Sunday, June 30, 2013

दीव का निर्मल माता चर्च

दीव के आस्था के स्थलों में प्रमुख है निर्मल माता चर्च। यह चर्च 400 साल से अधिक पुराना है जो देश के प्रमुख पुराने चर्च में से एक है। यह एक पुर्तगाली चर्च है। इसे निष्कलंक या निर्मल माता चर्च के अलावा सेंट पाल चर्च के नाम से भी जाना जाता है। इस चर्च का निर्माण 1601 में आरंभ हुआ था। करीब 9 साल बाद 1610 में इसका निर्माण पूरा हुआ। इस चर्च के शिल्प को स्थापत्य कला के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके आगे के हिस्से में अनूठी कलाकृतियों को सज्जित किया गया है। एक बारगी बाहर से देखने में लोगों की नजरें इसके सौंदर्य पर रूक जाती हैं। इसके निर्माण में भारतीय शिल्प कला का भी सुंदर मेल दिखाई देता है।

चर्च के आंतरिक सज्जा में गर्भ गृह, कमान और गुबंद आदि का सौंदर्य भी देखकर अचरज होता है। आतंरिक सज्जा में पुल्पिट या व्यासपीठ में भारतीय स्थापत्य कला की झलक दिखाई देती है। इसमें हिंदू, मुस्लिम और ईसाई संस्कृति की झलक दिखाई दे जाती है। आंतरिक सज्जा में काष्ठ शिल्प का अदभुत काम दिखाई देता है। यह चर्च उस समय बना था जब कोई कंप्यूटर नहीं आया था, तकनीक इतनी विकसित नहीं थी। पर इसका शिल्प देखकर आधुनिक वास्तुकार भी दांतो तले अंगुलियां दबा लेते हैं। चर्च के लकड़ी के दरवाजों पर सुंदर काम दिखाई देता है। चर्च की इमारत सफेद रंग की है।

इसके कमान और गुंबद के निर्माण में इस बात का ख्याल रखा गया है कि इमारत को आंधी और भूकंप से बचाया जा सके। दीव के सेंट पॉल चर्च के अंदर सेंट मेरी की मूर्ति स्थापित है। यह एक बड़े आकार की बर्मा टीक ( सागवान) की लकड़ी से बनी है। डिजाइन की लिहाज से दीव का सेंट पॉल चर्च बॉम एन्ड जीसस बेसिलिका गोवा की तर्ज बना हुआ भी लगता है। दीव में रहने वाले कुछ सौ इसाई समुदाय के बीच ये सबसे बड़ा चर्च है।




 कैसे पहुंचे - यह सुंदर चर्च दीव में दीव के किले के पास स्थित है। जब आप चर्च में पहुंचते हैं तो अदभुत शांति का एहसास होता है। यहां पर मोबाइल फोन बंद रखने के निर्देश हैं। चर्च में नियमित और साप्ताहिक प्रार्थना होती है। दीव का भ्रमण कराने वाले आटो रिक्शा वाले आपको दीव के निर्मल माता चर्च लेकर जाते हैं।

( DIU, CHURCH ) 
    


Saturday, June 29, 2013

समंदर से घिरा दीव का किला

दीव शहर में आकर्षण का मुख्य केंद्र यहां का किला है। दीव की मुख्य शहर को ही फोर्ट रोड कहते हैं। मुख्य बाजार वाली सड़क यानी मरीन ड्राइवर पर चलते जाएं आप किले के मुख्य द्वार तक पहुंच जाएंगे। दीव का किला करीब 57 हजार वर्ग मीटर में फैला है। इस किले को एशिया के पुर्तगालियों के किले में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

दीव का किला तीन दिशाओं में समुद्र से घिरा है। जबकि चौथी दिशा में एक छोटी सी नहर इसकी सुरक्षा करती है। इसी दिशा में किले का प्रवेश द्वार है। इस किले का निर्माण गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने पुर्तगालियों से संधि के तहत मु़गल आक्रमण से बचाव के लिए 1535 में करवाया था। बाद में ये किला पुर्तगालियों के कब्जे में आ गया। 1546 में वायसराय डी जीओ ने इसका पुनर्निर्माण कराया। प्रवेश द्वार के पास है सेंट जार्ज बुर्ज। इस पर कई तोपों की तैनात रहती थीं।
उस दौर में किले की सभी बुर्जों पर तैनात की गई कई तोपों आज भी देखा जा सकता है। इन सभी बुर्जों का नाम ईसाई संतों के नाम पर किया गया है। इन सब तोपों का मुहं समंदर की ओर है। हालांकि बदलते वक्त के साथ धीरे-धीरे इन तोपों का क्षय होता जा रहा है।

किले के अंदर बड़े शस्त्रागार भी बने थे। इसके अलावा संकट काल में भागने के लिए कई सुरंगे भी बनाई गई थीं। दीव के किले में प्रवेश के लिए कोई टिकट नहीं है। अगर आप दीव के किले में पहुंचे तो किले में सबसे ऊंचाई पर बने लाइट हाउस में जरूर जाएं। लाइट हाउस में जाने के लिए दो रुपये का टिकट लेना पड़ता है। इस लाइट हाउस की छत से बहुत दूर का अरब सागर का दिलकश नजारा दिखाई देता है।
राजा रानी जल कुंड - सन 1650 में बने संत लूसिया बुर्ज को किले के पूर्वी छोर पर देखा जा सकता है। संत लूसिया बुर्ज और मुख्य द्वार के बीच राजा रानी जल कुंड बना है। इस कुंड में बरसाती जल संग्रह करने का बेहतरीन इंतजाम किया गया था।
दीव के किले में ही आजकल दीव की जेल बना दी गई है। हालांकि इसमें कैदी कम ही रहते हैं। दीव के इस किले में अमिताभ बच्चन के फिल्म तूफान की शूटिंग हुई है। दीव के इस किले को घूमने के लिए तीन घंटे का वक्त चाहिए। किले के अंदर राज्यपाल का निवास भी बना है।
दीव किले का लाइट हाउस। इस पर जाने के लिए 2 रुपये का टिकट लगता है। -

