Thursday, June 20, 2013

श्रीकृष्ण विद्युत बनकर मेघमाला में विलीन हो गए

भगवान श्रीकृष्ण के जब धरती को छोड़कर परलोक जाने का वक्त आया तो सोमनाथ में त्रिवेणी नदी के तट पर श्रीकृष्ण के अपने बड़े भाई बलदेव से बड़ी भावुक वार्ता हुई। त्रिवेणी तट वह जगह है जहां,  अरब सागर में समाहित होने से पहले तीन नदियां आपस मिलती हैं। यह हिरण्य कपिला और सरस्वती का संगम है जिसे त्रिवेणी तीर्थ कहा जाता है। श्रीकृष्ण ने बलदेव से कहा, सारी लीलाएं खत्म हो चुकीहैं। भैया अब इस लोक से जाने का वक्त आ गया है। इसके बाद श्रीकृष्ण विद्युत बनकर मेघमाला में विलीन हो गए। इस तरह उन्होंने धरती छोड़ बैकुंठ धाम का सफर तय किया। इसके साथ ही बलदेव ने भी अपना असली रुप ( शेषनाग का ) धारण किया और नदी के मार्ग से पाताल लोक को प्रस्थान कर गए।

त्रिवेणी का तट और गोलोकधाम तीर्थ -  सोमनाथ में त्रिवेणी तट पर तीन नदियों का संगम है। हिरण्याकपिला और सरस्वती। यहां पर सुंदर घाट बनाए गए हैं। इसका पुनरोद्धार भारत के प्रधानमंत्री रहे मोरारजी देसाई के प्रयास से हुआ। हालांकि तट देखने में बहुत खूबसूरत नहीं लगता है। इसके और बेहतर रखरखाव की जरूरत महसूस होती है। तट पर साफ सफाई की कमी नजर आती है। इसके पास ही है गोलोकधाम तीर्थ जिसमें गीता मंदिर समेत कई मंदिर हैं। यहां आप लक्ष्मी नारायण मंदिर, श्रीकृष्ण चरण पादुका मंदिर, श्री गोलोकघाट, काशी विश्वनाथ मंदिर, श्री महाप्रभु जी की बैठक, श्रीभीम नाथ मंदिर और श्री बलदेव जी की गुफा देख सकते हैं। गीता मंदिर में भगवान कृष्ण की आदमकद प्रतिमा है। यहां पीपल वृक्ष के पास श्रीकृष्ण की चरण पादुका बनी है। यहां पर बलदेव की गुफा भी है। कहा जाता है कि यहीं से उन्होंने पाताल लोक के लिए प्रस्थान किया था।
सोमनाथ - त्रिवेणी तट के पास एक बावड़ी जो बुरे हाल में है। 

हिंगलाज गुफा - त्रिवेणी तट पर ही बगल में हिंगलाज गुफा भी है। कहा जाता है कि पांडव अज्ञातवास के दौरान कुछ समय यहां भी रहे। वैसे देश के तमाम हिस्सों के कई स्थलों को राम के वनवास या पांडवों के अज्ञात वास से जोड़ा जाता है। 

शंकराचार्य जी का आश्रम -
  मंदिर के बगल में शारदापीठ है। ये शंकराचार्य श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी का आश्रम है। इस आश्रम में एक संस्कृत विद्यालय का संचालन होता है। इस विद्यालय में देश भर से बच्चे संस्कृत और कर्मकांड पढ़ने आते हैं। पर शर्त है कि वे बच्चे सिर्फ ब्राह्मण कुल के ही होने चाहिए। इसी आश्रम में अध्ययन करने वाले एक कर्मकांड पाठी से मेरी मुलाकात होती है। वे इटावा उत्तर प्रदेश के रहने वाले वाले हैं। यहां पर वे पांच साल का पाठ्यक्रम कर रहे हैं। उम्र होगी कोई 14-15 साल। बता रहे हैं कि पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद गांव में जाकर मंदिर बनवाउंगा। मैंने कहा इससे क्या लाभ होगा। उन्होंने कहा, आपको पता नहीं है मंदिर बनते ही खूब सारा चढ़ावा रोज आएगा और मुझे जीवन भर बिना कमाए उस चढ़ावे कमाई से दाना पानी मिलता रहेगा। मैं उनकी बुद्धिमता के आगे नतमस्तक था। 
विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
(GUJRAT SOMNATH, SRIKRISHNA ) 

सोमनाथ में इनसे भी मुलाकात हुई थी, मंदिर के प्रवेश द्वार पर आसन लगाए बैठे थे बाबा जी....


No comments:

Post a Comment