Thursday, November 27, 2014

बूढ़ा केदार –पांडवों को गोत्रहत्या के पाप से मुक्ति मिली ( 05)

उत्तराखंड का केदारनाथ शिव के 12 ज्योतिर्लिंग में पांचवे स्थान पर आता है। पर यहां पंच केदार की संकल्पना है। पांच केदार में से एक है बूढ़ा केदार। 
उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से जाना जाता है। बदरीकेदार, गंगोत्री और यमुनोत्री चार धामों के यहां स्थित होने से यह देश भर के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र भी है, लेकिन राज्य में ऐतिहासिक, पौराणिक मंदिरों की श्रेणी में एक है बूढ़ा केदार मंदिर। श्री बूढ़ा केदार मंदिर टिहरी गढ़वाल जिले में है। वास्तव में उत्तराखंड में पंच केदार मंदिरों के दर्शन का विशेष महत्त्व है। इनमें से एक यहां एक बूढ़ा केदार मंदिर भी हैं।

बालगंगा और धर्मगंगा का संगम -  बूढ़ा केदार में बालगंगा व धर्मगंगा नदियों की संगमस्थली भी है। यह मंदिर बालखिल्या पर्वत और वारणावत पर्वत की परिधि में स्थित सिद्धकूट, धर्मकूट, यक्षकूट और अप्सरा गिरी पर्वत श्रेणियों के मध्य सुरम्य बालगंगा और धर्मगंगा के संगम पर स्थित है। प्राचीन समय में यह स्थल पांच नदियों बालगंगा, धर्मगंगा, शिवगंगा, मेनकागंगा व मट्टानगंगा के संगम पर था। पर अब तीन नदियां दिखाई नहीं देतीं।

बालगंगा और धर्मगंगा के संगम में स्नान करना पुण्यदायी माना गया है। संगम में आरती भी होती है। आगे बढ़कर यही नदी भिलंगना का रूप धारण कर लेती है। यह क्षेत्र हमारे देश का सीमांत क्षेत्र है। इस क्षेत्र को कभी टिहरी रियासत की दूसरी राजधानी के नाम से जाना जाता था। आज भी यह घाटी खेतीबाड़ी की लिहाज से काफी उर्वर  है।

बूढ़ा केदार मंदिर का शिवलिंग। 
उत्तराखंड के चार पवित्र धामों के बीच में स्थित वृद्ध केदारेश्वर मंदिर की यात्रा आवश्यक मानी गई है। प्राचीन काल में तीर्थाटन पर निकले यात्री बूढ़ा केदारनाथ के दर्शन करने जरूर आते थे। कहते हैं बूढ़ा केदारनाथ के दर्शन से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है।

पांडवों को दिया था वृद्ध रूप में दर्शन
वृद्ध केदारेश्वर की चर्चा स्कन्द पुराण के केदारखंड में सोमेश्वर महादेव के रुप में मिलती है। भगवान बूढ़ा केदार के बारे में मान्यता है कि गोत्रहत्या के पाप से मुक्ति पाने हेतु पांडव इसी मार्ग से स्वर्गारोहण हेतु हिमालय की ओर गए। यहीं पर भगवान शंकर ने बूढ़े ब्राहमण के रुप में बालगंगा-धर्मगंगा के संगम पर पांडवों को दर्शन दिया था। दर्शन देने के बाद शिव शिला रुप में अन्तर्धान हो गए। वृद्ध ब्राहमण के रुप में दर्शन देने के कारण ही सदाशिव भोलेनाथ वृद्ध केदारेश्वर या बूढ़ा केदारनाथ कहलाए।

मान्यता के मुताबिक यही वह स्थान है, जहां कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद पांडवों को गोत्र हत्या के पाप से मुक्ति मिली थी। बूढ़ा केदार के बारे में कहते हैं कि बाबा केदार यहां कुछ समय तक रुके थे। एक बंगाली रचनाकार ने बूढ़ा केदार को सागरमाथानाम देकर भी अलंकृत किया है।

