Saturday, January 12, 2013

प्रलयकाल में भी लोप नहीं होता काशी का - काशी विश्वनाथ मंदिर (07)

उत्तर प्रदेश में गंगा के तट पर बसी काशी को तीनो लोकों से न्यारी कहा गया है। यहां दशाश्वमेध घाट के पास है काशी विश्वनाथ का मंदिर। काशी विश्वनाथ का स्थान बारह ज्योतिर्लिंग में सातवें स्थान पर आता है। कहा जाता है इस नगरी का प्रलयकाल में भी लोप नहीं होता। उस समय भगवान शिव इस नगरी को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं।
इस नगरी को आदि सृष्टि स्थली कहा गया है। इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने आशुतोष (शिव) को प्रसन्न कर सृष्टि के सृजन के लिए यज्ञ किया था। फिर उनके शयन करने पर उनके नाभि कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए जिन्होंने सारे संसार की रचना की। इसी वजह से काशी शिव की प्रिय नगरी है।
इस जगह शिव ने अपने मुक्तिदायक ज्योतिर्लिंग को खुद स्थापित किया है। इसे विश्वेश्वर कहते हैं। यानी सारी दुनिया के ईश्वर। अगस्त्य मुनि ने भी विश्वेश्वर की आराधना की थी।
कहा जाता है काशी विश्वनाथ मंदिर की स्थापना आदि शंकराचार्य ने अपने कर कमलों से की थी। लेकिन इस मंदिर को औरंगंजेब ने तुड़वाकर वहां मस्जिद बनवा दी। ये अब ज्ञानवापी मस्जिद के नाम से जानी जाती है। इसकी नीचे की संरचना अभी भी स्पष्ट तौर पर मंदिर की है।


विश्वनाथ मंदिर का प्रवेश द्वार। 
 इसके ठीक बगल में इंदौर की महारानी अहिल्या बाई ने वर्तमान काशी विश्वनाथ का सुंदर मंदिर बनवाया। यह मंदिर 1780 का बना हुआ है। इस मंदिर का शिखर सौ फीट ऊंचा है। इस मंदिर के शिखर में पंजाब के महाराजा रणजीत ने स्वर्ण मंडित करवाया। ये मंदिर की व्यवस्था उत्तर प्रदेश सरकार देखती है। मंदिर के लिए आईएएस प्रशासक नियुक्त होता है। मंदिर में गैर हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है। ऐसा यहां लगे एक बोर्ड पर लिखा भी है।
साल 1785  में तत्कालीन गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स के आदेश से  नवाब अली इब्राहीम खां ने मन्दिर के सिंहद्वार के सामने नौबतखाना (स्थानक) बनवाया। यहां समय-समय पर विभिन्न वाद्यों का वादन श्री विश्वनाथ जी के पूजन के अवसर पर किया जाता है।
काशी विश्वनाथ मंदिर का परिसर एक बीघा, 9 बिस्वा, 6 धुर जमीन पर है। इस परिसर में विश्वेश्वरनाथ मंदिर, गंगेश्वर, गंगादेवी, हनुमान जी, नन्दी जी, गौरी शंकर, गणेश, महाकालेश्वर, महेश्वर, श्रृंगार गौरी के मंदिर हैं। मंदिर परिसर में ज्ञानवापी कूप भी है।

1558 में टोडरमल ने मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था ।
1669 में औरंगजेब ने आक्रमण कर इस मंदिर को क्षति पहुंचाई थी।
1780 में इंदौर की महारानी अहिल्या बाई द्वारा इस मंदिर पुनर्निर्माण कराया

1835 में 22 टन सोने से पंजाब के राजा रणजीत सिंह ने मंदिर के शिखरों को स्वर्णमंडित करवाया था।

कैसे पहुंचे - वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी 7 किलोमीटर है। काशी विश्वनाथ का मंदिर वाराणसी में गोदौलिया चौराहा के पास है। मंदिर में प्रवेश के दो मार्ग हैं। एक बांस फाटक रोड की तरफ से तो दूसरा दसाश्वमेध रोड की तरफ से। पतली गलियों से होकर मंदिर पहुंचने का मार्ग है। इस गली को विश्वनाथ गली कहते हैं। गली में सुंदर बाजार भी है। विश्वनाथ मंदिर के पास ही मां अन्नपूर्णा का मंदिर है। यहां अखंड अन्न क्षेत्र भी चलता है। कहा जाता है मां अन्नपूर्णा के आशीर्वाद से काशी में कोई भूखा नहीं सोता। श्री काशी विश्वनाथ की वेबसाइट पर जाएं- http://www.shrikashivishwanath.org/en/online/live.aspx

खुलने का समय 
काशी विश्वनाथ मंदिर सुबह 3 बजे मंगला आरती केसाथ खुलता है। रात्रि 10.30 बजे मंदिर शयर आरती के साथ बंद होता है। 
नया काशी विश्वनाथ मंदिर - काशी विश्वनाथ मंदिर से नौ किलोमीटर आगे काशी हिंदू विश्वविद्यालय परिसर में नया काशी विश्वनाथ मंदिर बनाया गया है। यह मंदिर बीएचयू परिसर के बीचों बीच स्थित है। 25 एकड़ परिसर में बना ये मंदिर भव्य है। इसका गुंबद 252 फीट ऊंचा है। मंदिर पूरी तरह संगमरमर पत्थरों से बना है।
बीएचयू स्थित विश्वनाथ मंदिर की दीवारों पर पूरी श्रीमदभागवत गीता संगमरमर पट पर उकेरी गई है। इस मंदिर का निर्माण काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की प्रेरणा से हुई है। वाराणसी आने वाले सैलानी और श्रद्धालु इस मंदिर के दर्शन करने जरूर पहुंचते हैं।    
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-   ------ माधवी रंजना


(JYOTIRLINGAM, TEMPLE, SHIVA, VARANASI, BHU ) 

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