पानीकोठा - दीव के किले से समुद्र का नजारा देखते ही बनता है। किले के सामने समुद्र के अंदर की दिशा वाले हिस्से में किले जैसी एक और छोटी सी इमारत है। इसे पानीकोठा कहते हैं। सर क्रीक के मुहाने पर बने होने के नाते इसे दूर से ही देखा जा सकता है। स्थानीय लोग पानीकोटा को कालापानी जेल बताते हैं। किले से कुछ दूर ही फेयरी जेट्टी है। जहां से बोट में बैठ कर आप पानी कोटे पर सैर के लिए जा सकते हैं। दीव का टूरिज्म विभाग इसके लिए बोट का संचालन करता है।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य


Friday, June 28, 2013

आईएनएस खुखरी – जरा याद करो कुर्बानी

सुंदर दीव की सुरम्य दर्शनीय स्थलों में एक है चक्रतीर्थ बीच जहां बना है आईएनएस खुखरी (खुकरी) मेमोरियल। यहां यादें हैं एक बड़ी शहादत की। जिन भारतीय  नौ-सैनिकों ने राष्ट्र की सेवा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी, उनके स्म‍रण में टीले पर भारतीय नौ-सेना  के युद्ध-पोत (FRIGATE) आईएनएस खुखरी का स्मारक बनाया गया है I टीला एवं इसके आसपास के क्षेत्र को बहुत ही खूबसूरत तरीके से विकसित कर इसे प्रकाशमान किया गया है।

पाकिस्तान से युद्ध के दौरान 9 दिसंबर 1971 भारत के लिए बड़े सदमे का दिन था। पाकिस्तान के पीएस हैंगर और भारत के आईएनएस खुखरी के बीच दीव समुद्र तट से 40 नाटिकल मील दूर पर मुकाबला हुआ। पाकिस्तानी सबमरीन की ओर से तीन तारपीडो दागे गए। इसे हमारा आईएनएस खुखरी झेल नहीं पाया। उस समय खुखरी में भारत के 18 अफसर और 176 नौसैनिक को अपनी जान गंवानी पड़ी। 

कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला की शहादत - भारतीय नौ सेना के कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला, उस समय खुखरी के कमांडिंग आफिसर थे। इस हमले के बाद खुखरी जहाज अरब सागर में डूब गया। और इस तरह सभी 18 अफसर और 176 सैनिकों ने अरब सागर में जल समाधि ले ली। वह रात पौने नौ बजे का समय था। खुखरी पर मौजूद सभी नाविक और अधिकारी रोज की तरह रेडियो का समाचार सुनने के लिए जुटे थे। जैसे रेडियो पर पहला वाक्य सुना गया – ये आकाशवाणी है अब आप... से समाचार सुनिए, तभी पहला धमाका हुआ।
कुछ खुशकिस्मत फौजी लोग थे जो खुखरी से बचकर निकलने में कामयाब रहे। पर कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला ने जहाज नहीं छोड़ा। वे चाहते तो अपनी जान बचा सकते थे। पर शायद उन्होंने सोचा कि बचकर गया तो देश को क्या जवाब दूंगा कि मैं अपने खुखरी को बचा नहीं पाया। कुछ लोग कहते हैं कि कैप्टन मुल्ला ने खुखरी पर आखिरी वक्त में आत्महत्या कर ली थी। कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला को बाद में मरणोपरांत महावीर चक्र दिया गया। खुखरी से बचे हुए जवानों में से एक ने बाद में एक पुस्तक भी लिखी।

निश्चय ही भारतीय नौ सैनिकों के लिए 1971 का वर्ष दुखद रहा, भले ही हमें पाकिस्तान से युद्ध में विजयश्री मिली लेकिन इस साल युध्द में खुखरी पर सवार 18 अधिकारियों और 176 नाविकों यानी 194 बहादुर फौजियों को देश ने खो दिया।

आईएनएस खुखरी मेमोरियल - 15 दिसंबर 1999 को उन बहादुर सैनिकों की याद में दीव के चक्रतीर्थ बीच  पर आईएनएस खुखरी का मेमोरियल बनाया गया। यहां पर खुखरी का एक माडल भी बनाया गया है।
हमारी मुलाकात रामअवध प्रजापति से होती है, वे 1965 से 1985 तक नौ सेना में रहे। वे बताते हैं कि 1971 में भारत पाकिस्तान युद्ध के समय आईएनएस दीपक पर कराची रीजन में तैनात थे। इसी दौरान हमने रेडियो पर आईएनएस खुखरी के तारपीडो की दुखद खबर सुनी।
कुछ लोग यह भी मानते हैं कि आईएनएस खुखरी धोखे का शिकार हुआ। हमारे सोनार सिस्टम ने पाकिस्तानी तारपीडो को देख लिया था पर सूचना पहुंचाने का सिस्टम काम नहीं कर सका, और देश के बहुत सारे जवानों को शहादत देनी पड़ी। बहरहाल ये बहुत ही मार्मिक कहानी है। बॉलीवुड चाहे तो कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला और उनके साथियों की शहादत पर शानदार फिल्म बना सकता है।
हमले में नष्ट एकमात्र युद्धपोत-  आईएनएस खुखरी एक ब्रिटिश टाईप 14 क्लास का युद्धपोत था। इसका निर्माण जे सेमुअल ह्वाइट ने किया था। यह 1955 का निर्मित था और 16 जुलाई 1958 को भारतीय नौ सेना में कमिशन हुआ था। इसका पेनेट नंबर एफ 149 था। इसकी लंबाई 300 फीट थी और 27.8 नाटिकल मील (51 किलोमीटर प्रति घंटे ) की अधिकतम गति से समंदर में दौड़ने में सक्षम था। भारतीय नौ सेना के इतिहास में यह एकमात्र जहाज है जो तारपीडो हमले में नष्ट हुआ। 
कृपाण कुठार और खुखरी - खुखरी के साथ नौ सेना के पास आईएनएस कृपाण और आईएनएस कुठार तीन युद्धपोत थे जिन्हें सिस्टर शिप कहा जाता था। आईएनएस खुखरी के हादसे में 61 नौ सैनिक और छह अधिकारी अपनी जान बचा पाए थे। खुखरी से बचने के बाद इन लोगों को संयोग से एक नाव मिल गई थी। 14 घंटे खुले समंदर में गुजारने के बाद उनसे संपर्क हुआ और वे लोग बचाए जा सके थे। 

