Saturday, September 22, 2012

लडू बवंडर और तरबूज (23)

( चंबल 23) 
लडू बवंडर। यही नाम गांव के लोगों ने हमें उसका बताया था। लडू के साथ बवंडर क्यों। शायद वह जब भी आते हैं वबंडर की तरह। वे चंबल के उस पार राजस्थान में रहते हैं। लडु रामनाथ के साले हैं। शायद इसलिए गांव के लोग मजाक में उनके साथ बवंडर शब्द जोड़ देते हों। हमारे कीर का झोपड़ा प्रवास के दौरान उनका आना हुआ। पहली बार हमें पता चला कि गांव में कोई कुछ बेचने आया है।

जब चिलचिलाती दुपहरिया में हमलोग नहा कर लौटे तो गांव के लोगोंने बताया कि लडू आए हैं। लडु अपने साथ लेकर आए थे ढेर सारे तरबूज। चंबल नदी के किनारे उस पार होने वाली तरबूज। बड़ी सी राजस्थानी पगड़ी बांधे लडु खाट पर बैठे थे। गांव के बच्चे सौदा कर उनसे तरबूज खरीद कर खा रहे थे। ये कोई रुपये देकर खरीद नहीं हो रही थी। बल्कि बाटर सिस्टम था। यानी तरबूज के बदले में सरसों।


हमने भी एक तरबूज खऱीदी। नकद पैसे देकर और जमकर खाया। 44 डिग्री के तापमान पर न बिजली न पंखे...और अगर ऐसे में तरबूज खाने को मिल जाए तो इससे बड़ी राहत और क्या हो सकती है। खाने के बाद लडु से पूछा ये तरबूज लेकर आए कैसे। उन्होंने बताया कि वे चंबल दरिया में इन तरबूजों को एक दूसरे से बांध कर पानी में तैरा देते हैं। इसके बाद सारे तरबूजों को धक्का देते हुए उस पार से इस पार लेकर आ जाते हैं।

तरबूजों के साथ वे भी चंबल नदी को पार कर जाते हैं। तब हमें पता चला कि सालों भर चंबल नदी में पानी ज्यादा नहीं होता। बारिश के बाद के दिनों में पानी कमर तक ही होता है। कई जगह नदी को पैदल पार किया जा सकता है। तो इस तरह तरबूज पहुंचे थे हमारे गांव तक। हालांकि लडू बवंडर ने बताया कि चंबल को पार करने में घड़ियाल का खतरा है, क्योंकि चंबल नदी में घड़ियाल पाले गए हैं।

-    -----  विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 
(  ( WATERMELON, CHAMBAL, RIVER, LADDOO BAWANDAR)  
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