Wednesday, October 31, 2012

बोट जेट्टि - कोचीन की लाइफ लाइन


फोर्ट कोच्चि की ओर बोट जेट्टि में...
कोचीन से फोर्ट कोच्चि के लिए चलती है बोट जेट्टि यानी छोटी स्टीमर। इसमें कुल 75 लोगों के बैठने की व्यवस्था है। सुबह छह बजे से रात नौ बजे तक कोचीन के समंदर से फोर्ट कोच्चि के लिए चलने वाली बोट जेट्टि का किराया है महज ढाई रूपये प्रति व्यक्ति। इस महंगाई में इतना कम। यह शायद केरल में लंबे समय रहे कम्युनिस्ट शासन का असर हो। केरला टूरिज्म चलाती है बोट जेट्टि जो कोचीन के लोगों की लाइफ लाइन है। वर्ना सड़क से फोर्ट कोच्चि पहुंचने के लंबा रास्ता तय करना पड़ेगा। यह बोट जेट्टि न सिर्फ स्थानीय लोगों की बल्कि देशी विदेशी सैलानियों की भी पसंद है। हमारे बगल मे एक बेंगलुरु की महिला बैठी हैं बोट मे। वे भी कोच्चि घूमने आई हैं। हिंदी शानदार बोल रही हैं। उनकी कोचीन के बारे में जानकारी काफी अच्छी है लिहाजा वे हमारी कुछ जिज्ञासाएं शांत करती हैं। समंदर में कुलांचे भरती बोट से नजर आते हैं कोचीन बंदरगाह को आने वाले बड़े बड़े जहाज। हालांकि यहां समंदर का पानी बहुत साफ नहीं है। 


कोच्चि, कोची और कोचीन – कोच्चि केरल का सबसे बड़ा शहर है आबादी के लिहाज से। अब यहां मेट्रो रेल चलाने की तैयारी चल रही है।
हालांकि आजकल शहर का नाम कोच्चि लिखा जाता है। पर पुराने दस्तावेजों में इसका नाम कोची लिखा हुआ मिलता है। बीच में सालों तक इस शहर को लोग कोचीन नाम से बुलाते रहे।

पर कोचीन के रेलवे स्टेशन का नाम एर्नाकुलम है। शहर में एर्नाकुलम नाम के दो रेलवे स्टेशन है। एर्नाकुलम टाउन ( ईआरएन) और एर्नाकुलम साउथ ( ईआरएस)। मुख्य स्टेशन एर्नाकुलम साउथ ही है। एर्नाकुलम टाउन को एर्नाकुलम नार्थ के नाम से भी जाना जाता है। दोनों स्टेशनों के बीच दूरी महज 2.6 किलोमीटर है। केरल टूरिज्म की वेबसाइट पर जाएं - https://www.keralatourism.org/

- vidyutp@gmail.com 

( COCHIN, KERLA, BOAT, FORT COCHI ) 


केरल यानी ईश्वर का अपना देश


सुबह हुई तो हमारी ट्रेन गोवा और कर्नाटक को पार करके केरल में प्रवेश कर चुकी थी। कोझिकोड (कालीकट) सुबह में आया। ट्रेन हल्की सी लेट है। यहां राजेश चौधरी और उनके साथी उतर गए। हमने यहां हल्का नास्ता लिया रेलवे स्टेशन के कैंटीन से।
दोपहर के 12 बजे हैं और हमलोग पहुंच चुके हैं कोझिकोड और उसके आगे के कई स्टेशनों को छोड़ते हुए एर्नाकुलम साउथ। यानी कोच्चि या फिर कोचीन। मंगला लक्षदीप के साथ 52 घंटे का सफर याद रहेगा। एकबारगी तो ट्रेन से उतरने की इच्छा ही नहीं हो रही है। पर हम कोचीन में पहुंच चुके हैं जहां कभी वास्कोडिगामा का कारवां पहुंचा था। 

केरल टूरिज्म की टैगलाइन है। केरल गॉड्स ओन कंट्री...सचमुच ईश्वर केरल पर बहुत मेहरबान है। केरल में ट्रेन के प्रवेश करते ही आपको दोनों तरफ हरियाली और ऊंचे-ऊंचे नारियल के पेड़ नजर आते हैं। नारियल ऐसा फल जिसके कई इस्तेमाल हैं। नारियल का तेल, नारियल का पानी, नारियल की मिठाई, पूजा में चढ़ाए जाने के लिए नारियल का खोपरा।

अतीत से साक्षात्कार यानी फोर्ट कोच्चिकोचीन यानी एरनाकुलम। केरल का सबसे बड़ा शहर। अब यहां मेट्रो रेल दौडा़ने की तैयारी हो रही है। एर्नाकुलम देश का पहला जिले जिसे सबसे पहले सौ फीसदी साक्षर घोषित किया गया। एर्नाकुलम रेलवे स्टेशन है तो कोचीन बंदरगाह। हिन्दुस्तान में अंग्रेजों से पहले पहुंचने वाले जेविस और पुर्तगालियों की स्मृति चिन्ह है कोचीन शहर में। 
Kochi - Lunch in Arya Bhawan. 


एर्नाकुलम रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही कोचीन में कई मध्यम स्तर के होटलों को ठिकाना बना सकते हैं। वैसे कोचीन में महंगे होटलों की भरमार है। हमारा ठिकाना बना चित्तूर रोड पर होटल संगीता। होटल गनम का हिस्सा। होटल के ठीक सामने दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा का दफ्तर है। होटल का साफ सुथरा अच्छा व्यवहार है। हमारे सफर का किसी होटल में ये पहला पड़ाव है। रिसेप्सन पर मौजूद महिला ने रजिस्टर में मेरा नाम लिख रखा था। हमने यहां फोन करके मौखिक बुकिंग कराई थी।
KOCHI- IN A AUTO RICKSHAW

होटल में पहुंचकर जमकर नहाए और 52 घंटे के रेल के सफर की थकान दूर की। इसके खाने के लिए होटल की तलाश में निकले। हमने दोपहर का खाना आर्य भवन में खाया। थाली में मिल्स 50 रुपये में अनलिमिटेड।
पीने के लिए केरला आर्युवेदिक वाटर यहां के होटलों में दिखाई दिया। यह एक किस्म का रंगीन पानी होता है जो गर्म करके पेश किया जाता है। शाम होने लगी थी और इसके बाद हम चल पड़े फोर्ट कोच्चि की ओर।
- विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com

( होटल संगीता,   Near Junction Railway Station, Chittoor Rd, KOCHI - 682016 Tel. 04842376123  दूसरे होटल - होटल गनम, चित्तूर रोड, होटल पॉलसन पार्क, रेलवे स्टेशन के सामने )  ( KERALA, KOCHI ) 


Tuesday, October 30, 2012

गोवा के थिविम रेलवे स्टेशन पर रोटियां

साल 2012 के अक्तूबर माह में दक्षिण भारत का सफर। 12618 मंगला लक्षदीप एक्सप्रेस वैसे थो थिविम स्टेशन पर 7.12 बजे शाम पहुंचती है पर वह दो घंटे लेट थी। लिहाजा खानेका समय हो गया था। पेट में चूहे खूब कूद रहे थे। थिविम गोवा का एक रेलवे स्टेशन है। अनादि इस बात पर खुश थे कि हम गोवा में हैं। पर मुझे कुछ खाने का इतंजाम करना था। ट्रेन का ठहराव महज दो मिनट का है। 21 मीटर समुद्र तल से ऊंचाई पर थिविम छोटा सा स्टेशन है दो प्लेटफार्म हैं यहां पर।