कैसे पहुंचे - चक्रतीर्थ बीच दीव शहर से चार किलोमीटर की दूरी पर हैIयह बीच स्थानीय पर्यटकों के साथ-साथ राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करता है। सैलानियों के लिए यह आनन्दायक विश्राम स्थल है I इस बीच के नजदीक ही एक टीला है, जिसे सूर्यास्त दर्शन स्थल (सन सेट प्वाइंट) भी कहा जाता है।

यहां हुआ था जालंधर का वध - इस स्थल से एक रोचक पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है I ऐसा माना जाता है कि इसी स्थान पर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से असुरराज जालंधर का वध किया थाI बीच के सामने समुद्र में एक छोटा-सा टीला है, जिसे भांस्लोग के नाम से जाना जाता है I कहा जाता है कि वहां पत्थर पर भगवान श्रीकृष्ण के पदचिन्ह हैं Iजब निम्न ज्वार हो तभी इस स्थान पर पहुंचा जा सकता है।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य
-         (INS KHUKRI, INDIAN NAVY, DIU, INDO PAK WAR 1971, TORPEDO )



Thursday, June 27, 2013

दीव के रुमानी समुद्र तट

दीव का नगवा बीच। 
वैसे तो देश में कई राज्यों में समुद्र तट हैं जो सैलानियों की पसंद हैं लेकिन दीव के समुद्र तट की अपनी रुमानियत है। दीव का सबसे लोकप्रिय समुद्र तट है नगवा बीच। दीव के बस स्टैंड से सात किलोमीटर आगे नगवा बीच पर सालों पर शाम को रौनक रहती है। बहुत भीड़ भाड़ नहीं है लेकिन नगवा बीच का सौंदर्य ऐसा है जो यहां आपको घंटो रोकता है। यहां आप लहरों से अठखेलियां कर सकते हैं। नहाने का मजा ले सकते हैं। तट पर नहाने के बाद फ्रेश वाटर बाथरुम भी बने हैं। जो लोग यहीं रहना चाहते हैं तो नगवा बीच पर कुछ होटल भी हैं। नगवा बीच पर वाटर स्कूटर, स्पीड बोट आदि का भी मजा लिया जा सकता है। अगर आप फोर्ट रोड के होटलों में ठहरें हैं तो नगवा बीच जाने और आने का इंतजाम करके जाएं। आप आरक्षित आटो या किराए की बाइक लेकर जा सकते हैं।

जालंधर बीच और चक्रतीर्थ बीच दीव के दूसरे समुद्र तट हैं। यहां नहाने योग्य सुविधा नहीं है। पर घूमने और समंदर के साथ मौन संवाद करने के लिए ये समुद्र तट काफी अच्छे हैं।
घोघला बीच दीव के प्रवेश द्वार पर ही स्थित है। बस स्टैंड के पास समंदर पर बना पुल दीव और घोघला को जोड़ता है। घोघला बीच पर भी होटल हैं और लंबे समुद्र तट पर सुबह या शाम गुजारने के लिए पर्याप्त मौके भी हैं। यहां वाटर स्कूटर या गुब्बारे की सैर का मजा लिया जा सकता है। घोघला बीच पर नगवा बीच की तरह भीड़ भाड़ नहीं होती।
दीव का घोघला बीच। 
हालांकि दीव के समुद्र के पानी में बालू की मात्रा ज्यादा है लेकिन दीव के तट की अपनी खूबसूरती है। कई सैलानियों को ये गोवा से भी ज्यादा अच्छा लगता है। दीव के सुंदर तट एक बार आने वाले सैलानियों को बार बार बुलाते हैं।
-    ---- विद्युत प्रकाश मौर्य   

(DIU, SEA )

Wednesday, June 26, 2013

सपनों सा सुंदर है दीव

गोवा से अलग होने के बाद दमन दीव केंद्र शासित राज्य हैं। हालांकि दमन और दीव के बीच 700 किलोमीटर की दूरी है। पर दीव गुजरात के ज्यादा करीब है।

छुट्टियां बीताने के लिए दीव सिर्फ गुजरातियों को ही नहीं बल्कि देश भर के लोगों को आकर्षित करता है। पूरा दीव आप 25 किलोमीटर में घूम सकते हैं। पर दीव के बस स्टैंड से फोर्ट रोड पर आगे बढ़ने पर दीव का मुख्य बाजार है। यहीं रहने व खाने के लिए प्रमुख होटल हैं। फोर्ट रोड के एक तरफ मद्धम मद्धम हिलोरें लेता समंदर है तो दूसरी तरफ दीव का बाजार।
आप इतिहास की गाथाओं के साथ कुदरत का मधुर संगीत भी सुन सकते हैं दीव में।

दीव 52 हजार की आबादी वाला एक छोटा सा द्वीप है । 30 मई, 1987 को गोवा को राज्यों का दर्जा दिए जाने के बाद दमन और दीव अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। दीव जिले में साक्षरता दर वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार 83.36% है। दीव में 12वीं के बाद कोई स्कूल नहीं है। दीव के छात्रों 12 वीं कक्षा के बाद उच्चतर अभ्यास के लिए 17 किलो मीटर की दूरी पर स्थित ऊना में आर्ट्स और कॉमर्स कॉलेज में जाना पड़ता है । 

दीव में समंदर के किनारे हर जगह सड़क पर बैठने के लिए सुंदर बेंच और बच्चों के लिए झूले लगाए गए हैं। साफ सफाई इतनी है कि देखकर ऐसा नहीं लगता कि हम भारत के ही किसी शहर में हैं। 
फोर्ट रोड पर आगे जाकर दीव का प्रसिद्ध किला है। दीव 1961 तक पुर्तगाल के कब्जे में था। इसलिए किले में पुर्तगालियों से जुड़ी स्मृतियां हैं। पुर्तगाली चर्च के अलावा यहां युद्ध के हथियारों की स्मृतियां हैं। किले के अंदर ही दीव की जेल भी है। दीव में अपराध बहुत कम है इसलिए जेल में कैदी दो चार ही रहते हैं। किले को देखकर लगता है कि इसकी सुरक्षा को अभेद्द बनाने के लिए खूब पुख्ता इंतजाम किए गए थे।

