Wednesday, January 9, 2013

एक हैदराबादी शादी में...शुभ लग्ने सावधनाय...


कुल14 दिन के दक्षिण भारत के कई शहरों के सफर के बाद हमलोग अब पहुंच गए थे हैदराबाद। कोच्चि,त्रिवेंद्रम, कन्याकुमारी, मदुरै, रामेश्वरम, कोयंबटूर, ऊटी, मैसूर, बेंगलुरू, तिरूपति के बाद हमारा अब आखिरी पड़ाव था हैदराबाद। तिरुपति से रात नौ बजे हैदराबाद जाने वाली ट्रेन में हमारा आरक्षण था। यह एक स्पेशल ट्रेन थी जो आज आखिरी फेरा ले रही थी। संयोग से हमें इसमें आरक्षण मिल गया था।
 हैदराबाद वह शहर है जहां पहले ही तकरीबन एक साल गुजार चुके थे। पर इस बार संयोग से हमारी यात्रा के आखिरी पड़ाव में शादी थी हमारे नवीन भाई की।
 शादियां तो हमेशा खास होती है चाहे किसी भी इलाके की हों। बिहार में मिथिला की शादियों के रस्मो रिवाज रोचक होते हैं तो हमारे लिए आंध्र प्रदेश की एक शादी देखना भी कम कौतूहल भरा नहीं था। मौका था हमारे हैदराबाद प्रवास के दौरान हमारे मकान मालिक रहे एन रत्नाराव के बड़े बेटे नवीन की शादी का। पूरे दक्षिण भारत के सफर के बाद हमलोग एक बार फिर हैदराबाद के वनस्थलीपुरम में उसी घर में पहुंचे जहां बेटे अनादि का बचपन गुजरा था। हम दोपहर में पहुंचे तो घर में शादी की तैयारियां चल रही थीं।

बारात जाने से पहले दोपहर में दूल्हे को आशीर्वाद देने की रस्म हुई। इसमें हमने भी हिस्सा लिया परिवार के बाकी सदस्यों की तरह। शाम को बारात निकली सिकंदराबाद के एक इलाके में। शादी बैंक्वेट हॉल में थी। लेकिन बिल्कुल परंपरागत तरीके से। तीन पंडित थे शादी मेंरत्नाराव जी ने बताया कि पंडित की फीस 10 हजार रुपये है। शादी का मुहुर्त तय था रात दस बजे। मुहुर्त निकट आ रहा था। पंडित जी समवेत स्वर में मंत्रोच्चार कर रहे थे...
शुभ लग्ने सावधनाय...     

विवाह का खास मंत्र जो लग्न के इंतजार में पंडित जी द्वारा लगातार उच्चारित किया जा रहा था। सारे बाराती शुभ मुहुर्त का इंतजार कर रहे थे। जैसे मुहुर्त आए आसमान में हजारों फूलों की बरसात होने लगी। ये नजारा था तेलंगाना प्रांत में होने वाले एक विवाह का। हमें इस शादी में शामिल होने का खास तौर पर मौका मिला था।

मंगल धुन बजाने वाले अपने वाद्ययंत्रों के साथ पहुंच गए थे। उत्तर भारत की तरह बैंड बाजा नहीं खास तरह की मंगलधुन बजती है शादी की सारी रस्मों के दौरान। 


 ...शुभ लग्ने सावधनाय..श्री लक्ष्मीनारायण ध्यान सावधनाय... और शुभ लग्न आया दूल्हे दुल्हन ने एक दूसरे पर फूल बरसाना शुरू किया। इसके बाद दूसरी रस्म शुरू हुई चावल के बंटवारे की। इसके बाद तीसरी रस्म माला डालने और बदलने की। वर वधू पक्ष के लोगों ने दुल्हा दुल्हन को आशीर्वाद दिया। पूरी शादी मंच पर हुई। दुल्हन का फूलों से श्रंगार खास होता है।

दुल्हन घूंघट नहीं करती-  शादी में कोई परदा नहीं। लेकिन अभी सारी रस्में खत्म नहीं हुईं। एक और रस्म आई घड़े से अंगूठी ढूंढ कर निकालने की।  दुल्हा दुल्हन दोनों मिलकर कोशिश करते हैं। और शादी की आखिरी रस्म। पंडित दुल्हा दुल्हन को अपने साथ खुले आसमान के नीचे ले जाते हैं। पति अपनी पत्नी को सप्तर्षि तारे को दिखाता है और उनसे आशीर्वाद लेता है। सारी रात की बात नहीं बस कुछ घंटे में शादी संपन्न हो गई।

शादी के बाद अगले ही दिन वर वधू स्वागत समारोह था। यहां खाने पीने के मीनू में खास तौर पर उत्तर भारतीय व्यंजन थे। अनादि को रबड़ी और जलेबी खूब पसंद आई। अगले दिन सुबह हमारा दिल्ली जाने वाली ट्रेन में आरक्षण था। मुन्ना (वेंकट सुधीर) हमें रेलवे स्टेशन पर छोड़ने आए। सिकंदराबाद स्टेशन पर सुबह साढे़ सात बजे हम लोग ट्रेन में सवार हुए। ट्रेन है एपी एक्सप्रेस बाद में उसका नाम बदलकर हो गया तेलंगाना एक्सप्रेस। हैदराबाद से तकरीबन 25 घंटे का सफर। अब तो सारे रास्ते के स्टेशन जाने पहचाने से हो गए हैं। 
( 30 अक्तूबर 2012 ) 

---- विद्युत प्रकाश मौर्य ( HAYDRABAD, VANASTHALIPURM, SHADI, SHUBH LAGAN ) 

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