 प्लेटफार्म पर एक छोटी सी कैन्टीन थी। ट्रेन दो मिनट से ज्यादा रुक गई तो हमने थोड़ा सा रिस्क लिया और कैंटीन से खाने के लिए कुछ मांगा। सुखद आश्चर्य हुआ यहां पर चपाती मिल रही थी। भाव भी ठीक थे। 10 रुपये में एक चपाती सब्जी के साथ। हमने अपनी जरूरत के हिसाब से चपाती ले ली। इस तरह हमारी रात की पेटपूजा हो सकी। गोवा में मंगला एक्सप्रेस थिविम और मडगांव स्टेशनों पर रुकती है।


 मडगांव में मंगला का स्टाप 10 मिनट का है। मडगांव वास्कोडिगामा के बाद गोवा का प्रमुख स्टेशन है। इसके बाद यह रेलगाड़ी कर्नाटक में प्रवेश कर जाती है। मडगांव से वास्कोडिगामा की दूरी 23 किलोमीटर है। पर कोंकण रेल की ट्रेने वास्को नहीं जाती हैं। अगर कोंकण रेल से गोवा जा रहे हैं तो थिविम या फिर मडगांव में ही उतरना होगा। मडगांव बड़ा स्टेशन है। यहां पर कोच के रखरखाव के भी इंतजाम है। स्टेशन का प्लेटफार्म साफ सुथरा चमचमाता हुआ है। नारियल के पेड़ो की हरियाली मन मोह लेती है।


थिविम रेलवे स्टेशन नार्थ गोवा में पड़ता है। यहां से कैंडोलियम बीच जाना सुगम है। थिविम रेलवे स्टेशन पर एक बोर्ड लगा है जिस पर यहां गोवा के प्रमुख पर्यटक स्थलों की दूरी लिखी गई है।

 मापुसा 11 किलोमीटर, बीचोलियम 9 किलोमीटर अरपोरा 19 किलोमीटर. कालांगुट 23 किलोमीटर, वागाटोर 24 किलोमीटर, अंजना 20 किलोमीटर। पर हमे तो इस बार गोवा जाना नहीं था। सो हम ट्रेन की खिड़की से ही गोवा का नजारा करते रहे और गोवा को बाय बाय कहा। गोवा के रेलवे स्टेशनों पर बने स्टाल में गोवा के बने उत्पाद खरीदे जा सकते हैं।

मडगांव (गोवा) रेलवे स्टेशन पर। 


 गोवा के रेलवे स्टेशनों पर आप चिकी, शहद और अन्य खाद्य उत्पाद खरीद सकते हैं जिनका निर्माण कुटीर उद्योगों में गोवा के अंदर हुआ है। जो लोग बार बार दक्षिण भारत की यात्रा रेल से करते हैं उनके लिए ये सफर कई बार बोरियत भरा हो जाता है। पर हमारे लिए सब कुछ नया था। खास तौर पर कोंकण रेल के नजारे। मेरे बहुत सारे दोस्त पूछते हैं कि गोवा घूमने गए या नहीं. मैं कहता हूं गोवा से गुजरा हूं जरूर पर गोवा समुद्र तट देखने नहीं गया। हम मंगला एक्सप्रेस से गोवा की शीतल बयार का स्पर्श लेकर आगे की ओर बढ़ जो गए थे। पर गोवा तो बुलाता रहता है सैलानियों को। हमने भी मना नहीं किया है। हम आएंगे गोवा..कभी जरूर आएंगे।



Sunday, October 28, 2012

कोंकण रेल की रपटीली राहें

कोंकण रेल का सफर मनमोह लेता है। अदभुत नजारे हमेशा के लिए आपके जेहन में कैद हो जाते हैं। कोंकण भारतीय रेलवे का एक अलग जोन है। ये आजाद भारत में भारतीय रेलवे में इंजीनियरिंग की उत्कृष्टता का बेहतरीन नमूना है। मुंबई के पास पनवेल से आगे रोहा रेलवे स्टेशन से शुरू हो जाती है कोंकण रेल की सीमा। रास्ते में आते हैं चिपलूण, रत्नागिरी जैसे स्टेशन।
महाराष्ट्र में कणकावली कोंकण रेल का प्रमुख रेलवे स्टेशन है। यहां स्टेशनों पर कोई भीड़भाड़ नहीं दिखाई देती। महाराष्ट्र का रत्नागिरी जिला हालांकि विकास के मामले में पिछड़ा है लेकिन खूबसूरती में गोवा का मुकाबला करता है। रत्नागिरी में हमारी ट्रेन 10 मिनट रुकी। लेकिन खाने पीने को स्टेशनों पर खाने पीने को कुछ खास नहीं मिला। रत्नागिरी के बाद ट्रेन महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले से गुजरती है। हालांकि मंगला एक्सप्रेस का ठहराव इस जिले के स्टेशनों में नहीं है। सिंधुदुर्ग, कुदल और सावंतवाडी रोड जैसे स्टेशनों से ट्रेन बिना रुके गुजर जाती है। शाम गहराने के साथ ट्रेन गोवा में प्रवेश कर जााती है। कोंकण रेल मार्ग पर गोवा के दो बड़े स्टेशन आए थिविम जंक्शन और मडगांव जंक्शन।

कोंकण रेल के सफर के दौरान रेल की खिड़की से नदियां, पहाड़ और हरियाली देखते देखते आपकी आंखे थक जाएंगी लेकिन नजारे खत्म होने का नाम नहीं लेंगे। रेल एक सुरंग में घुसती है, निकलने के बाद दूसरे सुरंग में घुस जाती है। पहाड़ों को काटकर कोंकण रेल के लिए रास्ते बनाए गए हैं। एक तरफ ऊंचे पहाड़ तो दूसरी तरफ गहरी खाई। कोंकण रेल गोवा का बड़ा इलाका तय करते हुए आगे बढ़ती है। रास्ते में काफी दूर तक एक तरफ गोवा का समंदर दिखाई देता है। देश के पश्चिमी तट पर 760 किलोमीटर का सफर कराती है कोंकण रेल। गोवा में कोंकण रेल 105 किलोमीटर का सफर करती है जिसमें जुआरी नदी पर बना पुल अद्भुत है। आप अगर कोंकण रेल के सौंदर्य का पूरा नजारा लेना चाहते हैं तो मुंबई से सुबह खुलने वाली किसी ट्रेन में सफर स्लीपर क्लास से करें। इसके लिए जनशताब्दी या मंडोवी एक्सप्रेस का चयन कर सकते हैं।

