Sunday, September 16, 2012

लुगाइयां पढ़ गई तो रोटी कौन बनाएगा ( 17)


कीर का झोपड़ा में हमारी क्लास में सिर्फ मर्द की पढ़ने आते हैं। हमने काफी कोशिश की, गांव की महिलाएं भी पढ़े। आते-जाते गांव की महिलाएं हमसे बात करतीं. वे चाहतीथीं कि उनकी भी पढ़ाई हो। लेकिन गांव के मर्दों का उनपर दबाव था। वे कहते थे..लुगाइयां पढ़ गईं तो रोटी कौन बनाएगा। हमने उनको काफी समझाने की कोशिश की। आजकल दुनिया में महिलाएं कहां से कहां पहुंच गई हैं लेकिन इसका गांव वालों में कोई असर नहीं पड़ा।

हालांकि गांव के लोग इतने गरीब नहीं हैं कि भूखमरी का संकट हो लेकिन। गांव में किसी का बैंक खाता नहीं है। गांव के लोगों ने पोस्टआफिस का लाल डिब्बा नहीं देखा। गांव में कभी कोई खत नहीं आता। दिल्ली तो दूर गांव के कुछ ही लोगों ने ग्वालियर का नाम सुन रखा है। आसपास के राजस्थान के कुछ शहरों का नाम जरूर जानते हैं। गांव का कोई आदमी कभी किसी बड़े शहर नहीं गया। पास के कस्बाई बाजार से अपनी जरूरत की सारी चीजें खरीद लाते हैं। यानी एक ऐसा गांव जो बाकी दुनिया से काफी अलग है। इनकी अपनी अलग ही दुनिया है। कई मायनो में ये अच्छा भी हो सकता है। लेकिन हमारे जेहन में आता है कि हिंदुस्तान में कीर का झोपड़ा जैसे हजारों गांव होंगे।
गांव के लोग थानेदार वकील और कलेक्टर के अलावा किसी सरकारी महकमे के अधिकारी को नहीं जानते। हमने सुना गांव में कभी कोई नेता वोट मांगने भी नहीं पहुंचा। स्थानीय नेता जिस चुनाव चिन्ह पर वोट डालने को कहते ये लोग वहीं मुहर लगा देते हैं। जाहिर हैं सरकार भले ही विकास के लिए कई तरह की योजनाएं चला रही हो लेकिन गांव में विकास की किरण नहीं पहुंची।
कवि दुश्यंत याद आते हैं –
यहां आते आते सूख जाती हैं सब नदियां..
मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा।
हालांकि इस गांव के लोगों को सरकार से कोई शिकायत नहीं है।

No comments:

Post a Comment