Friday, September 14, 2012

और नहीं मिली हमें चाय (15)

साक्षरता स्वंयसेवक के तौर पर ये तय था कि हमारे खाने पीने का इंतजाम गांव के लोग करेंगे और हम गांव में पढ़ाएंगे। पर कीर का झोपड़ा गांव के लोग काफी गरीब थे। इसलिए हमें कार्यक्रम समन्वयक की ओर से सलाह दी गई थी कि आप हर दिन अलग अलग घरों में भोजन करेंगे जिससे एक ही परिवार पर बोझ न पड़े। कीर का झोपड़ा गांव में कोई मुखिया नहीं था। हम पहले दिन काडु के घर मेहमान थे। दो दिन काडु के पिता मांगीलाल और उनकी बेटी चायना ही हमें रोटी खिलाते रहे।

 जब हमें इसका पता चला तो हमने समझाया कि हम पूरे गांव के अलग अलग घरों में खाएंगे। लेकिन मांगीलाल का हमसे ऐसा स्नेह था कि वह बोला – नहीं मास्टर हम ही तुम्हे महीने भर खिलाएंगे। तब हमने और दिग्विजय भाई ने मिलकर तय किया कि हमलोग खुद अलग अलग घरों में अपना भोजन तय करेंगे। हर रोज अपनी क्लास में हम अपने प्रौढ़ छात्रों से तय कर देते थे कि अगले दो दिन या एक दिन का खाना आपके घर होगा। और किसी दिन भूल गए तो किसी भी घर में हमारी रोटी नहीं बनी।

एक दिन गांव में राजेंद्र भाई आए। उन्होंने पूछा आप लोग शहर से आए हो तो रोजाना चाय पीने की आदत होगी। उन्होंने हमारे लिए दो किलो चीनी और चाय पत्ती भिजवा दी ताकि हमें चाय मिल सके। गांव में एक घर में चीनी रखवा दी गई। गांव में बकरी का दूध मिल जाता था। इसलिए चाय बनाना आसान था। दो दिन हमें चाय तो मिली। पर तीसरे दिन से चाय मिलनी बंद हो गई।
चीनी से मेहमानों के लिए खीर बना दी - तब हमने मेजबान से पूछा- भाई चाय क्यों नहीं बनी। मेजबान बोला- घर में मेहमान आ गए थे सो सारी चीनी उन्हें खीर बनाकर खिलाने में खत्म हो गई। इसके बाद के दिनों में हमारी चाय के लाले पड़ गए। खैर हम चाय के इतने तलबगार भी नहीं थे सो हमारा दिन आराम से गुजरता गया।

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