Saturday, July 13, 2013

स्वंयभू शिवलिंग हैं महाबलेश्वर

शिव सर्वत्र विराजमान हैं। घट घट में, कण कण में। फिर महाबलेश्वर शहर तो शिव के नाम पर ही बसा है। यहां पर पुराने महाबलेश्वर शहर में शिव का प्राचीन मंदिर है। यहां सृष्टि से सृजनकर्ता और संहारक शिव महाबलेश्वर के रूप में विराजमान है। महाबलेश्वर मतलब महा बलशाली। भला महा बलशाली क्यों। इसलिए कि शिव ने अपनी जटाओं में पांच नदियों का जल उठा रखा है। ये पांच नदियां हैं कृष्णा, कोयना, वेणा, सावित्री और गायत्री। वास्तव में ये सभी नदियां भागीरथी का प्रतीक हैं। इन पांचों नदियों को पंचगंगा कहते हैं। पंचगंगा यानी इन पांचो नदियों का उदगम स्थल महाबलेश्वर मंदिर के बगल से ही होता है। इस उदगम स्थल पर पंचगंगा मंदिर बना है।

वैसे तो महाबलेश्वर का मंदिर काफी पुराना बताया जाता है लेकिन मंदिर का भवन 16वीं सदी का बना हुआ बताया जाता है। इसे राजा चंद्रराव ने बनवाया था। मंदिर पांच फीट ऊंचे पत्थर के दीवार के अंदर बना हुआ है। काले पत्थर से बने इस मंदिर के गुंबद की ऊंचाई ज्यादा नहीं है। शिव के मंदिर के दो हिस्से हैं मूल गर्भ गृह और बाहर का प्रांगण। बाहर के प्रांगण में विशाल नंदी बैल विराजमान है। नंदी का निर्माण एकल पत्थर से हुआ है।

स्वंयभू शिवलिंगम - महाबलेश्वर में शिव का लिंगम स्थापित नहीं किया गया है, बल्कि ये स्वंयभू शिवलिंगम है। यहां शिव के लिंगम की आकृति खुरदरे रुद्राक्ष जैसी है। यहां शिव शक्ति के प्रतीक हैं। वे नदियों के उद्गम के स्रोत भी हैं। पहाड़ों और प्रकृति के रक्षक भी हैं। महाबलेश्वर मंदिर के बगल में ही कृष्णा देवी का मंदिर भी है। वे कृष्णा नदी का रूप है। यहां से निकलने वाली पांच नदियों में में कृष्णा सबसे बड़ी नदी है। कृष्णा महाराष्ट्र के बाद दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश में पहुंचती हैं। कई जगह वे अपना रौद्र रुप भी दिखाती हैं। महाबलेश्वर आने वाले श्रद्धालु पंचगंगा नदी में स्नान व पूजना करते हैं।
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------- माधवी रंजना
( (MAHABALESHWAR, SHIVA, MAHARASTRA ) 

   

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