफलता आदि सब कुछ हासिल किया जा सकता है। पूजा घर से लेकर विवाह के मौके पर पूजा के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सभी बर्तन मिट्टी के होते हैं।
मिट्टी पर भोजपुरी की इन पंक्तियों पर गौर फरमाएं...  
माटी के मनई हईं,  मटिए के बा घर दुआर,  
मटिए से छोह बा,  मटिए के बनल संसार...

-विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com


Monday, October 14, 2013

संकटमोचन मंदिर – परीक्षा के समय बढ़ जाती थी भीड़

वाराणसी का संकटमोचन मंदिर। इस मंदिर के साथ सैकड़ो यादें जुड़ी हैं। पांच साल तक काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान हर छात्र सबसे ज्यादा इसी मंदिर में मत्था टेकने जाता है। खास तौर पर परीक्षा नजदीक आने पर मंदिर में छात्रों की भीड़ बढ़ जाती है। हनुमान जी करेंगे बेड़ा पार।  खास तौर पर जिन छात्रों की परीक्षा की तैयार कमजोर रहती थी वे संकटमोचन ज्यादा पहुंचते थे। हमारे कुछ साथी तो हर मंगलवार और शनिवार बिना नागा संकटमोचन के दर्शन करने जाते थे।
 तो 1990 से 1995 के दौरान में मैं भी अनगिनत बार संकटमोचन मंदिर में गया। बीएचयू के लंका गेट से मंदिर की दूरी एक किलोमीटर है। कई बार संकटमोचन मंदिर के पास स्थित महेंद्रवी छात्रावास में साइकिल लगाकर हमलोग मंदिर में जाते थे हनुमान जी के दर्शन करने। खास तौर पर संकटमोचन संगीत समारोह के दौरान तो मैं पांच रातें मंदिर परिसर में ही गुजार देता था। इस दौरान देश के चोटी के शास्त्रीय साधकों को यहां सुनने का मौका मिला। पांच दिनों तक चलने वाला यह देश का प्रमुख शास्त्रीय आयोजन है। यहां बड़े शास्त्रीय साधन बिना किसी शुल्क के अपनी प्रस्तुति देने आते हैं, तो नए कलाकार इस मंच पर एक बार अपनी कला की प्रस्तुति देने का मौका चाहते हैं।
यहां हमने पंडित शिवकुमार शर्मा (संतूर) पंडित जसराज, सुलक्षणा पंडित, तबला वादक सुभाष निर्वाण जैसे अनगिनत नामों का कला प्रदर्शन देखा। 2006 में संकटमोचन परिसर में आतंकी हमले के बाद अब यहां सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। मंदिर के प्रवेश द्वार में बदलाव दिखाई देता है। पहले इतनी सुरक्षा नहीं हुआ करती थी।

यहां राम और हनुमान विराजते हैं साथ-साथ
वाराणसी का संकटमोचन हनुमान मंदिर काशी के प्रसिद्ध मंदिरों में शामिल है। यह मंदिर ऐतिहासिकआध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है। विशाल परिसर में यहां हनुमान जी और रामचंद्र जी का मंदिर स्थित है। काशी प्रवास के दौरान रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने आराध्य हनुमान जी के कई मंदिरों की स्थापना की। उनके द्वारा स्थापित हनुमान मंदिरों में से एक संकटमोचन मंदिर भी है। यह मंदिर भक्ति की शक्ति का अदभुत प्रमाण देता है। इस मंदिर में स्थापित मूर्ति को देखकर ऐसा आभास होता है जैसे साक्षात हनुमान जी विराजमान हों।

तुलसीदास ने यहां रचे थे पद - मूर्ति के बारे में कहा जाता है कि इसे कवि गोस्वामी तुलसीदास ने स्वयं अपने हाथों से गढ़ा था और तब एक छोटा-सा मंदिर बाद में विस्तृत होता गया। ऐसी भी मान्यता है कि 16वीं शताब्दी में तुलसीदास ने पवित्र हिंदू ग्रंथ रामचरितमानस् का एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा वहीं रहकर लिखा था। मान्यता है कि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस का कुछ अंशसंकटमोचन मंदिर के पास विशाल पीपल के पेड़े के नीचे बैठकर लिखा था।