किले को देखकर लगता है कि इसकी सुरक्षा को अभेद्द बनाने के लिए खूब पुख्ता इंतजाम किए गए थे। किले के अंदर भागने के लिए कई सुरंगों का भी निर्माण किया गया है। ये किला पुर्तगालियों का है, लेकिन पुर्तगालियों से पहले भी दीव का इतिहास है।
किला तीन तरफ से समुद्र से घिरा हुआ है। किले के अंदर संत लुसिया बुर्ज और टावर हाउस है। यहां समंदर का नजारा अदभुत दिखाई देता है। किले में प्रवेश का कोई टिकट नहीं है, लेकिन किले में प्रवेश शाम को पांच बजे के बाद बंद हो जाता है।

दीव किले के पास ही दीव का प्रसिद्ध निर्मल माता चर्च है। इसके अलावा दीव में समर हाउस पर बैठकर आप समंदर का नजारा कर सकते हैं। आईएनएस खुखरी की स्मृति में एक माडल दीव में बनाया गया है।
इसके पास ही गंगेश्वर महादेव का मंदिर है। ये दीव का एकमात्र मंदिर है जहां सैलानी जाते हैं। इस मंदिर में सागर की लहरें लगातार शिव लिंग को छूती रहती हैं।
-    ---- विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com

  

Tuesday, June 25, 2013

दीव -समंदर के संगीत के संग डिनर

होटल डीपी में लंच। 
दीव खाने पीने के लिए जाना जाता है। गुजरात में पूर्ण शराबबंदी लागू है। लिहाजा गुजरात के शराब पीने के शौकीन लोग दीव आना पसंद करते हैं। यहां शराब सस्ती भी है और अच्छी भी मिलती है। हालांकि दीव की सड़कों पर रात को शराब पीकर हरकत करते हुए लोग आपको नजर नहीं आएंगे। लिहाजा दीव परिवार के साथ घूमने वालों के लिए सुरक्षित है। शहर की कानून व्यवस्था चुस्त है। दीव पहुंचने पर हमने सबसे पहले मैंगो शेक का स्वाद लिया। गुजरात के केसर आम का मैंगो शेक।

दीव में मैंगो शेक का मजा
फोर्ट रोड पर शेक बनाने वाले अपने बनारस के भाई निकले। हर साल छह महीने दीव में आकर दुकान लगाते हैं। बाकी के छह माह गांव में गुजारते हैं। दोपहर का खाना हमने डीपी रेस्टोरेंट में खाया। 70 रुपये की लिमिटेड थाली। लेकिन खाना सुस्वादु और कई तरह की सब्जियों और छाछ के साथ। हालांकि हम जिस होटल में ठहरे थे, यानी होटल सम्राट और सीडाडे इसका भी अपना रेस्टोरेंट अच्छा है
लेकिन दीव का सबसे लोकप्रिय रेस्टोरेंट है अपना होटल। होटल आलीशान का साथी होटल अपना का रेस्टोरेंट मरीन ड्राइव पर है। हमें बैठने की जगह भी समंदर के तट पर छतरी के नीचे मिली। सुस्वादु गुजराती थाली और उसके साथ जगमगाते दीव का नजारा।
पार्श्व में सुनाई देता समंदर की लहरों का संगीत। इससे खाने का स्वाद और बढ़ जाता है। माधवी और वंश के लिए ये शाम यादगार रही। आसपास के टेबल पर गुजराती, मराठी, पंजाबी परिवार दीव की शाम का आनंद उठा रहे थे।

सालों भर सदाबहार मौसम - दीव का मौसम सालों भर सदाबहार रहता है। गर्मी के मौसम में भी दीव का अधिकतम तापमान 33 डिग्री से उपर नहीं जाता। लिहाजा छोटे से दीव का मौसम हमेशा खुशनुमा बना रहता है। खास तौर पर अगर आप दीव में दो चार दिन की छुट्टियां मनाना चाहते हों तो आपके लिए दीव अच्छा विकल्प हो सकता है।
होटल अपना में डिनर। 

शनिवार और रविवार को होटल महंगे - नए साल के अलावा दीव में हर शनिवार और रविवार को भीड़ ज्यादा होती है। इसलिए होटलों का किराया शनिवार और रविवार को अधिक होता है जबकि बाकी के पांच दिन कम। अगर को 1200 रुपये प्रतिदिन का होटल है तो वह शनिवार और रविवार को 2400 रुपये प्रतिदिन का हो जाता है। अगर दीव आने की योजना बनाएं तो होटल पहले से बुक करा लें तो अच्छा रहेगा।

-    - विद्युत प्रकाश मौर्य   
( (DIU, APNA HOTEL, MANGO SHAKE )

Monday, June 24, 2013

चलो चलें - सपनों से प्यारे दीव में


दीव एक अलग राज्य। एक सपनों का शहर। दीव वेरावल या सोमनाथ से 90 किलोमीटर दूर है। वेरावल से बस से दीव जाया जा सकता है। वैसे डेलवाडा तक मीटर गेज की ट्रेन भी जाती है। वहां से दीव बार्डर छह किलोमीटर रह जाता है। पर सिर्फ एक ट्रेन सोमनाथ से शाम को 4 बजे चलती है। इसलिए हमने गुजरात रोडवेज की बस से दीव के लिए अग्रिम टिकट बुक करा रखा था। बस वेरावल बस स्टैंड से सुबह 10 बजे थी। वेरावल सोमनाथ से 7 किलोमीटर दूर सोमनाथ से बड़ा शहर है। बस स्टैंड के आसपास खाने पीने के लिए कुछ अच्छे विकल्प हैं। वेरावल से दीव तीन घंटे का रास्ता है। रास्ता मनोरम है। सफर में अरब सागर से आने वाली ठंडी हवाएं गर्मी के एहसास को कम करती हैं। वेरावल से टैक्सी या टेंपो से भी दीव जाया जा सकता है। रास्ते में ठीक बीचों बीच कोडीनार नामक शहर आता है।

 दीव  की सीमा आरंभ होने से पहले जूनागढ़ जिले का उना शहर आता है। ये दीव से पहले गुजरात का बड़ा शहर है। यहां से दीव 10 किलोमीटर रह जाता है। दीव कभी गोवा के साथ हुआ करता था। पर गोवा के अलग राज्य बन जाने के बाद अब दमन और दीव अलग केंद्र शासित राज्य हैं। हालांकि दमन मुंबई के पास है और यह दीव से 700 किलोमीटर दूर है। लेकिन राज्य के प्रशासक दमन में बैठते हैं। दीव में कलेक्टर प्रशासन देखते हैं।

