Monday, September 10, 2012

हमारा गांव कीर का झोपड़ा (11)

( चंबल 11) 

कीर का झोपडा वह गांव था जहां हमें एक महीने से ज्यादा वक्त गुजारना था। गांव में सारे लोग केवट बिरादरी के हैं। वही केवट जिसने रामचंद्र को नदी पार कराया था। सभी घर मिट्टी के बने हुए हैं। ज्यादातर लोगों के घर एक कमरे वाले हैं। कोई 150 से ज्यादा लोगों की आबादी होगी इस झोपड़ा में। यह हमारे गांव के तरफ के किसी टोले जैसा है। गांव के लोग मछली पकड़ते जरूर हैं पर उसे बेचते नहीं। चंबल नदी के किनारे बसा गांव बिल्कुल चांद पर ही है क्योंकि गांव से बस स्टाप, पोस्ट आफिस , बैंक, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सब कुछ कई किलोमीटर दूर है। गांव का इकलौता हैंडपंप इन दिनों खराब है। इस हैंडपप की भी हम आगे बात करेंगे।

 चंबल नदी में पानी कम होने के कारण नदी की मुख्य धारा चार किलोमीटर दूर हो गई है। चंबल के पानी से कटकर बना एक खंड़ेदा जो गांव से  दो किलोमीटर दूर है वहीं गांव की पानी की समस्त जरूरतें पूरी करता है। हां समस्त मतलब, नहाना, शौच जाना, कपड़े धोना, खाना बनाना या फिर पीने का पानी सब कुछ इस बरसाती तालाब पर भी निर्भर है।


गांव पहुंचने पर गर्मी तेज हो गई थी। हम अपना सामान रखने के बाद तालाब में काडु के साथ नहाने चले गए। थकान थी सो देर तक नहाते रहे। ये क्या गांव में लौटने के बाद देखा कि गांव में कोई भी मर्द या औरत दिखाई नहीं दे रहा है। काडु ने बताया कि गांव के सारे लोग एक और गांव जो यहां से कई किलोमीटर दूर है वहां भोज खाने चले गए हैं। पूरे परिवार का आमंत्रण है इसलिए आज की शाम गांव में चूल्हा नहीं जलेगा। आपको भी हमारे साथ चलना होगा।
हमारे पास कोई चारा नहीं था। सो मैं और दिग्विजय नाथ सिंह काडु के साथ चल पड़े। छह किलोमीटर तो हम चल चुके थे। अब नए गांव में भोज के लिए शुरू हुआ छह किलोमीटर का जाने का सफर। इस सफर में पता चला कि चंबल के बीहड़ कैसे होते हैं। अगर आपको कोई रास्ता बताने वाला नहीं हो तो मजाल क्या आप अपनी मंजिल तक पहुंच जाएं। कभी इन्ही बीहड़ो में चंबल के डाकू रहते थे। हालांकि अब डाकूओं का डर खत्म हो गया है। हमलोग धीरे धीरे चल रहे थे। लेकिन काडु ने कहा कि मास्टर जल्दी जल्दी गैल काटो। ( रास्ता नापो) हमें समय पर गांव में पहुंचना है। पूरा गांव पहुंच चुका है। सिर्फ हमीं लोग पीछे हैं।
 - vidyutp@gmail.com

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