गोवा में जुआरी नदी पर पुल। 
कोंकण के रेल मार्ग पर 2000 पुल और 91 सुरंगे हैं। कोंकण रेल मार्ग पर कारबुडे सुरंग सबसे लंबी है। ये 6.5 किलोमीटर लंबाई की है। ट्रेन को 30 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से इस सुरंग को पार करने में 12 मिनट से ज्यादा वक्त लग जाता है। कर्नाटक में कारवार भटकल उडुपी जैसे शहरों से गुजरती हुई कोंकण रेल मार्ग पर ट्रेन सुहाने सफर को तय करती हुई ट्रेन पहुंच जाती है कर्नाटक के मंगलोर। मंगलोर यानी ऐश्वर्या राय बच्चन के बचपन का शहर।


कोंकण रेल का पहला रेलवे स्टेशन  - रोहा (महाराष्ट्र)
आखिरी रेलवे स्टेशन – ठोकुर (कर्नाटक) 

कुल रेलवे स्टेशन – 59 
कुल दूरी 760 किलोमीटर
बड़े पुल 179 छोटे पुल 1819
कुल तीखे मोड 320 
कुल सुरंगे -91

प्रमुख स्टेशन – वीर, खेड, चिपलूण, संगमेश्वर, रतनागिरी, राजापुर, वैभववाडी रोड, कनकावली, सिंधुदुर्ग, कुदल, सावंतवाडी रोड। 

गोवा में आने वाले प्रमुख स्टेशन - पेरनेम (गोवा) थिविम (गोवा) वेरना, करमाली, मडगांव (गोवा), केनकोना, 

कर्नाटक में आने वाले प्रमुख स्टेशन - कारवार, अंकोला, होनावार, भटकल, कुंदापुरा, उडुपी, ठोकुर।


रोरो सेवा -  रोरो मतलब रोल ऑन रोल ऑफ। इसमें माल से लदे ट्रक सीधे रेलवे वैगन पर लोड कर दिए जाते हैं। उनका पड़ाव आने पर उन्हें फिर रेलवे से सीधे सड़क पर उतार दिया जाता है।यह अनूठी सुविधा कोंकण रेलवे में उपलब्ध है। 26 जनवरी 2014 को कोंकण रेल सेवा ने सफल 16 साल पूरे कर लिए हैं।

कोंकण रेलवे की अधिकृत वेबसाइट - http://konkanrailway.com/english/

-    - विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com

( KONKAN RAIL, GOA, RATNAGIRI, CHIPLUN) 
  

Saturday, October 27, 2012

संतरे के साथ चलती है जिंदगी

मंगला लक्षदीप एक्सप्रेस मुंबई के बाहरी इलाके का रेलवे स्टेशन पनवेल में रुकी है। पनवेल मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनल से 40 किलोमीटर से ज्यादा दूर है। पर अब मुंबई शहर का विस्तार पनवेल तक हो गया है। रेलवे स्टेशन विशाल और साफ सुथरा है। यहां स्टेशन पर संतरे का बड़ा सा गट्ठर लेकर रेल में चढ़े कुशीनगर के अनुराग। कोच मं आते ही आवाज लगाकर संतरे बेचना शुरू कर दिया। हमने संतरे खरीदे। उनसे थोड़ी बातचीत हुई। वे रोज कोंकण रेल मार्ग पर संतरा बेचते हुए रत्नागिरी तक जाते हैं। तकरीबन छह घंटे के सफर में रास्ते में सारे संतरे बिक जाते हैं। वे बताते हैं कि जो नहीं बिके वे सारे संतरे वापसी में बिक जाते हैं। युवा अनुराग संतरा बेचने के साथ साथ बीए की पढ़ाई भी कर रहे हैं। हर साल परीक्षा देने यूपी में अपने शहर कुशीनगर जाते हैं। अनुराग ने बताया कि रोज संतरा बेच कर महीने में 30 से 40 हजार रुपये तक आराम से कमा लेते हैं। उनका कहना है कि कोई सीमा नहीं है कमाई की। और मेहनत करें तो कमाई बढ़ भी सकती है।


कोंकण रेल पर चिपलूण रेलवे स्टेशन। 
जितनी मेहनत करो उतनी कमाई - अनुराग कहते हैं जितनी मेहनत करो उतनी कमाई है। उनकी जिंदगी का फलसफा सुनकर प्रेरणा मिलती है। पढ़े लिखे लोगों में कई बार निराशा दिखती है। लेकिन अनुराग गजब के आशावादी हैं। सरकारी नौकरी पाने की कोशिश की। पर नहीं मिली। लेकिन कोई मलाल नहीं। जिंदगी से कोई शिकायत नहीं। 

वे खूब मेहनत कर रोज नागपुरी संतरे बेचते हैं। तौल का कोई संकट नहीं। दस रुपये का पैकेट तैयार करते हैं। रेल में जो मांगे उसे थमाते जाते हैं। अच्छी खासी कमाई हो जाती है। जिंदगी रेल के साथ चलती रहती है। किसी से कोई शिकवा शिकायत नहीं। 

बताते हैं कि काम इतना बढ़ा लिया है कि छह आठ स्टाफ भी रखा है। यूपी से चलकर आने के बाद महाराष्ट्र भा गया है। परिवार के दूसरे लोग भी यहां रहते हैं। वे सब लोग अलग अलग कारोबार में जुटे हुए हैं। अब अपनी कमाई से महाराष्ट्र के पनवेल में जमीन खरीदने की भी तैयारी कर रहे हैं। तो कहो हिंदी मराठी भाई भाई।
पनवेल के बाद साढ़े तीन घंटे के लगातार रफ्तार के बाद हमारी ट्रेन चिपलूण में रुकी। इसके बाद अगला ठहराव आया रत्नागिरी। वही रत्नागिरी जो हापुस आम के लिए प्रसिद्ध है। कोंकण क्षेत्र शुरू हो चुका है। हरीतिमा मन मोह रही है। सफऱ का आनंद बढ़ता जा रहा है। अगला स्टेशन कणकावली है। महाराष्ट्र का आखिरी ठहराव। 

-    -विद्युत प्रकाश मौर्य 

( ORANGE, RAIL, KONKAN, MAHARASTRA ) 

चलो अब चलते हैं कोंकण रेल के सफर पर....





Friday, October 26, 2012

इगतपुरी में महाराष्ट्र का बड़ा पाव

गोली बड़ा पाव बन चुका है बड़ा ब्रांड। 
दक्षिण की ओर हमारी यात्रा का दूसरा दिन है। मंगला लक्षदीप एक्सप्रेस में सुबह हुई तो मनमाड और नासिक जैसे रेलवे स्टेशन पीछे छूट चुके थे। मनमाड शिरडी के साईं बाबा जाने के लिए नजदीकी रेलवे स्टेशन है। इसके बाद इगतपुरी नामक रेलवे स्टेशन आता है जहां मंगला का लंबा ठहराव है। इगतपुरी में ट्रेन 20 मिनट रूकी। यहां सुबह नास्ते में मिला महाराष्ट्र का प्रसिद्ध बड़ा पाव। 15 रुपये में दो बड़ा पाव। कहीं 20 रुपये का तीन तो कहीं सात रुपये का एक भी। अनादि और माधवी को बड़ा पाव खूब पसंद आया। कई साल पहले मैं मुंबई पहुंचा था तब बड़ा पाव पांच रुपये में दो मिलता था। बड़ा पाव पर भी महंगाई का असर पड़ा है लेकिन अभी भी ये देश कई राज्यों की तुलना में सस्ता नास्ता है। नास्ते बाद ट्रेन चल पड़ी। थोड़ी देर बाद ट्रेन ने मुंबई की सीमा को छू लिया। मुंबई में कल्याण और ठाकुर्ली के बाद आता है पनवेल।

