Thursday, October 25, 2012

मंगला लक्षदीप एक्सप्रेस से केरल की ओर...

बने दोस्त -  राजेश चौधरी के साथ अनादि कोंकण रेल के एक स्टेशन पर। 
16 दिन में दक्षिण भारत की सैर - सारा देश घूम लेने की तमन्ना बहुत से लोगों की होती है। पर इस पूरे हिंदुस्तान में बड़ा हिस्सा दक्षिण भारत का है जो उत्तर भारत से काफी अलग है। दक्षिण में घूमना एक खुशनुमा एहसास की तरह है। खान-पान, लोग, धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल सब कुछ मन मोहते हैं। मुझे दक्षिण बार बार बुलाता है। मेरी पहली दक्षिण की यात्रा 1992 में हुई थी। उसके बाद 2005 में तकरीबन एक साल हैदराबाद में नौकरी करने का मौका मिला। पर साल 2012 में सपरिवार दक्षिण भारत के कई स्थलों को घूमने का कार्यक्रम बनाया। सोलह दिन में पांच राज्यों के 12 प्रमुख शहर। बिना किसी ट्रेवल टूर आपरेटर के पूरी यात्रा की योजना खुद तैयार की। पुराने यात्रा वृतांत और इंटरनेट पर रिसर्च करके रेल टिकट और होटल आदि अग्रिम बुक कर लिए और हम निकल पड़े एक लंबी यात्रा पर।

दिल्ली से दक्षिण भारत की ओर जाना हो तो एक रास्ता नागपुर होकर जाता है तो दूसरा कोंकण रेल से गोवा होकर। हमने दक्षिण के सफर के लिए गोवा होकर जाने वाला रास्ता चुना। क्योंकि तमन्ना थी कोंकण रेल की हरी भरी वादियां देखते हुए दक्षिण पहुंचने की। इसके लिए ट्रेन चुनी 12617 -मंगला लक्षदीप एक्सप्रेस। दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से हर सुबह 9.20 बजे खुलने वाली ये ट्रेन कई राज्यों को जोड़ती है। दिल्ली से शिरडी,नासिक, गोवा जाने वालों के लिए भी ये ट्रेन मुफीद रहती है। तो केरल जाने वालों के लिए बहुत पुरानी ट्रेन है मंगला एक्सप्रेस। पचास घंटे से ज्यादा सफर कर सात राज्यों से होते हुए ऐतिहासिक शहर कोचीन पहुंचती है। हालांकि ये ट्रेन लक्षद्वीप नहीं जाती पर, यह कोचीन जाती है, जहां से लक्षद्वीप के लिए पानी के जहाज चलते हैं इसलिए इस ट्रेन के नाम के साथ लक्षद्वीप जुड़ा हुआ है। हालांकि कोचीन से भी लक्षद्वीप 25 घंटे रास्ता है पानी के जहाज से।  

मंगला लक्षद्वीप एक्सप्रेस का रास्ते में कुल 47 रेलवे स्टेशनों पर ठहराव है। सुबह नौ बजे दिल्ली के निजामुद्दीन स्टेशन पर हमलोग ट्रेन के स्लीपर कोच में जगह ले चुके थे। ट्रेन का सफर यादगार रहा। मंगला देश की सबसे लंबी सुपरफास्ट श्रेणी की ट्रेन है। इस ट्रेन पर हमें 52 घंटे गुजरना है यह सुनकर सात साल के अनादि रोमांचित हैं। वैसे दक्षिण भारत की ओर जाने वाली ज्यादातर रेलगाड़ियां निजामुद्दीन स्टेशन से ही खुलती हैं।

जब हमारी ट्रेन मथुरा पहुंची तो रेल में हमारे सहयात्री बने अलवर से आए पिता-पुत्र। राजेश चौधरी एनआईटी, कालीकट से एमटेक करने के बाद अब दीक्षांत समारोह में डिग्री लेने जा रहे हैं। साथ में पिता भी जा रहे हैं। 24 साल के प्रोफेसर राजेश हमारे नन्हे अनादि के तुरंत दोस्त बन गए। दोनों एक दूसरे का ज्ञान बढ़ाने में जुटे हैं। राजेश बताते हैं कि चार साल कालीकट ( अब कोझिकोड) में पढ़ाई करने के दौरान अनगिनत बार इस रेल मार्ग से सफर करना पड़ा है। ग्वालियर स्टेशन आया तो उनके कुछ और दोस्त ट्रेन के सहयात्री बने जो अपने पिता के साथ कालीकट डिग्री लेने जा रहे हैं। उन लोगों के साथ वार्ता करते हुए सफर कटता रहा। 


चलो चलें केरल की ओर। 
मध्य प्रदेश में सांची का छाछ पीते हम रात को भोपाल पहुंचे। वहां हमारे पुराने साथी प्रकाश नारायण सिंह रेलवे स्टेशन पर मिले। प्रकाश हमारे साथ महुआ चैनल में काम कर चुके हैं। अब भास्कर के इंटरनेट संस्करण में कार्यरत हैं। वे स्टेशन पर कुछ खाने पीने का सामान लेकर आए थे। मिल कर मन भावुक हो गया। रात के नौ बज चुके हैं। भोपाल से ट्रेन आगे बढ़ी तो हमलोग सो गए। कब इटारसी, खंडवा गुजरा पता नहीं चला। ट्रेन महाराष्ट्र के मनमाड में रूकी तो नींद खुली। साईं बाबा के दरबार में जाने वाले कुछ लोग उतर चढ़ में लगे थे।

यात्रा मार्ग और पड़ाव - दिल्ली से कोच्चि, तिरुवनंतपुरम, कन्याकुमारी, मदुरै, रामेश्वरम, कोयंबटूर, मेट्टुपालयम, ऊटी, मैसूर, बेंगलुरु, तिरुपति, हैदराबाद, दिल्ली )  
- vidyutp@gmail.com



( RAIL, MANGALA LAKSHDEEP EXPRESS, KERLA) 

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