उना ने से आगे बढ़ने पर समंदर की ठंडी हवाओं का एहसास बढ़ जाता है। दीव का शानदार प्रवेश द्वार आता है। लिखा है वेलकम टू दीव। इसके बाद आरंभ हो जाती है एक अलग खूबसूरत दुनिया। 

दीव के गेट के पास ही है घगोला बीच। लेकिन दीव का बस स्टैंड दीव बार्डर से लगभग छह किलोमीटर अंदर है। दीव के खूबसूरत बस स्टैंड से हमारा होटल सम्राट कुछ मिनट पैदल चलने की दूरी पर था। यह दीव के दूसरे प्रमुख होटल सीडाडे इन की शाखा है। होटल के स्वीमिंग पुल में नहाकर सफर की थकान दूर हो गई।
-   -    विद्युत प्रकाश - vidyutp@gmail.com   
http://www.diutourism.co.in/

Sunday, June 23, 2013

गुजरात के सोमनाथ शहर में दो दिन...

साल 2013 का मई का महीना। गर्मी अच्छी खासी पड़ रही है। पर हमलोग इस गरमी में गुजरात में घूम रहे हैं। हमने द्वारका से रात की ट्रेन ली है सोमनाथ के लिए। इसका फायदा यह हुआ कि रात भर ट्रेन के वातानुकूलित डिब्बे में सोते हुए हमलोग सुबह सुबह सोमनाथ पहुंच गए। ट्रेन जब सोमनाथ स्टेशन पर पहुंची तो ठीक से उजाला नहीं हुआ था। रेलवे स्टेशन से टायलेट्स गंदे थे। पर समय था जरूरत थी सो नित्य क्रिया से निवृत होकर स्टेशन से बाहर आए। 

सोमनाथ रेलवे स्टेशन से सोमनाथ मंदिर कोई 6 किलोमीटर दूर है। बाहर शेयरिंग आटो रिक्शा मिलने लगे थे। इससे हमलोग सोमनाथ मंदिर के पास पहुंच गए। हमने होटल अवध ऑनलाइन बुक किया था। यह सोमनाथ मंदिर के बगल वाली गली में है। हालांकि सोमनाथ ट्रस्ट की ओर से भी आवास बनाए गए हैं। पर उन्हें ऑनलाइन बुक करने में पेचीदगियां थीं।

 होटल अवध मंदिर के ठीक बगल में है। पर राष्ट्रीय महत्व के इस मंदिर के बगल की गलियां निहायत गंदी हैं। खुली नालियां बदबू कर रही हैं और आसपास सूअर घूम रहे हैं। मंदिर भव्य है पर इसके आसपास स्वच्छता नहीं है। बड़ा दुख हुआ। खैर स्नान से निवृत होकर हमलोग मंदिर में दर्शन करने पहुंचे। सोमवार की सुबह बाबा सोमनाथ के आसानी से दर्शन हुए। मंदिर में प्रवेश को लेकर सुरक्षा कड़ी है। कैमरे मोबाइल आदि लेकर अंदर नहीं जा सकते। मंदिर परिसर में एक पुराना सोमनाथ मंदिर भी है जिसे इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने बनवाया था। दर्शन के बाद मंदिर परिसर में बैठकर हमलोग सागर की लहरों को देखने लगे। बड़ा आनंद आ रहा था।

दर्शन के बाद भूख लगी थी। हमलोग भोजन के लिए पहुंचे लीलावती भोजनालय। मंदिर परिसर में एक गुजराती परिवार ने बताया था कि यहां खाने के लिए सबसे अच्छी जगह लीलावती भोजनालय है। पहुंचने पर पता चला अभी भोजन का समय शुरू नहीं हआ है। थोड़े इंतजार के बाद भोजन शुरू हुआ। थाली 55 रुपये की। खाना सुस्वादु था। आनंद आया। लीलावती ट्रस्ट के निर्माण और प्रबंधन में गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल की बड़ी भूमिका है। खाने के बाद बाहर निकलने पर तेज धूप हो गई थी। सोमनाथ के बाकी मंदिर भी घूमने थे, सो तय किया शाम को घूमेंगे। एक आटोवाले लतीफ भाई से बात हुई। उनसे तय हो गया वे 4 बजे होटल के नीचे आ जाएंगे। लतीफ भाई ठीक 4 बजे पहुंच गए। अगले तीन घंटे उनका साथ रहा। रास्ते में हमें एक जगह लकड़ी की बड़ी बड़ी नावें बनती हुई दिखाई दीं। सोमनाथ में ऐसी नावें बड़े पैमाने पर बनती हैं।

रात्रि विश्राम होटल अवध में ही हुआ। इस होटल के मालिक की शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी के साथ तस्वीर लगी है होटल के रिसेप्सन पर। पता चला कि इलाहाबाद के रहने वाले होटल के प्रोपराइटर महोदय स्वरूपानंद जी के बड़े शिष्य हैं। उनका कारोबार गुजरात में फलफूल रहा है। शाम का भोजन फिर लीलावती भोजनालय में ही रहा। यहां हमें एक श्रद्धालु परिवार फिर मिल गया जो द्वारका में भी हमारे साथ था। अगली सुबह वेरावल बस स्टैंड से हमारी बस थी दीव के लिए सुबह 10.15 बजे। अग्रिम आरक्षण था। सो हम आटो बुक करके बस स्टैंड के लिए चल पड़े। ... जय सोमनाथ।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य

(SOMNATH, GUJRAT, HOTEL AWADH ) 


             