पनवेल में भी ट्रेन 10 मिनट से ज्यादा रूकी। पनवेल के बाद शुरू हो जाती है कोंकण रेल की सीमा। राजेश चौधरी बताते हैं कि वे अपनी कालीकट में चार साल की पढ़ाई के दौरान कई बार कालीकट आना जाना कर चुके हैं। ट्रेन के तीन दिन के सफर में अगर अच्छे सहयात्री मिल जाएं तो सफर और यादगार हो जाता है। राजेश लंबी यात्रा के लिए अपनी मां से गुझिया और नींबू का अचार बनवा कर लाए हैं। हम सबको उनकी गुझिया और अचार का स्वाद खूब पसंद आया।


थोड़ी सी चर्चा बड़ा पाव की। अब महाराष्ट्र का बड़ा पाव राज्य की सीमा से बाहर निकल कर बड़ा ब्रांड बन चुका है। गोली बड़ा पाव समेत कई ब्रांड के स्टोर राज्य से बाहर खुल चुके हैं। साल 2004 में गोली बड़ा पाव ने अपना पहला ब्रांडेड स्टोर मुंबई के कल्याण इलाके में खोला। अब इसके 350 से ज्यादा स्टोर 19 राज्यों के 88 शहरों में खुल चुके हैं। इस स्टोर की कल्पना शिवदास मेनन ने की थी। गोली के कई स्टोर दिल्ली एनसीआर में खुल चुके हैं। 

पुणे और औरंगाबाद में छोटू कोल्हापुरी की है धूम। 
गोली वडा पाव में एक क्लासिक बड़ा पाव की कीमत 25 रुपये है। कीमत की लिहाज से ये फुटपाथ के स्टाल पर बिकने वाला बड़ा पाव से तीन गुना महंगा है। इसके अलावा आप कई वेराइटी का स्वाद ले सकते हैं यहां। अब गोली बड़ा पाव ने होम डिलेवरी भी शुरू कर दी है। 

बड़ा पाव में दूसरा बड़ा ब्रांड जंबो किंग है। ये ब्रांड 2001 में आरंभ हुआ था। जंबो किंग बड़ा पाव के आठ के आसपास ब्रांड बेचता है।  बड़ा पाव का तीसरा ब्रांड है छोटू कोल्हापुरी। औरंगाबाद और पुणे में छोटू कोल्हापुरी के स्टोर देखने को मिले। इसकी दरें भी वाजिब है। हालांकि छोटू कोल्हापुरी की स्वाद थोड़ा तीखा है। 

- - vidyutp@gmail.com

( RAIL, KERLA, PANWEL, MAHARASTRA, BADA PAV ) 

Thursday, October 25, 2012

मंगला लक्षदीप एक्सप्रेस से केरल की ओर...

बने दोस्त -  राजेश चौधरी के साथ अनादि कोंकण रेल के एक स्टेशन पर। 
16 दिन में दक्षिण भारत की सैर - सारा देश घूम लेने की तमन्ना बहुत से लोगों की होती है। पर इस पूरे हिंदुस्तान में बड़ा हिस्सा दक्षिण भारत का है जो उत्तर भारत से काफी अलग है। दक्षिण में घूमना एक खुशनुमा एहसास की तरह है। खान-पान, लोग, धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल सब कुछ मन मोहते हैं। मुझे दक्षिण बार बार बुलाता है। मेरी पहली दक्षिण की यात्रा 1992 में हुई थी। उसके बाद 2005 में तकरीबन एक साल हैदराबाद में नौकरी करने का मौका मिला। पर साल 2012 में सपरिवार दक्षिण भारत के कई स्थलों को घूमने का कार्यक्रम बनाया। सोलह दिन में पांच राज्यों के 12 प्रमुख शहर। बिना किसी ट्रेवल टूर आपरेटर के पूरी यात्रा की योजना खुद तैयार की। पुराने यात्रा वृतांत और इंटरनेट पर रिसर्च करके रेल टिकट और होटल आदि अग्रिम बुक कर लिए और हम निकल पड़े एक लंबी यात्रा पर।

दिल्ली से दक्षिण भारत की ओर जाना हो तो एक रास्ता नागपुर होकर जाता है तो दूसरा कोंकण रेल से गोवा होकर। हमने दक्षिण के सफर के लिए गोवा होकर जाने वाला रास्ता चुना। क्योंकि तमन्ना थी कोंकण रेल की हरी भरी वादियां देखते हुए दक्षिण पहुंचने की। इसके लिए ट्रेन चुनी 12617 -मंगला लक्षदीप एक्सप्रेस। दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से हर सुबह 9.20 बजे खुलने वाली ये ट्रेन कई राज्यों को जोड़ती है। दिल्ली से शिरडी,नासिक, गोवा जाने वालों के लिए भी ये ट्रेन मुफीद रहती है। तो केरल जाने वालों के लिए बहुत पुरानी ट्रेन है मंगला एक्सप्रेस। पचास घंटे से ज्यादा सफर कर सात राज्यों से होते हुए ऐतिहासिक शहर कोचीन पहुंचती है। हालांकि ये ट्रेन लक्षद्वीप नहीं जाती पर, यह कोचीन जाती है, जहां से लक्षद्वीप के लिए पानी के जहाज चलते हैं इसलिए इस ट्रेन के नाम के साथ लक्षद्वीप जुड़ा हुआ है। हालांकि कोचीन से भी लक्षद्वीप 25 घंटे रास्ता है पानी के जहाज से।  

मंगला लक्षद्वीप एक्सप्रेस का रास्ते में कुल 47 रेलवे स्टेशनों पर ठहराव है। सुबह नौ बजे दिल्ली के निजामुद्दीन स्टेशन पर हमलोग ट्रेन के स्लीपर कोच में जगह ले चुके थे। ट्रेन का सफर यादगार रहा। मंगला देश की सबसे लंबी सुपरफास्ट श्रेणी की ट्रेन है। इस ट्रेन पर हमें 52 घंटे गुजरना है यह सुनकर सात साल के अनादि रोमांचित हैं। वैसे दक्षिण भारत की ओर जाने वाली ज्यादातर रेलगाड़ियां निजामुद्दीन स्टेशन से ही खुलती हैं।

जब हमारी ट्रेन मथुरा पहुंची तो रेल में हमारे सहयात्री बने अलवर से आए पिता-पुत्र। राजेश चौधरी एनआईटी, कालीकट से एमटेक करने के बाद अब दीक्षांत समारोह में डिग्री लेने जा रहे हैं। साथ में पिता भी जा रहे हैं। 24 साल के प्रोफेसर राजेश हमारे नन्हे अनादि के तुरंत दोस्त बन गए। दोनों एक दूसरे का ज्ञान बढ़ाने में जुटे हैं। राजेश बताते हैं कि चार साल कालीकट ( अब कोझिकोड) में पढ़ाई करने के दौरान अनगिनत बार इस रेल मार्ग से सफर करना पड़ा है। ग्वालियर स्टेशन आया तो उनके कुछ और दोस्त ट्रेन के सहयात्री बने जो अपने पिता के साथ कालीकट डिग्री लेने जा रहे हैं। उन लोगों के साथ वार्ता करते हुए सफर कटता रहा। 