संकटमोचन हनुमान मंदिर में भगवान हनुमान के गले में गेंदे के फूलों की माला सुशोभित रहती है। इस मंदिर की एक अद्भुत विशेषता यह हैं कि भगवान हनुमान की मूर्ति की स्थापना इस प्रकार हुई हैं कि वह भगवान राम की ओर ही देख रहे हैंजिनकी वे निःस्वार्थ श्रद्धा से पूजा किया करते थे। भगवान हनुमान की मूर्ति की विशेषता यह भी है कि मूर्ति मिट्टी की बनी है।संकटमोचन महराज कि मूर्ति के हृदय के ठीक सीध में श्री राम लला की मूर्ति विद्यमान हैऐसा प्रतीत होता है संकट मोचन महराज के हृदय में श्री राम सीता जी विराजमान है। मंदिर का निर्माण साल 1611  के आसपास हुआ माना जाता है। चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यहां हनुमान जयंती धूम-धाम से मनाई जाती है। 
संकटमोचन के लड्डू - 
मंदिर परिसर में प्रसाद की दुकानें भी है। संकटमोचन के बेसन लड्डू श्रद्धालुओं में काफी लोकप्रिय है। इसके लिए कूपन लेना पड़ता है। 
मंदिर परिसर में विवाह आदि संस्कार भी अत्यंत सस्ती दरों पर कराए जाते हैं। हर साल हनुमान जयंती के मौके पर संकटमोचन मंदिर परिसर में पांच दिन तक चलने वाला शास्त्रीय संगीत समारोह चलता है। इसमें देश के प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक और वादक पहुंचते हैं।

राम मिलेंगे कीर्तन में मंदिर में रोज शाम को अक्सर कीर्तन होता है। तब यहां आस्था का सुंदर वातावरण दिखाई देता है। यहां लिखा है राम मिलेंगे कीर्तन में। राम मंदिर और हनुमान मंदिर के बीच के विशाल कूप स्थित है। मंदिर परिसर में हरित वातावरण है। इस हरियाली में बड़ी संख्या में बंदर भी निवास करते हैं। श्रद्धालुओं को तनिक उनसे सावधान रहना पड़ता है।
कैसे पहुंचे - मंदिर वाराणसी के दुर्गाकुंड क्षेत्र में स्थित है जो प्रख्यात काशी हिंदू विश्ववविद्यालय के भी काफी नजदीक है। वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन से शेयरिंग आटो या सिटी बस से आसानी संकटमोचन पहुंचा जा सकता है।  हर मंगलवार और शनिवार को मंदिर में अन्य दिनों की अपेक्षा श्रद्धालुओं की ज्यादा भीड़ रहती है।
 विशाल परिसर
8.5 एकड़ मे फैला है संकटमोचन मंदिर का परिसर
2006 में मंदिर ने आतंकवादी हमला झेला था। शहर तीन विस्फोटों से एक विस्फोट मंदिर में हुआ था।
07 मार्च को जब मंदिर पर हमला हुआ तब मंदिर में आरती हो रही थी।

 -vidyutp@gmail.com
(SANKATMOCHAN HANUMAN TEMPLE, VARANASI ) 

Tuesday, October 8, 2013

पीएम के तौर पर सादगी भरा जीवन था नेहरू का

इसी कमरे में नेहरु जी ने आखिरी सांस ली थी।
आठ फरवरी 1916 को वसंत पंचमी के दिन पंडित जवाहर लाल नेहरु का विवाह कमला कौल ( शादी के बाद में नेहरु बनीं)  के साथ हुआ था। तो आइए चलते हैं तीन मूर्ति भवन जहां पंडित नेहरु ने आखिरी वक्त गुजारा। उनका बेडरूम अध्ययन कक्ष और बैठक देखकर प्रतीत होता है कि वे पीएम के रूप में सादगी भरा जीवन जीते थे। 