Thursday, June 20, 2013

श्रीकृष्ण विद्युत बनकर मेघमाला में विलीन हो गए

भगवान श्रीकृष्ण के जब धरती को छोड़कर परलोक जाने का वक्त आया तो सोमनाथ में त्रिवेणी नदी के तट पर श्रीकृष्ण के अपने बड़े भाई बलदेव से बड़ी भावुक वार्ता हुई। त्रिवेणी तट वह जगह है जहां,  अरब सागर में समाहित होने से पहले तीन नदियां आपस मिलती हैं। यह हिरण्य कपिला और सरस्वती का संगम है जिसे त्रिवेणी तीर्थ कहा जाता है। श्रीकृष्ण ने बलदेव से कहा, सारी लीलाएं खत्म हो चुकीहैं। भैया अब इस लोक से जाने का वक्त आ गया है। इसके बाद श्रीकृष्ण विद्युत बनकर मेघमाला में विलीन हो गए। इस तरह उन्होंने धरती छोड़ बैकुंठ धाम का सफर तय किया। इसके साथ ही बलदेव ने भी अपना असली रुप ( शेषनाग का ) धारण किया और नदी के मार्ग से पाताल लोक को प्रस्थान कर गए।

त्रिवेणी का तट और गोलोकधाम तीर्थ -  सोमनाथ में त्रिवेणी तट पर तीन नदियों का संगम है। हिरण्याकपिला और सरस्वती। यहां पर सुंदर घाट बनाए गए हैं। इसका पुनरोद्धार भारत के प्रधानमंत्री रहे मोरारजी देसाई के प्रयास से हुआ। हालांकि तट देखने में बहुत खूबसूरत नहीं लगता है। इसके और बेहतर रखरखाव की जरूरत महसूस होती है। तट पर साफ सफाई की कमी नजर आती है। इसके पास ही है गोलोकधाम तीर्थ जिसमें गीता मंदिर समेत कई मंदिर हैं। यहां आप लक्ष्मी नारायण मंदिर, श्रीकृष्ण चरण पादुका मंदिर, श्री गोलोकघाट, काशी विश्वनाथ मंदिर, श्री महाप्रभु जी की बैठक, श्रीभीम नाथ मंदिर और श्री बलदेव जी की गुफा देख सकते हैं। गीता मंदिर में भगवान कृष्ण की आदमकद प्रतिमा है। यहां पीपल वृक्ष के पास श्रीकृष्ण की चरण पादुका बनी है। यहां पर बलदेव की गुफा भी है। कहा जाता है कि यहीं से उन्होंने पाताल लोक के लिए प्रस्थान किया था।
सोमनाथ - त्रिवेणी तट के पास एक बावड़ी जो बुरे हाल में है। 

हिंगलाज गुफा - त्रिवेणी तट पर ही बगल में हिंगलाज गुफा भी है। कहा जाता है कि पांडव अज्ञातवास के दौरान कुछ समय यहां भी रहे। वैसे देश के तमाम हिस्सों के कई स्थलों को राम के वनवास या पांडवों के अज्ञात वास से जोड़ा जाता है। 

शंकराचार्य जी का आश्रम -
  मंदिर के बगल में शारदापीठ है। ये शंकराचार्य श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी का आश्रम है। इस आश्रम में एक संस्कृत विद्यालय का संचालन होता है। इस विद्यालय में देश भर से बच्चे संस्कृत और कर्मकांड पढ़ने आते हैं। पर शर्त है कि वे बच्चे सिर्फ ब्राह्मण कुल के ही होने चाहिए। इसी आश्रम में अध्ययन करने वाले एक कर्मकांड पाठी से मेरी मुलाकात होती है। वे इटावा उत्तर प्रदेश के रहने वाले वाले हैं। यहां पर वे पांच साल का पाठ्यक्रम कर रहे हैं। उम्र होगी कोई 14-15 साल। बता रहे हैं कि पाठ्यक्रम पूरा करने के बाद गांव में जाकर मंदिर बनवाउंगा। मैंने कहा इससे क्या लाभ होगा। उन्होंने कहा, आपको पता नहीं है मंदिर बनते ही खूब सारा चढ़ावा रोज आएगा और मुझे जीवन भर बिना कमाए उस चढ़ावे कमाई से दाना पानी मिलता रहेगा। मैं उनकी बुद्धिमता के आगे नतमस्तक था। 
विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
(GUJRAT SOMNATH, SRIKRISHNA ) 

सोमनाथ में इनसे भी मुलाकात हुई थी, मंदिर के प्रवेश द्वार पर आसन लगाए बैठे थे बाबा जी....


Wednesday, June 19, 2013

भालुका तीर्थ - यहां श्री कृष्ण ने त्यागे थे प्राण


आमतौर पर लोग सोमनाथ को सिर्फ शिव के प्रसिद्ध मंदिर के तौर पर ही जानते हैं। पर आप सोमनाथ मंदिर के अलावा कई और तीर्थ स्थलों के दर्शन कर सकते हैं। इसके लिए आपको आधे दिन का समय कम से कम अलग से निकालना चाहिए।  सोमनाथ तीर्थ क्षेत्र भगवान शिव के साथ ही भगवान श्री कृष्ण के जीवन से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। भागवत पुराण में श्रीकृष्ण के देवलोक गमन की कथा आती है। कृष्ण के पांव में जरा नामक व्याध का तीर लगा था।

सोमनाथ मंदिर से छह किलोमीटर दूर वेरावल मार्ग पर भालुका तीर्थ नामक स्थान है। किसी जमाने मे यहां सघन वन हुआ करता था। कहा जाता है कि यह वही जगह है जहां वन में विश्राम करते समय कृष्ण को जरा नामक व्याध का तीर लगा था। हालांकि व्याध ने श्रीकृष्ण को वह तीर गलती से मार दिया था जब वे विश्राम कर रहे थे। निकट पहुंचने पर व्याध ने उनसे क्षमा भी मांगी थी, पर प्रभु को तो अपनी लीला के बारे में मालूम था। वे इस लोक से प्रस्थान करने के लिए तैयार थे। 
कहा जाता है त्रेता युग में राम ने बालि को धोखे से तीर मारा था। प्रभु ने कहा था मैं भी तुम्हें मौका दूंगा। द्वापर युग में बालि बहेलिये के रुप में था। यहां पर भगवान  श्रीकृष्ण की लेटी हुई विशाल प्रतिमा है। इसके बगल में प्रेम भिक्षु जी महाराज द्वारा स्थापित अखंड रामनाम कीर्तन मंदिर है। यहां पर द्वारका की तरह अखंड रामधुन चलती रहती है। इस मंदिर के बगल में प्रजापिता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय का म्यूजियम भी है। यह संग्रहालय बाहर से  विशाल शिवलिंग के आकार का दिखाई देता है। पर इसके अंदर कलात्मक तरीके से भवन का निर्माण किया गया है। 

