Sunday, September 9, 2012

उफनती चंबल को चीर कर पार कर जाता है काडु (10)

( चंबल 10) 
चंबल दरिया का विस्तार। 
बगदिया हमारे साक्षरता प्रोजेक्ट का गांव नहीं था। यह तो हमारा एक दिन का पड़ाव भर था। हमें तो आगे जाना था। अगले दिन सुबह जय सिंह भाई साहब के घर नास्ते के बाद एक युवक हमें अपने गांव ले जाने के लिए आया था। उसका नाम था काड़ु। हम काडु के साथ चल पड़े। चंबल के बीहड़ो में कुछ किलोमीटर पैदल चलते गए काड़ु के पीछे-पीछे। हमारा अगला पड़ाव था कीर का झोपड़ा। कीर केवट मल्लाह से मिलती जुलती एक बिरादरी है। बगदिया से कच्ची पगडंडियों और ऊंचे नीचे रास्तों से कुछ किलोमीटर पैदल चलने के बाद काडु का गांव आ गया।

काडु 18 साल का श्याम वर्ण का सुडौल देहयाष्टि का युवक है।  उसके पिता मांगीलाल हैं। बहन का नाम चायना है। मां इस दुनिया में नहीं है। काड़ु थोड़ा प्रगतिशील है। क्योंकि अभी तक उसकी शादी नहीं हुई।नहीं तो इस उम्र में गांव में कोई और कुआंरा नहीं। काडु गांव में अपनी छोटी सी दुकान चलाता है। गांव वालों की आवश्यकता की वस्तुएं साबुन, गुड़, बीड़ी आदि बेचता है। रुपये गिनना और पहचानना तो सबको आता ही है इस गांव में। सो इस मायने में साक्षर हैं लोग। लेकिन काडु को लिखना पढ़ना नहीं आता। हमें गांव में पता चला कि काडु बहुत अच्छा तैराक भी है। जब बारिश के दिनों में चंबल नदी अपनी पूरी जवानी पर होती है तब होने वाली तैराकी प्रतियोगिता में काडु चंबल नदी को सबसे तेज गति से पार कर जाता है।


पिछले साल स्थानीय दारोगा ने काडु की तैराकी की गति से खुश होकर उसे 500 रुपये नकद इनाम से नवाजा था। भले काडु अच्छा तैराक है लेकिन उसकी प्रतिभा को संवारने के लिए उसे एशियाई खेल या ओलंपिक तक पहुंचाने के लिए कोई सरकारी योजना इस गांव तक नहीं पहुंच सकी है।
काडु को तो ये पता भी नहीं कि तैराकी प्रतियोगिता भी होती है। राष्ट्रीय स्तर पर खेल की प्रतिभाओं की तलाश करने वाली सरकारी एजेंसियां ऐसे गांव तक क्यों नहीं पहुंच पाती है। अगर अच्छी ट्रेनिंग और मौका मिले तो पक्का काड़ु जैसे लोग ओलंपिक में पदक जीतकर ला सकते हैं।
 काडु हमारी पढ़ाई में भी खूब ध्यान लगाकर काफी कुछ सीख रहा था। हालांकि हमारे आने के आखिरी दिन वह निराश हो गया। यह सोचकर ही हम महीने भर बाद चले जाएंगे तो हमें आगे कौन पढ़ाएगा। इस गांव में हमारा प्रथम गाइड दोस्त सब कुछ काडु ही है। गांव की भाभियां उसके अब तक कुआंरे होने पर उसके साथ मजाक करती हैं। काडु हमें गीत गाकर सुनाता है
हु र्रे...गोरी के आंटो दियो मरोड़...बड़ की छांव में... ( पानी पेड़ की छांव में  गोरी की बाहें पकड़ कर मरोड़ दी...) 

-         --- विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com 
      ( KIR KA JHOPDA, KADU, CHAMBAL RIVER ) 



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