तीन मूर्ति भवन के पहली मंजिल पर एक कमरा दिखाई देता है। इसमें एक लकड़ी का सिंगल बेड पड़ा है। 27 मई 1964 इसी कमरे में दिल का दौरा पड़ा और भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू नहीं रहे।  इससे पहले 1963 में उन्हें पहली बार दिल का हल्का दौरा पड़ा था। फिर जनवरी 1964 में उन्हें और कमजोर कर देने वाला दौरा पड़ा। पर 27 मई को तीसरा दौरा पडा जिसमें वे नहीं बच सके।
पंडित नेहरू का अध्ययन कक्ष 
पंडित जवाहरलाल नेहरू 1947 में स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। आजादी के पहले गठित अंतरिम सरकार और आजादी के बाद 1947 में भारत के प्रधानमंत्री बने और 27 मई 1964 को उनके निधन तक वे इस पद पर बने रहे। पंडित जवाहर लाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर 1889 में इलाहाबाद में हुआ था। इलाहाबाद के आनंद भवन में उनका बचपन गुजरा तो तीनमूर्ति भवन में आखिरी दिन। ये दो भवन उनके जीवन के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।
तीन मूर्ति भवन की दो मंजिला इमारत लंबे समय तक देश की सत्ता का केंद्र रही। यहां एक दर्शक के तौर पर पहली मंजिल पर आप नेहरू जी का अध्ययन कक्ष देख सकते हैं। लकड़ी की एक बड़ी समान्य सी टेबल। कमरे में चारों तरफ अलमारियों में किताबें। यहां नेहरू जी देर रात तक अध्ययन करते या फिर किताबें पढ़ते रहते। प्रधानमंत्री रहते हुए भी पढ़ना उनका प्रिय शगल था।
तीन मूर्ति भवन में प्रधानमंत्री का मुलाकात कक्ष 

तीन मूर्ति भवन के इस प्रधानमंत्री निवास का एक और कमरा है उनकी बैठक। ये कमरा आकार में अपेक्षाकृत बड़ा है। इसमें सोफा और पीछे कुछ लंबी लंबी बेंच लगी है। इस कमरे की सजावट भी एक दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के  प्रधानमंत्री निवास के हिसाब से देखें तो सादगी भरी है।


तीन मूर्ति भवन का गोलचक्कर, यहां लगी हैं तीन फौजियों की मूर्तियां..
अटल जी ने दी थी शानदार श्रद्धांजलि- नेहरु के निधन के बाद  भाजपा नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जो श्रद्धांजलि नेहरू को दीउसे भी अपने आप में एक यादगार भाषण कहा जा सकता है। वाजपेयी ने कहा, "एक सपना अधूरा रह गयाएक गीत मौन हो गया और एक लौ बुझ गई. दुनिया भर को भूख और भय से मुक्त कराने का सपनागुलाब की खुशबू और गीता के ज्ञान से भरा गीत,और रास्ता दिखाने वाली लौ कुछ भी नहीं रहा। वाजपेयी ने एक बार फिर कहा था- नेहरू से बड़ा डेमोक्रेट मैंने देखा नहीं।
वसंत के मौसम में अगर तीन मूर्ति भवन जाएं तो आपको यहां किस्म किस्म के फूल खिले मिलेंगे। इन फूलों को देखकर आप आनंदित हो उठेंगे। कभी इसी उद्यान से पंडित नेहरू अपने कोट में लगाने के लिए फूल चुना करते थे। तो आइए बात करते हैं फूलों की...
जिंदगी है बहार फूलों की...दास्तां बेशुमार फूलों की...
तुम क्या आए तसव्वुर में..आई खुशबू हजार फूलों की।
- विद्युत प्रकाश मौर्य

