Friday, September 21, 2012

रामनाथ की बनाई मछली का यादगार स्वाद (22)

( चंबल 22) 
एक दिन कीर का झोपड़ा गांव में हमें मछली खाने को मिली। वह हमारे लिए यादगार दिन था। गांव में सबसे अच्छी मछली रामनाथ बनाते हैं। गोया गांव की औरतें तो शाकाहारी हैं। वे मछली नहीं बनातीं। घर की रसोई में भी नहीं बनती। घर के बाहर मांसाहारी चूल्हा जलता है। रामनाथ खुद चंबल नदी गए और नदी में जाल फेंक कर मछली पकड़कर लाए। इसके बाद मछली को काटने से लेकर मसाले तैयार करने और आगे का सारा काम रामनाथ ने खुद अंजाम दिया। वो कौन सी मछली थी मुझे याद नहीं। लेकिन उस दिन हमने और दिग्विजय ने छक कर मछली को उदरस्थ किया। खाने के बाद मैंने मछली बनाने की तारीफ की। वाकई वैसी सुस्वादु मछली मैंने पहले कभी नहीं खाई थी। आगे भी कभी नहीं मिली।
रामनाथ ने मछली की तारीफ सुनकर कहा, हां मास्टर मछली तो अच्छी बननी ही थी। मैंने उसमें आधा किलो सरसों तेल जो पटका था। इस इलाके में सरसों की खेती होती है। सो गांव में शुद्ध सरसों का तेल उपलब्ध है। तो लोग तेल पटकने में कोताही नहीं बरतते।

हर रोज की नमक रोटी से हटकर एक दिन कुछ अलग खाने को मिला। एक दिन की और बात है। रामकरण हमारे पास आया बोला मास्टर हमारे घर चावल बना है खाओगे। हमने कहा हां खा लेंगे। चवाल बनाना उन लोगों के लिए किसी शाही भोजन की तरह था।
बाबा देवपुरी के स्थान पर मिल्क केक की दुकानें। ( मुरैना-धौलपुर रोड) 


जब हमारे पास एक कटोरी में चावल आया तो उसमें चीनी और दूध भी डाल दिया था। वह खाने में कुछ अजीब सा हो गया था। लेकिन गांव के लोग कभी कभी चावल खाते हैं तो वे उसके कुछ लक्जरी वाले तरीके से खाते हैं। ये खीर नहीं है लेकिन कुछ कुछ खीर से मिलता जुलता भी है। कीर का झोपड़ा में दो शाम मछली और चावल बदलाव के दिन थे। बाकी दिन तो फिर से हमारा वही मीनू था। और क्या नमक रोटी और करील का अचार जिंदाबाद।
  

No comments:

Post a Comment