चलो चलें केरल की ओर। 
मध्य प्रदेश में सांची का छाछ पीते हम रात को भोपाल पहुंचे। वहां हमारे पुराने साथी प्रकाश नारायण सिंह रेलवे स्टेशन पर मिले। प्रकाश हमारे साथ महुआ चैनल में काम कर चुके हैं। अब भास्कर के इंटरनेट संस्करण में कार्यरत हैं। वे स्टेशन पर कुछ खाने पीने का सामान लेकर आए थे। मिल कर मन भावुक हो गया। रात के नौ बज चुके हैं। भोपाल से ट्रेन आगे बढ़ी तो हमलोग सो गए। कब इटारसी, खंडवा गुजरा पता नहीं चला। ट्रेन महाराष्ट्र के मनमाड में रूकी तो नींद खुली। साईं बाबा के दरबार में जाने वाले कुछ लोग उतर चढ़ में लगे थे।

यात्रा मार्ग और पड़ाव - दिल्ली से कोच्चि, तिरुवनंतपुरम, कन्याकुमारी, मदुरै, रामेश्वरम, कोयंबटूर, मेट्टुपालयम, ऊटी, मैसूर, बेंगलुरु, तिरुपति, हैदराबाद, दिल्ली )  
- vidyutp@gmail.com



( RAIL, MANGALA LAKSHDEEP EXPRESS, KERLA) 

Wednesday, October 24, 2012

बड़े काम के हैं ये मसाले


रसोई में रोजाना इस्तेमाल किए जाने वाले मसाले आपको अलग तरह के रोगों से बचाते हैं। वहीं ये कई तरह की बीमारियों के उपचार भी हैं। कई बार आप बीमारी से परेशान होते हैं पर इसका उपचार आपके रसोई घर में ही मौजूद रहता है।  

तो आइए जानते हैं इनके बारे में-
हींग – तेज खांसी का अच्छा निदान है। पेट दर्द में भी करती है काम।
तेज पत्ता – अच्छा एंटी बैक्टरिया है। चर्म रोगों में भी राहत देता है।
इलायची – बुरी सांस को रोकता है। पाचन संबंधी बीमारियों में लाभकारी। लगातार इलायची चबाना डायबिटिज को भी नियंत्रित करता है।
लाल मिर्च- कोलेस्ट्राल बढ़ने से रोकता है। शरीर में कैलोरी बर्न करने में भी मददगार।
दालचीनी – शरीर में इंसुलीन की मात्रा को प्राकृतिक तरीके से बढ़ाता है। रक्त में कोलेस्ट्राल की मात्रा कम करता है।
लौंग -  दांत दर्द में लाभकारी, छाती के दर्द, बुखार, खांसी, सर्दी में लाभकारी।

धनिया – जोड़ों  के दर्द में लाभकारी, एलर्जी और बुखार में भी लाभकारी।
जीरा – लोहा का अच्छा स्रोत, शरीर की पाचन क्रिया को ठीक रखता है। जीरा के साथ उबला हुआ पानी दस्त में लाभकारी है।
करी पत्ता करी पत्ता ब्लड शूगर घटाने में लाभकारी है। वहीं इसके सूखे पत्तों से कई तरह की दवाएं तैयार की जाती हैं।
मेथी – मां का दूध बढ़ाने में लाभकारी है। डायबिटिज और कोलेस्ट्रोल घटाने में भी लाभकारी।
लहसुन – सर्दी और खांसी में लाभकारी
अदरक – पाचन तंत्र को दुरुस्त रखता है। सर्दी और खांसी में भी लाभकारी।
जायफल – दमा में लाभकारी, दिल के रोग में भी लाभकारी।
काली मिर्च – सर्दी खांसी और दर्द में लाभकारी। पाचन तंत्र को भी रखता है दुरुस्त।
जाफरान, केसर – त्वचा के रोगों में लाभकारी, दमा, सर्दी, खांसी का अच्छा उपचार।
चक्र फूल – पाचन तंत्र को ठीक रखता है। जोड़ों के दर्द में काफी लाभकारी।
हल्दी – त्वचा के रोगों में लाभकारी। हल्दी का पाउडर कटे हुए घाव में राहत देता है। मधुमेह में भी लाभकारी है।  

-    -  -- विद्युत प्रकाश मौर्य ( MASALA, KITCHEN )   

Monday, October 22, 2012

पुष्कर- जगतपिता का एक मात्र मंदिर है यहां


भगवान शिव के मंदिर हर गांव शहर में होते हैं। भगवान विष्णु के भी मंदिर होते हैं। लेकिन जगत पिता ब्रह्मा का एक मात्र मंदिर है धरती पर। वह है रास्थान के पुष्कर में। 
कहा जाता है देवता अमृत का सेवन कर रहे थे। इस दौरान अमृत का एक टुकड़ा पुष्कर में गिरा और यहां बनाया ब्रह्मा जी ने अपना खुद का मंदिर। वर्तमान में जो मंदिर बना है उसका निर्माण 14वीं सदी में हुआ था। मंदिर मुख्य रूप से संगमरमर के पत्थरों से बना हुआ है। कार्तिक पूर्णिमा के समय यहां विशाल मेला लगता है। कहा जाता है यह एकमात्र मंदिर है जिसे औरंगंजेब ने नष्ट नहीं किया। 


मंदिर की कथा - मंदिर की एक और कथा है। कहा जाता है कि भगवान ब्रह्मा ने जगत भलाई के लिए यज्ञ करना चाहा। इसके लिए जब वो शुभ मूर्हत आया तो उनकी पत्नी मां सरस्वती ने उन्हें इन्तजार करने को कहा। इससे यज्ञ में विलंब होने लगा। क्रोध में आ कर ब्रह्मा जी ने गायत्री नाम की स्त्री से विवाह कर लिया और उन्हें अपने साथ यज्ञ में बैठाया ताकि समय रहते शुभ मूहर्त में यज्ञ का कार्य पूर्ण हो सके। सरस्वती जी ने जब अपने स्थान पर दूसरी स्त्री को बैठे देखा तो वे क्रोध में आ गईं और ब्रह्मा जी को श्राप देते हुए कहा कि आपकी धरती पर कहीं भी और कभी भी  पूजा नहीं होगी। जब उनका क्रोध थोड़ा शांत हुआ तो देवी-देवताओं ने मां सरस्वती को विनय की कि ब्रह्मा जी को इतना कठोर दण्ड न दें।  देवी-देवताओं की बात का मान रखते हुए मां सरस्वती ने कहा कि ब्रह्मा जी का केवल एक ही मंदिर होगा जो पुष्कर में स्थित होगा और वो केवल यहीं पर पूजे जाएंगे। 

