Sunday, September 30, 2012

रणथंभौर वाले गणेश जी ने बुलाया (31)


( चंबल- 31) 
मध्य प्रदेश के चंबल घाटी में साक्षरता मिशन खत्म होने के बाद हमें रणथंभौर वाले गणेश जी का बुलाया आ गया। वो कैसे। गांव में प्रवास के दौरान, श्योपुर जिले के गांव या यों कहें बसावट, कीर का झोपड़ा गांव के लोग पूछते थे मास्टर तुम कौन से गांव से आए हो...अगर मैं बिहार बताऊं तो वे नहीं जानते थे। दिग्विजय सिंह यूपी बताएं तो वे नहीं जानते थे। जानते भी भला कैसे क्योंकि गांव के लोगों ने तो कभी ग्वालियर और श्योपुर के अलावा किसी शहर का नाम भी नहीं सुना था। हां वे चंबल के उस पार राजस्थान के शहरों के बारे में जरूर जानते थे। तब हम उन्हें अपनी यूनिवर्सिटी का नाम बताते थे। हमने बताया कि हम काशी जी से आए हैं।

गांव के लोगों ने काशी का नाम सुन रखा है। हम काशी के नाम पर गांव में और पूज्य हो जाते थे। हमारा सम्मान बढ जाता था। गांव के लोग खुश किस्मत मानते थेकि उनके गांव में काशी से कोई आया है। हमारे एक गांधीवादी साथी ने कहा कि आप कीर के झोपड़ा जैसे गांव में दो देवदूत की तरह हो। लेकिन हम हकीकत जानते थे। हम गांव में साक्षरता के सिपाही बनकर आए थे लेकिन हम तो खुद की इस गांव में लोगों से कुछ सीखने की कोशिश कर रहे थे। हमने गांव में रहकर गांव के भोले-भाले लोगों से भी काफी कुछ सीखा। जीवन का संघर्ष और भोगा हुआ सच।

अब हमारी चला-चली की वेला थी। हमें पता चला कि चंबल नदी के उस पार है सवाई माधोपुर। सवाई माधोपुर में है रणथंभौर का अभ्यारण्य और रणथंभौर का किला। गांव के लोगों में रणथंभौर के गणेश जी को लेकर बहुत आस्था है। गांव के कई लोग वहां जा चुके है।

तो हमने भी तय किया कि गांव छोड़ने के बाद हम भी रणथंभौर के गणेश जी का दर्शन करने के बाद ही अपने शहर के लिए जाएंगे। और यही हुआ। गणेश जी ने हमें बुला लिया। गांव से निकल कर हमलोग श्योपुर पहुंचे। महात्मा गांधी आश्रम में रिपोर्ट किया। हमने आश्रम से अपने कामकाज का प्रमाण पत्र लिया। उसके बाद का नाव से चंबल नदी पार की। हमारे साथ बगदिया गांव के जय सिंह जी के भाई भी थे। अब श्योपुर से सवाई माधोपुर जाना हो तो चंबल नदी पर पुल बन गया है। लेकिन 1992 में कोई पुल नहीं था। चंबल नदी को नाव से पुल पार करने के बाद सवाई माधोपुर तक का सफर बस से शुरू हुआ।

ये हमारा राजस्थान की धरती पर पहला प्रवेश था। हमने यहां की मिट्टी को नमन किया, क्योंकि हमारे पुरखे इसी धरती से गए थे। रात को सवाई माधोपुर में रेलवे स्टेशन के पास ही एक धर्मशाला में हमने ठिकाना बनाया। अगले दिन सुबह हम रणथंभौर के किले के लिए चल पड़े। जून के महीने में गरमी भीषण थी। पर किला देखने और गणेश जी से आशीर्वाद लेने की इच्छा मन में थी। इस यात्रा में हमारे साथ दिग्विजय नाथ सिंह के अलावा महाराष्ट्र के दो साथी ( नितिन एलमुले के साथ और मित्र ) भी थे, जिनका साथ गुजारे वक्त यादगार रहेंगे।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - हमें लिखें - vidyutp@gmail.com 
(लेखक पेशे से पत्रकार हैं, घूमना उनका शौक है ) 

( RANTHAMBHORE, GANESHA, CHAMBAL, DIGVIJAYNATH, NITIN YELMULE ) 

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