Tuesday, July 2, 2013

साबरमती में बापू का आश्रम

वही बापू जिन्हे साबरमती का संत कहा जाता है। साबरमती का संत इसलिए किए 1917 में अहमदाबाद के बाहरी इलाके में आश्रम बनाने के बाद बापू यहां लंबे समय तक रहे।
ये आश्रम स्वतंत्रता आंदोलन की प्रमुख घटनाओं का साक्षी बना। दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद बापू ने अंग्रेजों को खिलाफ अपने आंदोलन का संचालन इसी साबरमती आश्रम से किया। इसी आश्रम से ऐतिहासिक दांडी यात्रा आरंभ हुई।
 अहमदाबाद के लोग इसे गांधी आश्रम कहते हैं। रेलवे स्टेशन से आश्रम सात किलोमीटर है। आश्रम साबरमती नदी के किनारे एलिस ब्रिज के पास है। अब आश्रम के पास एक और पुल बन गया है।

 बापू का आश्रम पहले 1915 में कोचरब गांव में शुरू हुआ था। लेकिन वहां स्थितियां अच्छी नहीं थी। बाद में बैरिस्टर जीवन लाल द्वारा दी गई जमीन में साबरमती का सत्याग्रह आश्रम आरंभ हुआ।
साबरमती आश्रम में बापू का वह कमरा है जहां वे 1917 से 1933 तक रहे। आश्रम में बापू द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला चरखा देखा जा सकता है। इसके अलावा कस्तूरबा का कमरा, विनोबा भावे का कमरा और आश्रम में आने वाले मेहमानों के लिए कमरे बने थे।
 नदी के तट पर वह स्थल है जहां शाम को हर रोज प्रार्थना होती थी। साबरमती आश्रम के कई हिस्से मूल स्वरूप में रखे गए हैं। वहीं प्रवेश द्वार के पास बापू के जीवन पर एक बड़ा संग्रहालय बनाया गया है, जहां तस्वीरों में बापू का पूरा जीवन देखा जा सकता है। 
आश्रम में वस्त्र विद्यालय भी है। यहां कुटीर और लघु उद्योगों का प्रशिक्षण दिया जाता था। आश्रम में बापू के जीवन से जुड़ी पुस्तकें खरीदी जा सकती हैं। छोटा सा चरखा महज 100 रुपये में। थोड़ा बड़ा 200 रुपये में खरीद सकते हैं।
साबरमती आश्रम में चारों ओर हरियाली है। वातावरण ऐसा है जहां की हवा से देशभक्ति की बयार बहती नजर आती है। यहां की मिट्टी प्रेरणा देती है। आत्मालोचना करने की, हमें आजादी तो मिल गई लेकिन क्या हम सचमुच देश के लिए जी रहे हैं।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य 

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