पुष्कर मिट्टी में खालिश राजस्थान की खुशबू है। चारों तरफ पहाड़ियों से घिरा पुष्कर दुनिया से कुछ अलग सा लगता है। पुष्कर बस स्टैंड से पैदल आगे बढ़ते जाइए। आ जाएगा ब्रह्मा जी का मंदिर। मंदिर में पूजा अर्चना करने के बाद पुष्कर सरोवर में जाना न भूलें। लोग पुष्कर सरोवर में भी पूजा करके अपने परिवार के लिए उन्नति की कामना करते हैं। यहां पूजा कराने के लिए पंडे सदैव मौजूद रहते हैं। 

जगतपिता के मंदिर के अलावा पुष्कर में कई और मंदिर भी हैं। यहां ऊंट की सवारी का भी आनंद लिया जा सकता है। साल में एक बार पुष्कर में मेले का आयोजन होता है। तब पुष्कर में सैलानियों की भीड़ बढ़ जाती है। लेकिन वैसे भी पुष्कर में सालों भर सैलानी पहुंचते हैं। पुष्कर की आबोहवा खास तौर पर विदेशियों को बहुत भाती है। कई विदेशी तो यहां हफ्तों ठिकाना बनाए रहते हैं। इसलिए पुष्कर की दुकानों पर अब दाल बाटी चूरमा ही नहीं बल्कि चाइनीज डिश और मोमोज भी खाने को मिल जाएंगे।
अजमेर को पड़ाव बनाकर पुष्कर के अलावा अजमेर शरीफ की ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर जाया जा सकता है। महान सूफी संत की दरगाह पर चादर चढाने और मन्नत मांगने देश ही नहीं पड़ोसी मुल्क से भी बड़ी संख्या में लोग आते हैं। अजमेर में ऐतिहासिक ढाई दिन का झोपड़ा देखा जा सकता है।

कैसे पहुंचे - पुष्कर राजस्थान में जयपुर से तकरीबन 150 किलोमीटर आगे है। पुष्कर पहुंचने के लिए आप कहीं से भी अजमेर पहुंचे। अजमेर में ही आप किसी होटल में अपना ठहराव कर सकते हैं। यहां से पुष्कर महज 20 किलोमीटर है। सिर्फ बसें जाती हैं। पहाड़ी के एक तरफ अजमेर दूसरी तरफ पुष्कर। 
- माधवी रंजना 

( PUSHKAR, BARHMA TEMPLE, AJMER, RAJSTHAN ) 

Saturday, October 20, 2012

दुनिया भर का अनूठा संग्रह है सलारजंग म्यूजियम में


एक लड़की को देखने के लिए लड़के वाले उसके घर आए हैं। लड़की साजो श्रंगार कर तैयार होती है। वह अपने भाइयों के बीच अपने भावी दुल्हे को देखने के लिए पहुंचती है। इस दौरान वह कैसी शरमाई और सकुचाई सी होती है। इसका खूबसूरत चित्रण एक कलाकार ने किया। सफेद संगमरम पर बनी ये नायाब मूर्ति एक ही पत्थर से बनी है। मूर्ति इतनी सुंदर है कि आप एक बार देखें तो काफी देर तक नजर नहीं हटती। नवाब ने अपनी विदेश यात्रा के दौरान ये मूर्ति पसंद आ गई। नवाब ने महंगी कीमत देकर ये मूर्ति खरीदी और इसे मंगाने में भी काफी राशि खर्च की। इस नयनाभिराम मूर्ति को हैदराबाद के सलारजंग म्यूजियम में देखा जा सकता है।

हैदराबाद शहर के बीचों बीच मूसी नदी के किनारे स्थित है सलारजंग म्यूजियम। ये देश का सबसे बडा संग्रहालय है जहां निजी संग्रह संकलित है। वैसे ये देश का तीसरा बड़ा संग्रहालय है। यहां हैदराबाद के निजामके निजी संग्रह का बहुत बड़ा संग्रह देखा जा सकता है। संग्रहालय देखने के लिए आपको पूरा एक दिन का समय निकालना पड़ेगा। संग्रहालय के साथ यहां समृद्ध पुस्तकालय भी है।

सलारजंग 3 का संग्रह -  हैदराबाद के सातवें निजाम मीर यूसुफ अली खान बहादुर या ( सलारजंग तीन ) ने दुनिया भर के देशों से अनूठी कलाकृतियों का संग्रह मंगाने में काफी राशि खर्च की। 2 मार्च 1949 को अपने निधन तक वे अपने संग्रहालय को समृद्ध करने में लगे रहे। उनके द्वारा किए गए 48 हजार वस्तुओं के नायाब संग्रह को इस म्यूजियम में देखा जा सकता है। किसी निजी व्यक्ति द्वारा किया गया इतना बड़ा संग्रह और कहीं भी नहीं मिलता।
 संग्रहालय में निजाम परिवार के हीरे जवाहरात के ज्वेलरी का बड़ा कलेक्शन देखा जा सकता है। अरबों रुपये के इस कलेक्शन को 1995 में संग्रहालय में शामिल किया गया। संग्रहालय में नायब पेंटिंग और मूर्तियों का कलेक्शन तो है ही एक गैलरी में किस्म किस्म की घड़ियां एक ही जगह देखी जा सकती हैं। संग्रहालय में भारतीय कला का नहीं बल्कि दुनिया के अलग अलग देशों के की मूर्ति कला और पेंटिंग का नमूना एक ही जगह देख सकते हैं।


कुल 38 दीर्घाएं हैं सलारजंग म्युजियम में। जिनमें हाथी-दांत की बने सामानों की दीर्घा, सजावट के सामान, अलग अलग तरह के हथियार और संगीतमय घड़ियां लोगों का मनमोह लेती हैं। यहां अंदर कैमरा ले जाने पर रोक है। अब सलारजंग म्यूजियम में 50,000 से ज्यादा पुरातात्विक वस्तुओं का डिजिटाइजेशन हो गया है। 

16 दिसंबर 1951 को सलारजंग म्यूजियम को देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने इस संग्रहालय को राष्ट्र को समर्पित किया।  मूसी नदी के किनारे स्थित संग्रहालय की भव्य इमारत 1968 में बनी है। सन 2000 में इसमें दो और इमारतें जोड़ी गई हैं। संग्रहालय समय समय पर वर्कशाप का भी आयोजन करता रहता है।

- विद्युत प्रकाश मौर्य

Thursday, October 18, 2012

बच्चों को विश्वास में लेकर करें स्थान परिवर्तन

जब कभी आप स्थान परिवर्तन करें बच्चों को भी विश्वास में लें उन्हें यह समझाने की कोशिश करें की हमें क्यों यह जगह बदलनी पड़ रही है। नई जगह पर हमारे लिए जाना क्यों जरूरी है। साथ ही नई जगह पर जाने से हमें क्या क्या लाभ हो सकते हैं। 

आप यह न समझें की बच्चे कुछ नहीं समझते हैं। बच्चे काफी कुछ समझते हैं। उनके साथ दोस्ताना व्यवहार करके अपनी बातें साझा करें, आपको इसका लाभ मिलेगा। परिवर्तन का बच्चों पर जो मानसिक रूप से बुरा असर पड़ता है बच्चे उससे उबर सकेंगे। 

मैं जब अपनी भांजी से एक बार मिला तो उससे पूछा कि नई जगह में आकर कैसा महसूस कर रही हो तो उसका जवाब था कि पुराने स्कूल से नया स्कूल अच्छा जरूर है पर मैं अपने पुराने दोस्तों को काफी मिस कर रही हूं। उसे कई महीने नए स्कूल में अपने नए दोस्तों के साथ सामंजस्य बिठाने में लग गए।

