Saturday, September 15, 2012

और शुरू हो गई हमारी क्लास (16)


गांव में पहुंचने के अगले दिन से ही हमारी क्लास लगनी शुरू हो गई। सुबह आठ बजे से 10 बजे तक दो घंटे की क्लास। इसके बाद सूर्य भगवान का कोप बढ़ जाता था और हम चल पड़ते थे चंबल नदी में नहाने। लौटने के बाद रोटी खाना। उसके बाद कुछ घंटे आराम। पेड़ के नीचे बिना बेडशीट वाली खाट पर सोना। शाम को तीन बजते ही फिर शुरू हो जाती थी हमारी दो घंटे की क्लास। क्लास के बाद गांव के लोगों के लिए नए नए तरह के खेल। इसके बाद एक बार फिर नहाने के लिए चंबल नदी में प्रस्थान। गांव में बिजली नहीं है इसलिए रात में क्लास लगाना मुश्किल था। जल्दी से शाम का खाना खाना और चांदनी रात में आसमान के नीचे खाट लगाकर सो जाना।

संपूर्ण साक्षरता कार्यक्रम लोगों को अक्षर ज्ञान कराने के लिए हमें साक्षरता कीट प्रदान की गई थी। पढ़ाने की तकनीक बहुत वैज्ञानिक थी। छोटे समय में निरक्षर लोगों को अक्षर ज्ञान कराया जा सकता है। उन्हें मामूली पढ़ना। हस्ताक्षर करना और गिनती आदि सिखाई जा सकती है।

हमारी क्लास में 10-12 साल के बच्चों से लेकर 60 साल के बुजुर्ग तक आ रहे थे। नौजवानों में पढ़ाई को लेकर खासा जोश था। वे बच्चों की तरह क्लास में चिल्ला चिल्ला कर अभ्यास करते थे। दूर खड़ी उनकी लुगाइयां क्लास देखकर हंसती थीं। लेकिन छात्रों में उत्साह था। कुछ नहीं समझ में आने पर वे तुरंत पूछते थे- हुरे मास्टर इ काईं हई....( मास्टर ये क्या है ) हम लोग भी अपनी क्लास से उत्साहित थे। दिग्विजय नाथ सिंह क्लास के बाद गीत कराते थे। साक्षरता गान में लोगों को पढ़ाई का महत्व समझाया जाता था।
भाई का प्यारा – पढ़ा लिखा
लुगाई का प्यारा – पढ़ा लिखा
पूरे गांव का प्यारा – पढ़ा लिखा।
गांव के लोग समझ गए कि अक्षर ज्ञान हो जाने के बहुत से फायदे हैं।

- - विद्युत प्रकाश मौर्य  ( KIR KA JHOPDA, CLASS, STUDY ) 

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