Thursday, August 15, 2013

चुस्की चाय की...

....राम  राज  में  दूध  मलाई , किशन  राज  में  घी ,
कलयुग में मिलती है चाय... फूंक फूंक कर पी...

हमारे मुहल्ले के एक चाय दुकानदार ने अपनी दुकान के आगे बड़े बड़े अछरों में ये लाइनें लिखवा रखी हैं। चाय हमारे लोकाचार का अंग बन चुकी है। अब आप किसी के घर जाते हैं तो वह चाय आफर करता है। कई जगह तो बिना पूछे ही चाय आ जाती है। शायद ही कोई आदमी हो जो चाय न पीता है। अगर आप चाय भी नहीं पीते तो क्या पीएंगे।

एक कप टी तुमने दी हमने पी, ही ही ही...चाय धीरे-धीरे गांवों में भी प्रवेश करती जा रही है। पर एक जमाने में लोग गांवों में चाय की जगह लड्डू का मिश्री से आपका स्वागत करते थे। मेरे दादा जी कहते थे जिस घर में चाय मिलने लगी वहां समझा चाह खत्म हो गई। नेह खत्म हो गया। औपचारिकता आ गई। यह भी क्या चाय पीओ और मुंह जला लो।

देश विदेश के चाय उत्पादकों की लाबी बड़ी मजबूत है। वे बड़े-बड़े विज्ञापन कर लोगों को चाय पीने के फायदे बताते हैं। यह बताते हुए नहीं थकते की चाय पीने से शरीर मे फूर्ति आती है। पर चाय के विरोधी कहते हैं कि इसमें निकोटिन है जो धीमा जहर है। आपको धीरे-धीरे मारता है। 
अब भला दिल क्या करे वह किसकी माने चाय पीए या नहीं पीए। कई दफ्तर वाले मुप्त की चाय पीलाते हैं। वे इसलिए पीलाते हैं कि चाय पीकर आपको नींद न आए और आप फटफट फाइलें निबटाते रहें। मालिकों को चाय के इस फायदे का अच्छी तरह पता है। बड़ी-बड़ी चाय कंपनियों की चाय बिक्री कम हो रही है। इसलिए वे चाय को अब नए अंदाज में लेकर आ रही हैं। मसाले दार चाय, कोल्ड, आईस टी आदि आदि। चाय के रोड शो लगाए जा रहे हैं। चाय की कीमतें कम जा रही हैं। चाय के पैकेट के साथ उपहार बांटे जा रहे हैं।
अंग्रेजों ने जब चाय की खेती हिंदुस्तान में शुरू करवाई तो यहां चाय कोई नहीं पीता था। लिहाजा लोगों में चाय की आदत डलवाने के लिए चाय मुफ्त में बांटी जाती थी। तब रोड शो हाथी पर चलता था। हाथी के ऊपर लगे हौदे में चाय बनाकर लोगों को गली-गली में मुफ्त में दी जाती थी। चाय पीजिए और फुर्ती महसूस कीजिए। धीरे-धीरे चाय हिंदुस्तानियों के रसोई घरों में घुसने लगी। अब चाय के बिना बात शुरू नहीं होती। बात खत्म होने से पहले चाय के कई दौर हो जाते हैं। चाय अकेलेपन की दोस्त है। थोड़ी -थोड़ी प्रेमिका जैसी थोड़ी थोड़ी पत्नी जैसी।
 चाय पीजिए और मुस्कुराइए। यह भूल जाइए कि धीरे-धीरे मीठा जहर आपके शरीर में जा रहा है। अब चाय के तलबगार सभी हैं। राजा से लेकर रंक था। चोर से लेकर साधु तक। चाय सारे भेदभाव भुलाकर सबका मेल कराती है। चाय लोगों में प्रेम बढ़ाती है रिश्ते बनाती है। जब कोई पहली बार मिलता है तो आप पूछना नहीं भूलते-चाय लेंगे क्या आप। अगर कोई चाय पीने मना कर दे, तो लोग कहते हैं, बड़ा अजीब आदमी है चाय भी नहीं पीता...
-विद्युत प्रकाशvidyutp@gmail.com

1 comment:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 28 नवम्बर 2015 को लिंक की जाएगी ....
    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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