Thursday, August 30, 2012

चंबल के आंचल में (1)

मई और जून 1992 का महीना। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में ग्रीष्मावकाश की घोषणा होने के साथ हमने तय किया कि इस बार घर नहीं जाकर कहीं घूमने जाना है। इसी दौरान हमारे पास महात्मा गांधी सेवा आश्रम, जौरा मुरैना से संपूर्ण साक्षरता अभियान में बतौर शिक्षक पढ़ाने का आमंत्रण आया। हमने एक महीने से कुछ ज्यादा वक्त वहां बीताने का तय किया। वाराणसी से बुंदेलखंड एक्सप्रेस में मैं और दिग्विजय नाथ सिंह सवार हुए। हमारी ट्रेन, इलाहाबाद के बाद चित्रकूट, बांदा, कालांजर, महोबाओरछाझांसी होती हुई ग्वालियर पहुंची। ग्वालियर में हम युवा साथी आनंद पंडित से उनके घर जाकर मिले। ग्वालियर का जय विलास पैलेस किला देखा। उसके बाद हम ग्वालियर से बस से महात्मा गांधी सेवा आश्रम, जौरा पहुंचे।

ये वही आश्रम है जहां 1972  में  जय प्रकाश नारायण के सानिध्य में चंबल के डाकूओं के सरेंडर हुए। ये आश्रम अब डाकूओं के परिवारों के पुनर्वास के लिए कई तरह के प्रोजेक्ट चलाता है। जौरा आश्रम में कई तरह के खादी ग्रामोद्योग की वस्तुओं का उत्पादन होता है लेकिन आश्रम की बनी हुई दरी उत्कृष्ट गुणवत्ता वाली मानी जाती है। 

जाने माने गांधीवादी कार्यकर्ता पीवी राजगोपाल ने इस आश्रम में लंबा वक्त गुजारा है। यहां के लोग उन्हें बड़े सम्मान से राजू भाई के नाम से याद करते हैं। इस आश्रम में मैं लगातार कई बार जा चुका हूं। राजू भाई के बाद अब रणसिंह परमार इस आश्रम की व्यवस्था देखते हैं। राष्ट्रीय युवा योजना के निदेशक एस एन सुब्बराव ने 1970 में इस आश्रम की स्थापना की थी।


चंबल नदी पर मुरैना और धौलपुर के मध्य पुल। 

सालों इस इलाके में रहकर डाकुओं से संपर्क कर उन्हें सरेंडर के लिए तैयार करने में उनकी बड़ी भूमिका रही। कभी चंबल घाटी में आतंक का पर्याय रहे ये डाकू सरेंडर के बाद इस आश्रम को अपना घर मानते है। वे साल में कई बार होने वाले कार्यक्रमों में इस आश्रम में आते भी हैं। जौरा और आसपास के गांवों में लोगों में जागरूकता लाने के लिए सुब्बराव जी ने 20 से ज्यादा शिविर 70 के दशक में लगाए जिसमें देश के कोने कोने से युवाओं ने आकर श्रमदान किया। ऐसा ही एक गांव है बागचीनी जहां कई शिविर लगाए गए।
 - विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com

(CHAMBAL, JOURA, MORENA, MP, SHEOPUR, SUBBARAO, DIGVIJAY NATH ) 

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