वाणगंगा में आपरूपि शिवलिंग के दर्शन   


सोमनाथ मंदिर से कुछ किलोमीटर आगे समंदर के किनारे वाणगंगा नामक स्थान है। जहां समंदर की जलधारा के बीच दो शिव लिंग अपने आप प्रकट हो गए हैं। हमें शक हुआ कि हो सकता है किसी ने इन शिवलिंग को यहां जलराशि के बीच लाकर स्थापित कर दिया हो। पर हमारे आटो वाले गाइड मोहम्मद लतीफ ने बताया कि नहीं भाई साहब ऐसा नहीं है। कम से कम मैं  40 सालों से इसी तरह इन शिव लिंगों को देख रहा हूं। इससे पहले मेरे पुरखे भी इसे इसी तरह देखते आए हैं। मैं लतीफ भाई की आस्था के आगे नतमस्तक था। 


सोमनाथ दर्शन - सोमानाथ तीर्थ न सिर्फ हिंदू धर्म में बल्कि जैन मतालंबियों के लिए भी पवित्र तीर्थ है। हमारे आटो वाले गाइड मोहम्मद लतीफ ने पूरी आस्था से सोमनाथ शहर घुमाया और उसके पवित्र स्थलों के बारे में बताया। उनका हिंदू धर्म के बारे में ज्ञान देखकर हम मुग्ध थे। सोमनाथ शहर में बड़ी संख्या में मुस्लिम परिवार हैं जिनकी रोजी रोटी बाबा सोमनाथ के सहारे चलती है।
   - विद्युत प्रकाश मौर्य
(( SOMNATH, GUJRAT, KRISHNA )     


Tuesday, June 18, 2013

सोमनाथ - बार-बार लूटने के बाद भी बना रहा वैभव



इतिहास में सोमनाथ मंदिर अपने वैभव और ऐश्वर्य के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता था। सोमनाथ मंदिर को जनवरी 1026 में पहली बार मोहम्मद गजनी ने लूटा। वह करोड़ों के हीरे जवाहरात लेकर अपने देश गया। लेकिन ये धन उसके काम नहीं आया। रास्ते में ही उसकी मृत्य हो गई। इसके बाद राजा भीमदेव ने मंदिर को एक बार फिर बनवाया। सौराष्ट्र के तमाम राजाओं ने मंदिर की श्रीवृद्धि में योगदान किया। इसके बाद 1297 में अल्लाउद्दीन खिलजी ने, 1395 में मुजफ्फरशाह ने 1413 में अहमदशाह ने सोमनाथ मंदिर को लूटा।
अहिलेश्वर महादेव -  1783 में इंदौर की महारानी अहिल्या बाई ने सोमनाथ के भग्नावशेष के पास सोमनाथ का एक मंदिर बनवाया। ये मंदिर सोमनाथ के मुख्यमंदिर के बगल में आज भी मौजूद है। जिसमें नियमित पूजा होती है। दो मंजिल वाले इस मंदिर में दो शिवलिंग हैं। ऊपर अहिलेश्वर महादेव और नीचे गर्भ गृह में सोमनाथ।


वर्तमान सोमनाथ मंदिर में मंदिर परिसर में भव्य दिग्विजय द्वार बनाया गया है। मंदिर परिसर में एक नृत्य मंडप भी है। इसके साथ ही द्वादश ज्योतिर्लिंग की भव्य चित्रावली वाली गैलरी बनाई गई है। इसमें सभी ज्तोतिर्लिंगों को परिचय भी दिया गया है।

सोमनाथ ट्रस्ट- सोमनाथ मंदिर का पूरा इंतजाम सोमानाथ ट्र्स्ट देखता है। इसलिए मंदिर में पूजा पाठ को लेकर कोई ठगी का आलम नहीं है। मंदिर ट्रस्ट ने सोमनाथ आने वाले भक्तों के रहने के लिए कई आवास बनवाए हैं और भोजनालय भी चलाता है। मंदिर के बगल में स्थित सोमनाथ भोजनालय में 35 रुपये में भोजन की थाली उपलब्ध है।


लीलावती कांप्लेक्स -  हाल के दिनों में सोमनाथ मंदिर के पास लीलावती कांप्लेक्स का निर्माण कराया गया है। यहां रहने के लिए एसी, नॉन एसी कमरे और खाने के लिए लीलावती भोजनालय में सुस्वादु भोजन उपलब्ध है। यह कांप्लेक्स मंदिर के ठीक सामने स्थित है। यहां बाहर बैठने के लिए सुंदर बेंच लगी हैं। रात में यहां का वातावरण मनोरम हो जाता है। लीलावती कांप्लेक्स के भोजनालय में 55 रुपये की शाकाहारी थाली उपलब्ध है। सोमनाथ में रहते हमने भोजन और नास्ता लीलावती भोजनालय में लिया। थाली में छाछ मिलती है जो गुजराती थाली का अनिवार्य हिस्सा है।
-    -- माधवी रंजना

 महामृत्युंजय मंत्र
 ओम त्रयंबकम यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम।
उर्वारुकमिव बंधनात् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्। 

  (JYOTIRLINGAM, TEMPLE, SHIVA,GUJRAT )   


Monday, June 17, 2013

जय सोमनाथ - स्वयं चंद्रमा ने बनवाया था मंदिर ((01))


सोमनाथ मंदिर यानी द्वादश ज्योतिर्लिंग में पहला स्थान। गुजरात के शहर सोमनाथ में स्थित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है सागर की लहरों के किनारे इसका निर्माण स्वयं चंद्रमा ने कराया था। सोमनाथ को सोमेश्वर भी कहते हैं यानी सोम (चंद्र) के नाथ ( ईश्वर)। इतिहास में सोमनाथ मंदिर कई बार बना और टूटा। आजकल जो भव्य सोमनाथ मंदिर है इसे देश आजाद होने के बाद सरदार वल्लभ भाई पटेल और अन्य नेताओं ने जन सहयोग से बनवाया।
11 मई 1951 को देश के पहले राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर में सोमनाथ की पुनः प्राण प्रतिष्ठा की। ये मंदिर सिर्फ आस्था केंद्र नहीं बल्कि हमारे राष्ट्र की अस्मिता का भी प्रतीक है। सोमनाथ मंदिर देश के नए बने मंदिरों वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। मंदिर की इमारत सात मंजिला है। मंदिर का गुंबद 155 फीट ऊंचा है।