बार बार स्कूल बदलने का असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है। कई बार सिलेबस बदल जाता है तो बच्चों को नए सिलेबस के अनुसार पढ़ाई करनी पड़ती है। अगर सिलेबस वही है तो भी स्कूल बदलने पर टीचर बदल जाते हैं , दोस्त बदल जाते हैं वातावरण बदल जाता है। कई बच्चों को अपने पुराने टीचर बहुत अच्छे लगते हैं तो कुछ को पुराने दोस्त। ऐसे में नए जगह में सब कुछ बदल जाने पर किसी के लिए सब कुछ सामंजित कर लेना आसान नहीं होता। अक्सर हम बच्चों की  मानसिक समस्याओं की ओर ध्यान नहीं देते।

 अगर आपका बच्चा लगातार निराश रहता हो तो उससे दोस्ताना व्यवहार कर उसकी समस्या के बारे में जानना चाहिए। याद रखिए अगर आप अपने बच्चे के संग दोस्ताना व्यवहार करते हैं तो आपका बच्चा खुद को आपके करीब महसूस करता है। अगर आप उसके साथ ज्यादा बात नहीं करते हैं तो धीरे-धीरे उसके साथ दूरियां बढ़ने लगती है। इसलिए आप हमेशा थोड़ा सा समय अपने बच्चे के लिए निकालें और उसका हाल चाल जरूर पूछें। उसके उसके नए स्कूल के बारे में पूछें उसके नए दोस्तों के बारे में पूछें। इसका आपको लाभ मिलेगा।  

आप कई बार घर बदलते हैं. घर बदलने के कई कारण हो सकते हैं. कई बार नौकरी में तबादले कारण तो कई बार किसी और कारण से घर बदलना पड़ता है. घर बदलने में आपको तो परेशानी होती ही है. साथ ही बच्चों को भी काफी परेशान होना पड़ता है। ऐसे में जब आप घर बदलते हों बच्चों का खास ख्याल रखने की जरूरत है।

 हर बदलाव का असर हर किसी पर पड़ता है. जैसे आप हिंदी भाषी क्षेत्र से किसी अहिंदी भाषी क्षेत्र में जाते हैं वहां आपको नए लोगों के साथ निभाने में दिक्कत होती है. ऐसी ही दिक्कत बच्चों के साथ भी आती है. ऐसे मामले में बच्चों पर खास तौर पर ध्यान देने की जरूरत है. क्योंकि बच्चों को भी नए माहौल में खुद को सामंजित करने में काफी परेशानी आती हैइसे बड़े ध्यान से समझने की जरूरत है।

सामंजस्य बनाने की कोशिश करें - बच्चों को अपने पुराने स्कूल को छोड़ना पड़ता है पुराने दोस्तों को छोड़ना पड़ता हैपुराने पड़ोसियों को छोड़ना पड़ता है। ऐसे में बच्चे कई बार नई जगह पर काफी उदास रहते हैंभले ही नई जगह कितनी भी अच्छी क्यों न हो पर पुरानी जगह की याद बच्चों को सताती रहती है। हम जिस तेजी नई जगह में खुद को सामंजित कर लेते हैं कई बार बच्चे खुद को इस तरह नहीं कर पाते हैं। ऐसे में बच्चों का खास ख्याल रखने की जरूरत है। नहीं तो हो सकता है बच्चे लगातार तनाव में रहने लगें और इसका असर उनकी पढ़ाई लिखाई पर पड़ सकता है।


-         विद्युत प्रकाश मौर्य   vidyutp@gmail.com 

 ( TRAVEL, CHILD, CHANGE, TRANSFER ) 

Tuesday, October 16, 2012

गोलकुंडा के किले की चढ़ाई

गोलकुंडा के किले से हैदराबाद का नजारा...

आजादी से पहले देश में दो हैदराबाद हुआ करते थे। एक सिंध हैदराबाद ( अब पाकिस्तान में ) दूसरा हैदराबाद डेक्कन ( दक्खन) । हैदराबाद डेक्कन शहर के बाहरी इलाके में चारमीनार से 13 किलोमीटर दूर है गोलकुंडा का किला। आठ किलोमीटर के के दायरे में फैले इस किले पर चढ़ाई करना किसी पहाड़ पर चढ़ाई करने से कम नहीं है। गोलकुंडा का किला घूमने के लिए पूरा एक दिन का समय चाहिए। हमने एक दिन का समय निकाला। हमारे साले रवि, पत्नी माधवी और दो साल के अनादि साथ थे।

किले के शिखर तक पहुंचने के लिए 600 से ज्यादा सीधी सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। किला तकरीबन 400 फीट ऊंचा है। इस बीच रास्ते में कई अलग अलग तरह के ऐतिहासिक भवन हैं। किले की सबसे ऊंचे बुर्ज पर चढ़ने के बाद यहां हमेशा ठंडी ठंडी तेज हवाएं चलती रहती हैं। वहां से पूरे हैदराबाद शहर का नजारा ऐसा लगता है मानो ईश्वर ने अपनी कूची से कोई शानदार की पेंटिंग रच डाली हो। किले की इस ऊंचाई से 30 किलोमीटर दूर तक भी नजारा देखा जा सकता है। यानी दुश्मन पर चौकस निगाहें रखने के लिए मुफीद जगह। 

किले के टॉप पर एक कैफेटेरिया भी बना है। हालांकि किले की ऊंचाई पर चढ़ने के बाद पता चला कि हमने गलत रास्ता चुन लिया था। चढ़ाई का रास्ता लंबा वाला है जिसमें कम सीढ़ियां हैं। उतरने के लिए सीढ़ियों वाला रास्ता चुनना चाहिए था।

किले के साथ कई ऐतिहासिक कथाएं जुड़ी हैं। वारांगल के काकातीय राजाओं ने इसे बनवाया था तब यह मिट्टी का किला था। मुहम्मद शाह और कुतुब शाह के जमाने में इसे विशाल चट्टानों से बनवाया गया। देश के सबसे बड़े और सुरक्षित किलों में से एक गोलकुंडा बहमनी के शासकों के भी अधीन रहा। किसी जमाने में गोलकुंडा के इलाके के हीरे के खान से कोहेनूर हीरा निकला था। बताया जाता है कि ये पूरा किला एक बड़े ग्रेनाइट के पहाड़ पर बना है। इसके बगल में मूसी नदी बहती है।
-    विद्युत प्रकाश 
( ( GOLKUNDA FORT, HYDRABAD, TELANGANA ) 

Sunday, October 14, 2012

रेलगाड़ियों का इतिहास देखने यहां आइए...