विशालकाय शिवलिंग है यहां
बूढ़ा केदारनाथ मन्दिर के गर्भगृह में विशाकाय लिंगाकार फैलाव वाले पाषाण पर भगवान शंकर की मूर्ति और लिंग विराजमान है। कहा जाता है इतना बड़ा शिवलिंग शायद देश के किसी भी मंदिर में नहीं दिखाई देता। मंदिर में  श्रीगणेश जी एवं पांचो पांडवों सहित द्रौपदी के प्राचीन चित्र उकेरे हुए हैं। मंदिर में ही बगल में भू शक्ति, आकाश शक्ति और पाताल शक्ति के रूप में विशाल त्रिशूल विराजमान है।
 नाथ संप्रदाय के होते हैं पुजारी बूढ़ा केदार मंदिर में पुजारी ब्राह्मण नहीं होते बल्कि नाथ जाति के राजपूत होते हैं। नाथ जाति के सिर्फ वही लोग ही पूजा कर सकते हैं, जिनके कान छिदे हों।

मार्गशीष माह में मेला - बूढ़ा केदार में हर साल मार्गशीष माह में मेला आयोजित होता है। कई बार स्थानीय लोग इस मंदिर क्षेत्र को विकसित करने की मांग कर चुके हैं। बूढ़ा केदार में रहते हुए ट्रैकिंग और पक्षियों को नजारा करने का लुत्फ भी उठाया जा सकता है। मंदिर के आसपास कई तरह के रंग बिरंगे पक्षी देखे जा सकते हैं। हर साल बूढ़ा केदार मंदिर में हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। दर्शन करने आज भी सैकड़ों पैदल तीर्थ यात्री हर साल आते हैं।

कैसे पहुंचे - उत्तराखंड में नई टिहरी शहर से बूढ़ा केदार की दूरी 60 किलोमीटर है।
ऋषिकेश और नई टिहरी से बस से यहां पहुंचा जा सकता है। हालांकि टिहरी से बूढ़ा केदार पहुंचने के लिए बहुत अच्छी सड़क नहीं है। घनसाली से यहां के लिए जीप भी मिल जाती है। समुद्रतल से 4400 फीट की ऊंचाई पर स्थित बूढ़ा केदार में सालों भर हल्की सर्दी रहती है इसलिए  गर्म कपड़े लेकर जरूर आएं।

कहां ठहरें - बूढ़ा केदार में ठहरने के लिए लोक जीवन विकास भारती के आश्रम के अलावा कोई और उचित स्थान फिलहाल नहीं है। आप टेहरी में ठहरने का ठिकाना बनाकर बूढ़ा केदार जा सकते हैं।

-           विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 


श्री वृद्धकेदार स्रोत्रम
श्री वृद्धकेदारेश्वरस्तवं आदि केदारेश्वरः प्रभो ।
रुद्राक्षमाल सुविमल लोचन श्री वृद्धकेदारेश्वरम् ।।1
त्रिःशक्ति त्रिशूल विशाल रम्ये,स्थापितं तव सन्निधौः।
अखण्ड दीप प्रज्वल वामे, शोभितं तवः विग्रहम् ।।2
महा शिला पुरस्थः द्रष्टं पंचवक्त्र त्रिलोचनम् ।
चतुः श्पादोपरि स्थितं लिंगाकार महेश्वरम् ।।3
श्री वृद्धकेदार पृष्ठ भागे पंच पाण्डवाः लक्षितम् ।
उपरि शैय्यासने रम्येः धर्म राज युधिष्ठिरम् ।।4
पयःक्षीरः घृतस्नात्वा, गौर सर्षप पूजितम् ।
तस्य सर्वाभीष्ट सिद्धि, श्री बृद्ध केदारेश्वरम् ।।5
यः पूजितं इदं लिंगं,भाव-शक्ति समन्वितम् ।
गोत्र-हत्या-ब्रह्माहत्या स्पर्श मात्रेण मुच्यतम् ।।6
धर्म गंगा-बाल गंगे, कपिल भैरव सुस्थिरम् ।
पंच वाद्यैःघोष शब्दौः श्री बृद्ध केदारेश्वरम् ।।7

प्रातः,सन्ध्या समय निशिदिन देवपूजक वन्दितम् ।
धूप पात्रः घण्ट नादम् चतुर्दिश सुशोभितम् ।।8

( JYOTIRLINGAM, TEMPLE, SHIVA) 

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