Sunday, September 8, 2013

कुरूक्षेत्र नरकातारी तीर्थ और बाणगंगा

कुरूक्षेत्र में थानेसर से ज्योतिसर के रास्ते में 5 किलोमीटर की दूरी पर नरकातारी तीर्थ स्थित है। वर्तमान में नरकातारी तीर्थ में आप वाणगंगा देख सकते हैं जो एक कुएं के समान है। यहां परिसर में कई मंदिर बने हैं। यहां भीष्म पितामह की माता गंगाजी की मूर्ति, बाण शैय्या पर लेटे भीष्म पितामह की विशाल मूर्ति, पांचों पांडव और द्रौपदी की मूर्तियां स्थापित है। परिसर में 26 फीट ऊंची हनुमान जी की भी विशाल मूर्ति है।
कहा जाता है महाभारत के युद्ध में घायल भीष्म पितामह बाण शैय्या पर लेटे थे तब उन्होंने अर्जुन से पानी मांगा। अर्जुन ने यहीं भूमि में शक्तिशाली बाण मारा तो भूमि से गंगा का एक स्रोत फूट पड़ा। पुराणों के अनुसार महाभारत का युद्ध खत्म होने के बाद पांडव हस्तिनापुर चले गए। एक माह 26 दिन बाद नरकातारी तीर्थ पर पांच पांडव द्रौपदी व नारद जी कई ऋषियों समेत भीष्म से मिलने पहुंचे। यहीं पर भीष्म पितामह ने महाभारत का शांतिपर्व और विष्णु सहस्त्रनाम सुनाया था। भीष्म पुराणों के बहुत बड़े ज्ञाता थे।
भीष्म जब महाभारत के युद्ध 10वें दिन घायल होकर गिर पड़े तो उस समय सूर्य दक्षिणायन था इसलिए वे परलोक नहीं जाना चाहते थे। उन्हें पिता शांतनु से इच्छा मृत्यु का वरदान मिला हुआ था। लिहाजा वे अर्जुन द्वारा बनाई गई बाणों की शैय्या पर ही लेटे रहे।

 यहां किया था भीष्म ने देहत्याग


युद्ध समाप्त होने के बाद जब सूर्य उत्तरायण हो गए तब माघ मास शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को नरकातारी में ही भीष्म ने अपने प्राण त्यागे। भीष्म महाभारत में सबसे बलशाली पुरूष थे। वे एक पल में युद्ध को खत्म कर सकते थे, लेकिन उन्होंने शस्त्र नहीं उठाने का प्रण ले रखा था। कहा जाता है भीष्म ने लगातारा गायत्री मंत्र के उपासना से ये शक्तियां अर्जित की थीं। भीष्म ने अर्जुन को वरदान दिया था कि यदि कोई व्यक्ति पाप का अन्न खा ले, उसका मन मलिन हो जाए तो मेरे दर्शन मात्र से व निर्मल हो जाएगा।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य


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