Wednesday, October 2, 2013

दक्षिण भारत में हिंदी से चलता है काम

अगर आप सोचते हैं कि दक्षिण भारत में घूमते हुए आपका हिंदी बोलकर ही काम चल सकता है तो आप सही हैं . वास्तव में दक्षिण भारत में हिंदी तेजी से लोकप्रिय हो रही है। आप दक्षिण भारत के तमाम पर्यटक स्थलों पर जाएं आपका काम हिंदी बोलकर चल सकता है। कोच्चि, त्रिवेंद्रम के होटल वाले, आटो वाले और दुकानदार हिंदी बोलते, समझते हैं। कन्याकुमारी तमिलनाडु में है लेकिन वहां हर तरफ हिंदी समझी जाती है। दुकानों के साइन बोर्ड भी हिंदी में दिखाई देते हैं। दक्षिण के राज्य तमिलनाडु के परंपरागत शहर मदुरै में रेलवे स्टेशन के बाहर होटलों के साइन बोर्ड और विजिटिंग कार्ड पर हिंदी में नाम प्रकाशित है।
मदुराई में रेलवे स्टेशन के आसपास होटलों के बाहर हिंदी में लिखा दिखाई देता है- यहां कमरे किराए पर मिलते हैं। जाहिर है यह बाजार का असर है। उत्तर भारत के ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करने की होड़ लगी है। शापिंग माल्स और शोरूम के सेल्समैन हिंदी बोलते हैं। जिन सेल्समैन को हिंदी आती है उन्हें आसानी से नौकरी मिल जाती है। मैं मदुरै एक सेल में घुसता हूं। मैं हिंदी में संवाद शुरू करता हूं। तुरंत एक हिंदी वाला सेल्समैन हाजिर हो जाता है। वह पूछता है कहिए क्या सेवा करूं। सेल्समैन ने कहा उसे चार भाषाएं आती है। इस प्लस प्वाइंट के कारण उसे वेतन ज्यादा मिलता है। वह एक नौकरी छोड़े तो कई नौकरियां उसे आफर हो जाती हैं। रामेश्वरम शहर में सारे आटो रिक्शा वाले हिंदी समझ और बोल लेते हैं।

ऊटी के बोटानिकल गार्डन में...
हिल स्टेशन ऊटी में जाकर ऐसा लगता ही नहीं कि आप किसी दक्षिण के शहर में हैं। हर दुकान, हर फुटपाथ पर सामान बेचने वाले को हिंदी आती है। होटलों के रिसेप्शन पर भी आपका काम हिंदी बोलकर चल सकता है। वहीं तिरूपति में हिंदी को लेकर कोई समस्या नहीं आती। बेंगलुरु और मैसूर में आप हिंदी बोलकर आराम से काम चला सकते हैं। दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार के लिए दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा कई दशक से सक्रिय है। इस संस्था को डिम्ड यूनीवर्सिटी का दर्जा है। यह कई तरह के कोर्स कराता है। अब हर साल तमिलनाडु में लाखों लोग हिंदी  का पाठयक्रम कर रहे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे जान गए हैं कि तमिलनाडु से बाहर जाने रोजी रोजगार पाने के लिए हिंदी जानना जरूरी है। दक्षिण में अब टेलीविजन, फिल्मों और लगातार सैलानियों की आवाजाही के कारण हिंदी का प्रसार दक्षिण में खूब हो रहा है। 
दक्षिण में भी हैं हिंदी के अखबार:
अगर अखबारों की बात करें तो बेंगलुरु से हिंदी दैनिक अखबार राजस्थान पत्रिका प्रकाशन दो दशक से हो रहा है। पत्रिका अपना चेन्नई संस्करण भी शुरू कर चुका है। साल 2012 की यात्रा में  मैंने वहां दक्षिणभारत राष्ट्रमत नामक नया अखबार देखा जो बहुत अच्छे लेआउट डिजाइन में प्रकाशित हो रहा है। यह अखबार भी बेंगलुरु के साथ चेन्नई से भी प्रकाशित होता है। धीरे धीरे इन अखबारों के पाठक बढ़ रहे हैं।



-  ----  विद्युत प्रकाश मौर्य  
http://www.dbhpsabha.org/   

( (HINDI, SOUTH, KERALA, TAMILNADU )