रेल म्युजिम - जानकारी के साथ मौज- मस्ती भी।
छुक...छुक करती आई रेल....रेलगाड़ी ने डेढ़ सौ साल के इतिहास में भारत में बहुत बड़ा बदलाव देखा है। आज भारतीय रेल का जितना बड़ा नेटवर्क है, उसके विकास की कहानी और भी रोचक है। रेलगाड़ी पर न जाने कितने गीत बने हैं और कितनी कहानियां लिखी गई हैं। पर भारतीय रेल ने रेलवे की इस विकास यात्रा को एक जगह संजोने के लिए नई दिल्ली के चाण्क्यापुरी में नेशनल रेल म्यूजियम बनाया है। कई एकड़ में फैले इस रेल म्यूजियम में आप भारतीय रेल के पूरे इतिहास को अपनी आंखों के समाने देख सकते हैं। सौ साल पुराने इंजन, महाराजाओं के सैलून,  पुरानी पटरियां देख सकते हैं। साथ ही रेलवे जुड़ी दुर्लभ तस्वीरें और मॉडल भी यहां देख सकते हैं। खास तौर पर बच्चों के लिए रेल म्यूजियम बड़ी रोचक जगह है। बच्चे यहां आकर अपना ज्ञान तो बढ़ाते ही हैं वे खुश भी होते हैं ज्वाय ट्रेन में सफर करके।
 स्टीम लोकोमोटिव आरएमआर एफ 734


रेल म्यूजियम आकर बच्चे आनंदित तो होते ही हैं साथ ही वे अपना ज्ञान भी बढ़ते हैं पर यह बड़े लोगों के लिए कम रोचक जगह नहीं है। आज हम राजधानी और शताब्दी एक्सप्रेस जैसी ट्रेनों में  यात्रा करते हैं पर रेलगाड़ियों का यह सुविधायुक्त सफर कैसी कैसी पटरियों से सफर करके यहां पहुंचा है। यह सब कुछ यहां जाने को मिल सकता है। जब देश गुलाम था तो भारत में अगल अलग रजवाडो ने
अपनी-अपनी रेलगाड़ियां चलाई थीं।
हसंग - ए 885 - भारतीय उपमहाद्वीप में चला सबसे छोटा स्टीम इंजन

हैदराबाद निजाम का सैलून कैसा था उसकी रेलगाड़ी का इंजन कैसा था। नागपुर, जयपुर, भावनगर के राजाओं ने कैसी अपनी रेल चलाई यह सब कुछ आप यहां देख सकते हैं। थोड़ा अतिरिक्त शुल्क देकर आप राजाओं के सैलूनों का अंदर से भी नजारा कर सकते हैं। भारतीय उप महाद्वीप में चलने वाला सबसे छोटा भाप इंजन हसंग था, जो 1897 में बना था। इसे रेल संग्रहालय में देखा जा सकता है।

रेल म्यूजियम में आकर आप यह भी जान सकते हैं पहले कभी भारतीय रेल में थर्ड क्लास का भी डिब्बा हुआ करता था। उस डिब्बे में टॉयलेट नहीं होते थे। फिर उसमें टॉयलेट कैसे लगा इसकी कहानी रोचक है। आम म्यूजियम में थर्ड क्लास का डिब्बा भी देख सकते हैं।

-  --   विद्युत प्रकाश 

( ( RAIL MUSEUM, DELHI, STEAM HISTORY ) 


Saturday, October 13, 2012

राष्ट्रीय रेल संग्रहालय- यहां जानिए भाप इंजन का सफर


आज भारतीय रेल से स्टीम इंजन की पूरी तरह विदाई हो चुकी है। अब रेलगाड़ियां पूरी तरह बिजली के इंजन या डीजल इंजन से चलती हैं। पर किसी जमाने में सिर्फ स्टीम इंजन ही एक मात्र विकल्प था। रेलगाड़ियां कोयले से बनने वाले भाप से चलती थीं। एक बार फिर से पुराने भाप इंजन अकबर को नई दिल्ली से सरिस्का तक चलाने की तैयारी हो रही है। यह सैलानियों के लिए खास आकर्षण का केंद्र होगा। लेकिन आप दिल्ली के रेल म्यूजियम में आकर भाप इंजन का पूरा इतिहास देख सकते हैं। किसी जमाने में छोटी-छोटी पटरियां थीं और छोटी-छोटी रेल गाड़ियां। ब्राड गेज आने से पहले मीटर गेज, नैरो गेज और स्पेशल गेज पर दौड़ती ट्रेनें। रेल म्यूजियम में आप स्टीम इंजन का पूरा जीवंत इतिहास देख सकते हैं। यहां आप अपनी आंखों से देख और पढ़ सकते सकते हैं भारतीय रेल के विकास की कहानी।
इसके अलावा नेशनल रेल म्यूजियम का खास आकर्षण है, छोटी सी रेलगाड़ी। छोटा सा इंजन और छोटे-छोटे डिब्बे। यह रेलगाड़ी आपको पूरे म्यूजियम का सफर कराती है दस रूपये के टिकट में। इतनी छोटी रेलगाड़ी अब देश के किसी कोने मे नहीं चलती है।

 
अगर आप घूमते-घूमते थक जाएं जाएं तो खाने पीने के लिए रेस्टोरेंट भी है। साथ ही अगर बोटिंग करनी है तो छोटे तालाब में नावें आपका इंतजार कर रही हैं। अब रेलवे ने यहां एक आडोटिरयम और कान्फ्रेंस रूम भी बनवा दिया है। यानी पूरी तरह से पिकनिक मनाने के साथ ही ज्ञान बढ़ाने की भी जगह है रेल म्यूजियम।

ऐसे शुरू हुआ रेल में शौचालय - किसी जमाने में भारतीय रेल के कोच में शौचालय नहीं होते थे। पर 1909 में अखिल चंद्र सेन के साहेबगंज डिविजनल दफ्तर को लिखे एक बड़े ही कौतूकपूर्ण तरीके से लिखे गए पत्र ने भारतीय रेलों में शौचालय बनवाने की शुरूआत की। रेल संग्रहालय में उनका ये पत्र बड़े डिस्प्ले में देखा जा सकता है। वहां अंगरेजी में लिखे गए पत्र का हिंदी अनुवाद भी पेश किया गया है। यह था उनका अंगरेजी में लिखा गया मूल पत्र -   
I am arrive by passenger train Ahmedpur station and my belly is too much swelling with jackfruit. I am therefore went to privy. Just I doing the nuisance that guard making whistle blow for train to go off and I am running with 'lotah' in one hand and 'dhoti' in the next when I am fall over and expose all my shocking to man and female women on plateform. I am got leaved at Ahmedpur station.
"This too much bad, if passenger go to make dung that dam guard not wait train five minutes for him. I am therefore pray your honour to make big fine on that guard for public sake. Otherwise I am making big report! to papers."


कैसे पहुंचे - रेल म्यूजियम पहुंचना बहुत आसान है क्योंकि यह दिल्ली के सबसे पॉश इलाके चाणक्यापुरी में स्थित है। आप केंद्रीय सचिवालय से बस नंबर 680 और 620 पकड़ कर रेल संग्रहालय जा सकते हैं। निकटतम सुगम मेट्रो स्टेशन उद्योग भवन हो सकता है। यह रिंगरोड पर मोतीबाग के करीब है। रेल म्यूजियम सालों भर खुला रहता है। पर हर सोमवार का बंद रहता है। समूह में आने वाले स्कूली बच्चों के लिए प्रवेश टिकट में डिस्काउंट भी है। 

-    - विद्युत प्रकाश मौर्य 

( RAIL MUSEUM, DELHI, STEAM HISTORY )