Sunday, December 9, 2012

एक बार फिर जाल फेंक रे मछेरे


समंदर के किनारे मछली पकड़ना लोगों का प्रमुख रोजगार है। फोर्ट कोच्चि में बने चाइनीज फिशिंग नेट 700 साल से ज्यादा पुराने हैं। 13वीं सदी में कुबलई खान के समय से यहां नेट लगे हैं। कोवलम के समुद्र तट पर सुबह में समंदर में जाल फेंकने और जाल को खींचने का नजारा देखा जा सकता है। जाल को बाहर निकालने के बाद कई मछुआरे मिलकर जाल से मछलियां निकालते हैं। ये विशालकाय जाल होता है जिसे महाजाल कह सकते हैं। भले ही मछली पकड़ने का काम सुबह होता है लेकिन मछुआरों का काम 24 घंटे चलता रहता है। जब हम कन्याकुमारी पहुंचे तब वहां समंदर के किनारे फिश आक्शन सेंटर बना देखा। इसे हिंदुस्तान टाइम्स समूह और सीआईआई के सहयोग से बनवाया गया है। सुनामी की तबाही के बाद ये नीलाम घर बनवाया गया। यहां कुछ मछुआरों को लंबे लंबे जाल बुनते देखा।



कई मछुआरों का दल मछलियां पकड़ने के लिए नाव से समंदर का दौरा करते हैं। इस दौरान मछुआरों को समुद्री तूफानों का भी सामना करना पड़ता है। कई बार वे रास्ता भटक कर दूसरे देश की सीमा में भी पहुंच जाते हैं। रामेश्वरम से श्रीलंका की समुद्री सीमा काफी निकट है। ऐसा कई बार होता है जब भारतीय मछुआरे श्रीलंका की सीमा में पहुंच जाते हैं फिर उनकी गिरफ्तारी भी हो जाती है। कई बार जांच पड़ताल के बाद उन्हें छोड़ा जाता है। ऐसी ही घटनाएं भारत और पाकिस्तान के बीच भी सुनने को मिलती हैं। गुजरात के समुद्र तट से भी काफी मछुआरे राह भटक जाते हैं। यानी समंदर से मछली पकड़ने का काम मुश्किलों भरा है। लेकिन मछुआरों की जिंदगी इसी समंदर के साथ चलती रहती है। वे इस उम्मीद के साथ एक बार फिर जाल फेंकने को तैयार होते हैं कि इस बार जाल में कुछ बड़ी मछलियां आ फंसेंगी।

-    -------विद्युत प्रकाश मौर्य  
( ( FISHING, SEA, NET, FISHERMEN, TAMILNADU, KERALA) 

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