Tuesday, July 22, 2014

कुरुक्षेत्र - यहां हुई थी महाभारत की लड़ाई ((6))


( पहियों पर जिंदगी-6)
सात अक्टूबर की सुबह पानीपत से हमलोग ट्रेन से ही कुरुक्षेत्र पहुंचे। रेलवे स्टेशन से ही सद्भावना मार्च निकाला गया। सद्भावना का अलख जगाते हमलोग पहुंचे शहर के जाट धर्मशाला। इसके पहले पड़ा था सैनी धर्मशाला। इससे लगता है कि कुरुक्षेत्र में बड़ी बड़ी धर्मशालाएं बनवाने का काम अलग अलग बिरादरी के लोगों ने किया है।


कुरुक्षेत्र का  ब्रह्मसरोवर 
सुबह का नास्ता जाट धर्मशाला में हुआ। यहां हमारा परिचय कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रम समन्वयक एपीएस लामा से हुआ। नास्ते के बाद हमारा सद्भावना मार्च आगे बढ़ा। शहर के एक प्रमुख चौराहे पर नुक्कड़ सभा हुई। वहां से आगे नगर के प्रमुख गुरुद्वारे में गए जहां दोपहर का भोजन हुआ। आज मैंने दिन भर मौन व्रत धारण कर रखा था। भोजन के बाद काफी लंबी दूरी पैदल चलने के बाद हमलोग कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय पहुंचे। यहां के बड़े आडिटोरियम के बाहर लॉन में सभा हुई। कुलपति भीमसेन दाहिया ने हमारा स्वागत किया। झांसी की बालिकाएं उस्मी उनियाल और विनीत शर्मा पैदल चलकर काफी थक गई हैं।

यहां से हमारा अगला पड़ाव था कुरूक्षेत्र का ब्रह्मसरोवर जिसके पास ही है श्रीकृष्ण संग्रहालय। गीता के उपदेश और श्रीकृष्ण के जीवन पर ये अद्भुत संग्राहलय है जिसका उदघाटन दो साल पहले ही राष्ट्रपति ने किया है। संग्राहलय में नटवर नागर के जीवन की झांकियों के अलावा उपर की मंजिल में मधुबनी पेंटिंग में श्रीकृष्ण की लीलाएं उकेरी गई हैं जो नयनाभिराम है।



थोड़ी देर आराम के पश्चात मैं और विशाल दूबे जर्मनी की सेंड्रा और मारेन के साथ कैंटीन में चाय पीने गए। शाम की सर्वधर्म प्रार्थना सभा आर्य कन्या विद्यालय में हुई। यहां स्थानीय उपस्थिति कम रही। नेहरु युवा केंद्र की स्वयंसेवक आदित्या सैनी ने सहयोग से होगा सर्वोदय..हे इन्सानों..हे प्रभु की संतानों सहयोग करो... गीत सुनाया। रात को हमलोग वापस जाट धर्मशाला पहुंचे। रास्ते में सुंदर मानसरोवर झील मिली। रात को ही एक ट्रेन से हमलोग दिल्ली वापस आ गए।


Feedback- vidyutp@gmail.com

No comments:

Post a Comment