Saturday, June 15, 2013

पानी का महत्व बताता है रुकमणि मंदिर


कृष्ण की 16 हजार रानियां थीं लेकिन इनमें रुकमणि उनकी पटरानी थीं। द्वारकाधीश मंदिर से दो किलोमीटर आगे कृष्ण की मुख्य रानी यानी पटरानी रुकमणि देवी का मंदिर है। ये मंदिर समंदर के किनारे है। द्वारकाधीश कृष्ण को रणछोड़ भी कहते हैं क्योंकि वे 17 बार जरासंध से युद्ध करने के बाद मथुरा छोड़कर द्वारका में आ बसे। एक बार कृष्ण और रुकमणि ने दुर्बासा ऋषि को अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया। दोनों ऋषि को लेकर अपने घर जा रहे थे। तभी रास्ते में रुकमणि को प्यास लगी। कृष्ण और रुकमणि ने खुद पानी पीया पर दुर्बासा ऋषि को पानी पिलाना भूल गए। नाराज ऋषि ने भोजन करने से मना कर दिया और दोनों को शाप दे डाला। साथ ही ऋषि के शाप के कारण द्वारका नगरी का पानी भी पीने योग्य नहीं है। शाप के कारण रुकमणि को लंबे समय तक जंगल में प्रवास करना पड़ा अपने पति कृष्ण से अलग रहते हुए।

यहां किया जाता है पानी दान 
समंदर के किनारे बना रुकमणि का मंदिर वास्तुकला का सुंदर नमूना दिखता है। इस मंदिर में पानी दान करने की महत्ता है। श्रद्धालु यहां अपनी इच्छानुसार पानी का दान करते हैं। दान में मिले पानी को शहर के गोशालाओं में और जरुरतमंदों तक पहुंचाया जाता है। मंदिर के पास पानी दान की दरें लिखी हुई हैं। श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसान पानी दान करते हैं। अगर आप पानी दान नहीं करना चाहते तो भी आपके लिए पीने का पानी यहां मौजूद रहता है। रुकमणि मंदिर के बाहर बड़ी संख्या में साधु बैठे रहते हैं। श्रद्धालु उन्हें भी दान करते हैं।

गोपी तालाब मंदिर – द्वारका शहर से कुछ किलोमीटर बाहर गोपी तालाब है। यहां एक तालाब है। कहा जाता है कि कृष्ण के साथ रास रचाने वाली गोपियों ने यहां जल समाधि ले ली थी। गोपी तालाब के आसपास कई गोपी तालाब मंदिर हैं। ये सभी मंदिर निजी हैं और सभी के पुजारी मंदिर के अति प्राचीन होने का दावा करते हैं। गोपी तालाब मंदिर से निकाली जाने वाली मिट्टी को सफेद चंदन कहा जाता है। यहां मिट्टी को श्रद्धालु चंदन सरीखे इस्तेमाल के लिए अपने साथ ले जाते हैं।
-    माधवी रंजना   

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