 मंदिर खुलने का समय - मंदिर सुबह छह बजे से रात्रि 9.30 बजे तक श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खुला रहता है। सुबह सात बजे दोपहर 12 बारह बजे और शाम 7 बजे मंदिर में आरती होती है। 
अगर आपका सोमवार के दिन ही सोमनाथ के दर्शन का संयोग बने तो कहना ही क्या। हमारे साथ कुछ ऐसा ही हुआ। हम जिस दिन पहुंचे संयोग से सोमवार था। 


सोमनाथ की कथा - सोमनाथ की कथा का वर्णन स्कंदपुराण में आता है। चंद्रमा की 27 पत्नियां थीं। लेकिन वे 26 पत्नियों को सर्वाधिक प्रेम अपनी रुपवती पत्नी रोहिणी पर बरसाते थे। नाराज बाकी पत्नियों ने पिता दक्ष प्रजापति से शिकायत की। चंद्रमा के नहीं मानते पर दक्ष प्रजापति ने चंद्रमा को क्षय होने का शाप दिया।
शाप से मुक्ति के लिए चंद्रमा ने मृत्युंजय भगवान शिव की लंबी आराधना की। तब शिव ने प्रसन्न होकर चंद्रमा से कहा कि शाप से पूरी तरह मुक्ति संभव नहीं है लेकिन शुक्ल पक्ष में तुम्हारी एक कला रोज बढ़ जाता करेगी। वहीं कृष्ण पक्ष में रोज एक काया का क्षय होगा। 

मंदिर के बारे में कहा जाता है सोमनाथ मंदिर के मूल निर्माता स्वयं चंद्रमा हैं। मंदिर के तटपर हिलोरें लेती सागर की लहरें मानो 24 घंटे शिव का जलाभिषेक कर रही होती हैं। मंदिर परिसर में बैठने पर हमेशा सागर की लहरों का दिव्य संगीत सुनाई देता है।

लाइट एंड साउंड शो – सोमनाथ मंदिर के परिसर में रोज शाम 7.45 बजे मंदिर परिसर में एक घंटे का लाइट एंड साउंड शो होता है। इस शो में सागर कथावाचक के रुप में सोमनाथ मंदिर के बार बार बनने और विध्वंस होने की दास्तान बड़े ही रोचक अंदाज में सुनाता है। 

अगर आप सोमनाथ पहुंचे हैं तो लाइट एंड साउंड शो जरूर देखें। लाइट एंड साउंड शो के लिए टिकट लेना पड़ता है।आप समय से पहले पहुंच कर टिकट लेकर अपना स्थान सुनिश्चित कर लें। 

कैसे पहुंचे - सोमनाथ का मंदिर गुजरात के सोमनाथ नामक शहर में समंदर के किनारे स्थित है। निकटतम रेलवे स्टेशन सोमनाथ है। पर छह किलोमीटर पहले वेरावल नामक रेलवे स्टेशन है, जहां तक काफी ट्रेनें जाती हैं। धीरे धीरे सोमनाथ विकसित हो रहा है पर वेरावल बड़ा बाजार और रेलवे का जंक्शन है। सोमनाथ के लिए गुजरात के अहमदाबाद से सीधी ट्रेनें हैं। द्वारका से भी सोमनाथ के लिए सीधी ट्रेन है।  

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द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम्

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।
हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥

एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥
एतेशां दर्शनादेव पातकं नैव तिष्ठति।

कर्मक्षयो भवेत्तस्य यस्य तुष्टो महेश्वरा ॥




कहां कहां हैं 12 ज्योतिर्लिंग 

1- सोमनाथ - सोमनाथ पृथ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह मंदिर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है।
2- मल्लिकार्जुन  - यह ज्योतिर्लिंग आन्ध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल नाम के पर्वत पर स्थित है।
3- महाकालेश्वर - यह ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी कही जाने वाली उज्जैन नगरी में स्थित है।
4- ओंकारेश्वर-  ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध शहर इंदौर के समीप नर्मदा तट पर स्थित है।

5- केदारनाथ- केदारनाथ स्थित ज्योतिर्लिंग उत्तराखंड में स्थित है। बाबा केदारनाथ का मंदिर बद्रीनाथ के मार्ग में स्थित है।
सोमनाथ - सागर करता है शिव का नमन। 

6- भीमाशंकर - भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पुणे जिले में मंचर के पास स्थित है।

7- काशी विश्वनाथ -विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग उत्तर प्रदेश के काशी में स्थित है।

8- त्र्यंबकेश्वर - यह ज्योतिर्लिंग गोदावरी नदी के  उदगम के पास महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले में स्थित है।
9- वैद्यनाथ - श्री वैद्यनाथ शिवलिंग झारखण्ड प्रान्त में देवघर में स्थित है।
10-नागेश्वर  - यह ज्योतिर्लिंग गुजरात में द्वारका के बाहरी इलाके में स्थित है।
11- रामेश्वरम  - यह ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु के रामनाथपुरम नामक स्थान में स्थित है। यह स्थान हिंदुओं के चार धामों में से एक भी है।
12-घृष्णेश्वर मन्दिर - घृष्णेश्वर महादेव का मंदिर महाराष्ट्र औरंगाबाद शहर के पास एलोरा की गुफाओं के पास स्थित है।



- श्रीरुद्राष्टकम -  

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥ 1॥

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकाल कालं कृपालं गुणागार संसारपारं नतोऽहम् ॥ 2॥

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं मनोभूत कोटिप्रभा श्री शरीरम् ।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गङ्गा लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥ 3॥

चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीशचर्माम्बरं
 मुण्डमालं प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥ 4॥

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम् ।
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥ 5॥

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ।
चिदानन्द संदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥ 6॥

न यावत् उमानाथ पादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।
न तावत् सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ॥ 7॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम् ।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ॥ 8॥

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥

-  प्रस्तुति - माधवी रंजना
 

(SOMNATH, GUJRAT, SHIVA, LILAWATI BHAWAN )

 (JYOTIRLINGAM, TEMPLE, SHIVA)